Gandhi- Bharat se Pahle [1, 2015 ed.] 9780143423751, 9788184750270

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Gandhi- Bharat se Pahle [1, 2015 ed.]
 9780143423751, 9788184750270

Table of contents :
मुखपृष्ठ
अनुक्रम
लेखक के बारे में
लेखक की अन्य पुस्तकें
समर्पण
प्राक्कथन
1. मंझली जाति, मंझला दर्जा
2. शाकाहारियों के बीच
3. एक तट से दूसरे तट तक
4. डरबन में वकालत
5. घुमंतू आंदोलनकारी
6. वफादार वकील
7. भूरों के खिलाफ गोरे
8. बहुलतावादी और अतिनैतिकतावादी
9. ट्रांसवाल में उथल-पुथल
10. लंदन में जोड़-तोड़
11. समझौते से संघर्ष की ओर
12. जेल की ओर
13. जोहांसबर्ग में एक टॉलस्टॉयवादी
14. विवेक का कैदी
15. औसत कद का महान नेता
16. सभ्यताओं का आमना-सामना
17. समाधान के प्रयास
18. पुत्र का प्रस्थान, गुरु का आगमन
19. फीनिक्स का डॉक्टर
20. टूटती सीमाएं
21. अलविदा अफ्रीका!
22. गांधी, महात्मा कैसे बने
आभार
स्त्रोतों पर एक नोट
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रामचं गुहा

गां धी भारत से पहले अनुवाद सुशांत झा

अनु म लेखक के बारे म लेखक क अ य पु तक समपण

ा कथन 1. मंझली जा त, मंझला दजा 2. शाकाहा रय के बीच 3. एक तट से सरे तट तक 4. डरबन म वकालत 5. घुमंत ू आंदोलनकारी 6. वफादार वक ल 7. भूर के खलाफ गोरे 8. ब लतावाद और अ तनै तकतावाद 9. ांसवाल म उथल-पुथल 10. लंदन म जोड़-तोड़ 11. समझौते से संघष क ओर 12. जेल क ओर 13. जोहांसबग म एक टॉल टॉयवाद 14. ववेक का कैद 15. औसत कद का महान नेत ा 16. स यता

का आमना-सामना

17. समाधान के यास 18. पु का

ान, गु का आगमन

19. फ न स का डॉ टर 20. टू टती सीमाएं 21. अल वदा अ

का!

22. गांधी, महा मा कैसे बने आभार ोत पर एक नोट संदभ सूच ी पगुइन को फॉलो कर सवा धकार

पगुइन बु स गांधी: भारत से पहले रामचं गुहा का ज म सन 1958 म दे हरा न म आ। गुहा ने द ली और कलक ा म अपनी पढ़ाई पूरी क । साथ ही ओ लो, टडफोड, येल व व ालय और भारतीय व ान सं ान (इं डयन इं ट टयूट ऑफ साइंस) म अ यापन कया। वे वसेनचेफकोलेज जु ब लन म फेलो रहे ह और कैलीफो नया यूनीव सट , बकले म इंडो-अमे रकन क यु नट चेयर व ज़ टग ोफेसर भी रहे ह। दस साल के दर यान तीन महा प म पांच अकाद मक पद पर रहने और इस तरह कई व व ालय म पढ़ाने के बाद आप एक पूणका लक लेखक बन गए और बगलौर को अपना ायी ठकाना बना लया। गुहा ने व वध वषय पर अपनी कलम चलाई है, जसम पयावरणवाद का वै क इ तहास, एक मानवशा ी-आंदोलनकारी क जीवनी, भारतीय केट का सामा जक इ तहास और हमालयी कसान का सामा जक इ तहास आ द शा मल ह। गुहा ारा लखी गई कताब और लेख का अनुवाद बीस से भी यादा भाषा म हो चुका है। गुहा क पु तक और लेख को जो पुर कार मले ह उनम यूके केट सोसाइट लटरेरी अवाड और अमे रकन सोसाइट ऑफ इ वायरमटल ह का लयोपो - हडी ाइस शा मल है।

सुशांत झा एक युवा प कार, राजनी तक व ेषक और अनुवादक ह। मधुबनी ( बहार) के खोजपुर गांव से ता लुक रखने वाले सुशांत ने आईआईएमसी, नई द ली से ट वी प का रता क पढ़ाई क है और उ ह साल 2014 के लए बहार म एसपी सह प का रता स मान भी मल चुका है। सुशांत ने रामचं गुहा क इं डया आ टर गांधी (भारत: गांधी के बाद और भारत: नेह के बाद) के अलावा पै क च क इं डया: ए पो ट (भारत: एक त वीर), रा ल गांधी क जीवनी रा ल और अ खलेश यादव क जीवनी अखलेश यादव: वड ऑफ चज का हद म अनुवाद कया है। सुशांत ने रदशन, इं डया यूज और ेसबीफ जैसी सं ा म भी काम कया है। सुशांत वेब जगत के स य लेखक म से

एक ह और उनका हद म ‘आ पाली’ और अं ेजी म ‘सुशांत झा’ के नाम से लॉग भी है। अखबार , प का और इंटरनेट के लए वतं लेखन। सं त अ न का क यु नकेशन म सी नयर ए डटो रयल कंस टट के तौर पर नोएडा म कायरत ह।

पगुइन ारा हद म का शत रामचं गुहा क अ य पु तक

भारत: गांधी के बाद भारत: नेह के बाद उपभोग क ल मण रेखा आ ख़री उदारवाद और अ य नबंध नेता संत और व ान वदे शी खेल अपने मैदान पर

ई.एस. रे ी के लए जो भारतीय दे श ेमी, द ण अ क लोकतं वाद , और सभी रा ीयता के गांधी के व ान के म और सलाहकार ह

इ तहास के प म आ मकथा-मा क अपूणता और उसक क ठनाइय के बारे म पहले मने जो पढ़ा था, उसका अथ आज म अ धक समझता ं। म यह जानता ं क स य के योग क इस आ मकथा म जतना मुझे याद है उतना सब म हर गज नह दे सका ं। कौन जानता है क स य का दशन कराने के लए मुझे कतना दे ना चा हए... लखे ए करण पर कोई फुरसत वाला आदमी मुझसे जरह करने बैठे, तो वह इन करण पर कतना अ धक काश डालेगा? और य द वह आलोचक क से इनक छानबीन करे, तो कैसी कैसी ‘पोल’ कट करके नया को हंसावेगा और वयं फूलकर कु पा बनेगा?

एम.के. गांधी, आ मकथा



का आभार

न न ल खत च को छोड़ कर सभी च साबरमती आ म अ भलेखागार, अहमदाबाद क अनुम त से का शत कए गए ह। शेष च के लए अनुम त न न ल खत जगह से ा त ई है– च 1 और 2: नेह मेमो रयल यू ज़यम और लाइ ेरी च 3: इरावती गुहा च 15: गेट इमेजेज़ च 16: को बस इमेजेज़ च 17: ई.एस. रे ी च 29: टाटा स ल आकाइ स

ा कथन गांधी, सभी

कोण से

म यह कताब कभी नह लख पाता अगर मने सन 1998 म कै लफो नया व व ालय, बकले म ग टम (बसंत के महीने से शु होनेवाला पाठय म) न बताया होता। व व ालय ने मुझसे पयावरणवाद के इ तहास पर एक पाठय म पढ़ाने को कहा था जो उस समय तक मेरे शोध और लेखन का मु य क ब था। ले कन म उस वषय से थक गया था। मने व व ालय से आ ह कया क उसके बदले मुझे ‘आ यूमट् स वद गांधी’ यानी ‘गांधी के साथ तक- वतक’ या ‘गांधी पर बहस’ नाम के से मनार को चलाने क इजाज़त द जाए। उस समय तक एक समावेशी और उदार भारत क गांधी क प रक पना को राजनी तक फलक के दोन कनार से चुनौती द जा रही थी। द णपंथी खेमे क तरफ से ह संगठन का एक गठजोड़ (संघ प रवार के प म स ) आ ामक प से एक ध मक रा य क अवधारणा को बढ़ावा दे रहा था जसका गांधी ने ता ज़दगी वरोध कया था। सरी तरफ वामपंथी खेमे से बढ़ता आ माओवाद व ोह सामा जक प रवतन लाने के अ हसक तरीक को खा रज कर रहा था। रा पता के त अपने अपमान भाव को द शत करने के लए माओवा दय ने पूव भारत के कई इलाक म गांधी क तमा को ढहा दया था। ले कन राजनी तक अ तवा दय के इन हमल के बावजूद गांधी का वचार ज़दा रहा। उसे भारत क सरकार ारा तीका मक—हां महज तीका मक ही—समथन मला, ब क सामा जक कायकता और आंदोलनका रय ने इसे यादा मजबूती से सामने रखा। जस पाठय म को म पढ़ाना चाहता था वह गांधी क ववादा द वरासत पर क त होता। हालां क बकले म मेरे मेज़बान इस ताव से उ सा हत नह थे। वे जानते थे क गांधीवाद अ ययन के त मेरा योगदान शू य के बराबर है, जब क पयावरणवाद पर एक पाठय म कैलीफो नया म हमेशा लोक य होता जो एक ऐसा ांत था जहां उजा संबं धत वसाय के उ मय और पयावरण े मय क भरमार थी। व व ालय को ये चता थी क गांधी पर होनेवाला से मनार अपनी जड़ क तलाश म लगे भारतीय मूल के

कुछे क छा को ही अपनी तरफ ख च पाएगा ज ह वहां एबीसीडी या क थत प से अमे रका बोन कं यू ड दे सी (अमे रका म ज मे मत भारतीय) कहा जाता है। आ खरकार कई प ाचार के बाद मुझे गांधी पर पाठय म पढ़ाने क अनुम त मल ही गई। ले कन म खुद ही असमंजस म था और वच लत था। म सोच रहा था क अगर व व ालय क बात सही ई और कुछ ही छा इस पाठय म म आए तो या होगा? अगर उनम भी सारे के सारे भारतीय ए तो या होगा? प मी तट के लए उस लंबी उड़ान के दर यान म कुछ और नह सोच पाया। म श नवार के दन सैन स को प ंचा, मेरी पहली क ा अगले बुधवार को शु होनेवाली थी। र ववार को म बकले के मश र टे ली ाफ एवे यू म घूमने नकला। नु कड़ पर मुझे एक ानीय सा ता हक क मु त त मली। जब म वापस अपने अपाटमट आया तो मने उसे पढ़ना शु कया। प े पलटते ए मने एक फोटो टू डयो का व ापन दे खा। उसम बड़े अ र म लखा आ था : ओनली गांधी नोज़ मोर दै न अस एबाउट फा ट (फा ट के बारे म सफ गांधी ही हमसे यादा जानते ह! यहां फा ट का मतलब अथ था, गांधी के संदभ म उपवास और टू डयो के संदभ म ती ता या काम क तेज़ी!) नीचे छोटे अ र म व ापन क ा या क गई थी क टू डयो 10 मनट म ट दे सकता है, जो उस ज़माने के हसाब से बड़ी बात थी जब ज़माना ड जटल नह आ था। म उस व ापन को पढ़कर भा वत आ और मुझे सुकून मली। एक बे ए रया (अमे रका म प मी तट का खाड़ी इलाका जहां सॉ टवेयर उ ोग क त है और जसे स लकॉन वैली भी कहा जाता है-उसे बे ए रया भी बोला जाता है) सा ता हक अपने पाठक से गांधी के बारे म जानने क उ मीद कर रहा था ता क ‘फा ट’ श द पर ज़ोर दया जा सके। मेरा डर र हो गया और बाद म तो ब कुल ही ख म हो गया जब एक भरा-पूरा लास म गांधी पर ा यान सुनने के लए मेरे सामने बैठा था। मेरे सामने तीस छा थे जनम से ज म या मूल से सफ चार भारतीय थे! मेरे छा म एक बम मूल क लड़क थी जो वहां लोकतं आंदोलन के कुचले जाने के बाद नवा सत होकर रह रही थी, एक य द लड़क थी जसके दो ेरणा-पु ष म से एक गांधी और ज़यो न ट (य द वाद ) दाश नक मा टन बबर थे। उन लोग म एक अ कनअमे रकन भी था जो उ मीद कर रहा था क आ खकार यह पाठय म उसे मैलकॉम ए स और मा टन लूथर कग जू नयर म से एक को चुनने म मदद करेगा। वहां एक जापानी लड़का भी था और ब त सारे कॉके शयन मूल के छा थे। क ा क बहस म और अपने लेखन म छा ने गांधी के बारे म हर कोण से वचार कया और हर तरह के तक सामने रखे- जसम से कुछ तो नदशक के लए ब कुल ही अनपे त थे। वह पाठय म ब त ही मज़ेदार सा बत आ, जैसा क मने कभी क पना तक नह क थी। मने महसूस कया क ऐसा मेरे उस वषय को चुनने क वजह से ही संभव आ था।

म सोच रहा था क बकले म अगर डी गॉल के बारे म कोई पाठय म होता और उसका नाम ‘आ यूमट् स वद डी गॉल’ होता तो कतने छा ने उसम च दखाई होती? और मान ली जए क कोई अमे रक इ तहासकार द ली व व ालय आया होता और उसने ‘आ यूमट वद ज़वे ट’ का ताव कया होता तो या उसम लोग च दखाते? ज़वे ट, च चल, डी गॉल ये सब महान रा ीय नेता है, ले कन उनका आभामंडल उस समय धीरे-धीरे ीण होने लगता है जब हम उनके दे श क सीमा से र जाते ह। उस हसाब से दे खा जाए तमाम आधु नक राजनेता और राजनी त के बीच महा मा गांधी ही एक मा णक वै क व दखते ह। अब यह है क गांधी क इस अ त वै क त ा का या कारण है? गांधी ने तीन अलग-अलग दे श म काम कया (और महादे श म भी): इं लड, द ण अ का और भारत म। वह सा ा यवाद वरोधी आंदोलनकारी, समाज सुधारक, धा मक चतक और एक मसीहा थे। उ ह ने नया के इ तहास म सबसे यादा हसक स दय म से एक म वरोध के एक ऐसे अ का आ व कार कया जो अ हसा पर आधा रत था। राजनी तक चार के बीच उ ह ने छू आछू त मटाने और ह त श प के पुन ार का भी योग कया। वह एक धमपरायण ह थे ले कन सरी धा मक परंपरा म उ ह काफ दलच ी थी। गत लालच और आधु नक तकनीक क अनै तकता के त उनक चेतावनी कई बार लोग को त यावाद लगती थी ले कन हाल के समय म फर से वो क ब म आ गई है जब से पयावरण संर ण पर नई बहस शु ई है। व टो रया युग के इं लड म श त और न लवाद द ण अ का म स हा सल करनेवाले गांधी का कम और उनका जीवन उनके समय के इ तहास (और भूगोल) पर अ मट छाप छोड़े ए है। जब वह अपने सघन राजनी तक कायकलाप म लगे ए थे उसी दौर म नया म बो शे वक ां त ई, फासीवाद का उ ान और पतन आ, नया म दोदो व यु हो गए और ए शया और अ का म सा ा यवाद वरोधी आंदोलन म उफान आया। एक तरफ गांधी भारत म अ हसा के आधार पर एक जन-आंदोलन चला रहे थे तो सरी तरफ चीन म माओ- से-तुंग एक कामयाब हसक ां त क शु आत कर रहे थे। व ान और आम आदमी दोन के लए गांधी ब त ही दलच वह य क उनम साफतौर पर वसंग तयां दखती ह। कभी-कभी वह एक असांसा रक संत के प म वहार करते ह, जब क कई बार वह राजनी त म डू बे ए एक नेता क तरह दखते ह। एक बार जब एक टश प कार ने उनसे पूछा क आधु नक स यता के बारे म उनके या वचार ह तो उनका कहना था, ‘मुझे लगता है क यह एक अ ा वचार सा बत होगा।’ फर भी प म के इस घनघोर वरोधी ने तीन ेत व - हेनरी सा ट, जॉन र कन और लयो टॉ सटॉय को अपने ेरणा पु ष के प म वीकार कया। टश सा ा य को ‘शैतानी’ कहनेवाला यह व ोही उस समय रोया था जब सरे व यु के समय म लंदन

पर ( जससे वह भलीभां त प र चत थे और यार करते थे) बमबारी क गई थी। साथ ही अ हसा के उस स पुजारी ने थम व यु के समय भारतीय क सेना म नयु भी करवाई थी! गांधी ने एक लंबा जीवन जया और उनक मृ यु के बाद उनक स बढ़ती ही जा रही है। उनका संदेश सन 1982 म रचड एटनबरो ारा न मत फ म के ारा चा रत कया गया—या आप चाह तो क हए क ऐसा करने क एक को शश क गई— जसे नौ ऑ कर मले और जो एक बॉ स ऑ फस हट सा बत ई। उनके उदाहरण ने मा टन लूथर कग, ने सन मंडेला, दलाई लामा और आंग सान सूची जैसे व ोही और मश र राजनेता को े रत कया है। उनके ारा चा रत अ हसा क श ा ख म नह ई है। लोकतां क आंदोलन के ारा ए करीब पांच दजन स ा प रवतन के अ ययन म पाया गया क स र फ सद से यादा मामल म तानाशाही सरकार इस लए नह धराशायी क उनके खलाफ सश व ोह आ था, ब क वे ब ह कार, हड़ताल, उपवास और वरोध के सरे मा यम क वजह से परा जत जसक ेरणा गांधी से मली थी!1 हाल ही म तथाक थत ‘अरब ग’ आंदोलन के समय म , यमन और सरे दे श म आंदोलनका रय ने गांधी क त वीर का दशन कया और उनके ारा चलाए गए वरोध और संघष क काय णाली का नज़द क से अ ययन कया।2 उनक मृ यु के छह दशक से यादा बीत जाने के बाद भी गांधी का जीवन और उनक वरासत अब भी चचा के क म है और उस पर कई बार ऐसे दे श म या वयन कया जाता है जसके बारे म गांधी जानते तक नह थे। इसके साथ ही वह अपने मादरे वतन के दलो दमाग पर अब भी छाए ए ह। उनके वचार क तारीफ होती है, उस पर हमले होते ह—कुछ लोग उसे खतरनाक बताते ह तो कुछ अ ासं गक। फर भी लोग उनके वचार को ह -मुसलमान , नचली और ऊंची जा तय और मानव और पयावरण के बीच होनेवाले संघष और तनाव को सुलझाने के लए अहम मानते ह। ● गांधी के वै क मह व का पता हर साल का शत होनेवाली उन पु तक से चलता है जो उनके व पर हर साल बड़ी सं या म नया भर के छापेखान म छापी जाती है। इन कताब को भारत सरकार के काशन से मदद मलती है जसने गांधी वां मय(कले टे ड व स ऑफ महा मा गांधी) छापा है। यह ृंखला सैकड़ खंड म है, जो एक सं ह और संपादन का वराट काय है जसम द सय हज़ार प , भाषण, लेख, संपादक य और सा ा कार शा मल ह जसका ेय वा तव म महा मा गांधी को जाता है।

गांधी ब ढ़या लखते थे और उ ह ने लखा भी ब त। सन 1903 से लेकर 1914 तक और फर 1919 से ले कर 1948 तक उ ह ने गुजराती और अं ेज़ी म सा ता हक प का काशन कया। जहां उनके लेख दोन ही भाषा म सामा य तरीके के और बना लागलपेट के होते थे। उनका गुजराती लेखन यादा सघन और भावशाली होता था य क वह अपने पाठक के साथ एक नै तक और सां कृ तक नया साझा करते थे।3 उनके लेखन क मा ा और शायद गुणव ा के कारण भी, ये कहा जा सकता है क गांधी एक पांचवी भू मका का भी नवाह करते थे और वो भू मका थी एक संपादक और लेखक क । उनके इस काय ने उनके सरे काय म मदद और बढ़ो री ही क य क राजनी त और समाज पर उनके वचार उन समाचारप म छपते थे जो उनके खुद के ारा संचा लत थे या कम से कम नयं त थे। गांधी लेखन का संपूण (या लगभग सारा ही) भाग उनके कले टे ट व स (गांधी वां मय) म उपल ह। इसक क मत 4000 पए या करीब 50 पाउं ड है और उसके अं ेज़ी सं करण को हाल ही म सीडी-रोम म डाल दया गया है। गांधी वां मय के खंड ब त सारे वेबसाईट पर भी उपल ह। उ ह ब त ही प र मपूवक गांधी के जीवनीकार या उन लोग ारा वहां उपल कराया गया है ज ह ने उनके धा मक-आ थक वचार , अ हसा का उनका दशन, म हला के त उनके वचार, शराब, नशाखोरी और जुए पर उनके वचार पर शोध कया है।4 गांधी के कले टे ड व स (गांधी वां मय) क सहज उपल ता क वजह से उनके वचार, उनका आंदोलन, उनक दो ती और उनक त ं ता बड़े पैमाने पर दखती है और कई बार उनके अपने लेखन के च मे से खासतौर पर दखती है। गांधी के श द पर यह नभरता अ सर उस ऐ तहा सक प र य को संक ण कर दे ता है जसके खलाफ उनका पूरा जीवन और कम संचा लत आ था। उनक मृ यु के पसठ साल बाद आम आदमी इस बारे म तो खासा जानकारी रखता है क गांधी नया के बारे म या सोचते थे, ले कन उसे इस बारे म लगभग न के बराबर जानकारी है क नया, गांधी के बारे म या सोचती थी। एक दशक पहले बकले म उस पाठय म को पढ़ाने के बाद मने तय कया क म गांधी के ब आयामी व पर एक कताब लखूंगा जो उनके प रवार, म , अनुया यय और वरो धय के श द और कायकलाप के संदभ म गांधी के श द और उनके कायकलाप क पड़ताल करेगा। यह सही है क गांधी वां मय (कले टे ड व स) एक अप रहाय सं ह है ले कन वह ब त सारे ोत म से महज एक है। इसी लए मने उन अ भलेखागार म जाना शु कया जहां उनके समकालीन के नजी द तावेज़ रखे ए ह। मने द ण अ का म उनके मुख सहयो गय के कागज़ात का अ ययन करना शु कया। मने उन ब त सारे मुख ी-पु ष ारा गांधी को या गांधी पर लखे प का अ ययन कया ज ह ने गांधी

के साथ भारतीय वतं ता आंदोलन म काम कया था। मने गांधी के चार ब के का शत या अ का शत लेखन का भी अ ययन कया। मने उन लोग क अवधारणा का भी अ ययन कया ज ह ने गांधी का वरोध कया था। खु फया जानका रयां इक ा करने म टश सा ा य के अ धका रय को वशेष द ता हा सल थी और साथ ही गांधी के याकलाप म उनको पचास साल तक दलच ी रही थी। वे द ण अ का म गांधी के पीछे भूत क तरह लगे ए थे जो वहां उनके लए सतत परेशानी का कारण बने ए थे। उससे भी यादा अं ेज़ी राज के अ धकारी भारत म गांधी के पीछे पड़े ए थे जहां उ ह ने अपने लाख दे श वा सय को टश राज के अ याचार के खलाफ खड़ा कर दया था। भारत, इ लड और द ण अ का के रा ीय और ांतीय अ भलेखागार मने प , टे ली ाम , रपोट और उन सूचना का अ ययन कया जहां सा ा य के अ धका रय ने अपने सबसे खतरनाक (ब क सबसे व श ) व ोही पर ट पणी लखी थी। हालां क न त तौर पर ऐसी बात नह थी क जन लोग ने गांधी का वरोध कया था वे सारे के सारे टश या अ क ही थे। उनम से ब त सारे भारतीय थे और कुछ तो ब त ही व श यो यता वाले भारतीय थे। उनम लंदन म श त दो तेज़-तरार वक ल शा मल थे जनम एक थे मु लम नेता मुह मद अली ज ा और सरे थे नचली जा तय के नेता बी. आर. अंबेडकर। इसके अलावा उनके वरो धय म लेखक रब नाथ टै गोर भी थे जो नोबेल पुर कार हा सल करनेवाले पहले ए शयाई थे। ये तीन व तो उ चत ही स थे ले कन गांधी के सरे अ य आलोचक भी भारत म थे, साथ ही द ण अ का म उनके याकलाप के थोड़े कम मश र वरोधी भी फैले ए थे। उनके लेखन ( का शत या अ का शत) गांधी के संपूण वचार और कायकलाप को समझने के लए मह वपूण ह। गांधी ने जो भी कया और कहा वह तभी मायने रखता है जब हम ये जान जाएं क वह कन बात पर अपनी त या दे रहे थे।वाले पहले बात पर अपनी त या दे रहे थे। उनके बारे म जानने का सरा मह वपूण ोत उस समय के समाचार प ह। गांधी के बारे म पहला संदभ सन 1888 म का ठयावाड़ टाइ स म मलता है जसम उनके क़ानून क पढ़ाई के लए लंदन जाने का ज़ है। ले कन उनके द ण अ का म बताए गए समय और सावज नक जीवन म वेश के बाद से ही गांधी समाचार म नय मत तौर पर दखने लगते ह। शु म वह ानीय प से भावशाली नटाल मरकरी और जोहांसबग टार म दखते ह बाद म वे मह वपूण अंतरा ीय प मसलन द टाई स ऑफ लंदन और द यूयॉक टाइ स म भी का शत होते ह। म ये दावा तो नह कर सकता क मने गांधी के पूरे जीवनकाल के ेस का अ ययन कया है ले कन फर भी म इतना कह सकता ं क मने उन अखबारी रपोट का अ ययन कया है जो भारत और द ण अ का म गांधी के अ भयान क वजह से पैदा ए ववाद

और दलच य पर ह। जैसे सरकारी खु फया रपोट उनक दै नक ग त व धय पर आधा रत ह और जो उन हर जगह से द गई है जसका दौरा उस तूफानी नेता ने कया था। ये रपोट उन लोग के बारे म बताती ह जो वैसे तो प र य से गायब ही रहते ह—मसलन कसान, मक, ापारी और करा नय का वग जो गांधी से ब त ही भा वत था और जनके वचार संवाददाता क रपोट और संपादक के नाम प म प रल त होते ह। उस साम ी क खोज करते समय जो गांधी वां मय म नह है, मने चार महादे श म पांच दे श के अ भलेखागार का दौरा कया। ये या ाएं और शोध मु यतः उस साम ी क खोज के लए क ग जो मेरे वषय के नाम या उसके ह ता र से संबं धत नह थी। फर भी मुझे ये दे खकर आ य और आनंद आ क एका धक वजह से गांधी ारा खुद के लखे ए प उनके कले टे ड व स (गांधी वां मय) म शा मल नह कए गए ह। कम से कम अब तक उपयोग म न लाई जा सक इस नई साम ी क व वधता और गहराई को इस कताब के आ खर म ‘ए नोट ऑन सोसज़’ ( ोत पर एक ट पणी) नामके अ याय म व णत कया गया है। इस शोध के आधार पर म उनक जीवनी को दो खंड म लखना चाहता ं ता क गांधी के जीवन, काय और संदभ को संपूण प से समझा जा सके। यह पहली पु तक गुजरात म उनक परव रश, लंदन म दो साल तक क़ानून क पढ़ाई और सबसे गहन प म द ण अ का म एक वक ल, एक गृह और एक सामुदा यक नेता के प म उनके तमाम काय क पड़ताल करती है। सरी कताब उस कालखंड क पड़ताल करेगी जो हमारे वषय (गांधी) के जनवरी 1915 म भारत लौटने से लेकर जनवरी 1948 म उनक मृ यु तक से संबं धत है। वह पु तक उनके राजनी तक अ भयान के सामा जक इ तहास, उनके समाज सुधार आंदोलन और उनके आ म के दै नक जीवन क जानकारी दे गी। अ क गांधी और भारतीय गांधी का यह अ ययन अपने आप म ब त सारे च र और कहा नय को समेटे ए है। उनम से कुछ कहा नयां अ भभूत करती ह तो कुछ खांत ह, जब क कुछ अ य सामा जक और राजनी तक अथ से भरी ई ह। उन कहा नय क भौगो लक सीमाएं ए शया, अ का, यूरोप और यहां तक क उ री अमे रका तक पसरी ई ह। उन कहा नय का कथानक रे ग तान से लेकर पहाड़ तक, नगर से लेकर गांव तक और नद से लेकर समंदर तक फैला आ है। उन कथा का इ तहास उ ीसव सद के उ राध से लेकर आज के वतमान ण तक फैला आ है। उन कहा नयो को पढ़ते (और बताते) समय हम ह , मुसलमान , य दय , ईसाइय , पार सय , जै नय , सख और यहां तक क कुछ ना तक से भी मलते ह। उन कथा म ब त सारे च र मक वग से आते ह— जनम कसान, श पी, कानदार, गृह णयां, कूड़ा बीनने वाले और ख नक भी शा मल ह। हम सं ांत पृ भू म के लोग भी मलते ह

जनम समृ ापारी, श शाली रा यपाल, सजे-धजे सेना य और जनता ारा चुने ए रा ा य शा मल ह। यह व वध प र य और ये लोग इस लए मायने रखते ह य क उनका मोहनदास करमचंद गांधी से कोई न कोई संबंध है। यह मोहनदास गांधी क गुजरात से लंदन और फर नटाल से ांसवाल और फर वहां से वापस गुजरात और फर न जाने हज़ार ऐसे जगह क या ा है जसका हम अनुसरण कर रहे ह। इस तरह से उनके पद- च और उनके काय क पड़ताल करते व हम इस तरह के व वध प र य और अलग-अलग तरह के उ लेखनीय य से मुलाकात होती है। इस कहानी के क य पा और भारत के महान का रामायण के क य पा बीच म कुछ समानता है। उस कहानी के नायक भगवान राम भी कई बार इ ा से तो कई बार अ न ा से लंबी री क या ा करते ह। वह भी अपने जीवन का लंबा समय नवासन म तीत करते ह और उनक भी एक वफादार और बेहद सहयो गनी प नी है (गांधी क तरह ही) जसके साथ वह हमेशा उस इ ज़त और समझदारी से वहार नह कर रहे होते जसक वह अ धका रणी है। वह भी एक उ नै तक च र के ह जनके मन म कभी-कभी बल और खतरनाक वचार आते ह। राम और गांधी दोन के ही श शाली वरोधी ह जनका अपना एक न त मत है और उनके अपने समथक ह। दोन ही —एक मथक म तो एक वा त वकता म—कई अ य सरे य के गहन समथन के बना वो काम नह कर सकते थे जो उ ह ने कया। साथ ही अपने जीवन के बाद दोन क त ा भी बढ़ती गई और उनके कई काय क आलोचना भी ई। ले कन दोन के बीच क समानता को यादा नह ख चना चा हए। रामायण जो नै तकता ा पत करना चाहती है वो सां कृ तक और पा रवा रक है-मसलन अपनी प नी के साथ कैसे वहार कर या अपने पता या अपनी वमाता के साथ कैसे वहार कर या फर जा त या समुदाय के धम को कैसे अ ु ण रख। हमारे अपने महाका के मामले म जो सीख मलती है वो साफतौर पर यादा सामा जक और राजनी तक है। हम वदे शय के शासन और वशासन, हसा और अ हसा और आ ामक धम प रवतन और सरे धमवाल के साथ यार भरी समझदारी के बीच चुनाव करने के लए कहा जाता है। हम ाकृ तक व ा के त आदर और उनके त अहंकारपूण अपमान म से एक को चुनने के लए कहा जाता है। कई बार रामायण से भी आगे नकलते ए वा तव म हमारे महाका म सही चुनाव पारंप रक व ा को उलटने जैसा हो जाता है—जैसे छू आछू त उ मूलन और म हला को बराबरी का दजा दे ने क बात म सामने आती है। यानी दोन महाका क श ा सरे ान पर आती है। मह वपूण बात है कहानी का व प, मानवीय अनुभव का समृ भंडार, क य च र का अ भभूत करना और उन

चर थी।

क गहनता ज ह ने या तो उनके साथ काम कया था या उनके खलाफ लड़ाई लड़ी

● मौजूदा पु तक का कथानक अ ू बर 1869 म गांधी के ज म से शु होता है और जुलाई 1914 म द ण अ का म उनके ान से ख म होता है। इसम से यादातर समय एक वक ल और एक आंदोलनकारी के प म उ ह ने नटाल और ांसवाल म बताया। गांधी के जीवनीकार ने तेज़ी से उनक जीवनाव ध के इस कालखंड को महज थोड़ा सा छू ते ए आगे नकलने क वृ दखाई है। उ ह ने इस कालखंड को उनके जीवन के बाद के यादा मह वपूण खंड के महज पूवा यास के तौर पर च त करने क को शश क है जो उ ह ने भारत म बताए थे। उ ह ने उनके जीवन के इस भाग पर कृ तवा दय क तरह वचार करने क को शश क है जसम द ण अ का म उनके काय बाद के समय म मादरे-वतन म उनके ारा कए गए मह वपूण काय क भू मका तैयार करते तीत होते ह। 5

हड़बड़ी और योजनवाद—ये दो वृ यां और ान दोन के साथ अ याय करती ह। एक समाज सुधारक, एक लोक य जननेता, राजनी तक चतक और एक गृह के प म गांधी मूलतः अपने द णी अ क अनुभव से ही आकार पाते ह। इसके नतीजे म उस महादे श के इ तहास म उनका एक व श भाव है, उनके वचार और तौर-तरीक ने बाद के दौर म वहां न लवाद के खलाफ जंग म मह वपूण भाव डाला। जब सन 1893 म गांधी ने डरबन म पहला कदम रखा, द ण अ का अपने रा नमाण क या से गुज़र ही रहा था। इसके अलग-अलग उप नवेश अपना शासन खुद ही चलाते थे। उनम से कुछ मसलन नटाल टश वा सय ारा शा सत थे जब क ांसवाल जैसे सरे इलाके डच मूल के अ कय (उ ह उस समय बोर के नाम से जाना जाता था) ारा शा सत थे। अ का के उस एकमा ह से म जहां यूरोपीय वातावरण था, उप नवेशवा दय ने अपने लए एक अलग होमलड के नमाण क को शश शु क थी। ज़ा हर सी बात थी क वहां ब त सारे अ क ऐसे थे जो वहां तब से रहते थे जब गोरे समुदाय के लोग वहां आए भी नह थे। ले कन लड़ाइय और वजय क एक ृंखला के तहत उन अ कय को पराधीन कर लया गया था। उन वच वशाली यूरोपीय और पराधीन अ कय के बीच भारतीय मूल के लोग थे। वे मक के प म अ का आए थे ज ह ग ा के खेत , कारखान , खदान और रेलवे के काम के लए लाया गया था। वहां एक अ खासी सं या भारतीय ापा रय और

पेशेवर क भी थी। गांधी के आगमन के समय नया के उस ह से म करीब 50,000 भारतीय रहते थे जनम से अ धकांश नटाल म ही रहते थे। गांधी नटाल और ांसवाल म लंबे समय तक रहे—लगभग दोन ही जगह पर एक-एक दशक तक। नटाल समंदर के तट पर था जहां अं ेज़ का वच व था जसक अथ व ा चीनी और कोयले पर आधा रत थी। ांसवाल दे श के अंदर समु से र था जहां बोर शासन था और सोने क खोज क वजह से वहां क अथ व ा उफान पर थी। धातु क समृ , अपे ाकृत कम आबाद और दोन उप नवेश का ब ढ़या जलवायु यूरोप और ए शया से आनेवाल को आक षत कर रहा था। गुजराती, त मल और हद भाषी लोग हद महासागर पार कर यहां आ रहे थे जब क एं लकन, कैथो लक, य द और थयोसो फ ट अटलां टक से होकर यहां आ रहे थे। ये सारे लोग यादा से यादा भौ तक समृ क तलाश म यहां आ रहे थे जो शायद वे अपने वतन म कभी हा सल नह कर पाते। द ण अ का को उप नवेश बनाने और उस पर दावा करने क वो बड़ी होड़ लगभग उसी समय शु ई थी जब संयु रा य अमे रका क तरफ यूरोपीय ताकत ने अपना फैलाव कया था। खुले-खुले से वशाल इलाके, वपुल ाकृ तक संसाधन (और ाकृ तक सुंदरता), वग च र पर आधा रत पुरानी घनी आबाद क नया से मु ये ऐसी बात थ जो आ थक वास क दो या म साझी थ । ले कन प मी अमे रका के यूरोपीय उप नवेशवा दय को वहां के ानीय लोग से ही पार पाना था, जब क उनके द ण अ क समक को भारतीय का भी सामना करना था जो वहां के ानीय नवासी नह थे, और न ही यूरोपीय थे। इन व च प र तय के बीच गांधी अपनी चार भू मका को हा सल करने और उसे अमलीजामा पहनाने के लए सामने आए—वो भू मकाएं थ वतं ता सेनानी क , समाज सुधारक क , धा मक ब लतावाद क और एक मसीहा क । वा तव म उनके शु आती सहयो गय म से एक ( जसे अब लगभग भुला दया गया है) ने तो गांधी क स ह पहचान तक बताई ह ज ह उ ह ने भारत से बाहर रहते ए हा सल कया था ! उस ने लखा, ‘द ण अ का ब त सारी स य क क गाह है। यह ब त ही कम स य क ज म ली रही है जनम से एक ह मोहनदास करमचंद गांधी। उनके कई प ह— द वान के बेटे, वक ल, े चर पकड़नेवाला, पच चपकानेवाला, गंभीर चतक, उदार भ पु ष, शारी रक म करनेवाला, सेवा करनेवाला, श क, आंदोलनकारी, चार करनेवाला, ट लग ड, कसी का श ु नह , पूव सज़ाया ता, साधु, अपने लोग का नवा चत नेता और धुर शां त य वरोधी।’6 उन सारी पहचान म आ खरी पहचान का नया के इ तहास पर सबसे यादा असर पड़ा है। स वनय अव ा के तरीक के लए स या ह श द गांधी का दया आ है जसका उ ह ने द ण अ का म आ व कार कया और बाद म भारत म इ तेमाल कया। इसे

उनके समथक और शंसक नया के सरे दे श म इ तेमाल कर रहे ह। गांधी से पहले जो लोग अपने शासक से असंतु थे या तो वे ाथनाप का सहारा लेते थे या फर ह थयारबंद वरोध करते थे। गांधी के तरीक क खा सयत यह थी क वे वयं को तकलीफ दे कर शासक वग को श मदा कर दे ते थे जसम वरोध करनेवाला लाठ खाने और जेल जाने क इ ा करता था और अ हसक ले कन तब तरीके से क़ानून को तोड़ता था। गांधी के द ण अ का छोड़ने के कुछ ही दन के बाद सन 1916 म क य भारत म एक काशक ने अ का म गांधी के स या ह का इ तहास का शत कया। उस कताब को कुछ इस तरह पेश कया गया, ‘उस वीरतापूण लड़ाई क कहानी जो नया के इ तहास म अपने आप म अनूठ थी, एक ऐसी लड़ाई जसम बं क, बम या तोप का इ तेमाल नह कया गया (और न ही हवाई जहाज़ से बम ही गराए गए), एक ऐसी लड़ाई जसम ये बताया गया क च र क ताकत कसी भी तरह क ताकत पर भारी पड़ती है।’ उस काशक ने ये उ मीद क क ऐसा पढ़कर पाठक ‘गव से भर’ जाएगा, जब वे यह जानगे क कैसे वासी ‘कु लय और मज़ र ’ ने (भारत के) श त सं ांत वग को अपने संक प और जुनून से श मदा कर दया है।7 उस समय तक गांधी को भारत आए ए महज एक साल आ था। अं ेज का भारतीय उपमहा प पर पूण नयं ण था। ले कन फर भी जो बात सन 1916 म अ त शयो लग सकती थी वो एक शता द बाद यादा ावहा रक लगती है। भारतीय वतं ता सं ाम, अमे रका म नाग रक अ धकार आंदोलन, पूव यूरोप और चीन म ( त बत समेत) सा यवाद के खलाफ जन- तरोध, बमा और म य-पूव म सै य तानाशाही के खलाफ लगातार जारी वरोधी इनम से सभी ने ांसवाल म गांधी ारा अपनाए गए तौर-तरीक से कुछ न कुछ या पूरी ेरणा ज़ र ली है। स या ह का वराट और लगातार फैलता आ भाव द ण अ का म भारतीय ारा कए गए वरोध के तरीक पर एक बारीक पड़ताल क मांग करता है ता क उस समय के गांधी के बारे म और हमारे अपने अंदर उनक एक लगातार कट होती वरासत क हम एक गहरी समझदारी वक सत कर सक। गांधी के अपने सं ह (उनके द ण अ का से वास के डे ढ़ दशक बाद का शत और दो पु तक म संक लत) पर नभर रहने क बजाए मने उनके शु आती स या ह को उनके समकालीन द तावेज़ क नगाह से दे खने का यास कया है। वे च यां, भाषण, समाचारप के ववरण, अदालती मुकदम और सरकारी रपोट इस बात क यादा त वीर सामने रखते ह क कैसे गांधी ने अपने स वनय अव ा के वचार और उसके तौरतरीक को आकार दया। उ ह ने कैसे आमलोग को जेल जाने के लए गोलबंद कया। इन व वध ोत से हम इस बात क खोज कर सकते ह क कैसे वरोध- दशन ने अपना व प हण कया और कैसे वह लोग के सामने आया। हम ये भी जान सकते ह क कन लोग ने गांधी का अनुसरण कया (और य कया), कन लोग ने उनका वरोध कया

(और य कया) और उस वरोध को नरंतर जारी रखने के लए धन क व ा कैसे हो रही थी। इन शु आती स या ह के ऐ तहा सक पुनरावरोकन द ण अ का के इ तहास के मह वपूण कालखंड पर भी काश डालते ह। यो क जब एक बार अलग-अलग उप नवेश एक े ीय संघ के अधीन आ गए तो उसने अ ेत न ल क उ मीद और आकां ा के खलाफ गोर क भावना और उनके पूवा ह को मजबूत कर दया। गांधी के राजनी तक व को उनके खुद के अ त र अ य कई कोण से जाना जा सकता है। इसी तरह से गांधी के नजी व का मामला है। यहां भी द ण अ का का अनुभव मौ लक और नमाणकारी था। गांधी क पीढ़ के यादातर भारतीय उसी शहर म काम करते ए मर गए जस शहर या गांव म वे पैदा ए थे। अपने दै नक जीवन म वे यादातर समय उ ह लोग से मलते जुलते और बात करते थे जनक मातृभाषा उ ह क जैसी थी और जनके वंशगत वचार मलते-जुलते थे। ले कन द ण अ का आने के बाद गांधी इन संक ण और जड़ नया से बाहर एक ऐसी नया म प ंच गए जो अपनी नमाण क या से गुज़र ही रही थी। डरबन और जोहांसबग, जहां वे रहे और काम कया, ए शया, यूरोप और अ का के सरे ह स से वा सय को अपनी तरफ आक षत कर रहा था। उस व वध और तेज़ र तार से बदलते ए समाज म गांधी ने अपने से अलग धा मक और न लीय पृ भू म के लोग के साथ अटू ट दो ती ा पत क । आ य और ख क बात ये है क गांधी के द ण अ का म बताए दन के म और सहयो गय क चचा ऐ तहा सक रकाड से गायब है। ऐसा कई कारण से लगता है। एक वजह तो ये है क उनके कले टे ड व स (गांधी वां मय) पर अ य धक नभरता दखाई गई है। सरी, गांधी के भारत लौटकर आने से पहले के उनके जीवन को महज उनक आगामी वा त वक कहानी के पूवा यास के तौर पर दखाया गया है न क एक वतं कहानी के तौर पर और तीसरी ये क जीवनीकार और अनुयायी क म के लेखक क अपने मु य वषय क भू मका और व क वराट छ व गढ़ने क वृ । यादातर भारतीय और बाद म एटे नबरो क फ म दे खकर यादातर गैर-भारतीय भी, प रप व हो चुके गांधी के सहयो गय और आलोचक से ठ कठाक प र चत ह। ले कन फर भी वे उन लोग के बारे म ब त कम जानते ह ज ह ने गांधी के साथ द ण अ का म काम कया। यहां प रवार के बाहर उनके नज़द क म म दो ह (एक डॉ टर से वेलर बना और सरा एक उदार राजनी त ), दो य द (एक इं लड का प कार और सरा पूव यूरोपीय मूल का एक वा तु वद) और दो ईसाई पादरी (एक बैप ट ट और सरा एक एं लकन) शा मल थे। इस तरह से कह तो ये छह भारतीय वतं ता सं ाम म गांधी के मश र सहयो गय मसलन—जवाहरलाल नेह , व लभभाई पटे ल, सुभाष चं बोस, मैड लन लेड (मीरा बेन), सी. राजगोपालाचारी, मौलाना आज़ाद आ द के अ क पयायवाची जैसे थे। उनको ब त लोग नह जानते (कई मामल म तो वे ब कुल अ ात ह), हालां क गांधी

के च र और उनके काय पर उनका भाव नणाया मक है य क वे उस समय उनक ज़दगी म आए जब वह एक महान सावज नक व या भारत म जैसे उनको नाम दया गया—महा मा—नह बने थे, ब क उस समय वह एक संघषरत और उभरते ए आंदोलनकारी ही थे। इन द ण अ क म को लखी या उनसे गांधी को भेजी गई च यां गांधी क चता , संघष और संबंध को सघन और कई बार अनपे त प म सामने लाती ह। ले कन उ लेखनीय बात ये है क जीवनीकार ने इस साम ीय का कोई ज़ नह कया। इसक वजह यही हो सकती है क ये साम ीयां उनके कले टे ड व स (गांधी वां मय) म नह ह, ब क वे नई द ली, अहमदाबाद, टो रया, जोहांसबग, लंदन, ऑ सफोड और एक संदभ म तो इज़राइल के बंदरगाह वाले शहर हाइफा के अ भलेखागार म सुर त ह। ● सन 1890, 1900 और 1910 म द ण अ का म रहनेवाले अ धकांश लोग अ क ही थे। कभी-कभी बटाईदार और मज र के प म वे अपने गोरे मा लकान के लए काम करते थे। जब क सु र इलाक म वे गोर से र रहते थे और शका रय और खा सं हक के प म जीवन-यापन करते थे। ले कन शहर और दे श के अंद नी ह स दोन ही इलाक म वे कभी-कभार ही अं ेज़ या बोर के साथ दै नक त धा म सामने आते थे। अ क ापा रय क सं या ब त ही कम थी और उनसे भी कम अ क वक ल और डॉ टर क सं या थी। चूं क भारतीय मूल के लोग बेहतर श त और बेहतर तरीके से संग ठत थे, इस लए वही अं ेज़ के भु व को स य तरीके से चुनौती दे सकते थे। ले कन शासक वग ने इसका जवाब क़ानून म बदलाव लाकर दया। खास-खास जगह पर भारतीय के रहने और कान खोलने, एक ांत से सरे ांत म आवाजाही, बेहतरीन कूल म दा खला, भारत म शाद करके प नी को अ का लाने और प रवार बढ़ाने पर पाबंद लगा द गई। बाद म इन पाबं दय को अ क लोग पर भी थोप दया गया ले कन ये कहा जा सकता है क न लभेद से पी ड़त होनेवाल म सबसे पहले भारतीय ही थे। और गांधी ने इन न लवाद कानून का सबसे पहले वरोध कया, उस हसाब से ये कहा जा सकता है क वा तव म गांधी ही न लभेद के खलाफ आवाज़ उठानेवाले पहले थे। नटाल और ांसवाल म गांधी के संघष ने भारत म रा ीय आंदोलन को भी आकार दया और ेट टे न के सा ा यवाद एजडे को भा वत कया। हालां क एक सु वधा क नगाह से अगर दे ख, तो गांधी महज एक सामुदा यक संगठनकता थे। ले कन चूं क उनके काय का भाव एक साथ तीन महादे श क राजनी त पर पड़ रहा था, इसका नतीजा कह

यादा ापक था। एक ऐसे ज़माने म जब टे लीफोन आम इ तेमाल म नह था, फै स और इंटरनेट तो सु र भ व य के गभ म कह दशक र था, गांधी के संघष म वो अथ छु पा आ था जसे आजकल ‘वै क सामा जक आंदोलन’( लोबल सोशल मूवमट) कहा जाता है। गांधी का द ण अ का म संघष ‘ वासी रा वाद’ का एक शु आती उदाहरण था जसे बाद म जुनूनी ढं ग से बो टन म आय रश मूल के लोग ने, यूयॉक म य दय ने, टयू नस म फ ल त नय ने और सख ने बकूवर म अपनाया। उ ह ने उसी तरह से नाग रक अ धकार के लए उस ज़मीन पर आंदोलन कया जहां वे वतमान म रहते थे और ऐसा उ ह ने अपने हम-वतन के लए कया ज ह वे छोड़कर आए थे। गांधी के ज़माने म द ण अ का क घटनाएं वतमान यूरोप म मुसलमान और उ र अमे रका म ह ै न स और ए शयाई मूल के साथ होनेवाली घटना क पूवा यास थी। ये है क या वा सय को उनके अपने व ास और आ ा के पालन और अपनी भाषा के इ तेमाल क इजाज़त द जानी चा हए? वे कूल और काय ल पर होनेवाले भेदभाव के खलाफ कैसे संघष कर? उनक ज़ रत और आकां ा के हसाब से उनके लए कस तरह के राजनी तक संगठन उपयु ह? समाज म अमन-चैन और लोकतां क व ा कायम रखने के लए मेज़बान समुदाय और वा सय के अ धकार और उनक ज़ मेवा रयां या- या होनी चा हए? ये सवाल हमारे समय म भी उतने ही सां गक ह जतने ये सन 1893 या 1914 म थे— जब मोहन दास गांधी नटाल और ांसवाल म रहते थे। गांधी का अ का म बताया गया कालखंड यह दशाता है क कैसे इ ा या कई बार अ न ा से समुदाय के अ य दे श म वास ने सम या और असंतोष को ज म दया जो उन सम या और असंतोष से अलग नह है जो हमारे समय के और भी यादा भूमंडलीकृत व म हो रहा है।

1 मंझली जा त, मंझला दजा

गांधी क जा त ब नया, ह सामा जक पदानु म म एक अ ान रखती है।1 उसके ऊपर य और ा ण आते ह जो पारंप रक प से शासक और पुरो हत समुदाय ह। उ ह उनके सांसा रक और आ या मक धा मक श य के धारण करने क वजह से ऊंची जा तयां कहा जाता था। सामा जक म म ब नय से नीचे शू और अछू त जा तयां थ जो खे तहर मज़ र, श पी और कूड़ा बीननेवाल का काम करते थे। ये नचली जा तयां थ और ऐसा कहने का कारण उनके पारंप रक पेश से जुड़ी कलंक क भावना थी। ऐसा इस लए भी था क वे ऊपर क जा तय पर कई तरह के नदश और कई बार जीवनयापन के लए भी नभर रहती थ । जातीय पायदान म ब नए तीसरे नंबर पर थे। वे कई मायन म म य थे। उनका पारंप रक पेशा ापार और महाजनी था। वे कसान और मज़ र को पैसा उधार दे ते थे, साथ ही वे राजा और पुजा रय को भी पैसा दे ते थे। वे कान चलाते थे जो समाज के सभी वग के उपयोग म आती थी। वे जो सेवाएं दे ते थे वो समाज के लए अप रहाय सेवाएं थ –शायद यह कारण था क ब नय पर वे लोग यक न नह करते थे जो उनक सेवा लेते थे। लोग के क स -कहावत म उ ह धूत और लालची कहा जाता था। उनके बारे म कहा जाता था क वे दो तरह के बही-खाते रखते ह। एक खाता कानूनी भाषा म होता था जो सरकारी अ धका रय के लए होता था तो सरा गु त होता था जो उनके वा त वक कारोबार को दशाता था। एक हद कहावत के मुता बक तो ई र भी ब नय के लेख को नह पढ़ सकता! ब नए वपरीत प र तय म अ डग रहनेवाले, कुशल और अनूकू लत होने वाले लोग थे और उनम वो यो यता थी क वो राजनी तक अ रता और वपरीत समय म भ व य को दे ख सकते थे।2 गुजराती ब नय के आधु नक इ तहासकार लखते ह क गुजरात के ब नए अपनी मीठ जबान के लए जाने जाते थे ( ा ण के अहंकार और य के खेपन के उलट)। उ ह ने बोलचाल का एक ‘मुलायम और मनानेवाले तरीके’ का आ व कार कया था और सामान बेचते समय उसक गुणव ा क तारीफ वो सफलतापूवक करते थे। ‘वे अपने ाहक और मुव कल के साथ कभी भी ववाद म नह पड़ते थे और जब ज़ रत

होती थी, झुक भी जाते थे।’ उस जा त का मूल मं था–‘क ठन मेहनत और सादा जीवन।’ इस तरह ‘ब नय को कभी भी आलसी न होने क श ा द जाती थी, नतीजतन वे बेचैन य वाले समुदाय के प म मश र होते गए जसको कोई काम न रहने पर खीझ होती थी’।3 म यकालीन और आधु नक भारत के शु आती काल क राजनी तक अथ व ा म ब नय ने मह वपूण भू मका का नवाह कया। जीवनयापन के मु य आधार कृ ष काय म ब नय क ज़ रत होती थी य क वे आपदा और अभाव के काल म कसान को ऋण दे ते थे। यु काल म भी, जो राजनी त का मु य उपकरण था, उनक ज़ रत होती थी य क वे उन सरदार को धन दे ते थे और उनके लए ज़ेवरात सं ह करते थे जो या तो अपनी सीमा क र ा करना चाहते थे या उसका फैलाव करना चाहते थे।4 गांधी का ज म- े का ठयावाड़ ( जसे कभी-कभी सौरा के नाम से भी जाना जाता है) एक कान के आकार का ाय पीय दे श है जसका े फल कोई 23,000 वग मील है और जो भारत के प मी ांत गुजरात के क य भाग म त है। का ठयावाड़ म समु तट 600 मील लंबा है जसम कई गहरे बंदरगाह है। इसका ापार का पुराना इ तहास है और इसके ापा रक संबंध प मी तट के ऊपरी और नचले भाग और म य-पूव और अ का के साथ रहे ह। एक अनुमान के मुता बक 16व सद के आ खर म उस ाय प का समु ापार करीब 3 करोड़ पए सालाना के बराबर था। जो सामान खरीदे और बेचे जाते थे उनम थे–कृ ष उ पाद, मसाले, ज़ेवरात, ह थयार और कभी-कभी दास भी। इस सामान को चढ़ाने-उतारने और प रवहन का काय शू जा त के मज़ र ारा कया जाता था। हालां क उसक खरीद, सं ह और उसक ब ब नय ारा क जाती थी।5 इस उपमहा प म वह खाड़ी दे श शहरी स यता का पहला क था। यहां हड़ पा युग से नगरीय स यता रही है जो 3000 साल पुरानी है। म ययुग म का ठयावाड़ कई छोटे -छोटे रजवाड़ म बंट गया जसम हरेक को एक राजधानी क ज़ रत थी। का ठयावाड़ के इलाके म छोटे -बड़े शहर बखरे ए थे जो समु के कनारे थे तो कुछ भीतरी दे श म भी थे और 19व सद के आ खर म का ठयावाड़ क नगरीय आबाद अ -खासी 20 फ सद से ऊपर थी (जब क उपमहा प म सरे जगह पर शहरी आबाद सकल आबाद क महज 10 फ सद ही थी)।6 कृ ष और यु के लए उनक हमेशा उपल ता, समु ापार क मह ा, एक बड़ी शहरी आबाद -इन सारे कारक ने का ठयावाड़ को ब नय को लए आकषक बना दया। शहर के अंदर ापारी ताकतवर े णय म संग ठत थे। वे शासक पर ज़मीन दे ने और कर म छू ट दे ने के लए दबाव डालते रहते थे ता क वे अपना आवास बना सक और ापार कर सक। यहां वे कारोबारी, महाजन और कानदार के प म काम करते थे। ले कन का ठयावाड़ के ब नय को जस चीज़ ने व श बना दया वो ये था क वे सफ अपने

पारंप रक पेशे म समटे ए नह थे। वे राज व सं ाहक और नौकरशाह के प म रा य के लए भी सेवाएं दे ते थे।7 ह रा य म रा य का सरा सबसे मह वपूण पद द वान या मु यमं ी का होता था। यह मह वपूण पद लगभग हमेशा ही दो ऊंची जा तय ा ण या य के लए आर त था। ले कन ऐसा का ठयावाड़ म नह था और वहां ापारी जा त के लोग भी मु यमं ी बनने क इ ा पाल सकते थे। उ ह ब त सारे ब नया द वान म से एक थे मोहनदास गांधी के पता और उनके पतामह। ● गांधी क ज मभू म पोरबंदर, ाय प के द ण-प म कोने पर त है। यहां क जलवायु अ है, चमकती धूप नकलती है, हालां क वह चल चलाती ई नह होती। शाम खुशनुमा होती ह और समंदर से आनेवाली ठं डी हवा उसे शानदार बना दे ती है। एक अं ेज़ पयवे क ने महसूस कया क ‘पोरबंदर पर कुदरत मेहरबान रही है, इसने समंदर और आसमान से एक अक पनीय ापकता पाई है’। पूरी तरह प र और मज़बूत ऊंची द वार से सुर त वो ‘शहर समंदर के अनंत व तार म सर उठाए खड़ा दखता था’। इसक ताज़ा हवा म ‘समंदर का नमक घुला’ आ था जो ‘तट के कनार से होकर बहती थी और लहर के साथ ज़मीन से टकराकर झाग म बदल जाती थी’।8 उसी शहर के नाम पर उस रयासत का नाम पोरबंदर रखा गया था जो सन 1860 के दशक म 600 वग मील म समु तट पर फैला आ था। समंदर के कनारे ज़मीन दलदली थी, ले कन अंदर क तरफ कृ षयो य थी। इसी सूखी ज़मीन पर पोरबंदर के कसान चावल और दलहन उगाते थे। रयासत क करीब एक चौथाई आबाद राजधानी पोरबंदर म रहती थी जो बंदरगाह के ापार म लगी ई थी जसका 90 फुट का काश तंभ मील र समु से दखता था। एक ज़माने म यहां ‘ सध, बलु च तान, फारस क खाड़ी, अरब और अ का के पूव तट के साथ खूब ापार होता था’। ले कन बंबई के उदय ने पोरबंदर से जहाज़ और सामान क आवाजाही का गंभीर त प ंचाई। 1869 म मोहनदास गांधी के ज म के समय वहां आयात क जानेवाली मु य व तु म मालाबार क लक ड़यां, बंबई और भ च से सूत और तंबाकू और करांची से खा ा थे।9 पोरबंदर के शासक राजपूत के जेठवा वंश से ता लुक रखते थे। वे का ठयावाड़ के सबसे पुराने शासक वंश होने का दावा करते थे जसका इ तहास 9व सद तक जाता था। पड़ोसी रा य नवानगर और जूनागढ़ के साथ लड़ाई क वजह से उनक त पछले बरस म कमज़ोर ई थी। उन हारी और जीती गई लड़ाइय क वजह से उनक राजधानी

बदलती रही थी ले कन 18व सद के आ खर से वे लोग बंदरगाह वाले शहर पोरबंदर म ही थे।10 पोरबंदर, का ठयावाड़ के स र रजवाड़ म से एक था। इस छोटे से इलाके म इतने रा य के होने से राजा ने कई तरह क पद वयां धारण कर ली थ या उ ह वो पद वयां दे द गई थ । ब त सारे शासक, जो ह होते थे, अपने आपको ‘महाराजा’ कहते थे और अगर मुसलमान होते थे तो ‘नवाब’ कहते थे। सरे लोग अ य तड़क-भड़क वाली उपा ध लगाते थे मसलन ‘राव’ या ‘जाम साहेब’। पोरबंदर के शासक को ‘राणा’ के नाम से जाना जाता था। का ठयावाड़ ाय प क एक अनोखी और व श सुंदरता थी। लंबे समु तट के अलावा वहां पहा ड़य क एक ृंखला थी जसपर ह और जै नय के प व मं दर त थे। गांधी के लड़कपन के ज़माने म उस इलाके म तरह-तरह के जंगली जानवर भी थे–त आ, शेर और हरण तो काफ थे। वहां खूबसूरत च ड़या थ –सागरतट पर सफेदगुलाबी रंग के हंसावर (हंस के सामान च ड़या), खेत म धनेश और सारस और जंगल म कबूतर और छोट -छोट कई तरह क चहचहाने वाली च ड़यां थ । सन 1873 म ई पहली जनगणना म पाया गया क का ठयावाड़ क कुल आबाद करीब 23 लाख थी। का ठयावाड़ क 86 फ सद जनसं या ह क थी ले कन वे कई जा तय -उपजा तय म बंटे ए थे जनम हरेक के अपने अलग री त- रवाज़ थे और रहन सहन का अलग तरीका था। वहां करीब 13 फ सद मुसलमान थे जनम से अ धकांश ह से ही धमात रत ए थे। य कुछ का दावा था क वे अरबी और अ क मूल के ह। मुसमलान के अंत ववाही समूह म मेमन, जो मु यधारा क सु ी परंपरा को माननेवाले थे, खोजा और बोहरा थे जो यादा अपारंप रक माने जाते थे य क वे एक जी वत नेता (पीर) क परंपरा म यक न रखते थे। का ठयावाड़ के मुसलमान, ापारी, कृषक और श पी थे। ले कन उनके व वध वसाय और झुकाव के बावजूद वे इस े क भाषा गुजराती ही बोलते थे, न क फारसी या उ जो क उ र भारत के मुसलमान से जुड़ी ई मानी जाती थी।11 उनके अलावा उस इलाके म जैन और पार सय क अ सं या थी जो उपमहा प के कसी भी इलाके क तुलना म यहां यादा थी। जैन एक ऐसा पंथ था जो 9व सद ईसा पूव ह धम से टू टकर अलग बना था। ज़ोरो यन के नाम से जाने जाने वाले पारसी भी ईरान से भागकर भारत आए थे जब ईरान पर इ लाम क शया शाखा का अ धकार हो गया। जैन और पार सय ने का ठयावाड़ क आबाद को व वधता दान क और उनक व ता और ापार कौशल के लए काफ तारीफ क जाती थी। जै नय क उनके सादा नजी जीवन के लए भी तारीफ क जाती थी जब क सहज प से प मी तौर-तरीके अपनाने के लए पार सय क ।

पूव और द ण भारत क तरह अं ेज़ ने का ठयावाड़ का शासन सीधे अपने हाथ म नह रखा था। ाय प के करीब 80 फ सद भाग म शासन भारतीय शासक के हाथ ही रहा। इन शासक को उस समय तक बदा त कया जाता था जब तक क वे अं ेज़ क सै य व राजनी तक े ता को वीकार करते रहते थे। उ ह इलाके के ापार और लोग क आवाजाही क भी दे खभाल क इजाज़त थी। अं ेज़ ने का ठयावाड़ के रजवाड़ को सात े णय म रखा था। लास वन ( थम ेणी) के शासक को अपनी जा पर पूरा अ धकार था–वे या के तहत अपरा धय पर मुकदमा चला सकते थे और उ ह फांसी क सज़ा भी दे सकते थे। उससे नचले दज के राजा को मृ युदंड या लंबी सज़ाएं दे ने का अ धकार नह था। लास सेवन (सातव ेणी) के शासक को तो 15 पए से यादा के दं ड और 15 दन क जेल क सज़ा दे ने के लए भी अं ेज़ से इजाज़त लेनी पड़ती थी। का ठयावाड़ के रजवाड़े चार भौगो लक इलाक म बंटे ए थे जसम से हरेक म एक टश एजट रहता था जसके अधीन वहां के शासक होते थे। कुछ शहर म टश छाव नयां थ , तो कुछ म टश रेलवे इंजी नय रग और यन मशनरीज़ भी थ । कुछ अंतराल पर गोरे अ धका रय के अधीन टश सै य टु क ड़यां बंदरगाह और शहर का दौरा करती रहती थ । कभी-कभी कसी बड़े अ धकारी का भी दौरा होता था जैसे बंबई के गवनर या यहां तक क वॉयसराय का भी। उनके लए बड़े दरबार का आयोजन कया जाता था और शकार क व ा क जाती थी। उन तड़क-भड़क वाले भ वागत समारोह के आयोजन से ये बात सभी को थी क आ खरकार मु क का मरान कौन है।12 का ठयावाड़ के 74 राजा म से सफ 14 को थम ेणी म रखा गया था। उसम से पोरबंदर का राणा भी शा मल था। यह बात वहां क 70,000 जनता के बीच सा रत कर द गई, जसम गांधी प रवार भी एक था जो पी ढ़य से रा य क सेवा म था। सावज नक सेवा म उस प रवार के पहले गांधी लालजी थे जो जूनागढ़ टे ट से पोरबंदर काम करने के लए आए थे। लालजी गांधी ने वहां द वान के मातहत काम कया और वैसा ही काम उनके बेटे और पोते ने कया। ये उनक चौथी पीढ़ म ही संभव हो पाया क कोई गांधी, द वान या मु यमं ी के पद को हा सल कर पाया। उनका नाम उ मचंद गांधी था ज ह ‘ओटा बापा’ के नाम से भी जाना जाता था। ओटा उनके नाम के थम अ र का सं त प था तो बापा गुजरात म ‘ पता’ या ‘ कसी स मा नत व र ’ को कहा जाता है। उ मचंद गांधी क पहली नौकरी पोरबंदर बंदरगाह पर सीमाशु क अ धकारी क थी और वे वहां सीमाशु क कल टर थे। उसके बाद उ ह पोरबंदर और जूनागढ़ टे ट के बीच भू म ह तांतरण के मु े को सुलझाने के लए कहा गया ता क दोन रा य अपने े का

सही सीमांकन कर सक। इन दोन काम म उनक द ता क वजह से उ ह द वानी का पुर कार मला। पोरबंदर के द वान के प म उ मचंद गांधी ने रा य के व क कुशल व ा क । उ ह ने टश मरान से भी ब ढ़या संबंध ा पत कया और उनका व ास अ जत कया। जब पोरबंदर-जामनगर क सीमा पर डकैत ने दो अं ेज़ क ह या कर द , तो उ मचंद गांधी ने अपने शासक से कहा क वे ये कह क वो इलाका सरे रा य क सीमा म पड़ता है। जस जगह पर ह या क घटना ई थी वहां पहा ड़यां थ और वह मह वहीन जगह थी। अगर टश राज को खुश करने और उससे नज़द क ा पत करने के लए उसका याग भी करना पड़े तो या बुरा था?13 ले कन उ मचंद गांधी का लंबे समय तक द वानी का सपना उस समय व त हो गया जब अचानक पोरबंदर के राणा क मृ यु हो गई। राजा के पु ष उ रा धकारी नाबा लग थे, सो स ा अंत रम प से उसक मां यानी रानी के हाथ म चली गई। द वान क त ा और भाव रानी को अखरते थे और एक ववरण के मुता बक तो उसने द वान के घर सपाही भेज कर हमला भी करवाया। उसके बाद उ मचंद गांधी ने पोरबंदर को अल वदा कह दया और अपने पैतृक गांव कु टयाना चले गए जो जूनागढ़ टे ट म पड़ता था।14 जूनागढ़ के नवाब ने उ मचंद गांधी के पास संदेश भेजा क या उ ह कसी चीज क आव यकता है! उ मचंद गांधी नवाब के दरबार प ंचे और उ ह ने परंपरा के वपरीत ‘बाएं हाथ से नवाब का अ भवादन कया। इसे दे खकर दरबारी ब त नाराज़ ए’। जब एक दरबारी ने इसके लए उ ह डांट लगाई तो उ ह ने जवाब दया, ‘मने जो कुछ भी तकलीफ सहन क है, उसके बावजूद मेरा दा हना हाथ पोरबंदर के लए सम पत है’।15 सन 1841 म रानी-मां क मौत के बाद उ मचंद गांधी पोरबंदर लौट आए। उनक संप फर से बहाल कर द गई। गांधी प रवार का इ तहास बताता है क नए राणा व मजीत ने उ मचंद से आ ह कया क वे द वान का पद संभाल ल। ले कन उ ह ने यह वीकार नह कया। ले कन अ भलेखागार के रकॉड कुछ और ही कहते ह। पोरबंदर म एक टश सै य टु कड़ी थी जसका खच पोरबंदर रयासत उठाता था। शहर के ापा रय ने रयासत म शकायत क क फौज के सपाही हमेशा नशे म धु रहते ह और उ ह पैसे के लए तंग करते ह। व मजीत ने सोचा क चूं क समु डाके का खतरा ब त कम है, इसी लए इन सपा हय को बंबई वापस भेजा जा सकता है। उ मचंद गांधी इससे सहमत नह थे, उनका मानना था क अं ेज़ चा र क प से एक ऐसी कौम है जो ये बदा त नह करेगी। वो हम अभी बराबरी का वहार करने क इजाज़त नह दगे।16 व मजीत ने उस समय तो उनक बात सुन ली ले कन वह फौज का खच वहन करने से नाखुश था। सन 1847 म उसने उ मचंद के बेटे करमचंद ( ज ह कबा के नाम से भी जाना जाता है) को द वान नयु कया और उ ह रा य च के प म एक चांद का कलमदान

और चांद का याहीदान दया। नए द वान क उ उस समय महज 25 साल थी और वह व मजीत का हमउ था और वह अपने स त और वराट कद के पता क तुलना म राजा क इ ा के यादा अनुकूल भी था। कबा गांधी ठगने कद और भारी-भरकम शरीर वाले थे और मूंछ रखते थे। उनक ब त पढ़ाई नह ई थी, उ ह ने गुजराती म पढ़ाई करने के बाद राणा के कायालय म प लेखक और बाद म करानी क नौकरी क थी। उ ह अपने शासक का व ास हा सल था और वह नौजवानी म ही द वान बन गए। सन 1869 तक उ ह द वानी करते ए दो दशक का अनुभव हा सल हो चुका था। उस समय तक उनका तीन बार ववाह भी हो चुका था। उनक दो प नयां कम ही समय तक जी वत रह पा , दोन से उ ह एक-एक बेट भी ई थी-ले कन वो बच नह पा । तीसरी शाद से कोई ब ा नह आ। चूं क उनका कोई उ रा धकारी नह था, तो ऐसी हालत म उ ह ने अपनी प नी से सरी प नी करने क इजाज़त मांगी (जो पारंप रक ह ज़नून के तहत मा य है)। उ ह वो इजाज़त मल गई और कबा गांधी ने अपने से बाईस साल छोट ी से ववाह कर लया और उसे अपनी चौथी प नी बनाकर घर ले आए। उनक चौथी प नी का नाम पुतलीबाई था जो जूनागढ़ टे ट के एक गांव से आई थ । सन 1857 म उनका ववाह आ और उस प नी से एक के बाद एक उ ह तीन ब े ए। सन 1860 के आसपास एक पु का ज म आ जसका नाम था ल मीदास। उसके दो साल बाद रै लयत नामक बेट का ज म आ और उसके बाद सन 1869 म उनके सरे बेटे करसनदास का ज म आ।17 सन 1869 के वसंत म पुतलीबाई एक बार फर से गभवती थ । जब वह अपने चौथे ब े का इंतज़ार कर रही थी, उस समय पोरबंदर टे ट ववाद म घरा आ था और जो कबा गांधी के अ दाता और शासक राणा व मजीत क कुछ कारवाइय से ही पैदा ए थे। अ ैल के महीने म लुकमान नाम के एक गुलाम और एक अरब सपाही क राजा क आ ा से ह या कर द गई थी। खासकर गुलाम क ह या तो वीभ स तरीके से क गई थी। उसके कान और नाक काट डाले गए थे और उसके बाद उसे शहर क द वार से फककर मार डाला गया था। जब अं ेज़ को ये बात पता चली तो उ ह ने राजा व मजीत को तलब कया और इस पर ीकरण क मांग क । राजा ने जवाब दया क गुलाम लुकमान उसके बड़े बेटे का सेवक था और उसने उसे ‘नशे का आद ’ बना दया था। जब राणा और उनक प नी शहर से बाहर थे तो लुकमान ने उसे अ य धक उ ेजक शराब पला द , नतीजतन वह अ यंत तकलीफ म मर गया। राणा को ‘अपने बेटे के ह यारे उस गुलाम को दं डत’ करना पड़ा। राणा ने वीकार कया क उसक आ ा से उसके नाक और कान काटे गए ले कन राणा ने कहा क शहर क द वार पर से उसका उस तरह से गरना महज एक घटना थी।

जहां तक अरब सपाही क बात थी तो राणा ने कहा वह उसके महल के ज़नानखाने ( य के रहने का आवास) म घुस आया था और उसने ‘मेरे वग य बेटे क वधवा को पकड़ लया’ था। वह उसका शीलभंग करना चाहता था। उस सपाही को भी मौत के घाट उतारना ज़ री था य क उसने अपने ‘मा लक क इ ज़त से खलवाड़ क थी और रात म गु त प से एक डकैत क तरह ज़नानखाने क प व ता पर हमला कया था जसे ह और खासकर राजपूत जान क बाज़ी लगाकर सुर त रखने क को शश करते ह’। ले कन राणा के इस तक से अं ेज़ भा वत नह ए। ‘स ा के इस गंभीर पयोग क वजह से’ राणा का दज़ा घटा दया गया–वे थम ेणी के राजा से घटकर तीसरी ेणी के राजा रह गए। राणा से मृ युदंड दे ने का अ धकार छ न लया गया। अ े वहार का सबूत दे ने के लए अब उसे याय के आधु नक स ांत के आधार पर आपरा धक यायालय चलाना था।18 पोरबंदर के आ धका रक अ भलेखीय रेकॉड इसका कोई संकेत नह दे ते क इन घटना क बाबत राणा के द वान के मन म या चल रहा था। एक छोटे से रा य और उसके छोटे से दरबार म ये संदेह कया जा सकता है क राजकुमार और गुलाम के बीच म या नज़द क संबंध थे, ये बात कबा गांधी को ज़ र मालूम होगी। ले कन कबा गांधी ने अपने शासक को या सलाह द ? या उ ह ने गुलाम को त- व त कर मार दे ने और सपाही क ह या के खलाफ़ अपने राजा को कोई मश वरा दया? या व मजीत ने अं ेज़ को जो ीकरण दया था, उस प को तैयार करने म उनक कोई भू मका थी? ऐसे का कोई जवाब हमारे पास नह है। ले कन ये त य क कबा गांधी ने अपने शासक क पदावन त को सबसे यादा गंभीरता से महसूस कया, इसम कोई संदेह नह । राजा को आ रही परेशानी क खबर ज़ र नौकर और कबा गांधी क गभवती प नी पुतलीबाई तक प ंची होगी। यह 10 सतंबर 1869 क घटना है जब बंबई सरकार ने पोरबंदर के राजा व मजीत का दजा थम ेणी के राजा से घटाकर तीसरी ेणी के राजा का कर दया। उसके तीन स ताह बाद, वहां घट हसा और अपमान क इन घटना के बीच लंबी अव ध से राणा क द वानी कर रहे कबा गांधी क प नी ने अपने चौथे ब े को ज म दया। वह एक बालक था जसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी रखा गया। ● सन 1777 से गांधी प रवार पोरबंदर के पुराने शहर के दरवाज़े के पास एक तमं ज़ले मकान म रहता था। उस मकान म बड़े -बड़े बारह कमरे थे ले कन वहां काश क अ व ा नह थी। सरे त ले पर एक बड़ी बालकनी थी, जहां शाम को पूरा प रवार बैठकर

बातचीत करता था और समंदर क ताज़ा हवा का आनंद उठाता था। मकान के नीचे पानी जमा करने के लए एक टक (हौज) बना आ था। चूं क पोरबंदर का भूजल खारा था, तो बरसात के पानी को सहेजना और उसका संर ण ज़ री था। मानसून से पहले गांधी प रवार के छत क सफाई कर द जाती थी और जब बरसात का पानी छत से नीचे जाता तो उसे उस पाईप के मुंह के पास चूना और कुछ रासाय नक पदाथ मलाकर साफ कर दया जाता था जससे होकर वह ज़मीन पर नीचे टक तक जाता था।19 पुतलीबाई के सबसे छोटे बेटे मोहनदास का ज म भूतल पर त एक कमरे म आ था। बाद म उस कमरे को दे खकर एक या ी ने लखा, ‘कमरे म अंधेरा है और कोने म तो और भी अंधेरा है। कमरे से कोई भी खड़क बरामदे क तरफ नह खुलती थी। एक छोटा सा दरवाज़ा सरे कमरे म खुलता था जो इसके ठ क पीछे सरे कनारे पर था।’20 जैसा क भारतीय प रवार म रवाज़ था, बालक मोहनदास क दे खभाल प रवार क अ य य ने क । उसक मां और चा चय के आलावा उसक चचेरी बहन और खासकर उसक बड़ी बहन रै लयत उसे बारी-बारी से गोद म लेती और खेलती थी। उन बहन ने बाद म याद करते ए कहा क बालक मोहनदास ‘पारे क तरह बेचैन’ रहते थे। वह कुछ भी समय के लए ‘शांत नह रहता था। उसे हमेशा या तो खेलना या कसी क गोद म घूमना अ ा लगता था। म उसे गोद म ले जाकर गली म घुमाती और गाय, भस, घोड़े , ब लयां और कु े दखाती...कु के कान ठना उसका एक य शगल था’।21 गांधी क मां पुतलीबाई का ज म दन ना नाम के गांव म आ था जो समंदर से र एक नद के कनारे पहा ड़य के बीच म था। वह गांव पोरबंदर से तीस मील क री पर था। उनके पता एक कानदार थे। अमे रका व ान ट फेन हे उ लेख करते ह क मोहनदास क मां को एक युवा प नी के प म अ त धैय और संयम का प रचय दे ना पड़ा होगा य क उनके प त क दोन प नयां बीमार और नःसंतान थ और उ ह ने एक मायने म अपने प त क सरी प नय क जगह ले ली थी। करमचंद गांधी क दोन प नयां कुछ साल तक उसी मकान म साथ-साथ रह ।22 पुतलीबाई को जस घर का ज़ मा संभालना पड़ा वह पूण शाकाहारी था। अपनी जा त के अ य सद य क तरह ही गांधी प रवार ने कभी मांस या अंडा नह पकाया था। 19व सद के भारत के री त- रवाज़ को दज करने वाला सं त श दकोष हॉ सन-जॉ सन लखता है क गुजरात के ब नए ‘ ाणी-मा के जीवन के लए अ य धक आदर का भाव द शत करते थे’।23 शाकाहार क उनक यह वृ ब नय को अ सर उपहास का पा भी बनाती थी। मांसाहार करनेवाली जा तयां उ ह ‘ढ ली दाल’ कहकर चढ़ाती थ । इसके बदले ब नए ‘उन अ धकांश गैर-ब नए लोग को हेय से दे खते थे जो उनक नगाह म भोजन क इस नकृ और गंद आदत को अपनाए ए थे’।24

कुछ ब नया प रवार वो स ज़ी भी नह खाते थे जो ‘ज़मीन के नीचे उगाई जाती थी’ जैसे याज़ और लहसुन। ब नया म हलाएं भोजन बनाते व चू हे म जलनेवाली आग पर नगाह रखती थ ता क कोई क ट-पतंग उसम गर न जाए और भोजन को षत न कर दे । कभी-कभार कबा गांधी शाम के भोजन क तैयारी करते समय स ज़ी काटने और साफ करने म अपनी प नी क मदद कर दे ते थे। का ठयावाड़ के राजपूत (पोरबंदर के राणा समेत) शकार, धू पान और सुरा के शौक न थे। खाड़ी इलाके के कसान का भी यही शौक था ले कन अपे ाकृत अ नय मत अंतराल पर। गांधी प रवार जैसे ब नए मांसाहार, तंबाकू और शराब से स त परहेज़ करते थे। फर भी उनका शाकाहारी भोजन ब त ही सू म और व वध कार का होता था। उनके भोजन का मु य अ था मोटे अनाज और चावल। दाल के भी कई कार थे। इन ठोस भो य पदाथ के अलावा कई तरह के ना ते क साम ी थी, खास तरह क चट नयां थ और अचार थे। ब ढ़या-ब ढ़या मठाइयां थ और मठाइय और मसालेदार भोजन के कई म ण भी थे।25 गांधी प रवार क सरी वशेषता धमपरायणता थी। पुतलीबाई एक आ मब लदानी क म का अनुशासन रखनेवाली म हला थ और वभाव से काफ धा मक थ । जैसा क उनके बेटे ने उ ह याद करते ए लखा: वो दै नक पूजा के बना भोजन क क पना तक नह कर सकती थ । हवेली (वै णव मं दर) जाना उनका नय मत कत था...वे कठोर से कठोर त ा कर सकती थ और उस पर च ान क तरह अ डग रहती थ ...उस शपथ म ढ ल के लए बीमारी उनके लए कोई बहाना नह हो सकती थी...उनके लए लगातार दो या तीन दन त रखना कोई बड़ी बात नह थी। चतुमास के दन म एक व का खाना उनक आदत म शुमार था। उनको इतने से ही संतु नह मलती थी, वो हरेक सरे दन चतुमास के दौरान त रखती थ । सरे चतुमास के दौरान उ ह ने बना सूय को दे खे ए भोजन न करने का न य कर लया। बरसात के उन दन म हम ब े छत पर सूरज का इंतज़ार करते ता क मां को कह सक क सूरज नकल आया है।26

ब नय क जस उप-जा त से गांधी ता लुक रखते थे वो मोढ़ ब नया कहलाती थी। मोढ़ नाम से ऐसा लगता है क द ण गुजरात के मोढ़े रा शहर का ज़ हो रहा हो। उनके कुल दे वता राम थे। पोरबंदर म एक राम मं दर भी था (उस मं दर के सं ापक म से एक गांधी प रवार का सद य भी था)। वह इलाका वै णव परंपरा म पूरी तरह से डू बा आ था। भगवान व णु और खासकर उनके अवतार राम और कृ ण क पूजा वहां लोग क परंपरा म थी। गांधी के ज म ल से ऊपर समु तट पर ारका नगर त था जहां मा यता के मुता बक कृ ण ने अपना युवाकाल बताया था और जो 19व सद से (कम से कम) ह परंपरा का एक महान तीथ ल रहा है।27 आ ा क सुंदरता और उसके रह य से मोहनदास का प रचय उनक मां ने ही करवाया। पुतलीबाई एक धम ाण ले कन उदार म हला थ । उनका पालन-पोषण वै णव परंपरा म आ था और बाद म वह णामी सं दाय क तरफ आक षत हो ग । णामी पंथ

क उपासना प त म इ लाम के कुछ त व से मलती जुलती प त भी शा मल थी। उस पंथ के सं ापक एक य, ाणनाथ थे जो 18व सद म का ठयावाड़ म रहते थे। उ ह ने ब त सारे जगह क या ा क थ और ऐसा कहा जाता है क वे म का भी गए थे। पोरबंदर म जस णामी मं दर क पुतलीबाई संर का थी, उसम कोई मू त या च नह थी, सफ द वाल पर लखावट थ जो ह धम शा और कुरान से ली गई थ । धा मक वषय म पुतलीबाई क दलच ी बढ़ती ही गई, यहां तक क उनके घर जैन मु न भी आने लगे।28 सन 1874 म जब मोहनदास पांच साल के थे, तो उनके पता पोरबंदर से राजकोट चले आए। वहां उ ह उस रा य के ठाकुर या राजा के सलाहकार के तौर पर नयु कया गया। दो साल के बाद उनक पदो त द वान के पद पर कर द गई। कबा गांधी को अब रा य क व ीय व ा क दे खभाल और सारी संप य के नबंधन का काम दे खना था। साथ ही उ ह राजक य अ धका रय के कामकाज और सरे रा य के साथ राजकोट के ापार को भी दे खना था। राजकोट के द वान के प म करमचंद को राज ा नक कोट क ज़ मेवारी भी संभालनी पड़ी-जो बुजग क एक सं ा थी और का ठयावाड़ म रजवाड़ के आपसी ववाद का नपटारा करती थी।29 हम इस बात क प क जानकारी नह मलती क कबा गांधी राजकोट य गए। हो सकता है इसक एक वजह ये हो क पोरबंदर म उनके शासक का दज़ा घटाकर तीसरा कर दया गया था। या हो सकता है क उ ह लगा हो क नई ज़ मेवारी यादा त ापूण है। का ठयावाड़ रयासत का टश एजट राजकोट म रहता था। चूं क उसके पीछे टश स ाट और टश सेना क ताकत थी, तो वह उस पूरे ाय प का सबसे ताकतवर था। उस हसाब से कबा गांधी के राजकोट आने से अं ेज़ क सव स ा से उनक नकटता म बढ़ो री ही ई। हालां क उ लेखनीय बात ये थी क गांधी प रवार ने पोरबंदर से अपना संपक बनाए रखा। कबा गांधी के राजकोट जाने के कुछ ही दन के बाद उनके छोटे भाई को पोरबंदर के राणा व मजीत ने अपना द वान नयु कर दया। का ठयावाड़ म टश उप त के क के प म राजकोट म एक अ के लए शोधक था, एक मशन था जो आय रश पाद रय ारा चलाया जाता था, एक एं लकन चच था और एक टश गै रसन (सै य टु कड़ी) थी। यह एक मह वपूण रेलवे जं न था और यह रेल ारा उस दे श के मह वपूण शहर से जुड़ा आ था। राजकोट म ही राजकुमार कॉलेज था जसक ापना टश प लक कूल के तज पर ई थी और जहां का ठयावाड़ के रयासत के राजकुमार अं ेज़ी श ा हा सल करते थे। कबा गांधी के राजकोट आने से चार साल पहले सन 1870 म उस कॉलेज क ापना ई थी और उसक ‘वेने टयन गो थक शैली’ क एक भ इमारत थी, साथ ही उसम एक ायामशाला, एक रैकेट कोट, एक राइफल रज और एक केट पेवे लयन भी था।30

राजकोट शहर और े के एक मुख होने के नाते कबा गांधी राजकुमार कॉलेज प रसर म कभी-कभार ज़ र जाते ह गे। ले कन उस व ालय म उनके ब े नह पढ़ सकते थे। यहां सफ उ ह ब को दा खला मलता था जो ामा णक प से राजपूत खानदान से ता लुक रखते थे और जो आगे चलकर रजवाड़ के राणा या राजा बनने वाले थे। कुछ मुसलमान ब को भी दा खले क इजाज़त थी जो वहां के नवाब के बेटे या भतीजे थे। जब क कसी ब नए के ब े का तो उस व ालय म दा खले का सवाल ही नह था। सन 1874 म कबा गांधी राजकोट आ गए और जब दो साल बाद उनक द वानी न त हो गई तो उनका प रवार भी उनके साथ रहने आ गया। बालक मोहनदास ने पोरबंदर म कसी ाथ मक शाला म दा खला लया होगा (हालां क ऐसा प के तौर पर नह कहा जा सकता)। ले कन उसके राजकोट के कूल म दा खला लेने के बारे म हमारे पास कुछ प के और व सनीय सबूत ह। यह ज़ उन दो पु तक म है जो सन साठ के दशक म एक सेवा नवृ हेडमा टर ारा लखी गई जसे वसंत के मौसम म सफाई के दौरान मोहनदास के कूल जाने का रेकॉड मल गया था।31 21 जनवरी 1879 को मोहनदास करमचंद गांधी का दा खला तालुक कूल म करवा दया गया जो दरबारगढ़ ज़ले म उनके घर से थोड़ी ही री पर था। जो वषय मोहनदास को पढ़ाए जाते थे, वे थे अंकग णत, गुजराती, इ तहास और भूगोल। उनसे उ मीद क जाती थी क वह आसान मान सक अंकग णत सीख, क वता के अंश को पढ़ और याद कर, साफ-साफ उ ारण कर और प मी भारत क मुख न दय और शहर के नाम से अवगत ह। बालक क कूल म उप त ब त अ नह थी। सन 1879 के कैलडर वष के 238 दन म मोहनदास सफ 110 दन ही कूल गए। यह कूल क वा षक परी ा म प रल त आ, जब इ तहान के नतीजे सामने आए। मोहनदास को क ा के उन आधे ब म शुमार कया गया ज ह कम नंबर मले थे। एक परी ा म उ ह महज 41.25 फ सद नंबर मले (जब क सबसे यादा नंबर पाने वाले लड़के ने 76.5 और सबसे कम पानेवाले लड़के ने 37.6 फ सद अंक हा सल कए थे)। सरी परी ा म उ ह ने थोड़ा बेहतर कया-उ ह 53 फ सद अंक हा सल ए जो क सबसे खराब दशन करनेवाले लड़के से 12 फ सद यादा थे ले कन सबसे बेहतरीन दशन करनेवाले लड़के से 12 फ सद कम थे। अ ू बर 1880 म मोहनदास, का ठयावाड़ हाई कूल म दा खले के लए वेश परी ा म बैठे।32 इसक ापना 1853 म ई थी यह पूरे ाय पीय इलाके म सबसे पुराना हाई कूल था। मोहनदास ने वेश परी ा म ब ढ़या दशन कया और उ ह 64 फ सद अंक मला। कूल म उनका दा खला हो गया। अब पहली बार उ ह सरे वषय के साथ अं ेज़ी पढ़ने का मौका मला।

का ठयावाड़ हाई कूल एक खूबसूरत दो मं ज़ली इमारत म त था जसका नमाण जूनागढ़ के नवाब के अनुदान से आ था। क ाएं 11 बजे सुबह से 5 बजे तक चलती जसम 1 घंटे का भोजनावकाश होता था। श नवार को कूल आधा घंटा पहले ही बंद हो जाता था। अं ेज़ी क पढ़ाई को सबसे यादा समय दया जाता था-स ताह म 10 घंटे जसम बोलकर पढ़ना, ह े, लेखन का नकल आ द शा मल था। यानी वहां वो सब पढ़ाया जाता था क ब े अं ेज़ी म नपुण हो सक जो नौकरशाही म जाने के लए आव यक था। सन 1881 म गांधी प रवार कराए के मकान से अपने मकान म आ गया। कबा गांधी ने का ठयावाड़ी शैली म न मत एक वशाल मकान खरीद लया था, जसम एक घुमावदार वेश ार था जो सीधे आंगन म जाता था जसके चार तरफ कमरे थे। वह मकान मोहनदास के हाई कूल से एक मील से भी कम री पर था। तो मोहनदास का ठयावाड़ी व –लंबा ढ ला पाजामा, एक बटनदार अंगरखा और एक टोपी–पहनकर पैदल ही कूल जाते थे। गांधी के कूली दन का योरा हम बताता है क इस नए कूल म उनका दशन ब त ‘उ साहजनक’ नह था। अपने थम वष म वह गुजराती और अंकग णत म उ ीण ए ले कन वह उन ‘तीन ब म शुमार थे ज ह भूगोल म कोई अंक नह मला।’। साल के आ खर म होनेवाले इ तहान म उ ह 34 छा के बीच 32वां ान हा सल आ। उसके अगले साल सन 1882 म मोहनदास लगभग कूल गए ही नह , य क उनके पता बीमार पड़ गए थे। वह वा षक परी ा म नह बैठ सके। हालां क सन 1883 म वह यादा एका चत और प र मी हो गए। उनक उप त नय मत थी और साल के अंत म होनेवाली परी ा म उ ह ने चार वषय म 68 फ सद अंक हा सल कए जसम अंकग णत, गुजराती, इ तहास, भूगोल और अं ेज़ी शा मल थे। अ ैल 1884 म ई स परी ा म इस बार वे थोड़ा सा फसले और उ ह 58 फ सद अंक हा सल ए। उसके कई दशक बाद जब गांधी मश र हो गए, तो एक अमरीक प कार ने उनक बहन रै लयत से पूछा क ‘ या गांधी कूल म एक अ े छा थे?’ तो उनका जवाब था, ‘उ ह कूल म एक हो शयार छा समझा जाता था, वे हमेशा थम ान पर आते थे।’ हालां क भा य क बात ये है क ऐ तहा सक रेकॉड उनक यारी बहन क याद से मेल नह खाता!33 अपने घर म गांधी क मुलाकात यादातर अपनी ही मोढ़ ब नया जा त के लोग से होती थी। का ठयावाड़ हाई कूल म उनके सहपा ठय म ब नय क अ य उप-जा तय के ब के अलावा कुछ ा ण छा भी थे। वह जीवन म पहली बार ईसाई और ईसाईयत से वा कफ हो रहे थे। राजकोट म कई चच थे (जब क पोरबंदर म एक भी नह था) और कुछ ब त ही ऊजावान मशन रयां थ । राजकोट म काम करनेवाले एक आय रश पादरी ने

‘ ा ण और ब नय को हर जगह एक बु जीवी वग के प म दे खा’ और सोचा क ऊंची जा तय का धमातरण ह समाज म बड़े तरोध को ज म दे गा। वह धा मक सड़क के एक कनारे खड़ा रहता और आने-जानेवाल को ईसा क महानता के बारे म बताता और उनके अधीन आने पर होनेवाले फायद को बताता। मोहनदास ने कूल जाते समय उस धम चारक को सुना ले कन वह वहां से तेज़ी से नकल गए और अपने कुलदे वता क नदा सुनकर खी ए।34 का ठयावाड़ हाई कूल म कोई भी ईसाई लड़का नह था, ले कन कई पारसी और कुछ मु लम ज़ र थे। शेख मेहताब नाम का एक मुसलमान लड़का मोहनदास का जगरी दो त बन गया। वह बगल के ग डल रयासत के जेलर का बेटा था। मेहताब से मोहनदास का प रचय उनके बड़े भाई करसनदास ने करवाया था। करसनदास गांधी और उनके मु लम म का पढ़ाई- लखाई म त नक भी मन नह लगता था। दोन कई-कई बार परी ा म अनु ीण हो गए। इस तरह से वे उसी क ा म रह गए जसम मोहनदास थे, जो उनसे कई साल छोटे थे।35 बाद म मोहनदास ने याद करते ए लखा, ‘मेहताब असाधारण र तार से लंबी री तक दौड़ सकता था। वह ऊंची और लंबी कूद म मा हर था।’ कूल के हेडमा टर एक पारसी थे जनका नाम दोराबजी गमी था। वे खेलकूद और एथले ट स म ब त च लेते थे। जब क मोहनदास क इसम कोई इ ा नह थी और उनका दशन भी अ ा नह था। जब क मेहताब हमेशा खेलने, त धा म भाग लेने और जीतने के लए तैयार रहता था। उनक दो ती इसी व भ ता पर आधा रत थी। एक शम ला सा और खेल-कूद म च न लेनेवाला लड़का, एक लंबे और मज़बूत खलाड़ी के त शंसा भाव रखता था। वे इतने जगरी दो त बन गए क एक बार वे दोन साथ-साथ त वीर खचवाने एक टू डयो चले गए। वो फोटो ाफ कसी तरह बचा आ है और उसम दखता है क दोन आसपास कु सय पर बैठे ए ह। मोहनदास का दा हना हाथ सजावट टे बल को छू रहा है जब क मेहताब आ म व ास और अ धकार के साथ बैठा आ है। बड़ा लड़का कई इंच लंबा है। वह एक पगड़ी पहने ए है जब क मोहनदास एक टोपी। उनके हावभाव से यह साफ दखता है क उस र ते म कौन सा दो त यादा आ म व ास से भरा आ है!36 दो ती क शु आत म ही मेहताब ने मोहनदास को सलाह द क उसक कमज़ोर कद काठ क वजह उसका मांसाहारी न होना है। इसके अलावा गुजराती क व नमद क उ भी सामने थी जसका अनुवाद कुछ इस तरह से हैः अं ेज़ को गौर से दे खो, वे भारतीय पर शासन करते ह य क मांसाहारी होने क वजह से

वे पांच यू बट लंबे ह। मेहताब ने अपने दो त के लए नद के कनारे एक घर म मांस पकाया, जो गांधी के घर से ब त र था। मांसाहार मोहनदास को ब कुल अ ा नह लगा, इसके अलावा वे अपनी मां क नाराज़गी से डरते थे। जैसा क वे अ सर पूछती थ , अगर उ ह ने पूछा क कूल म उ ह ने या खाना खाया है तो उनका या होगा? वह इस बात से और भी असहज हो गए जब एक दन मेहताब उ ह वे यालय ले गया। उनके दो त ने वे यालय का शु क पहले ही अदा कर दया था ले कन मोहनदास जैसा ‘नौ सखुआ इस खेल म ब कुल अंधा और गूंगा सा बत आ’। चूं क उ ह ने कोई पहल नह क तो वह वे या नाराज़ हो गई और उ ह दरवाज़े से बाहर नकाल दया। वह अनुभव उनके लए काफ पीड़ादायक था और मोहनदास ने शेख मेहताब क संग त से अपने को र कर लया।37 नौजवान मोहनदास का मन पढ़ाई- लखाई से वच लत होने लगा। इसक एक वजह थी घर म उनक नई साथी–उनक प नी क तूरबा। उनके ववाह क सही-सही तारीख कसी को नह मालूम है। अ धकांश ववरण के मुता बक यह सन 1883 क बात है (चूं क गांधी ने खुद ही उस घटना को याद करते ए लखा है क वह उस समय 13 साल के थे) ले कन कुछ अ य ववरण इसे सन 1882 या सन 1881 का भी बताते ह।38 उस ज़माने म कम उ म शाद करना भारतीय म आम बात थी। हक कत तो यह थी क उससे पहले भी दो बार मोहनदास क मंगनी हो चुक थी, ले कन ववाह से पहले ही दोन लड़ कय क मृ यु हो गई। जब क तूरबा के साथ उनक शाद प क हो गई तो प रवार ने तय कया क एक साथ तीन शा दयां ह गी–यानी मोहनदास के भाई करसनदास और उनके एक चचेरे भाई क शाद भी एक साथ क जाएगी। ववाह समारोह गांधी प रवार के पोरबंदर वाले पुराने घर पर संप आ। उस शाद के बारे म हे मोहनदास ने जो कुछ याद कया वो था–‘पहनने के लए अ े कपड़े , ढोलबाज क आवाज़, बारात, ब ढ़या खाना और साथ खेलने के लए एक अजनबी लड़क ’। कुछ अ त र याद भी थ क उनके पता उस शाद समारोह म हाथ म प यां बांधे ए आए थे य क जस घोड़ागाड़ी से वो पोरबंदर आ रहे थे, वह रा ते म उलट गई थी।39 क तूरबा पोरबंदर के ही एक ब नया प रवार क थी। उनके पता मकनजी कपा ड़या एक समृ ापारी थे जनका कपड़ और सूत का कारोबार था।40 उनका प रवार एक खूबसूरत दो मं ज़ले मकान म रहता था जसम 20 कमरे और ज़मीन के नीचे एक बड़ा पानी का टक था। उस घर म लकड़ी क सी ढ़यां और खूबसूरत तरीके से बनाए दराज़ और दरवाज़े थे। गांधी प रवार के घर क द वार नंगी थ , ले कन कपा ड़या प रवार के घर क द वार पर प ट स लगी ई थ ।41

शाद के कुछ महीन के बाद क तूरबा, मोहनदास के घर राजकोट आ गई। नौजवान दं प ी के बीच फर कस तरह के गाढ़ र ते बने या नह बने–इसके बारे म हमारी जानकारी पूरी तरह से प त के ववरण पर ही आधा रत है। मोहनदास लखते ह, वह अपनी ‘प नी के लए पागल’ थे। ‘यहां तक क कूल म भी म उसक बारे म सोचता रहता था और व दोष और हमारे मलन का वचार हमेशा मेरे दमाग म चलता रहता था।’ धीरेधीरे उनका यह लगाव द वानगी म बदल गया और इस तरह से मोहनदास हमेशा ‘अपनी प नी क ग त व धय पर नज़र रखने लगे’। उ ह ने आगे लखा है क हालत ये तक हो गई क ‘वह मेरी इजाज़त के बना कह जाती तक नह थी।’ यहां तक क जब वह अपनी स खय के साथ मं दर जाती थी तो भी मोहनदास ई या से भर जाते। कम से कम अपनी तरफ से वह ज़बद त यौन आकषण के शकार थे। क तूरबा अ श त थी, मोहनदास उनको ‘पढ़ाने के त ब त गंभीर’ थे। ले कन ‘वासनायु ेम’ क वजह से ऐसा करने का समय ही नह मल पाता था।42 सन 1885 के उ राध म गांधी प रवार के मु खया गंभीर प से बीमार पड़ गए। ब े उनक सेवा-सु ुषा म जुट गए। एक तरफ मोहनदास का हाथ पता के पैर क ‘मा लश म लगा आ’ था तो उनका ‘मन अपने शयन क क तरफ टं गा आ था’–इस बात के बावजूद क क तूरबा पेट से थी। इसका ये मतलब ये था क ‘धम, सामा य बु , मे डकल साइंस–सबके सब यौन संबंध बनाने से मना करते थे।’ एक रात जब मोहनदास अपने पता क मा लश कर रहे थे तो उनके एक चाचा आए और उ ह ने मोहनदास को आराम करने कह खुद ये काम करने क इ ा कट क । उस 16 साल के नौजवान ने इस मौके को हाथो-हाथ लया और ‘सीधे अपने शयन क क तरफ भागा’। उसने अपनी सोती ई प नी को जगाया और उसे अपने आगोश म ले लया। कुछ ही मनट के बाद उनके ेमालाप म वधान पड़ा। नौकर ने दरवाज़ा खटखटाया था, पता इस नया म नह रहे। उसके चालीस साल के बाद मोहनदास ने शम और पछतावे के साथ लखा, ‘अगर उस पशुता क भावना ने मुझे अंधा नह कया होता तो म, पता के जीवन के आ खरी ण म उनसे र नह आ होता।’ कुछ स ताह बाद जब गभपात क वजह से क तूरबा का ब ा मर गया तो इसके लए भी मोहनदास ने खुद को ही दोषी ठहराया। यह ‘पाश वक इ ा’ को रोकने क उनक अयो यता थी जसक वजह से ये ‘दोहरी शम’ उ ह झेलनी पड़ी थी। 43

गांधी ारा याद कए गए अथवा अलग तरीके से ा या यत उनके नजी इ तहास को छोड़कर हम फर से कूल म मले उनके अंक क बात करनी चा हए। सन 1885 क ग मय म उ ह ने पांचव ेड क परी ा म ठ क-ठाक दशन करते ए 55.75 फ सद अंक हा सल कए और क ा म तीसरा ान ा त कया। ग णत म तो उ ह ने अनपे त दशन कया (85 फ सद ) जसके लए उ ह दो का ठयावाड़ी राजा ारा दए जानेवाला

वज़ीफा हा सल आ। अगले साल अं ेज़ी भाषा के साथ उनका प रचय और भी घ न आ जब उ ह एडीसन ल खत 200 प े के े टे टर पढ़ने का मौका मला और म टन के पैराडाइज़ लॉ ट क 750 पं यां याद करने को कहा गया। वह वा षक परी ा म चौथे ान पर आए और अब उनके अंकप खोजने वाल क नगाह म गांधी को ‘ कसी भी तरह से औसत व ाथ नह कहा जा सकता था’। दसंबर 1886 के आ खरी स ताह म मोहनदास को ेड सात म दा खला दया गया जो उस कूल का सबसे ऊंचा दज़ा था। उनके कूल के ारा ही ली गई वेश परी ा म उ ह औसतन पांच वषय म 31.8 फ सद नंबर मले। उनके इस खराब दशन ने उनके अंदर एक वचलन को द शत कया य क वह ज द ही बंबई यू नव सट ारा लए जानेवाले मै कुलेशन क परी ा म बैठनेवाले थे। नवंबर 1887 के तीसरे स ताह म मोहनदास मै क परी ा दे ने े न से अहमदाबाद गए। वह जीवन म पहली बार े न म बैठे थे और वह गुजराती बोलनेवाले समाज के सबसे बड़े शहर क तरफ पहली बार जा रहे थे। एक वशु बौ क संदभ म कह तो सन 1887 म मै कुलेशन, मोहनदास क ज़दगी म सबसे कठोर परी ा थी। जन कुछ प से उनका सामना आ, उनम से कुछ उपल ह। जस अं ेज़ी के प का उ ह जवाब दे ना था ‘उसम स वभाव पर एक चालीस पं का लेख लखने को कहा गया था’। जन श द क उनको ा या करने को कहा गया था उनम Pleonasm (वाचालता) और apposition ( न पण/सामाना धकरण) जैसे श द थे। अंकग णत के प के लए उनको कुछ ज टल समीकरण को हल करने को कहा गया था जनम द सय दशमलब के ब थे! ाकृ तक व ान म उ ह कहा गया क वे अ य सवाल के अलावा चूना और स यू रक ए सड का रासाय नक सू बताएं। इ तहास और भूगोल वषय म उनसे पूछा गया क वे ‘इं लड म यू रटन शासन का सं त इ तहास बताएं’ और न े पर राईन नद को दशाएं। गुजराती भाषा म उनक द ता को जांचने के लए उनसे कहा गया क वो अं ेज़ी के पैरा ाफ का गुजराती म अनुवाद कर। उस पैरा ाफ म ये लखा था क ‘महारानी व टो रया क मू त लगाने से बेहतर है क उनके शासनकाल के वण जयंती वष के उपल य म एक कोष इक ा कया जाए जसे भारत को नई औ ो गक नया म अपनी ग रमामय जगह हा सल करने के लए सम पत कया जाए।’ जनवरी 1888 म का ठयावाड़ गज़ट म मै कुलेशन परी ा के नतीजे का शत ए। उस परी ा म 3000 से यादा लोग बैठे थे जसम तीस फ सद से कम ही उ ीण ए थे। मोहनदास उन उ ीण होने वाल म से एक थे। उ ह ने गुजराती और अं ेज़ी म ब ढ़या दशन कया था और दोन म उ ह औसतन 45 फ सद नंबर आए थे। ले कन ग णत और इ तहास म उनका दशन ठ क नह था। उनका कुल दशन 40 फ सद अंक का था।

रा य के जो 823 छा उस परी ा म उ ीण ए थे उसम मोहनदास को 404वां ान हा सल आ था।44 कूल के बाहर मोहनदास क श ा गुजराती सा ह य म उनक च से समृ हो रही थी। 19व सद म छापाखाने के आ व कार और शु आती अखबार के काशन ने भारतीय भाषा को काफ ो सा हत कया। गांधी क मातृभाषा कोई अपवाद नह थी। गुजराती म पहले उप यास का काशन सन 1866 म आ, उसके तीन साल बाद गांधी पैदा ए थे। उसी दशक म नमदासंकर लालशंकर(1833-66) ारा कई मह वपूण कहा नयां और क वताएं लखी गई थ । ‘नमद’ वही क व थे ज ह ने युवा मोहनदास को मांसाहार के लए े रत कया था। म यकालीन क वय का लेखन पहली बार छपकर आम लोग के सामने आ रहा था उसम से एक नर सग मेहता भी थे जो गुजरात म एक अ य धक लोक य वै णव चारक थे ज ह ने कृ ण क भ म ब त सारी रचनाएं लख और जनका मानना था क ई र उ ह के सामने कट होता है जो सर के ख को महसूस कर सकते ह। ये उप यास और क वताएं गांधी प रवार जैसे प रवार म प ंच रह थ और उनक उ के नौजवान ारा पढ़ जा रही थ जो मु त नया के नज़द क थे।45 जन लेखक को मोहनदास ने गौर से पढ़ा उनम नमद और गोवधनराम पाठ थे (1855-1907)। दोन ही समाज सुधारक थे ज ह ने अं ेज़ी राज को गुजरा तय के लए चुनौती के तौर पर दे खा। उ ह ने अपनी कमजो रय और दोष के लए उ ह सतक करने का काम कया। नमद जा त और कु था के खलाफ थे और वधवा ववाह के समथक थे। वह भारतीय शासक के और भाई-भतीजावाद रवैए के भी स त आलोचक थे। उसी तरह से गोवधनराम ने भी जा त क जकड़न और म हला के शोषण के खलाफ आवाज़ उठाई। नमद क तरह उनका भी मानना था क अगर इस तरह के पुराने री त- रवाज़ और सं ा को ख म नह कया गया तो टश शासन भारतीय को श मदगी क हद तक ले जाएगा।46 नमद और गोवधन वो लेखक थे ज ह गांधी ने राजकोट म पढ़ा था, उनके काम और उनके श द, उन श द के साथ घुल मल रहे थे या टकरा रहे थे, जो वे कूल म अपने दो त या घर पर अपने प रवारजन से सुन रहे थे। ● गांधी के पता और दादा बना कसी औपचा रक श ा के पोरबंदर के द वान बन गए थे। ले कन सन 1880 के दशक म सरकार और शासन क व ा धीरे-धीरे यादा सु व त हो गई थी। अब अ श त लोग से काम नह चलने वाला था। टश भारत

या रजवाड़ म भी, नौजवान ह ता नय को ऊंची नौक रयां हा सल करने के लए अं ेज़ी का ान और आधु नक वचार से अवगत होना ज़ री हो गया था। बंबई मै कुलेशन के तर के हसाब से मोहनदास गांधी का दशन ब त व श नह था। हालां क उनके अपने प रवार म उनक श ा का रेकॉड ज़ र चमकदार था। उनके सबसे बड़े भाई ल मीदास ने बीच म ही पढ़ाई छोड़ द थी और पोरबंदर रयासत म एक छोट सी नौकरी कर ली थी। उनके सरे भाई करसनदास को बंबई यू नव सट क परी ा म बैठने के लए नह भेजा गया। ले कन एक कामयाब मै कुलेट के प म मोहनदास प रवार म अपवाद थे–उनका प रवार अब उनसे उ मीद करता था क वे ऊंची ड यां लाएं। जनवरी 1888 म मोहनदास ने सामलदास कॉलेज, भावनगर म बीए ड ी कोस म दा खला लया। रा य के द वान के नाम पर बना वह कॉलेज का ठयावाड़ े का पहला ड ी कॉलेज था। मोहनदास भावनगर तक एक कूली दो त के साथ गए और उस या ा का पहला ह सा ऊंट गाड़ी और सरा भाग रेल से पूरा कया। उ ह ने एक वै णव इलाके म कराए पर कमरा लया। यहां उ ह अकेले रहना था और अपना खाना खुद बनाना था। मोहनदास क क ा म 39 छा थे जसम चार पारसी थे। शेष ा ण या ब नया पृ भू म के ह थे।47 बीए म वहां जो-जो वषय उपल था वो था अं ेज़ी, ग णत, भौ तक , तकशा और इ तहास। हर दन पांच घंटे का ा यान होता था। इस नए छा को बीजग णत से खास द कत थी। एक बार जब ग णत के श क ने उनसे कहा क वे लैकबोड पर आएं और एक सवाल को हल कर तो मोहनदास ने ऐसा हावभाव दखाया मानो उ ह ने श क क बात सुनी ही नह । भावनगर म मोहनदास को अपने घर क बार-बार याद सताती थी (अपनी प नी क और अपने मां के हाथ के खाने क ) और उ ह बार-बार सरदद होता था। अ ैल 1888 म जब पहले स के आ खर का इ तहान आ, तो वह सात म से सफ चार वषय के लए परी ा म बैठे। उसम भी उ ह ने ब ढ़या दशन नह कया। उदाहरण के लए अं ेज़ी म उ ह ने सफ 34 फ सद अंक हा सल कया।48 मोहनदास ग मय क छु म घर लौटे । उनके एक पा रवा रक म का उनके घर आगमन आ। वह एक ‘चालाक क म का और पढ़ा- लखा ा ण’ था जसका नाम मावजी दवे था। दवे ने पुतलीबाई को सलाह द क मोहनदास को सामलदास कॉलेज से हटाकर ज़नून क पढ़ाई के लए लंदन भेज दे ना चा हए। वैसे भी बीए करने म चार या पांच साल लगना था, जब क उससे आधे समय म लोग लंदन से बै र टर का स ट फकेट हा सल कर लगे। दवे ने कहा क ‘लंदन से क़ानून क ड ी हा सल करने के बाद उसे पोरबंदर क द वानी आराम से मल जाएगी’।49 हालां क शु म वह वचार पुतलीबाई को नह जंचा जो अपने बेटे को अपने नज़द क रखना चाहती थ , ले कन मोहनदास को वह वचार जंच गया। आगे उ ह ने लखा क

‘इं लड जाने का वचार...मेरे मन पर बुरी तरह हावी हो गया’। हालां क इस बारे म प के तौर पर कुछ नह कहा जा सकता क लंदन जाने के वचार को उ ह ने इतनी ज द य वीकार कर लया। शायद वह अमे रका और यूरोप क या ा के गुजराती सं मरण पढ़ रहे थे जो उस समय काफ चलन म था।50 अगर गांधी के पता जी वत रहते तो शायद उनके इं लड जाने का सवाल ही नह खड़ा होता, य क बंबई यू नव सट के मै कुलेशन क परी ा म सफलता पूवक उ ीण होने के बाद वह वैसे भी का ठयावाड़ ाय प के सवा धक श त य म से एक हो गए थे। एक टश अ धकारी ने हकारत भरे अंदाज़ म लखा, ‘जहां तक श ा-द ा क बात है का ठयावाड़ ब त ही पछड़ा इलाका है। यहां के कुछ ही राजे-महाराजे पढ़ या लख सकते ह और जो लोग उनके कामकाज दे खते ह उ ह अपने काम के अलावा कुछ नह आता। यहां ब त कम कताब उपल ह और कताब को कोई ो साहन नह दया जाता।’51 अगर मोहनदास भावनगर म अपनी बीए क पढ़ाई म दलच ी नह दखाते तो उनके पता अपने रसूख का इ तेमाल कर अपने इस अ य धक पढ़े - लखे (वहां के हसाब से) छोटे बेटे को कह नौकरी लगवा दे ते। वह नौकरी कसी महाराजा के यहां हो सकती थी जो उस समय पढ़े - लखे लोग को सेवा म लेकर और शासन को आधु नक बनाकर अं ेज़ को भा वत करने क चे ा म लगे ए थे। ऐसी त म मोहनदास शायद ही लंदन जाकर पढ़ाई करने क सोच पाते। अगर सोच भी पाते तो उनके पता पहले झटके म उनके वचार को खा रज कर दे ते। य क पुरातन सोच वाले ह म उस ज़माने म ये भय समाया आ था क काला-पानी (समु ) लांघने से जा त जाने का खतरा रहता है। ब नय के बीच यह पूवा ह तो और भी यादा सघन था य क भारत से बाहर उनक जो खा संबंधी कठोर वजनाएं थ , उसका पालन करना क ठन था। वह नयम उनके जीवन क संचालक श थी। उस समय तक वाभा वक प से वदे श जानेवाले भारतीय म पारसी थे जो वाभा वक तौर पर प मीकृत (हो रहे) थे और ह नह थे। कुछ बहा र ा ण और य ने भी समंदर पार करने का साहस कया था। उसम से ा ण तो पढ़ाई- लखाई को तव ो दे ते थे (एक ऐसा े जसम प म साफ तौर पर आगे था), जब क य टश तौर तरीके अपनाने और दे श के नए मा लकान म घुलने- मलने के लए वहां जाते थे। सरी तरफ ब नय क अ य धक सतकता और ढ़वा दता ने उ ह वदे श जाने और प मी श ा हा सल करने लायक लोग म सबसे कमज़ोर उ मीदवार बना दया था। मोहनदास के चाचा तुलसीदास ने जब ये सुना क मोहनदास ने वदे श जाने का न य कया है तो उ ह ने मोहनदास को मना करने क को शश क । उ ह ने कहा क जो वक ल इं लड से पढ़कर आते ह वो ‘भोजन के बारे म कोई तौर तरीका नह जानते। उनके मुंह से कभी सगार बाहर नह आता। वे अं ेज क तरह बेशम से कपड़े पहनते ह’। मोहनदास

के पता का भी ऐसा ही वचार था। अगर वो ज़दा होते तो वे अपने वचार उन पर और स ती से लादते। ले कन चूं क अब कबा गांधी नया म नह थे इसी लए उनक प नी पुतलीबाई को इस बारे म आ खरी फैसला लेना था। मोहनदास ने अपनी मां पर दबाव डाला क वो उ ह इं लड जाने क इजाज़त द। पुतलीबाई ने एक धा मक पु ष से इस बाबत मश वरा कया जस पर वो यक न करती थ । वो एक मोढ़ ब नया से बने जैन साधु थे जनका नाम बेचरजी वामी था। वामी ने कहा क लड़का लंदन जा सकता है अगर वो ये वादा करे क वो मांस नह खाएगा और अपनी प नी के त हमेशा वफादार रहेगा। मोहनदास ने अपनी मां के सामने ऐसी ही शपथ खाई और शपथ के बाद मोहनदास को वदे श जाने क इजाज़त मल गई।52 हालां क इसके बाद एक सम या और थी और सम या ये थी क लंदन म पढ़ाई का खच महंगा था। मोहनदास ने पोरबंदर रा य से मदद क मांग के बारे म वचार कया। पछले ही साल (1887) म पदावनत राणा को फर से इस शत पर पुरानी है सयत म बहाल कर दया गया था क वह रा य से बाहर रहेगा। ‘ नराशाजनक प से वह एक खराब शासक था’, ले कन ऐसा सोचा गया क उसे ‘ थम ेणी’ का राजा बनाकर ‘सां वना दे द जाएगी और टश भारत म रहने के लए मना लया जाएगा’। ऐसी त म रा य का शासक बंबई म रहता था तो पोरबंदर का शासन अं ेज़ अ धकारी े ड रक लेली के हाथ म चला गया। मोहनदास ने पोरबंदर के शासन से अपनी पढ़ाई के खच को वहन करने का आ ह कया। लेली ने सीधे तौर पर इससे इ कार कर दया–इस बात के बावजूद क गांधी प रवार का पोरबंदर रयासत से लंबा संबंध रहा था। मोहनदास के बड़े भाई ल मीदास ने पैसे के इंतज़ाम का आ ासन दया। पैसे क कमी क पू त प रवार के ज़ेवरात को बंधक रखकर क जानी थी। तो इस तरह से हाथ म पैसा और भाई के आ शवाद के बाद मोहनदास ने लंदन जाने क तैयारी क । 9 अग त 1888 को राजकोट म उनके पुराने हाई कूल ने उनके स मान म एक समारोह का आयोजन कया। उस समारोह के बारे म एक ानीय अखबार म खबर छपी जसम कहा गया क ‘ ी गांधी का ठयावाड़ के पहले ब नया ह जो बै र टरी क पढ़ाई के लए इं लड जा रहे ह।’ उनके सहपा ठय ने उ मीद क क ‘वे वशेष यान दे ते ए इं लड म भारत के हत को बढ़ावा दगे और साथ ही मेडल और पुर कार के लए त धा करगे।’ इसके जवाब म मोहनदास ने कहा क उ ह यक न है क ‘ सरे लोग भी उनके उदाहरण का पालन करगे और इं लड से लौटने पर वे अपने आपको भारत को पुनजागृत करने के महती काय म सम पत कर दगे।’ उसके बाद भाषण ए, मोहनदास ने लोग से शुभकामनाएं हण क और ‘लोग वहां से पारंप रक पान और गुलद त के साथ वापस अपने-अपने घर को लौटे ।’54 उसी तपती ग मय म जब मोहनदास को लंदन भेजे जाने का फैसला लया जा रहा था, उनक प नी क तूरबा ने एक बालक को ज म दया। हालां क

हम उस ब े क सही ज म त थ नह मालूम है, ले कन ऐसा लगता है क यह जुलाई महीने म कसी तारीख क बात होगी। उस शशु का नाम ह रलाल रखा गया। 10 अग त 1888 को, जस दन उ ह ने अपने पुराने कूल से छु ली, मोहनदास अपनी प नी और अपनी मां से वदा लेकर बंबई क तरफ रवाना हो गए।55 बंबई म ककर जब वह लंदन जाने के लए जहाज़ पर बथ मलने का इंतज़ार कर रहे थे, उ ह पता चला क बंबई के मोढ़ ब नया उनके वदे श जाने के फैसले के खलाफ हो गए ह। बंबई म समुदाय के मु खया ने जो कबा गांधी को जानता था, धमक द क अगर उ ह ने समंदर पार कया तो उ ह समाज से ब ह कृत कर दया जाएगा। इस धमक क बात चार तरफ फैल गई। जैसा क उसके कुछ ही दन बाद मोहनदास ने लखा, ‘म चार तरफ से घर गया। म इस तरह से बचकर नह नकल सकता था और कोई न कोई नगाह मेरी तरफ उठ ही जाती थी। एक बार जब म टाउन हॉल के नज़द क टहल रहा था, उ ह ने मुझे चार तरफ से घेर लया और सी टयां बजा , मेरे असहाय भाई चुपचाप इसे दे खते रहे’।56 इस मु े को सुलझाने के लए मोढ़ ब नय क एक ‘ वशाल सभा’ बुलाई गई। मोहनदास बीच म बैठे जब क समाज के नेता ‘मेरे ऊपर दबाव दे रहे थे और मुझे याद दला रहे थे क मेरे पता के साथ उनका कैसा संबंध था’। लड़के ने जवाब दया क वो पढ़ाई के लए वदे श जा रहा है और उसने मां को वचन दया है क वो कसी अजनबी ी को नह छु एगा, शराब नह पएगा और मांसाहार नह करेगा। ले कन समाज के नेता इससे भा वत नह ए। समाज के नयम के इस उ लंघन के लए लड़के को जा त युत करने क घोषणा क गई। यानी जो कोई भी उससे बात करने या मलने जाएगा उसे दं डत कया जाएगा। ले कन जैसा क नयम का उ लंघन करनेवाले ने बाद म याद कया, ‘मेरे ऊपर उस आ ा का कोई भाव नह पड़ा।’ 4 सतंबर 1888 को अपनी 20व वषगांठ से एक महीना पहले मोहनदास करमचंद गांधी समु के रा ते लंदन के लए रवाना हो गए।57

2 शाकाहा रय के बीच

लड़कपन म मोहनदास अ सर बंदरगाह पर जहाज़ को आते-जाते दे खा करते थे। ले कन जस जहाज म वह पहली बार चढ़े वो उ ह लंदन लेकर जानेवाला था। उस नौजवान के लए वह अनुभव रोमांचकारी था। पहली बार उ ह ने एक डायरी लखी जसम उस समु का या ा का ववरण उ ह ने बीस प म दज कया।1 उस जहाज़ का नाम था एस एस लाइड। वह बंबई से 4 सतंबर 1888 को शाम पांच बजे रवाना आ। उसके एक घंटे बाद रात के खाने क घंट बजी। भोजन क मेज़ पर मोहनदास के साथ बैठे थे— यंबक राय मजूमदार जो जूनागढ़ के एक नौजवान थे (और नाम से ा ण लगते थे)। मजूमदार भी पढ़ाई के लए लंदन जा रहे थे। युवा गांधी ने एक काला कोट पहन रखा था और अपना खाना खुद ले जा रहे थे—गुजराती मठाइयां और सुगं धत पकवान थे—जो उनके प रवार ने उनको रा ते के लए दया था। उनका वह नया म यादा अनौपचा रक कपड़ा पहने ए था और जहाज़ पर जो कुछ खाने को दया जा रहा था, उससे संतु था। यह व ा शु के अड़तालीस घंट तक चलती रही। सौभा य से मोहनदास को अपने इलाके का एक जहाज़ी मल गया और वह उनके लए दाल-चावल बनाने के लए तैयार हो गया। उस जहाज़ी ने उनसे रोट लेने का भी आ ह कया ले कन चूं क उसका हाथ गंदा था, सो उस तुनक मजाज़ और न ावाले ब नए ने रोट लेने से मना कर दया। इसके बदले उसने जहाज़ पर मल रहे इं लश ेड को ही दाल म डु बोकर खाना पसंद कया।2 दन के समय मोहनदास जहा ज़य को काम करते दे खते (उनक नपुणता उ ह शंसनीय लगी), उ ह ने पयानो को दलच ी से सुना (ये भी उ ह ने पहली बार और ता ुब से दे खा—ऐसा लगता है क राजकोट म गांधी के घर म कोई संगीत या वा यं नह था) और डे क पर हवा का आनंद लेते। एक दन वे डे क पर सूया त के बाद तक खड़े रहे और लहर को दे खते रहे क वो या पराव तत करती है—‘उ ह ऐसा तीत आ क चांद इधर से उधर डोल रहा है।’ उसके बाद तारे दखने लगे, पानी म वे तारे गांधी को ‘आ तशबाज़ी करते तीत ए।’

जब वे अदन प ंचे तो मुसा फर ने कनारे तक जाने के लए कराए क एक नाव ली। मोहनदास उस संर त रा य क इमारत को दे खकर ब त भा वत ए, ले कन वहां के भू य ने उनको ब त भा वत नह कया। अदन म पूरे दन बताने के बावजूद ‘उ ह एक भी पेड़ या ज़रा भी ह रयाली नह दखाई द ।’ उसी शाम एस एस लाइड लाल सागर म वेश कर गया। उनसे पहले और बाद म गए ब त सारे लोग क तरह ही मोहनदास ने वेज़ नहर को पार कया और ‘मन ही मन उस क तभा क तारीफ क जसने उसका नमाण कया था’। जब उनका जहाज़ पोट सईद प ंचा तो उ ह लगा क उ ह ने वाकई अपनी मातृभू म को काफ पीछे छोड़ दया है। य क ‘वहां अं ेज़ी स का चलता था, भारतीय स का वहां बेकार था’। एक सहया ी ने मोहनदास से कहा था क जब वे वेज़ नहर पार कर जाएंगे तो मौसम बदल जाएगा। जैसे-जैसे वे यूरोप के नकट प ंचते जाएंगे, ठं ड से बचने का एक ही रा ता होगा और वो होगा यादा से यादा मांसाहार और (सुरापान)। ले कन मोहनदास अपने चावल-दाल के भोजन पर अड़े रहे। तीन दन बाद वे डसी प ंचे। शाम का समय था और जब या ीगण तट पर प ंचे तो गैस-लप जलाए जा रहे थे। हर कोई इटा लयन म बात कर रहा था। मोहनदास रेलवे टे शन दे खकर त नक भी भा वत नह ए। वह वैसा ‘खूबसूरत’ नह था जैसा उनके अपने दे श म बंबई बेरार और स ल इं डयन रेलवे ने बनाया था। हालां क रेलवे के ड बे बड़े -बड़े और ठ क ढं ग से लगाए ए थे। मानो उन ब ढ़या अनुभव म इजाफा करते ए डसी म, मोहनदास को एक ानीय मला (जो अं ेज़ी बोलने क को शश कर रहा था)। उसने कहा, ‘सर, एक चौदह साल क सुंदर लड़क है। म आपको वहां ले चलूंगा। ब त पैसा नह दे ना होगा।’ ले कन उस नौजवान ह तानी ने इस ताव को नकार दया। अगला पड़ाव मा टा था। यहां मोहनदास और मजूमदार ने एक घोड़ागाड़ी कराए पर ली ता क उस इलाके का दशन कया जा सके। उ ह ने एक पुराना चच और एक ानीय सं हालय दे खा जसम यु के ह थयार और वो रथ दखाए गए थे जसपर कभी नेपो लयन बोनापाट ने सवारी क थी। तीन दन के बाद वे एक सरे सा ा यवाद ठकाने ज ा टर प ंचे—जहां क सड़क को दे खकर वे ब त ही भा वत ए। मोहनदास गांधी क लंदन तक क समु या ा क डायरी म भू- य का ववरण अ त तरीके से दया गया है। इसको लखने म उ ह ने असामा य तरीके से यान दया है। सड़क, इमारत और ह रयाली का वणन काफ सावधानी से कया गया है। कुदरत ने उनक ज म ली का ठयावाड़ क तुलना म यहां अलग तरीके से नेमत बरसाई थी। रा ते म जन शहर को उ ह ने दे खा था वहां उ ह ने लोग के हाथ को अलग तरीके से काम करते ए दे खा। जब जहाज़ लाइमाउथ नाम के बंदरगाह पर प ंचा तो मोहनदास को अचानक ठं ड का एहसास आ। रात के 11 बजे थे और जाड़ा नजद क आ रहा था। चेताव नय और

तमाम आकषण के बावजूद उ ह ने इस बात को सा बत कया क उ ह ने उन तीन वाद को नह तोड़ा था—मांसाहार नह करना, शराब नह पीना और पर- ी के साथ संबंध नह बनाना। ये वो वादे थे जो उ ह ने अपनी मां से राजकोट म कए थे। लाइमाउथ से जहाज़ अपने अं तम गंत क तरफ रवाना आ। 29 सतंबर को बंबई छोड़ने के तीन स ताह बाद एस एस लाइड टलबरी बंदरगाह पर जाकर लगा। मोहनदास और मजूमदार दोन जहाज़ से उतरे और वहां से 20 मील र लंदन जाने के लए े न पर सवार हो गए। उनक पहली रात लंदन म व टो रया होटल म बीती जो नॉथ बरलड ट म े फ गर वेयर के बगल म था।3 ● सन 1888 म लंदनए टश सा ा य का एक महान शहर था। महारानी व टो रया ने हाल ही म अपने शासन का वण जयंती समारोह मनाया था। जस सा ा य क वो माल कन थ वो नया के चार कोन म अपने झंडे गाड़ चुका था। यहां तक क वैसे कुछ दे श जो इं लड ारा सीधे शा सत नह थेए वे भी उसक सव ता को मानते थे। जब महा मा गांधी ने लंदन म कदम रखाए उसके कुछ ही दन बाद फारस के शाह का इं लड दौरा आ। एक लोक य प का के मु य पृ ने वडसर कैसल म वदे शी स ाट और महारानी के मुलाकात क त वीर का शत क । उस त वीर म व टो रया को लंबाई म छोटाए मज़बूत और सहज दखलाया गया हैए ब क एक हद तक वो ब त आकषक नह दखती.जैसा क वो थ भी। उनक तुलना म लचीले कद के और अपने खास प रधान म शाह यादा भ दखते थे। ले कन उस खेल म जो अहम बात थी वो था दोन का हावभाव— व टो रया सहासन पर बैठ थ जब क शाह झुककर उनका हाथ चूम रहे थे!4 सन 1888 म लंदन एक महान औ ो गक शहर भी था। इसके कारखाने—लप, चॉकलेट, जूते और कपड़ के अलावा हज़ार अ य व तु का बड़ी मा ा म उ पादन करते थे। लंदन म न मत और लंदन-वा सय ारा उपभोग म लाए जानेवाले उ पाद दोन ही बंदरगाह से आया तत- नया तत होते थे। उ ह 79,000 भीमकाय पोत म से एक था एस एस लाइड जो उसी साल शहर आया था जस साल गांधी वहां आए थे। नया भर से आनेवाले या य के अलावा उन जहाज़ से 2 करोड़ टन सामान भी ढोया जाता था जसक क मत 20 करोड़ पाउं ड के बराबर थी!5 और आ खर म सन 1888 म लंदन एक महान अंतरा ीय शहर भी था। उसक जतनी आबाद थी, नया म कसी सरे शहर क आबाद उतनी न थी। उस समय उसक आबाद करीब 60 लाख थी जो पे रस क आबाद से दोगुनी थी। उसम कई रा ीयता वाले लोग रहते थे। वहां एक वशाल और बढ़ती ई आबाद आय रश कैथो लक , जमन ,

चेक और इतालवी लोग क थी जो वहां काम क तलाश म आते थे। यू े न, पोलड और स के लोग भी वहां आते थे जो अपने दे श म हो रहे उ पीड़न से बचने के लए वहां आते थे। वह महानगर शायद यूरोप का सबसे यादा वै क शहर था और उसक भीड़भाड़ वाली सड़क पर ‘ऑ े लया, यूज़ीलड और कनाडाई लोग क आवाज़ सुनी जा सकती थ , साथ ही ए शयन और अ कन लोग क अजनबी क म क आवाज भी सुनी जा सकती थी’।6 लंदन के इन वदे शय म करीब 1000 भारतीय भी थे। 17व औ 18व सद म जो भारतीय लंदन आए थे वे यादातर मक वग के लोग थे। वे जहाज़ी और जहाज़ पर अ य काम करनेवाले, घरेलू नौकर और सपाही क म के लोग थे। वहां पर एक राम सह नाम का टॉम-टॉम मैन था जो सड़क पर ढोल बजाया करता था। हालां क कुछ सं ांत वग के लोग भी थे जो महाराजा और नवाब प रवार से थे। उसके बाद सन 1850 के बाद से एक बड़ी सं या ऐसे भारतीय क वहां आने लगी जो वहां च क सा या अ सर क़ानून म पेशेवर यो यता हा सल करने वहां प ंचने लगे थे। मोहनदास गांधी के लंदन आगमन के समय वहां जो दो भावशाली भारतीय रहते थे उनका नाम था-दादाभाई नौरोजी और अ ल करीम। नौरोजी एक पारसी थे जो एक ापा रक कंपनी के एजट के तौर पर सन 1855 म लंदन आए थे। समय के साथ-साथ वह ापार से यादा राजनी त और सामा जक काय म च लेने लगे। सन 1888 म उ ह ने इं लड म भारतीय का त न ध व करने के लए एक मंच का नमाण कया जसका नाम अगले साल टश कमेट ऑफ द इं डयन नेशनल कां ेस कर दया गया ( जसका गठन सन 1885 म बंबई म हो चुका था)। एक सरा भारतीय जसका भाव यादा मौजूं था वो अ ल करीम था जो आगरा का रहनेवाला था और महारानी व टो रया के कमचा रय म था। वह लंबा और ह का गोरा था और महारानी को ह तानी सखाता था और साथ ही भारतीय धम व परंपरा क भी जानकारी दे ता था। महारानी क नगाह म उनका श क ‘वाकई उदाहरण दे ने यो य और लाजवाब’ था। उसके नदश पर महारानी ने अपने भारतीय मुलाका तय को उ ह क भाषा म वागत करना शु कर दया था।7 लंदन म होनेवाली दै नक ग त व धयां लंदन क अंतरा ीय मह ा को दशाती थी। कभी कसी ए शयाई रा या य का दौरा होता, कभी च ड़याघर म पहला द रयाई घोड़ा लाया जाता। कसी महीने अ का म दास ापार के उ मूलन पर दशनी होती, अगले महीने कसी सरी गैलरी म जावा के गांव को दखाया जाता। ानीय ेस राजनी त का वै क कोण अ तयार करता— जसम े ट म व ोह से लेकर ाज़ील म ां त तक क खबर और उनका व ेषण होता। साथ ही अंतरा ीय अथ व ा पर भी खबर होत —मसलन चली म शराब नमाण और कै लफो नया म सोने क होड़ पर!8

● लंदन जाते समय रा ते म ही मोहनदास ने अपने एक प र चत को अपने आने के वषय म तार भेजा था। उसका नाम ाणजीवन मेहता था, जो मोरबी के एक डॉ टर थे। मोरबी राजकोट के नकट का शहर था। अब ाणजीवन इं लड म क़ानून क पढ़ाई कर रहे थे। जस शाम गांधी लंदन प ंचे, ाणजीवन उनसे मलने व टो रया होटल आए। बातचीत के दर यान मोहनदास ने उनका हैट (टोप) उठा लया और उसे दे खने लगे। ले कन डॉ टर मेहता ने उनक तरफ घूरकर जो दे खा तो गांधी ठठक गए। मोहनदास को अं ेज़ी तौरतरीक का पहला पाठ मल गया, ‘ सरे लोग का सामान मत छु एं। जैसा भारत म पहली मुलाकात म हम करते ह, उस तरह यहां पहली मुलाकात म ही सवाल मत पू छए। ज़ोर से मत बो लए। कसी को ‘सर’ मत बो लए जैसा क हम भारत म करते ह— सफ नौकर या मातहत ही अपने मा लक के साथ ऐसा बोलते ह, आ द-आ द।’9 वह होटल महंगा था, इसी लए मोहनदास और मजूमदार मोरबी के ही एक सरे के घर रहने चले गए। उसका नाम दलप म शु ला था। शु ला, रचमंड के उपनगर म रहते थे जो वहां से 11 मील र टे स क बहाव के ऊपरी तरफ था। वहां पर वे शु ला के साथ कुछ स ताह तक रहे, फर उ ह ने वे ट केन सगटन म एक मकान खोज लया। वह मकान एक वधवा का था जसके प त ने ह तान म काम कया था। वह एक व टो रयन टै रेस वाले मकान म रहती थी जो चार मं जला था और जसके पीछे से रेलवे लाईन गुज़रती थी। भाप वाली े न क आवाज़ घर से साफ सुनाई पड़ती थी। उस ब नया कराएदार को वहां का खाना पचा नह —आ खरकार कोई कतने दन तक ेड और ध पर आ त रह सकता था? संयोग से शहर म घूमते ए उनक नगाह कुछ शाकाहारी रे तरा पर पड़ी— जसम से एक फे रगडन ट और एक हाई हॉलबॉन म था। उ ह ने खुद से खाना बनाने के लए एक पोटबल टोव भी खरीदा। पानी म उबाला आ जौ का आटा, जसे ध या फल के साथ खाया जा सकता था—वो उनका ना ता बन गया। दोपहर का भोजन बाहर ही होता था, जब क रात के खाने के लए मोहनदास खुद ही चावल और सूप (झोल) बना लेते थे।10 6 नवंबर 1888 को मोहनदास गांधी ने इनर टपल (लंदन म बै र टर और जज का पेशेवर संगठन) म अपना नबंधन करवा लया—जो लंदन के यायालय के चार इ स म एक था। वह शहर के प म म नद के कनारे त था। या क हए क ‘वह एक सुप रभा षत इलाका नह था। वह व वध तरीके के सु चपूण ले कन धुंधली नई-पूरानी इमारत का समूह था और जनसे होकर हवाएं ग लय म हचकोला खाती थ । वे ग लयां म यादातर यातायात के लए बंद रहती थ ले कन पैदल चलनेवाल के लए खुली ई थ ।’11 इनर टपल म शा मल होने के तीन दन बाद मोहनदास ने अपने भाई ल मीदास को

लखा क ‘ठं ड के बावजूद मुझे मांस या शराब क कोई ज़ रत महसूस नह ई है। ऐसा लखते ए मुझे आनंद और कृत ता का अनुभव हो रहा है।’ यह प गांधी ारा लखे उन तीन प म से एक है जो उ ह ने लंदन से लखे थे और जो उपल ह। उसके कुछ ही दन बाद उ ह ने दो प और लखे जो उ ह ने पोरबंदर म टश शासन को भेजे थे जसम उनक पढ़ाई के खच म मदद क मांग क गई थी। उनके भाई ल मीदास ने उनके लंदन म खच के लए 666 पाउं ड का इंतज़ाम कया था, ले कन अब लंदन म दो महीना गुज़ारने के बाद मोहनदास को लगा क उ ह 400 पाउं ड क अ त र ज़ रत है। मोहनदास ने पोरबंदर के शासक को लखा, ‘अं ेजी जीवनशैली ब त महंगी है।’ राणा ने आधु नक श ाप त के त ब त कम दलच ी दखलाई है ले कन ‘अब अं ेज़ी शासन के अधीन आने पर हम वाभा वक प से उ मीद कर सकते ह क इसे ो साहन मलेगा। और म उन लोग म से ं जो जसे इस ो साहन से मदद मल सकती है।’12 ले कन उन प पर कोई यान नह दया गया। अब मोहनदास और ल मीदास को धन का इंतज़ाम खुद करना था। बै र टर क यो यता हा सल करने के लए मोहनदास को दो परी ा म उ ीण होना ज़ री था। पहली परी ा तब होनी थी जब उ ह ने चार ‘टम’(स ) ले लया हो, और सरी तब होनी थी जब उ ह ने नौ टम ले लया हो। ये टम जनवरी, अ ैल, जून और नवंबर म होते थे— जसम से सबसे छोटा बीस दन का था और सबसे लंबा इकतीस दन का। मोहनदास को येक टम म यूनतम छह डनर म शरीक होना था और कुल मलाकर उ ह 72 डनर म शरीक होना था। यह या श ु वक ल को अपने सहपा ठय और व र से मलने-जुलने और घ न होने का मौका दे ती थी। ऐसा होने से उस सं ा नक कमी क भी पू त होती थी जो क वहां मौजूद थी। य क ऑ सफोड या क ज क तरह इ स म आवासीय व ा नह थी। उ ह इनर टपल इस लए कहा जाता था य क कोट के इ स के साथ यह शहर क द वार के भीतर और नज़द क ही था। यहां का वातावरण काफ अं ेज़ीदां था और यहां प लक कूल और यू नव स टय के लोग क भरमार थी। मोहनदास ने अगर म डल टपल म र ज े शन करवाया होता तो हो सकता है क वो अ ा करते (जैसा क सन 1890 के दशक म एक वक ल ने याद कया) य क वहां भी इं लश, कॉट, आय रश, वे स, उप नवेशवाद और अ य लोग भी थे, साथ ही भारत के और अ का के इलाक के भी सैकड़ लोग थे।13 हालां क एक बात थी क इनर टपल म यादा खूबसूरत बाग-बागीचे थे जो ‘अ े खासे े म फैले ए थे, जहां चमकती धूप आती थी और वे करीने से सजाए गए थे’। वहां हरेक

साल लंदन हॉ टक चर सोसाइट का लॉवर शो होता था।14 हालां क मोहनदास के लए उसका कोई उपयोग नह था, य क एक छा के प म उनके पास इनर टे ल म कोई चबर नह था। उ ह अपने घर म पढ़ाई करके समय बताना था। जब उनके परी ा दे ने का व आया तब तक उ ह दस दन म एक बार इनर टे ल म सफ डनर के लए ही उप त होना पड़ता था। उस भोजन के साथ खास तरह के समारोह होते थे। इ स के सद य और छा गाउन पहन कर कतार म उस हॉल म वेश करते थे। वे चुपचाप खड़े रहते थे जब क गव नग बॉडी (यह ऐसे सद य से बना होता था जो अब महारानी के सलाहकार थे) क के आ खर म बने एक ऊंचे टे बल पर बैठती थी। जब सारे गवनर बैठ जाते थे, तो सद य-गण नचली मेज़ पर अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाते थे15 डनर म गांधी के साथ खाना खानेवाले लोग वग और सं कृ त दोन म उनके लए अजनबी थे। उसी तरह का खाना भी था। चार आद मय क मेज पर बीफ (गोमांस) या मांस का भो य पदाथ रख दया जाता था, साथ ही दो बोतल शराब रख द जाती थी। उस ह तानी ने शाकाहार का आवेदन कया जसम अमूमन उबले ए आलू और गोभी होते थे। उ ह ने अपनी मेज़ के अ य सा थय को अपने ह से क शराब दे द और बदले म उनसे उनका फल ले लया।16 इनर टे ुल म एक कठोर े स कोड का पालन कया जाता था। सन 1546 म एक आंत रक प म आदे श दया गया था क ‘उस समुदाय के भ पु ष-गण अपनी केशस ा और वेशभूषा म सुधार करगे और उनक लंबी दाढ़ नह होगी. ..’17 उ ीसव सद के आ खर म इसक ा या कुछ यूं क गई क चबर या अदालत म वक ल काले सूट, े स शट और एक रेशमी टोप पहनकर आएंगे। मोहनदास ने उस कोड को काफ गंभीरता से लया। उ ह ने टे ल के डनर के लए और अ य दन के लए भी ब ढ़या और आदश वेशभूषा अ तयार कया। उनके एक सहपाठ ने उ ह पका डली सकस के नकट दे खा और उनके ‘फैशन, केश- व यास और अंदाज़ को दे खकर काफ भा वत आ’। उसने साल बाद याद करते ए लखा क भ व य का वह वक ल एक ‘रेशमी टोप, चमकता धुला आ कोट, कड़ा और कलफ कया आ कॉलर ( जसे उस ज़माने म लैड टोन के नाम से जाना जाता था), एक बेहतरीन धारीदार रेशमी कमीज़ और गहरे रंग का ाउज़र पहने ए था, जो कोट के साथ मैच करता था। उसके पांव म ब ढ़या चमकते ए चमड़े के जूते थे।’18 ● युवा मोहनदास ने भले ही लैड टोन कॉलर पहन रखा हो ले कन उ ह ने उस के ब त दलच ी नह दखाई जसके नाम पर इसका नाम रखा गया था। सन 1889 म



व लयम एवाट गै टोन इं लड और ( ापक प से) व राजनी त का एक वराट व था। बजा मन डज़रायली क मौत के बाद अब लैड टोन का कंज़रवे टव पाट म नया त ं था लॉड से लसबरी। वे और उनक पाट एक के बाद एक स ा म आती रहती थी। लबरल पाट के लोग स ा म आने के बाद अपने दे श और नया के लए कोई एक नी त अ तयार करते तो टोरी पाट के लोग उससे अलग। उस समय क सं ांत राजनी त को वाम धड़े क तरफ से अ तवा दय क बढ़ती सं या ारा चुनौती द जा रही था। सन 1883 म काल मा स क मृ यु हो चुक थी ले कन उनके समथक लंदन म स य थे और व राजनी त म ां त लाने क योजना बना रहे थे। सन 1884 म फे बयन सोसाइट का गठन आ। इसने भी समाजवाद लागू करने क इ ा ज़ा हर क , ले कन अं ेज़ी तरीके या कह क या के तहत। अपनी आ मकथा के लंदन अ याय म गांधी लबरल, टो रय , क यु न ट या सोश ल ट का ज़ नह करते। इसके बदले उनक यादा दलच ी उन टश असंतु म थी जो शायद वामपं थय से भी यादा उ थे और न त ही ब त ही यादा समझ म न आने लायक थे। वे लोग लंदन के शाकाहारी थे। फे रगडन ट के उस रे ां क खड़क पर गांधी ने पहली बार हेनरी सा ट क कताब ली फॉर वे जटे रय न म दे खी। वह एक पतली कताब थी और गांधी ने इसे शु से आ खर तक पढ़ डाला। उस समय तक वह री त- रवाज और परंपरा से शाकाहारी थे, ले कन जब उ ह ने सा ट को पढ़ा तो वह ‘अपनी मज़ से शाकाहारी हो गए’। उ ह पता चला क लंदन म एक वे जटे रयन सोसाइट भी है जसक बैठक म वह जाने लगे। वह इस नए मत से इतने भा वत ए क जस इलाके म वह रहते थे वहां उ ह ने उसक एक शाखा ा पत कर द ।19 जन शाकाहा रय क गांधी ने इं लड म खोज क थी, उ ह ने मूल प से भारत से ही अपनी ेरणा ली थी। ीक से लेकर अ य यूरोपीय या ी भी ह के भोजन से अ भभूत थे। यह जानकर क आबाद का एक बड़ा ह सा मांसाहार के बना रहता है, उसने कुछ या य के मन म व मय के हद तक घृणा का संचार कया (जैसे क पुतगाली या ी वा को ड गामा को) साथ ही सर को गहरे प से भा वत कया। ये भारत ेमी लोग खासकर इन बात को दे खकर च कत रह गए क कैसे यहां के लोग कमज़ोर या मरते ए जानवर क दे खभाल करते ह। यूरोप म च ड़य के लए एक अलग च क सालय क क पना कौन कर सकता था? उनके लए यह भी एक आ य क बात थी क एक तरफ जहां गोरे सपाही बना बीयर या बीफ (गौमांस) के नह रह सकते थे, वह भारतीय सपाही चावलदाल खाकर उसी कुशलता से लड़ते थे। 17व और 18व सद के दौरान इं लड और ांस म ‘ ह ’ शाकाहारवाद क तारीफ म कई रचनाएं लख ग । हालां क बीते दशक म पूरब क यह तारीफ कम होती गई और यहां तक गायब ही हो गई। जब 19व सद म शाकाहार पर पहला संकलन छपा और

पहली वेजीटे रयन सोसाइट का ज म आ तो इस सामा य भोजन के बारे म तक अमूमन सफ वा य के आधार पर दया जाता था, न क ई र क सारी रचना के आदर के आधार पर। 20 इं लश शाकाहारवाद का भारतीय मूल गांधी के लए भी अनजाना था और उस के लए भी जसक कताब पढ़कर वे इस कदर भा वत ए थे। हेनरी सा ट एक सै नक अ धकारी का बेटा था जसके पता ने भारत म नौकरी क थी। सा ट का ज म भारतीय उपमहा प म आ था ले कन बचपन म ही वह इं लड आ गया था। उसे पढ़ाई के लए एटन और क ज भेजा गया, दोन ही जगह वह खुश नह था। पढ़ाई छोड़कर वह एटन आ गया और अपने एक पूव श क क बेट से उसने शाद कर ली। उसक शाद तो सफल रही ले कन उसका क रयर ा पत नह हो पाया। हेनरी डे वड थोरो के वचार से े रत होकर युवा दं पती एक गांव म रहने के लए चले गए जहां वे बना नौकर के रहते थे और सा ट जीवन-यापन चलाने के लए वतं लेखन करता था। 21 अपने जीवन-काल म सा ट ने 40 से यादा कताब लख । उनम थोरो और शैली क जीवनी (उसके शाकाहारी म ) भी शा मल ह। अब तक उसक सबसे भावशाली कताब भोजन क आदत म सुधार और जानवर के अ धकार पर थ । उसने एक बार लखा, ‘शाकाहार का तक रासाय नक नह है, ब क नै तक, सामा जक और वा य संबंधी है।’ उसने साधु व के साथ शाकाहार के समीकरण के वचार को खा रज कर दया ले कन शाकाहारी बनने के लए उसका तक था क आप अपने आपको कसी चीज़ से वं चत न कर ब क गैर-मानव समाज के साथ बंधु व क भावना को साझा कर। शाकाहारवाद का मूल कारण वो ‘बढ़ती ई भावना थी क मांसाहार एक ू र, अ चकर, अपूण और बेकार चलन है’। एक आलोचक ने उनके वचार म असंग त के लए सा ट क आलोचना क । उसका तक था क ध और अंडे भी जानवर से आता है। अगर कोई उसे खा सकता है तो मांस य नह ? सा ट ने मकता के तक के आधार पर उसका जवाब दया क एक समय आएगा जब ध और अंडा से भी परहेज कया जाएगा जैसा क मांस के साथ हो रहा है। ले कन ‘ न त प से पहले सबसे खराब चलन को र करना आव यक है। कसी भी सुधार के लए अ तवाद कोण अपनाना घातक हो सकता है। सुधार कभी भी ती नह होता, ब क क त म आता है और सफ त यावाद लोग ही पूरा न मलने क सूरत म आधे को भी नकार दे ते ह। 22 सा ट के कोण म शाकाहारी लोग मानव जा त क नै तकता के हरावल द ते ह। उसने वीकार कया क इसम कोई शक नह क भोजन क आदत म सुधार धीमी र तार से होगा। इसे ‘मु कल और क मय ’ का सामना करना होगा। ले कन जैसे-जैसे इस पर यादा से यादा वचार कया जाएगा, इसका प रणाम यादा नणया मक होता

जाएगा। या एक ज़माने म दास था का वजूद नह था और उसके प म तक नह दए जाते थे? शाकाहारवाद क सफलता लोकतं को मज़बूत करेगी। जैसा क उसने ज़ोर दे कर कहा, ‘ सफ मानव जीवन ही यार करने लायक और प व नह है, ब क सारा नद ष और खूबसूरत जीवन ऐसा ही है। भ व य के महान गणरा य सफ मानवजा त को ही लाभ नह प ंचाएंगे।’ ‘मनु य का अ भ करण अपने साथ एक ापक अ भ करण 23 लेकर आएगा और वो अ भ करण जानवर का भी होगा’। नय मत प से बीफ (गौमांस) खानेवाले अं ेज़ ने शाकाहा रय को एक छोटे और शायद बेवकूफ के समुदाय के प म दे खा। उनका मानना था क इनके रे ां को संर ण दे ना चा हए- य क आड़े व म जब लोग के पास यादा पैसे नह रहगे तो वहां भोजन कया जा सकता है! सन 1890 के दशक के बारे म काशक ांट रचड् स का लेखन, मोहनदास गांधी, हेनरी सा ट और उनके वे जटे रयन सोसाइट का लंदन के बारे म ववरण ये बताता है क ‘ लवरपुल ट और सट पॉ स के बीच म कई शाकाहारी रे ां थे। उसम से एक खास रे ां तो कग ट म था—चीपसाइड—जो मुझे याद है। छह पस (या नौ पस म?) म भरपेट ठूं सकर खाना मलता था। हालां क ऐसा नह लगता क उन दन से शाकाहारवाद ने कोई ब त तर क क है।’24 हालां क इं लड क या ा कर रहे हमारे इस या ी भारतीय के लए वे जटे रयन सोसाइट एक बड़ा सहारा सा बत ई जसने मानो उसक जान ही बचा ली। 19व सद के उ राध म लंदन क दो लोक य दलच य -नाटक और खेलकूद म नौजवान गांधी क कोई दलच ी नह थी।25 सा ा यवाद और समाजवाद राजनी त ने उनका मन त र कर दया था। हालां क लंदन के शाकाहा रय क होनेवाली सा ता हक बैठक म उ ह जीवन का एक उ े य और इं लड म कुछ शु आती दो त ज़ र मल गए। उ ह दन कभी— जसके बारे म प के तौर पर तो नह ले कन ये कहा जा सकता है क वो मोहनदास का लंदन म सरा साल रहा होगा—मोहनदास, जो सया ओ फ के साथ एक कमरे म रहने लगे। ओ फ , ऑ सफोड का नातक था और अब डॉ टरी क पढ़ाई कर रहा था। वह लंदन वे जटे रयन सोसाइट का स य सद य था। वह सोसाइट के जनल का संपादन करता था (सा ट क तरह ही) जहां वह खा आदत और राजनी त दोन पर ही लखता था और जहां (सा ट क तरह ही) उसने एक लेख म वीरतापूण आशावाद का दशन करते ए दावा कया क ‘एक वृ जसने मानवता को ा त कया है वो है बंधन से मु क तरफ ग त क भावना।’26 ओ फ और गांधी, एक अं ेज़ और एक भारतीय 52, सट ट फस गाडन, बेज़वाटर म एक मकान म साथ-साथ रहते थे जसके एक तरफ छायादार बागीचा था।27 दो न ल के लोग के बीच क ये दो ती अपने आप म अनूठ और बहा राना थी। गांधी और ओ फ

ऐसी पा टयां दे ते थे जहां दाल का सूप, उबला आ चावल और बड़े -बड़े कश मश के दाने परोसे जाते थे। सरे दन म वे साथ-साथ ‘ लब और अ य बैठक म जाते और शाकाहार पर भाषण दे ते जहां लोग हमारे इन वा य और शां त के त को सुना करते’। एक शाम गांधी ने घर लौटने पर ओ फ को दन म ई एक घटना के बारे म बताया। गांधी क एक अं ेज़ डॉ टर से मुलाकात ई थी जसने जब ये सुना क गांधी शाकाहारी ह तो उनसे बीफ-ट (गौमांस- म त चाय) पी लेने क बात मानने पर ज़ोर दया य क वषुवतीय इलाक के वपरीत—जहां खा ा और स ज़य पर आधा रत खाना उपयु था—‘इं लड के ठं डे वातावरण म बीफ या मटन का भोजन म होना आव यक था’। वे उस पर काफ दे र तक बहस करते रहे और अंत म डॉ टर ने खीझकर कहा क या तो ‘तुम बीफ-ट पयो या मर जाओ! गांधी ने जवाब दया क ‘अगर यह ई र क इ ा है क म मर जाऊं तो मुझे मरना ही पड़े गा ले कन म इस बात के त न त ं क ये कतई ई र क इ ा नह होगी क जो वादे मने मां के सामने भारत छोड़ने से पहले कए थे, उ ह तोड़ ं ।’28 इसी बीच दो अ य म जो चाचा और भतीजा थे, उ ह ने गांधी से कहा क वे उ ह भागवत-गीता क ा या कर समझाएं। उ ह ने उन दोन के सामने गीता का पाठ कयाजो उस समय हाल ही म एड वन आन ारा ‘द स ग कैसे टयल’( द गीत) के नाम से अनु दत आ था। उसके बदले उस अं ेज़ ने उ ह मैडम बलावट् क के काय से प रचय करवाया जो पूरी नया क या ा के बाद ( जसम भारत म बताया कुछ समय भी था) लंदन म बस गई थ । वेदांतवाद ( थयोसोफ ) क सं ा पका ने धम का व ान के साथ और ह व का ईसाईयत के साथ सामंज य बठाने क को शश क थी। उनका मत साफतौर पर भारतीय परंपरा से सहानुभू त रखता था, इस बात ने युवा गांधी को भा वत कया। उ ह ने बलावट् क और एनी बेसट से मुलाकात क जो एक उ समाजवाद और म हला मता धकार क समथक रही थ और ज ह ने हाल ही म उन मत को छोड़कर थयोसोफ (वेदांतवाद या वाद) अपना लया था।29 ह धम के स ांत से अलग और कुछ नया जानने के लए गांधी अब ईसाई धम के बारे म लखी ई बात का भी अ ययन करने लगे। उस संबंध म कताब और अ य सा ह य मेनेचे टर के उनके एक म उ ह दया करते थे। द बुक ऑफ जेने सस पढ़कर उ ह ज हाई आने लगी ले कन यू टे टामट ने उ ह काफ आक षत कया। उ ह ने लखा, खासतौर पर सरमन ऑन द माउं ट ‘सीधे मेरे दल म उतर गया’। उन पं य ने, जसम एक कसी सरे को अपना लबादा दे दे ता है जसने उसका कोट ले लया है—गांधी को काफ छु आ। गीता से इसक तुलना करते ए उ ह ने न कष नकाला क दोन ने यही सखाया है क ‘ याग सबसे बड़ा धम है’। 30

● जब मोहनदास लंदन गए थे तो शु आत म ही एक म ने उनको सलाह द क बै र टरी क पढ़ाई के साथ ही वे लंदन मै कुलेशन क परी ा भी दे सकते ह। इसके लए अ त र शु क दे ने क ज़ रत नह थी और भारतीय को वदे शी स ट फकेट जमा करना वैसे भी ब त पसंद था। मै कुलेशन के लए नबंधन के बाद गांधी ने पाया क उ ह इसके लए लै टन सीखना होगा जो उनके लए एक वशु वदे शी भाषा थी। साथ ही उ ह कम से कम व ान का एक वषय लेना ज़ री था। जब पहली बार वह लै टन क परी ा म बैठे तो अनु ीण हो गए, ले कन सौभा य से सरी बार म कामयाब हो गए। जहां तक व ान क बात थी तो उ ह ने रसायन शा लया ले कन उ ह ने पाया क उसके योग ब त ही ज टल ह तो उ ह ने उसके बदले हीट (उ मा) और लाइट ( काश) ले लया। 31 इस बीच इनर टे ल म गांधी को (अ य वषय के अलावा) रोमन लॉ, ौपट लॉ और कॉमन लॉ क परी ाएं पास करनी थ । पहले वषय के लए उ ह ने ज ट नयन कोड का अं ेज़ी अनुवाद और व लयम ए हंटर क ा या और व ेषण पर बड़ी पु तक इं ोड न टु रोमन लॉ (तीसरा सं करण, 1885) पढ़ा। सरे वषय के लए उ ह ने जोशुआ व लयम क सप स ऑफ द लॉ ऑफ ौपट (सोलहवां सं करण 1887) और ब त सारे मुकदम के सारांश पढ़े । कॉमन लॉ को समझने के लए उ ह ने दो कताब पढ़ जसके नए सं करण 1888 म आए थे। उनम से एक थ जॉन इंडरमौर क सपल ऑफ द कॉमल लॉ और हरबट ॉउन क कमटरीज़ ऑन द कॉमन लॉ। उस परी ा म इ वट ( ह सेदारी) पर भी एक वशेष खंड था जसके लए उ ह ने इसी वषय पर एडमंड एच ट नेल क कताब का 1887 सं करण पढ़ा। 32 जब गांधी कताब को नह पढ़ते थे तो वह शहर म लंबी री तक पैदल चला करते। उ ह ने गणना क क वह औसतन 8 मील त दन पैदल चलते थे। उनके बाद लंदन आनेवाले भारतीय छा को जैसा क उ ह ने कहा क ‘इं लड के ठं डे वातावरण म पैदल चलना एक आनंददायक अनुभव’ था, इसके अलावा आ थक कोण से भी ‘पैदल चलना े न या बस के सफर से अ ा’ है। पैदल या ा के बाद गांधी को पसीना या शरीर पर लगे धूल को साफ करने म आनंद आता था। कभी-कभी वह सावज नक नानागार म नहाने जाते थे ( जसका शु क पांच सट था), इसके अलावा उ ह ने अपनी मकानमाल कन को इस बात के लए राज़ी कर लया था क वो उ ह थोड़ा गम पानी उपल कराएं जसम वे अपना तौ लया या ंज भग कर दे ह पर फरा लेते थे। 33 लंदन और लंदन से बाहर शाकाहार को लेकर समारोह होते रहते थे और गांधी एक बार वे जटे रयन कॉ स म ह सा लेने के लए पोट् समाउथ गए। दन म भाषण वगैरह आ और शाम को आरामदायक माहौल म ज का खेल आ। खेल म गांधी क जोड़ीदार इ

क मकान-माल कन थ , जहां वे ठहरे ए थे। उस म हला ने गांधी के साथ मज़ाक करना शु कया और उनके साथ लट करने लगी। वह भी उसक तरफ आक षत होने लगे। उ ह ने बाद म लखा, ‘ऐसा पहली बार आ था क मेरी प नी के सवाए कसी सरी म हला ने मुझे वासना क तरफ आक षत कया था’। जब उनके बीच हंसी-मज़ाक यादा गहन होने लगा और उ ेजना बढ़ने लगी तो गांधी इससे काफ श मदा ए। अपनी मां को दए गए वादे को याद करते ए गांधी अचानक उस खेल से उठ खड़े ए और ‘धड़कते दल के साथ कांपते ए तेज़ी से उस कमरे से नकल गए मानो कोई शकार अपना पीछा करनेवाले से जान छु ड़ाकर भागा हो’। हालां क वह कॉ स कुछ समय और चलनेवाला था, ले कन गांधी अगले ही दन लंदन लौट आए। गांधी ने ाइटन म भी कुछ दन बताया और दो बार वटनर गए जो आथल ऑफ वाइट पर त था। सन 1890 म उ ह ने इं लश चैनल पार कया और पे रस दशनी दे खने गए जहां उ ह ने नव न मत ए फल टॉवर दे खा ले कन वह उससे यादा नो े डेम कैथे ल क वा तुकला और उसक सजावट से भा वत ए। 34 व टो रया युग के आ खर म इं लड म रह रहे मोहनदास गांधी ने या न ल या उनके ज म के आधार पर कोई भेदभाव महसूस कया? ऐसा लगता नह है। इं लड के जस समाज म गांधी का उठना-बैठना था वो शाकाहा रय और वेदांतवा दय (या वा दय ) का था और वे लोग वचार और जीवनशै लय के आधार पर नकटता बनाते थे, न क कसी क वचा के रंग के आधार पर। वैसे भी इं लड म रहनेवाले अं ेज़ बाहर रहनेवाले अं ेज़ क तुलना म कम पूवा ह से त थे। भारत म अं ेज़ जा त के लोग शासक वग के त न ध थे। वह ‘जहां भी जाते वहां सांवले रंग के लोग क एक बड़ी सं या उसक सेवा म हा ज़र रहती थी’। ले कन इं लड म तो एक अं ेज़ को अपना प भी खुद ही डाकघर म जाकर दे ना होता था और अपना थैला भी खुद ही उठाना होता था। सन 1890 के दशक म इं लड क या ा पर गए एक त मल प कार ने गौर कया क ‘अं ेज़ वभाव से दलदार होते ह और वदे शी (अ त थय ) को खुश करने के लए सतत तैयार रहते ह। म उस समय उनके आ त य क और भी शंसा करता ं जब म पाता ं क रंग के आधार पर वे भारतीय से कोई भेदभाव नह करते।’35 ● माच 1890 के आ खरी स ताह म अपने इं लड आगमन के डे ढ़ साल बाद मोहनदास क़ानून क परी ा के पहले स म बैठे। जब नतीज का ऐलान आ तो उ ह ने पाया क उ ह ने बंबई मै कुलेशन क तुलना म ब ढ़या दशन कया है। उ ह 46 लोग म छठा ान हा सल आ था। पहली बार उनका नाम ट टाइ स म अ य कामयाब छा के साथ

का शत आ। उन छा म कोलाह नाम का पारसी और सवा धकारी नाम का बंगाली भी था। भारतीय नाम उन यादातर एं लो-सै न नाम क सूची म व च से लग रहे थे जसम एट कन, बैरेट, लाक, मै सवेल, मूरे, रोज और मथ जैसे नाम थे। 36 उसी साल दसंबर महीने म गांधी आ खरी परी ा के लए बैठे। एक माह बाद 12 जनवरी 1891 को उ ह बताया गया क वे कामयाबी पूवक परी ा म पास हो गए ह और उ ह 109 म से 34वां ान हा सल आ है। 37 हालां क उ ह ने इ तहान नकाल लया था ले कन वह अभी भी टे ल ारा नद शत 72 डनर से कुछ डनर र थे। जब तक वह उन डनर म शा मल नह होते, भारत नह लौट सकते थे। उनके म और उनके साथ रहनेवाले जो शया ओ फ ने उ ह इस बात के लए राज़ी कया क वे लंदन म अपने शेष दन म द वे जटे रयन के लए लख। कसी लेखक के लए यह कोई असामा य बात नह है क उसका लेखन शु -शु म कसी कम सार वाली प का म छपे। ले कन उनम से कतने लोग दावा कर सकते ह क उनका पहला लेखन छह क त वाले लेख के प म का शत आ? फरवरी और माच 1890 म वे जटे रयन ने मोहनदास करमचंद गांधी के नाम से ‘इं डयन वे जटे रयन— 1,2,...करके क त म लेख का शत कया। उस ृंखला क शु आत जा त था क भू मका से ई थी। बाद के एक लेख म बताया गया क कैसे ए शयाई शाकाहार, यूरोप के शाकाहार के स ांत से अलग है। उ ह ने लखा, ‘अं ेज़ से उलट, भारत के लोग हरेक भोजन साम ी अलग-अलग नह लेते। ब क वे ब त सारी चीज़ साथ-साथ मलाकर खाते ह।’ उससे भी बड़ी बात ये है क ‘हरेक स ज़ी या साम ी अलग-अलग तरीके से तैयार क जाती है। भारत के लोग साद और उबली ई स ज़य म व ास नह रखते, ब क ब त सारे मसाले मलाकर उसे वा द बनाते ह मसलन मच, नमक, ल ग, ह द , सरसो और साथ ही और भी ब त सारे अ य मसाले जनके लए अं ेज़ी नाम खोजना मु कल है जब तक क उनका इ तेमाल कसी दवा बनाने म न होता हो।’ भारतीय भोजन यूरोप के भोजन से यादा व वध और समृ ह सवाए एक चीज के। हां, ‘वो एक चीज है फल, जसक अनुप त उपयु व णत मसालेदार भारतीय ंजन के बीच ज़ र खलती है।’ गांधी के लेख ने कुछ सामा य गलतफह मय और ा पत बात पर भी काश डाला। अगर एक स ांत के मुता बक ह ‘शारी रक प से कमज़ोर ह’ तो इसका कारण उनके भोजन से मांसाहार का अनुप त होना नह है। इसक वजह है ‘बाल ववाह क कु था’ है जस कारण एक बारह साल क लड़क को सोलह साल के एक लड़के से याह दया जाता है और उनसे उ प ब ा ‘शारी रक प से कमज़ोर होता है’। लेखक ने शराब के बारे म भी अपने मज़बूत वचार रखे जसे उ ह ने ‘मानव जा त का मन’ करार दया और

‘स यता के लए कलंक’ बताया। साथ ही उ ह ने इसे ‘भारत म टश शासन का एक सबसे बड़ा अ भशाप भी बताया’। उनके ारा क गई बाल ववाह क आलोचना उनके नजी अनुभव पर भी आधा रत थी। साथ ही उ ह ने अ य भारतीय पर जो शराब का असर दे खा था, उस वजह से उ ह ने शराब क आलोचना क थी। उसके बाद लेखक ने गड़े रय क जीवनशैली क तारीफ क । उनक नगाह म गड़े रये होमो इं डकस के उपयु उदाहरण थे। उनक शाकाहारी जीवनशैली, जंगल और खेत म उनके दै नक जीवन म ने गड़े रय के जीवन को ‘आदश जीवन बना दया था। उ ह ने लखा क वे अपनी आदत म नय मत ह, यादातर समय अपने जानवर के साथ घर से बाहर रहते ह जहां वे शु हवा लेते ह और ायाम करते ह। साथ ही वे पौ क आहार लेते ह और उन ब त सारी चता से र रहते ह जो अ सर कमज़ोर शारी रक सौ व से आती ह।’ गांधी ने हालां क इस बात को वीकार कया क गड़े रय म सफ एक कमी है। जैसा क ‘एक ा ण दन म दो बार नान करता है, वै य दन म एक बार करता है, गड़े रया स ताह म एक बार ही नहाता है’। बाक ‘उसम कोई द कत नह है। एक बाघ के सामान हसक न होते ए भी वह ब त ही मज़बूत और बहा र होता है और साथ ही एक मेमने क तरह ही मुलायम और सीधा भी होता है। वह अपने शारी रक हाव-भाव से कसी को भ च का नह करता, ले कन वह अ धकार का भाव दखाता है। कुल मलाकर भारतीय गड़े डया शाकाहा रय के ब त ही अ े उदाहरण ह और जहां तक शारी रक मता क बात है तो वे कसी भी मांसाहारी से मुकाबला कर सकते ह’।38 एक ऐसे के लए जसने कभी घर म अं ेज़ी न सुनी हो और यारह साल क उ से ही अं ेज़ी सीखनी शु क हो और जसका मै कुलेशन म ब त औसत अंक रहा हो —गांधी का लेखन आ यजनक प से साफ और बेलाग है। खास बात ये है क उ ह ने बात-बात म सा ा यवाद शासन क आलोचन भी कर द है (शराब क ब और उपभोग बढ़ाने के लए) और गड़े रय के जीवन क तारीफ भी क है। का ठयावाड़ म ऐसे कई पशुचारक समुदाय थे जो हरेक मानसून के बाद अपने जानवर के साथ वशाल गोचर म आते थे जो े के हरेक शहर के बाहर फैले होते थे।39 गांधी ने उनको ज़ र दे खा होगा और मेल और समारोह म उनसे मले ह गे जब गड़े रए अपने जानवर के साथ आते थे। ऐसा भी हो सकता है क वे उस समय हेनरी सा ट और उनके म एडवड कारपटर जैसे लोग के रोमां टक औ ोगीकरण वरोधी वचार से भा वत रहे ह जो अपने पूवकालीन व लयम वड् सवथ और जॉन र कन क तरह इस बात म यक न रखते थे क कसान और गड़े रये, ापारी और कारखाना-मज़ र क तुलना म एक शु और ाकृ तक जीवनशैली का त न ध व करते ह।40

अब चूं क वह छपने लगे थे तो उस नौ स खए लेखक ने और भी ज़ोर-शोर से लखना शु कर दया। उ ह ने भारतीय शाकाहा रय पर अपनी ृंखला के बाद भारतीय उ सव पर एक ृंखला क शु आत क ।41 उसके बाद पहली ृंखला कसी सरी प का के लए संशो धत क गई जसे ‘द फूड् स ऑफ इं डया’ नाम के एक लंबे लेख का प दया गया और जसे इस उ मीद के साथ ख म कया गया क ‘एक ऐसा व आएगा जब मांसाहारी इं लड और शाकाहारी भारत के बीच बड़ी मत भ ताएं ख न हो जाएंगी और इसी के साथ कुछ अ य मत भ ताएं भी ख म हो जाएंगी जो उन संवेदना क एकता को ख म करती ह जसे दोन दे श के बीच होनी चा हए’। इं लड क या ा पर गए इस भारतीय ने सोचा क ‘भ व य म हमलोग री त- रवाज़ और दल के बीच एकता ा पत करने क दशा म न य ही अ सर ह गे।’ 42 गांधी का लंदन के शाकाहारी समाज म घुलना- मलना और उनके काय म म शरीक होना उस बात से कह यादा मह वपूण है जतना आमतौर पर माना जाता है। अगर वे वे जटे रयन सोसाइट म नह शा मल ए होते तो वे फर वहां भी अपने हम—वतन से ही मल रहे होते जैसा क उस ज़माने म भारतीय छा करते रहे थे (या कभी-कभी अभी भी वैसा ही करते ह)। अं ेज़ के साथ उनक इन शु आती नज़द क दो तय ने उनके मानस पटल और उनके व का वकास कया। उ ह ने अलग-अलग न ल और धम के लोग के साथ संबंध बनाना सीखा और ये सीखा क उनके साथ कैसे घुला- मला जा सकता है, साथ खाना खाया जा सकता है या उनके साथ एक घर भी साझा कया जा सकता है। लंदन के शाकाहा रय ने मोहनदास को उनके जीवन म पहले सामू हक सामा जक याकलाप और सावज नक मंच पर उनक पहली-पहल उप त को संभव कया। गांधी क का शत कृ त म दजन कताब का हवाला है और ब त सारे वषय को छु आ गया है। यह एक उ लेखनीय ले कन ब त कम यान द गई बात है क उनके लेखन का क रयर एक वाहमान, सूचना मक और लेख क आ म व ास से भरी ृंखला के प म सामने आया जो उ ह ने भारतीय भोजन और उ सव के बारे म लखा था। अपने बंबई मै क और इनर टे ल स ट फकेट के लए गांधी को त य के अंबार से गुज़रना पड़ा और उसे परी क क ज़ रत के हसाब से सल सलेवार ढं ग से सामने रखना पड़ा। ले कन द वे जटे रयन के लए इन लेख को लखते व उ ह यादा बु म ापूवक अपने दमाग का इ तेमाल करना पड़ा था य क उनके पास जो त य थे उसे काफ सावधानीपूवक, सुसंगत और एक कायल कर दे ने वाले तरीके से एक ऐसे पाठक के सामने रखना था जसक पृ भू म उनसे ब कुल अलग थी। न ली और धा मक सीमा के बीच पुल बने गांधी, एक संगठनकता और लोग को गोलबंद करनेवाले गांधी, एक लेखक, चतक और एक चारक गांधी—उनके ये सारे प उनके लंदन वे जटे रयन सोसाइट के सद य बनने के बाद ही पहले-पहल द शत ए।

● एक तरफ द वे जटे रयन के पाठक भारत के ंजन और भोजन से प र चत हो रहे थे तो सरी तरफ एक ब सा रत सा ता हक भारतीय उपमहा प क कुछ सरी ही छ व तुत कर रहा था। उसका नाम था इल े डेड लंदन यूज़ जो भारत पर नय मत प से लेख छापता था। उसके वषय शकार ;पोलो और पहाड़ी जनजा तय को शांत करने या उनसे समझौता करने जैसे वषय होते थे। सन 1891 म 28 फरवरी के उस सा ता हक के अंक ने पालक म बैठे पगड़ीवाले एक महाराजा का रेखा च का शत कया जसके साथ सड़क पर वनयी मु ा म लोग उसक तरफ भ ा मांगने के लए हाथ फैलाए खड़े थे। उस रेखा च क सुख थी: समृ और गरीबीः भारतीय बाज़ार का एक च । स ाई तो यह थी जस शहर म वह सा ता हक का शत हो रहा था वहां भी गरीबी और अमीरी का भारी अंतर था। ‘समृ , भ ता, सं कृ त और नफासत के इस महानगर म भी भुखमरी, अवमानना और दल-दहलानेवाली गरीबी थी’। 19व सद के लंदन म ‘वंचना और था’ उ लेखनीय बात थी और एक समकालीन पयवे क के अनुसार ‘वह उस व ा क सड़ी ई न व का सबूत थी जस पर उस भीमकाय समाज का ढांचा टका आ था, म उ ह इस लए सड़ी ई मानता ं क य क इसी व ा ने हज़ार -हज़ार लोग को शारी रक और नै तक प से सबसे न नतम तर पर प ंचा दया है...’। लंदन का एक सरा प था जो यादा व वध प से सं ांत वग क पा टय म यमान होता था। ‘जो इस बात को लेकर मानो व श थे क कुछ पु ष और ावहा रक प से तकरीबन सारी ही म हला ने उपभोग को अपने जीवन का मु य पेशा बना लया है’। जैसे क उप यासकार व लयम मेकपीस थैकरे ने तीखे प से इन पा टय के बारे म लखा है क माताएं अपनी ‘कुंवारी बे टय को इन पा टय म इस लए लाती थ क बूढ़े धनी ए याश के सामने नुमाइश क जा सके और उनक मासू मयत क ब ल चढ़ाकर कुछ दौलत या कोई पदवी हा सल क जा सके’।43 ऊंची सोसाइट म मोहनदास का कोई वेश नह था। सट जे स या ोवनर वेयर के म हमां डत घर क बैठक या अ त थगृह म उनका वेश नह था। न ही वह मक वग के साथ उठते-बैठते थे चाहे वह ई ट एंड म उनका मकान हो या फर कारखाने या मठाई क कान हो जहां वह वग काम करते थे। गांधी क बातचीत अं ेज़ी समाज के म यवग के लोग से थी। जन तीन जगह पर वे रहे थे— टोर ट, टे व टॉक ट और सट ट फस गाडन- उन तीन जगह को 1889 के चा स बूथ के न े म ‘मैप ऑफ लंदन पॉवट ’ (लंदन के गरीबी का न ा) म ‘खाते-पीते म य वग का इलाका’ कहा गया है। हां, यहां वे

वाकई मकान-मा लक और मकान-माल कन से मले और कह तो इं लड के राजनी तक असंतु और उ पं थय से वे ा से मले जो उ ह क तरह म यमवग से आते थे।44 धा मक से दे ख तो गांधी का लंदन वास व वध अनुभव से भरा आ था। उ ह ने ह और वेदांतवा दय ( थयोसो फ ट ) के साथ सामा जक संबंध बनाया, उनका ना तक से प रचय आ और उ ह ने हॉलबॉन म चच क सामुदा यक सेवा म भी ह सा लया। उनक सामा जक ज़दगी सी मत ही थी। जस एकमा अमीर से वे मले वो था आन एफ ह स जो थे स आयरन व स का मा लक था और द वे जटे रयन का सं ापक और मु य धनदाता था।45 उसके अलावा यह क़ानून का व ाथ गरीब और मक वग के नज़द क सफ इतना ही जा पाया क उसने हाउस ऑफ कॉम स म उस वग के महान व ा चा स ेडलॉफ को सुना। जब मोहनदास लंदन आए थे तो उनके पास दादाभाई नौरोजी के नाम एक सफा रशी प था। नौरोजी एक पारसी उदारवाद थे जो इं लड म ‘भारतीय समुदाय के सव नेता’ थे।46 ऐसा लगता है क वह नौरोजी से नजी तौर पर मुलाकात करने म हचक रहे थे, ले कन वह उ ह अ सर सावज नक मंच पर बोलते ए सुनते थे। उ ह समारोह म वह ेडलॉफ को भी बोलते ए सुनते थे जो भारत और भारतीय का दो त था और जो टे न क राजनी त के ‘स त और खूबसूरत चेहर ’ म से एक था, साथ ही वह ‘धम नरपे ता और गणतं वाद’ का एक मज़बूत व ा था। ‘वह जनता के बीच से आया था और आ खर-आ खर तक उसने भाषण दे ने का कुछ ऐसा गुण बरकरार रखा जसने उसे लंदन के गरीब-वं चत तबक के लोग के प म याद करवाया’।47 गांधी ने अपनी आ मकथा म लखा है क ‘लंदन म रहनेवाला हरेक भारतीय ैडलॉफ का नाम जानता था’। जब फरवरी 1891 के पहले स ताह म उस उ वचार वाले नेता क मौत हो गई गांधी अपनी पढ़ाई से एक दन क छु लेकर उसक अं ये म भाग लेने वो कग गए। ैडलॉफ घनघोर प से अधा मक (ना तक) था और उस अं ये म ब त सारे ना तक शा मल ए थे। उस अं ये म शा मल होने गया यह भारतीय यह दे खकर च क गया क ‘उसका अं तम सं कार करवाने के लए कुछ धमगु भी वहां आए ए थे’।48 ेडलॉफ क अं ये म जाते समय गांधी ने इं लड म बनी पहली म जद दे खी। आगरा क मोती म जद क तज पर बनी इस म जद म कुछ ब ढ़या लकड़ी क न का शयां थ और यहां आनेवाल म महारानी व टो रया के ह तानी श क जैसे लोग भी शा मल थे। सन 1889 के पतझड़ म इस म जद का उ ाटन आ था और यह वो कग के बाहर त थी और लंदन से े न से आनेवाले या य को साफ-साफ दखती थी।49 ●

जहाज़ से लंदन जाते समय और शहर म कुछ समय बता लेने के बाद गांधी ने अ े कपड़े पहनना शु कर दया। वह अपने दो त से मलने जाते समय मॉ नग कोट पहनते थे और उसे पहनने से पहले उसे ठ क तरीके से साफ करते थे और इ ी करते थे। उनक शट का कॉलर कायदे से कलफ लगाया आ होता था और उनके जूते चमकते रहते थे। हालां क य - य गांधी लंदन म यादा दन तीत करते गए, उ ह सादा जीवन क उतनी ही आव यकता महसूस होती गई। इसक एक वजह तो वे जटे रयन सोसाइट क सादा जीवनशैली थी, सरी वजह ये थी क वह अपने प रवार पर बोझ नह बनना चाहते थे। हालां क उनक संप का पय (या पाउं ड म) म या मू य था, इसका पता हम नह चल पाया है, ले कन हम जानते ह क गांधी प रवार न य ही उ -म यवग य प रवार था। पोरबंदर और राजकोट के द वान के प म कबा गांधी को न त ही एक अ पगार मलती होगी। और बीती पी ढ़य के दर यान प रवार ने काफ संप और जेवरात भी अ जत कए थे। फर भी कबा गांधी क कम समय म ही मौत ने प रवार को हलाकर रख दया था। मोहनदास के भाई मै कुलेट होने म भी नाकामयाब रहे। प रवार क पूरी उ मीद अब उसके छोटे बेटे पर क त थी, इस लए कज़ लेकर और जेवरात को गरवी रखकर भी उसे बै र टरी क पढ़ाई के लए लंदन भेजा गया था। इं लड म पहले साल गांधी का खच 12 पाउं ड त माह था। सरे साल उ ह ने इसे कम करके 4 पाउं ड त माह तक कर लया। उ ह ने इं लड के ‘कुछ गैर-पारंप रक भ पु ष से ेरणा लेते ए ज ह ने फैशन को अल वदा कह दया था, अपने शट म कलफ लगाना छोड़ दया’। उ ह ने ग मय म जां घया भी पहनना छोड़ दया। इन तरीक से उ ह ने अपने धोबी का खच बचा लया। वह सावज नक प रवहन से या ा करने क बजाए हर जगह पैदल ही जाते। टकट का खच बचाने के लए उ ह ने लफाफे म प भेजने क बजाए पो टकाड म ही भेजना शु कया। उ ह ने नाई का खच बचाने के लए खुद ही अपनी हज़ामत बनानी शु कर द और अखबार खरीदना बंद कर सावज नक पु तकालय म अखबार पढ़ना शु कर दया। सादा जीवन के अपने योग को और धारदार बनाने के लए गांधी ने डॉ नकोल क कताब हाउ टु लव ऑन स स पस ए डे खरीद । उ ह ने अपने लए एक ल य नधा रत कयाः वो ल य था 9 श लग त स ताह म पौ क, वा य द, ब ढ़या और वा द खाना खाना। इसके लए उ ह ने चाय और कॉफ पीना छोड़ दया और सफ उ ह फल और स ज़य को खरीदने का फैसला कया जो उस मौसम म उपल थे। उनको उन कुछ महान अं ेज़ से ेरणा मली ज ह ने अपने जीवन-यापन का खच ब त घटा लया था। चा स ैडलॉफ ने एक बड़े घर के बदले दो कमरे के एक छोटे से मकान म रहना शु कर दया था। वह एक यू ज़क शॉप के ऊपर म रहता था। का डनल मै नग के बारे म कहा जाता था क ‘उसका अकेले म या सावज नक जगह पर सामा य

भोजन होता था-एक ब कुट, ेड का टु कड़ा और एक लास पानी’। गांधी ने शंसा करते ए इस बात को लखा क उनके इस सादा जीवन के बावजूद नया दोन ही य को ‘बौ क प से समझदार’ मानती थी साथ ही ‘शारी रक प से मज़बूत’ भी।50 10 जून, 1891 को उन 72 डनर को खाने या आधे-अधूरा खाने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी को औपचा रक प से बार म बुलाया गया। अगले दन उ ह ने हाईकोट म अपना नामांकन करवाया। उसी रात उ ह ने अपने साथी शाकाहा रय को एक वदाई भोज भी दया और हॉलबॉन के एक रे ां म 20 लोग के लए एक कमरा आर त करवाया। जैसा क सोसाइट के जनल ने रपोट कया यहां, ‘ म टर गांधी ने एक ग रमामय ले कन घबराहट से भरा आ भाषण दया जसम उ ह ने सारे उप त लोग का वागत कया। उ ह ने इस बात पर खुशी जताई क कैसे इं लड म मांस- वहीन (शाकाहार) भोजन का चार बढ़ता जा रहा है, उ ह ने उस बात पर काश डाला जस वजह से लंदन वे जटे रयन सोसाइट से उनका संबंध गाढ़ आ था और ऐसा कहते ए उ ह ने भावुक होकर म टर ओ फ के त अपना आभार कया।’ बाद म उस जनल (प का) को सा ा कार दे ते ए गांधी ने वीकार कया क ‘लंदन म बताए साल के दौरान वे ब त सारे काय नह कर पाए’। ले कन घर जाने पर ‘उ ह इस बात का सुकून रहेगा क उ ह ने लंदन म मांस और शराब को नह छु आ और ये भी क वे अपने नजी अनुभव से जानते ह क इं लड म ब त सारे शाकाहारी ह’।51 अगली सुबह गांधी ने लवरपुल ट से लंदन डॉक के लए े न लया। जो जहाज़ उ ह वापस भारत लाने वाला था वो एक ऑ े लयन ट मर ओ सयाना था जो अपने आप म ‘एक वशाल बहता आ प सा’ था और जसका वजन 6000 टन था। उस जहाज़ से वे अदन तक आए, फर वे एस एस आसाम म बैठे जो उ ह बंबई ले जानेवाला था। गांधी ने द वे जटे रयन के लए अपनी वापसी क या ा का वृ ांत लखा। चूं क वह वही चीज़ फर से दे ख रहे थे, इ स लए उस ववरण म अ भभूत होने और एक आ य का बोध नह मलता जो उ ह ने भारत से इं लड आते व कया था। उ ह ने दज कया क ओ सयाना के टाफ वन और साफ-सुथरे थे जब क एस एस आसाम के पुतगाली वेटर ‘महारानी क अं ेज़ी भाषा क ऐसी-तैसी कर रहे थे’ और ‘मन स क म के और मंद भी थे’। उस जहाज़ पर उनको मलाकर दो शाकाहारी थे। दोन ने मलकर जहाज़ के कमचा रय को ‘फ ट लास सैलून से कुछ स ज़यां, चटनी, चावल और ताज़ा फल दे ने का दबाव डाला...’। उस उ सुक भारतीय ने ‘शाकाहार-वाद पर भाषण दे ने के लए जहाज़ कमेट के से े टरी से 15 मनट का समय मांग लया।’ उनका वह आ ह मान लया गया और अगली संगीत सं या से पहले भाषण का समय न त कया गया। उस भाषण क तैयारी म गांधी ने उसे ‘कई-कई बार लखा, काटा और संशो धत कया’। वे एक ऐसे ोता

के सामने बोलने जा रहे थे जो उनक नगाह म उस वषय का श ु ोता था। ले कन आ खर म वह संगीत सं या र कर द गई और ‘उसी के साथ मुझे नराश करते ए वह भाषण अनकहा ही रह गया’। अ य ब त सारी व तु और य के साथ एस एस आसाम मोहनदास करमचंद गांधी, बै र टर एट लॉ को लए ए 5 जुलाई 1891 को बंबई के तट पर लगा। मानसून अभी आया ही था। बा रश और हवा के झ के या य को छू रहे थे और उनक वचा म घुल रहे थे।52

3 एक तट से सरे तट तक

इं लड से वापसी के बाद जब मोहनदास बंबई प ंचे तो बंदरगाह पर उनके बड़े भाई ल मीदास उनका इंतज़ार कर रहे थे। वहां से वे डॉ. ाणजीवन मेहता के घर गए, जो लंदन म उनके साथ पढ़ते थे। मेहता, जौह रय के समृ प रवार से ता लुक रखते थे जो क य बंबई के गामदे वी इलाके म रहते थे। उनका एक वशाल दोम ज़ला मकान था जसम लंबी बालकनी थी और लकड़ी के न काशीदार खंभे थे।1 डॉ. मेहता के घर जाते समय रा ते म गांधी के भाई ने उनसे कहा क उनके आने से कुछ महीने पहले उनक मां पुतलीबाई का दे हांत हो गया। प रवार ने उनको लंदन म इस लए सूचना नह द क इससे कह उनक पढ़ाई बा धत न हो जाए। यह समाचार मोहनदास के लए ‘ कसी गंभीर झटके’ से कम नह था।2 मां पुतलीबाई उ ह वदे श नह जाने दे ना चाहती थी और उनको चता थी क उनका बेटा नै तकता और भोजन संबंधी आदत म फसल सकता है। ले कन मोहनदास क़ानून क ड ी के साथ वापस आ गए थे और उ ह ने इस दौरान मांस, शराब या कसी पराई ी को छु आ तक नह था। ले कन अब उनक उपल य को सुनने के लए उनक मां ही इस नया म नह थ । बंबई म मोहनदास को सां वना दे ने के लए मेहता के एक संबंधी थे जो उस समय उस प रवार म ही रहते थे। उनका नाम रायचंद या राजचं था और जब रायचंद नौजवान थे तो उ ह कुछ रह यमय अनुभू तयां ई थ और उ ह ने जैन ंथ के अ येता और एक क व के प म स हा सल कर ली थी।3 एक जैन श क के प म रायचंद एक सादा और सामा य जीवन जीते थे, हालां क उनका याग पारंप रक याग से थोड़ा अलग और शायद गहरे क म का था। जहां सारे जैन शाकाहारी थे, उससे भी यादा धा मक लोग याज़-लहसुन भी नह खाते थे और ाणीमा के जीवन से यार करते थे। वे माल से अपना मुंह ढं के रहते थे ता क कोई उसम जाकर न मर जाए। घायल प य के लए जैन अ ताल भी थे। कई बार याग, एक आडं बरपूण तरीका भी अ तयार कर लेता था, जब कोई धनी-मानी ापारी अपने शंसक समुदाय के सामने अपनी सारी संप दान कर दे ता था।

रायचंद ने ढ़वाद जैन धम को ‘आ मा को न ढं कनेवाले धम क बजाए मुंह-प का धम कहकर खा रज कर दया’। औपचा रक शपथ के त लोग के अ तशय लगाव ने उ ह परेशान कर दया। उ ह ने तक दया क यहां तक क एक गृह भी याग कर सकता है और अपनी प नी और ब के लए उ चत व ा कर नयावी भोग से अंतमन से तट रह सकता है।4 रायचंद, ाणजीवन मेहता के भाई के दामाद थे। वह पेशे से एक जौहरी थे और कान संभालने के साथ-साथ धा मक कताब पढ़ते थे और क वताएं लखते थे। हालां क वह मोहनदास गांधी से साल भर ही बड़े थे, ले कन लोग म उनके त शंसा और आ य का भाव था। गांधी से उनका प रचय शतावधनी के प म कराया गया यानी एक ऐसा जो सैकड़ चीज़ याद रख सकता हो। एक ऐसा भी समय था जब वह इसका सावज नक प से द शन भी करते थे। बाद म उ ह ने अपने आपको धा मक काय तक सीमीत रख लया था। वह जैन और ह सा ह य के गहन जानकार थे और इ लाम और इसाईयत पर गुजराती म ब त सारी रचनाएं पढ़ चुके थे।5 बंबई म कुछ दन तो गांधी, रायचंद के साथ ही रहे। मातृ वयोग से उनका यान बंटाने और उनके मनबहलाव के लए रायचंद ने उनके सामने अपनी नजी श य को द शत भी कया। लंदन से आए गांधी से उ ह ने अलग-अलग भाषा म पैरा ाफ लखने और पढ़ने को कहा। उसके बाद रायचंद ने उसे ब लख दया जससे गांधी ब त भा वत ए। उसके तीस साल से भी यादा बीत जाने के बाद उ ह ने अपने ऊपर उस जैन व ान के भाव को कुछ यूं याद कया: वह धीरे चलते थे, ले कन कोई भी पयवे क यह दे ख सकता था क चलते समय भी वह एक चतन क मु ा म रहते थे। उनक आंख म एक जा था और वो ब त तीखी थी। उसम कोई म नह था। उन आंख म क करण का एक भाव था। उनका चेहरा गोल था, ह ठ पतले थे, नाक न तो तीखा था, न ही चपटा। उनका शारी रक गठन बला-पतला था और वे मंझोले कद के थे। वे ब त गोरे नह थे। वह एक शांत और अंदर से न वकार लगते थे। उनक आवाज़ इतनी मीठ थी क कोई भी उसे लगातार सुनना चाहता था। वह हमेशा मु कुराते ए रहते थे और खुश मजाज़ थे। उनके चेहरे से आंत रक खुशी छलकती थी। भाषा पर उनका ऐसा अ धकार था क मुझे नह याद आता क कसी बात को अ भ करते समय उ ह श द के लए अटकना पड़ा हो। रायचंद के साथ बात करते ए (और उ ह सुनते ए) ‘गांधी को एहसास आ क या ा त को सफ कूल म ही नह मांजा जा सकता और अगर कसी को ान ा त करने क ती इ ा है तो उसे बाहर भी ा त कया जा सकता है...’।6

रायचंद के साथ एक स ताह बताने के बाद गांधी अपने भाई के साथ ना सक क तरफ रवाना ए। उनक जा त मोढ़ ब नया ने उ ह लंदन जाने के लए अभी तक माफ नह कया था। अपनी जा त को शांत करने के लए उ ह ने गोदावरी म एक शु नान कया और उसके बाद राजकोट रवाना ए जहां उ ह ने शहर के मुख ब नय को एक रा भोज पर

आमं त कया। राजकोट म ही वे अपनी प नी और बेटे से मले ज ह उ ह ने पछले तीन साल से नह दे खा था। मोहनदास क उनके युवाकाल क ब त कम त वीर उपल ह और उनक युवा प नी क तो कोई त वीर वजूद म ही नह है। बाद क त वीर जो उनक उ के चौथे और पांचवे दशक म ली गई थ , वे दखाती ह क क तूरबा गोल चेहरे वाली एक सामा य सी ी थ । हालां क एक जीवनीकार ने खुशनुमा क पना करते ए लखा है क जब लंदन से लौटने के बाद मोहनदास अपनी प नी से मले तो ‘वह अपनी प नी क सुंदरता को दे खते ही रह गए’। उस कताब के मुता बक ज़ा हरा तौर पर गांधी के लए अपनी प नी को दे खना, मं मु ध कर दे ने जैसा था। उसक मुलायम वचा, मोट बरौ नय वाली बड़ी-बड़ी आंख, चमक ली साड़ी म उसक सुडौल, कोमल छोट सी काया! उसक चमक ले, लंबे, घने बाल म उसे कंघी करते दे खना कतना मनमोहक था..उसके छोटे -छोटे कदम को दे खना, उसके नंगे पैर म चांद क पायल क नझुन को हर कदम पर सुनना कतना आनंददायक था।7

यह बात मन को पढ़ते ए लखी गई है जसका कोई ोत नह दया गया है। अपनी आ मकथा म खुद गांधी का ववरण कह उससे यादा च मय है। अपने पुन मलन के बारे म वह लखते ह क ‘मेरी प नी के साथ मेरा संबंध अभी भी वैसा नह था जैसा क म चाहता था। यहां तक क इं लड म मेरे नवास ने भी मेरी इस जलन को र नह कया। मेरी अ त-संवेदनशीलता और मेरा हर छोट -छोट बात के त संदेह जारी रहा...’। हालां क सरे त य ( क क तूरबा ज द ही फर गभवती हो गई) इस बात को सा बत करते ह क कम से कम उन दोन के बीच फर से प त-प नी का सामा य संबंध कायम हो गया। इस बीच अपने लंदन वास से उ सा हत होकर गांधी ने अपने घर म भोजन-आदत म प रवतन कया और दै नक भोजन म कोको और जई के द लए क शु आत क ।8 गांधी के भारत लौटने के एक महीने बाद उनके भाई अपने शहर पोरबंदर म एक ववाद म फंस गए। ल मीदास, रजवाड़े के उ रा धकारी कुमार भाव सहजी के साथ जुड़े ए थे। कुमार उसी युवराज के बेटे थे जो गांधी के ज म के साल (1869) ‘यातनामय मृ यु के शकार ए’ थे और जस वजह से राणा व मजीत ने युवराज के सलाहकार क ह या करवा द थी। नतीजतन उनका दजा थम ेणी के शासक से घटाकर तीसरे ेणी के शासक का कर दया गया था और बाद म उ ह नवा सत ही कर दया गया था। सन 1891 तक राणा को उसक पुरानी श पूरी तरह से नह द गई थी। हालां क उसे पोरबंदर वापस आने क इजाज़त दे द गई थी ले कन वह टश सरकार ारा नयु शासक क दे खरेख म ही राजकाज चलाता था। राणा के पोते भाव सहजी को ग के उ रा धकारी के तौर पर तैयार कया जा रहा था। एक टश ूटर उसे अं ेज़ी, इ तहास और अ य वषय पढ़ाता था। एक टश इंजी नयर उसे रा य के अ य ह स म घुमाने ले जाता था और उन

जगह को च त करता था जहां पुल बनाए जा सकते थे। रा य का टश शासक उसे स ताह म दो या तीन दन अपने कायालय बुलाता था ता क वह अपनी जा के बीच ववाद को सुलझाना सीख सके और भ व य म रा य क नी त खुद बना सके। गांधी अपनी आ मकथा म लखते ह क ‘मेरे भाई (ल मीदास), पोरबंदर के वग य राणा साहब के ग पर बैठने से पहले उनके सलाहकार और स चव थे और उनके ऊपर उस आरोप क तलवार लटक ई थी क उ ह ने उनको (राणा को) गलत सलाह द थी।’9 उस वा य के पीछे एक ज टल कहानी छु पी ई है जसने सन 1920 के दशक म अपना मह व खो दया जब गांधी ने अपना सं मरण लखा था-ले कन जस कहानी ने वा तव म उनक ज़दगी और उनके क रयर पर एक खास भाव डाला। संयोग से अ भलेखागार से मली, प ाचार क एक बड़ी फाइल हम उस कहानी पर काश डालने म मदद करती है। इसी लए हम जानते ह क सन 1891 म ल मीदास, शापूर के ठाकुर क सेवा म थे जो का ठयावाड़ के एक ज़म दार थे। हालां क अ सर वह पोरबंदर म भी रहते थे (जैसा क रा य के शासक ने ट पणी क थी) जहां ‘वह भाव सहजी के साथ पछले नौ या दस महीन से कुछ अ ात और अप रभा षत वजह से घूमते रहते थे।’10 भाव सहजी के साथ समय बताकर ल मीदास ये उ मीद कर रहे थे क जब भाव सहजी, पोरबंदर के राणा बनगे तो उ ह कोई उपयु पद मल जाएगा। या शायद वह अपने भाई मोहनदास के ारा कुछ अ य भाव जमाना चाहते थे जो लंदन से पढ़ाई करने के बाद द वान पद के लए अ य धक यो य युवक था। खासकर तब जब अं ेज़, दे शी रा य म क़ानून और व ा क त को आधु नक बनाने म लगे ए थे। अपने सं मरण म गांधी लखते ह क ‘मेरे बड़े भाई को मुझ से ऊंची उ मीद थ । उनके मन म धन-संप और यश- त ा क काफ इ ा थी।’11 उस ववरण से दोन संभावना क तरफ इशारा मलता है- या तो ल मीदास खुद ही पोरबंदर के द वान बन जाना चाहते थे या ( जसक संभावना यादा लगती है) फर अपने लंदन से पढ़ाई कर लौटे और यो यता म उनसे बेहतर भाई को द वान बनवाना चाहते थे। ल मीदास गांधी के संर क, युवा कुमार भाव सहजी को राजकाज के आनंद से यादा अ याशी म मज़ा आता था। हालां क वह ववा हत था, ले कन उसने एक हरम बना रखा था। इं लड से गांधी के लौटने के समय, कुमार ने एक नई औरत को रख लया था। उसके लए उसने नए नौकर को बहाल कया, य उसके महल म पहले से ही पचास से यादा नौकर थे। इस तरह से खचा बढ़ता गया और उसी के साथ कज़ भी। अं ेज़ शासक ने नराश होकर लखा क ‘युवा राजकुमार रा य के कुछ घ टया च र के लोग के साथ घर गए ह।’12 कुमार और उसके दादा के बीच संबंध अ े नह थे। नौजवान राजकुमार महल से र एक आवास म रहता था। 7/8 अग त 1891 क रात को भाव सहजी, महल के तीसरे त ले

पर त एक कमरे म घुस आया। उसके साथ शहर का एक लुहार भी था जसने कमरे और ज़ेवरात से भरे कई ब स का ताला खोल दया। इन ब स से भाव सहजी ने सोने, मा ण य और सरे क मती धातु के बने कणफूल, नथ और कंगन नकाल लए। अपने साथ वह भोजन म काम आने यो य कुछ महंगी था लयां और त त रयां भी लेता गया। हालां क उस लुहार को महल के सुर ाक मय ने रोक लया और उससे पूछताछ क । जब उसने ये बताया क वह कसक आ ा से वहां आया है तो राणा ने रा य के शासक को इन सारी बात क जानकारी दे द । उस समय पोरबंदर का शासक एस. पी. पं डत था। उसने इस बात के ीकरण के लए भाव सहजी को बुलाया। भाव सहजी ने इस बात पर ज़ोर दया क वे ज़ेवरात उसके वग य माता- पता के ह। उसने कहा क उसे इस बात क चता थी क उसके दादा इन ज़ेवरात को ख म कर दगे, इसी लए उसने पहले ही उसे काबू म कर लया जो उसका ज म स अ धकार था। राणा व मजीत ने इससे इ कार कया और कहा क वे ज़ेवरात रा य क धरोहर ह जो कई पी ढ़य से शासक ारा अ जत कए गए ह। जब तक वह उस रयासत के राणा ह, वे उसके र क ह। वे उस ज़ेवरात को भाव सहजी को तभी स प सकते ह जब भाव सहजी रयासत क ग पर बैठ जाएंगे।13 उस रात महल म उस घटना को अंजाम दे ते समय भाव सहजी और लुहार के साथ दो अय भी थे। उसम से एक राजकोट के एक ापारी का बेटा था, जसका बकाया भाव सहजी पर था। सरे श स गांधी के मह वाकां ी भाई ल मीदास थे। रयासत के शासक को द गई अपनी गवाही म ल मीदास ने इस बात से इ कार कया क वह उस ताला तोड़नेवाली घटना के समय मौजूद थे। उ ह ने कहा क उ ह तब बुलाया गया जब महल के र क ने लुहार को रोक लया। ल मीदास ने कहा क चोरी क घटना पर ीकरण दे ने के लए जब भाव सहजी को बुलाया गया तो वह ‘इससे काफ आहत ए’। उसने ल मीदास से कहा क या उ ह मदद करने के लए राजकोट से कसी वक ल को बुलाना चा हए? ल मीदास ने जवाब दया क चूं क वो ज़ेवरात उनके अपने थे, इसी लए वक ल को बुलाने का मतलब होगा दोष वीकार करना। इस पर राजकुमार का जवाब था, ‘ठ क है’। उसके बाद ल मीदास वहां से चले गए। बाद म उस ववाद से खुद को र करने के लए ल मीदास ने शासक से कहा वह अपने घर लौटने से पहले महल म ‘ सफ पांच मनट के लए’ थे।14 इस ववाद को सुलझाने क लए राजकोट से टश पॉ ल टकल एजट को बुलाया गया। ज़ेवरात को खजाने म लौटा दया गया और कुमार भाव सहजी को ये चेतावनी द गई क अगर उनका आचरण ज द नह सुधरा तो उ ह उनके दादा क मृ यु के बाद राणा नह बनने दया जाएगा। ल मीदास को कहा गया क राजकोट म टश पॉ ल टकल एजट क इजाज़त के बना वे पोरबंदर नह आ जा सकते।15

अपने गृहनगर से एक तरह से नवा सत और अपने अ धकार से वं चत ल मीदास अपने भाई मोहनदास क ओर मदद के लए आशा भरी नगाह से दे खने लगे। उससे पहले गांधी क उस पॉ ल टकल एजट से लंदन म सं त मुलाकात हो चुक थी। तो या वह उस से बात कर अपने भाई के लए मदद नह मांग सकते थे? दरअसल, गांधी हचक रहे थे। वो ‘लंदन म एक सामा य मुलाकात के बदले कसी लाभ के काम के लए’ पॉ ल टकल एजट से बात करने म सहज नह थे। ले कन उनके भाई ने उन पर दबाव डाला, ‘तुम का ठयावाड़ को नह जानते हो और तु ह अभी ब त नयादारी सीखनी है। यहां सफ भाव काम करता है। यह तु हारे लए उ चत नह है क अपने भाई के लए एक ऐसे ऑ फसर से तुम बात भी न करो जसे तुम जानते हो। यह तु हारा कत है।’ ल मीदास उनके बड़े भाई थे, साथ ही वे ऐसे समय उनक मदद के लए सामने आए थे, जब वे लंदन म क़ानून क पढ़ाई कर रहे थे और उ ह पैस क स त ज़ रत थी। अ न ा के बावजूद वे पॉ ल टकल एजट से मलने गए। ले कन टश भारत म न लीय भ ता इं लड क तुलना म यादा मजबूत थी, आ खर भारत एक उप नवेश था। लंदन जैसे महानगर म एक अं ेज़ और भारतीय क सामा य मुलाकात का यहां कोई मतलब नह था। जब मोहनदास अपने भाई के मामले को लेकर एजट के पास गए तो उसने उ ह अपने ऑ फस से बाहर नकाल दया।16 ● अपने याकलाप से ल मीदास ने पोरबंदर रयासत म मोहनदास के लए भी कसी संभावना को धू मल कर दया। महल म उनके कारनाम से द वानी या कसी यायाधीश के पद क संभावना अगर पूरी तरह से ख म नह ई थी तो कमज़ोर ज़ र पड़ गई थी।17 अब मोहनदास के पास सबसे ब ढ़या वक प यही था क वे टश भारत म एक वक ल का काम कर। सन 1891 के नवंबर क शु आत म वे हाईकोट म अपना नामांकन कराने बंबई लौटे । उ ह इनर टे ल के स ट फकेट के आधार पर एक लाइसस दया गया और एक टश बै र टर से अनुमोदन प भी मला।18 सन 1890 के दशक म बंबई क आबाद दस लाख से कम ही थी। एक टश नाग रक ने इसे ‘भारत का लघु प’ कहा था। इसक सड़क पर करीब चालीस भाषा म बातचीत करते ए लोग मल सकते थे और उनके नथुन से ‘खुशबू और मसाल , लहसुन, चीनी और गोयठ का गंध साफ महसूस कया जा सकता था’।19 एक ज़माने म बंबई मछु आर के कुछ गांव का समूह था, ले कन 19व सद के आ खर तक यह औ ो गक और ावसा यक प से उफान मारता एक महानगर बन चुका था। बंबई म करीब 50 सूती

मल थ जनम 50,000 से यादा लोग काम करते थे। चार तरफ आ थक ग त व धयां पसर रही थ , समंदर को भरकर ज़मीन बनाई जा रही थी, उपनगर को शहर से जोड़ने के लए नई रेलवे लाईन बछाई जा रही थी और जहाज़रानी के बढ़ते कारोबार के लए नए डॉक (गोद ) बनाए जा रहे थे। हर समय शहर म नए कूल और कॉलेज खुल रहे थे। उस शहर म भारत के सभी धम के (और नया के भी) लोग रहते थे। यह वग य संदभ म भी ब त व वध था जहां मक क एक वशाल आबाद , एक अ ा-खासा ापा रक समुदाय, एक छोटा ले कन बढ़ता आ अं ेजी भाषी वक ल , डॉ टर , करा नय और श क का वग था।20 एक इ तहासकार ने लखा क ‘शहर के फैलाव के साथ ऐसा लगता है क प मी भारत के हर जा त समूह के लोग झुंड के झुंड बंबई क तरफ चले आ रहे ह, ठ क उसी तरह जैसे ए या टक इलाके के लोग ने सट ऑफ लैगून के लए कया।’21 गांधी के गुजराती भाई इस नए मौके का फायदा उठानेवाल म अ णी थे जो ापार और नए पेश के पैदा होने से सामने आ रही थी। बंबई प ंचने पर गांधी ने गरगांव म एक कमरा कराए पर लया जो उस जगह से यादा र नह था जहां वह पहले-पहल जैन धम के ाता रायचंद भाई से मले थे। वहां से बंबई हाईकोट तीन मील द ण फोट इलाके म था। हाईकोट नव-गो थक शैली क इमारत क एक ृंखला थी जो अपनी तकोनी छत, खूबसूरत बुज और अपने आकार के लए मश र थी। हाईकोट का े फल 80,000 वग फुट म था।22 हर सुबह लंदन म श त वह वक ल नय मत प से हाईकोट जाता, वहां क लंबीघुमावदार सी ढ़यां चढ़ता और उसके कमर का च कर काटता। जैसा क बाद म उसने खुले मन से याद कया, ‘अ सर म मुकदम पर सही तरीके से यान नह दे पाता था और मुझे झपक आने लगती थी। भारतीय कानून का अ ययन ‘एक थकाऊ काम’ था, खासकर उ ह स वल ोसीजर कोड को आ मसात करने म खासी द कत का सामना करना पड़ा। उनको कोई मुकदमा नह मलता था, शायद इस वजह से क वे एक साधारण व ा थे और शहर म बाहरी थे। हालां क उ ह ने नचली अदालत म एक मुकदमा लड़ा और एक कसान के नवेदन प को ा ट करके उ ह ने पैसे बनाए जसक ज़मीन को कुक कर दया गया था।23 नवंबर 1891 से लेकर सतंबर 1892 तक मोहनदास गांधी बंबई आते जाते रहे। (उनका वहां नय मत रहना इस वजह से बा धत आ क उ ह राजकोट जाना पड़ता था, जो े न से रात भर क या ा थी)। शहर का उन पर या भाव पड़ा या बंबई के बारे म उ ह ने या सोचा, इसका उ ह ने कोई रेकॉड नह दया है। या वहां वे अपने वजातीय मोढ़ ब नय से ही मलते-जुलते रहे या वे बंबई क उभरती ई वै क सं कृ त का भी ह सा बने? बंबई म एक ब त ही स य पारसी और गुजराती थएटर था। या गांधी ने वहां एक भी नाटक

दे खा? हाईकोट जाने के रा ते म उ ह ने बंबई के मैदान म नौजवन को केट खेलते ज़ र दे खा होगा। या वे कभी केट का कोई मैच दे खने के लए के? बंबई म गांधी के बताए समय का सफ एक ही प उपल है। वो प उ ह ने अपने एक म को लखा था जसम उ ह ने काम क कमी के बारे म लखा था। साथ ही उ ह ने लखा क ‘जा त का वरोध पूववत जारी’ है। मोढ़ ब नया समुदाय का एक तबका अभी भी गांधी के लंदन जाकर पढ़ाई करने और कालापानी पार करने से नाराज़ था। मोहनदास ने लखा, ‘सब कुछ उस एक पर नभर’ है— जो जा त म मेरे वेश को रोकने के लए हर संभ व यास करेगा। मुझे अपने कृ य पर कोई ख नह है जतना क मेरे उन वजातीय बंधु के लए जो अपनी जा त के एक के आदे श को भेड़ क तरह सर झुकाकर मानते ह। वे लोग कुछ अथहीन ताव पा रत कर रहे ह और अपनी सीमा से बाहर जाकर अपने भाव का दशन कर रहे ह। न य ही उनके तक म धम का कोई ान नह है। या यह उ चत नह होगा क ऐसे वजातीय से कोई वा ता न रखा जाए, ब न बत इस बात के क उनक बात को मानकर रहने के ता क मुझे उनके बीच का ही एक सद य मान लया जाए?24

गांधी अदालत म नाकामयाब हो रहे थे और अपनी जा त ारा उ पी ड़त। ऐसे म उनके मन को उनके नए दो त रायचंदभाई से बात करके सुकून मलता था। वह उनक कान पर उनसे मलने जाते जहां वह रायचंदभाई को आराम से ग पर बना कसी तनाव के पालथी मारकर बैठे दे खकर भा वत होते। वह प मी तौर तरीक क कुस या सोफा पर नह बैठते थे जसके गांधी खुद भी आद हो चुके थे। वह इस बात से भी भा वत ए क रायचंदभाई को अपने पहनावे या श ल-सूरत को लेकर कसी तरह क फ नह थी। जन य से गांधी अदालत म मलते थे वो लोग अपने पहनावे को लेकर सतक रहते थे और कोट-पट म सज-धज कर आते थे। ले कन वह जौहरी- चतक सफ एक साधारण धोती-कुता पहने रहता था जस पर कई बार इ ी भी नह क ई होती थी। एक बार उनक बातचीत सरे य के त क णा क भावना पर होने लगी। रायचंद ने कहा क हालां क चमड़े के बना काम चलाना मु कल है ले कन इसका इ तेमाल कम से कम करना चा हए। गांधी ने दे खा क रायचंद भाई क टोपी पर एक चमड़े क प मंढ ई है। जब गांधी ने उसक तरफ इशारा कया तो तुरंत रायचंद भाई ने सर से टोपी उतार ली। उनके उस हावभाव ने एक बड़े श ाचार को रेखां कत कया। गांधी ने सोचा क यहां एक ऐसा श क है जो गलती को सुधारने और यहां तक क उसके खंडन तक के लए तैयार है। रायचंद ने गांधी से कहा क उ ह अपनी जा त क परंपरा से बाहर दे खना चा हए। ब नए छोट -छोट बात को लेकर हमेशा से अ त- श ाचारी और स ह णु रहे थे जैसे क ड़े मकोड़ को हा न न प ंचाना या खास तरह का खाना न खाना आ द। फर भी उनक क णा क भावना एक घेरे म बंद थी। साथ ही उनम साहस क भी कमी थी। रायचंद ने कहा क हालां क ब नय का काम ापार करना था, फर उ ह ‘ सरी जा तय के गुण को

सीखना’ चा हए। उ ह शू से कड़ी मेहनत, ज ासा सीखनी चा हए।25

य से साहस और ा ण से ान के



● बंबई म जब गांधी को नय मत काम नह मला तो वे अपने घर राजकोट लौट आए। ऐसा लगता है क वह अदालत म ब ढ़या तरीके से बहस नह कर पा रहे थे ले कन एक अ े लेखक के प म (लंदन के वे जटे रयन सोसाइट ऑफ लंदन के प म), उनको आवेदन/ नवेदन प का मसौदा बनाना आता था। गांधी ने राजकोट म एक कायालय खोला जसम धीरे-धीरे मुव कल आने लगे। वह उनके लए ाथनाप का मसौदा तैयार करते जो मु यतः भू म ववाद से संबं धत होते थे। इससे उ ह 300 पए मा सक क आय होनी शु ई। वह आमदनी उनके प रवार के खच के लए काफ थी, जसम 28 अ ू बर 1892 को सरे बेटे के ज म के साथ बढ़ो री हो चुक थी। गांधी के उस बेटे का नाम रखा– म णलाल।26 बंबई जैसे महानगर म अपनी वकालत को जमाने क तुलना म (जैसा क उनके लंदन के श ण से उनसे उ मीद क गई थी) एक छोटे से शहर म वतं काय करना ब त स मानजनक काम नह था। हालां क एक सुकून क बात ये थी क जीवन म पहली बार उ ह अपने प रवार या कसी दो त से कज़ नह लेना पड़ रहा था और वे कज़ मु थे। संयोग से एक तरफ का ठयावाड़ म उनके लए दरवाज़े बंद हो रहे थे, तो सरी तरफ द ण अ का म एक अवसर कट आ। गांधी के गृहनगर पोरबंदर के एक मु लम ापारी प रवार ने द ण अ का म एक सफल कारोबार ा पत कया था। उस कंपनी को दादा अ ला एंड संस के नाम से जाना जाता था और उसक शाखाएं नटाल, ांसवाल और पुतगाली ई ट अ का म फैली थ । वे लोग कई तरह के उ पाद का कारोबार करते थे। ांसवाल म कंपनी क सात कान को दादा अ ला के र ते का भाई तै यब हाजी खान महमूद संभालता था। जुलाई 1890 म तै यब के प रवार ने इन कान को 42,500 पाउं ड म खरीदा था जसक अदायगी क त म क जानी थी। सन 1892 से अदायगी क क त आनी बंद हो ग । अब अ ला ने अपने र ते के भाई पर मुकदमा ठोक दया य क उसका वो उसका दे नदार था। अ ला ने याज समेत 24,700 पाउं ड क अदायगी का मुकदमा ठ का।27 दादा अ ला क तरफ से अं ेज़ वक ल अदालत म पैरवी कर रहे थे ले कन वहां एक सम या थी। अ ला का अपना रेकॉड गुजराती म था। अब अ ला एक ऐसे वक ल क तलाश म था जसे गुजराती भी आती हो और कोट क जबान अं ेज़ी भी। उसने गांधी के भाई ल मीदास को प लखा क या उनका लंदन से पढ़ाई कर आया भाई द ण

अ का आकर उसक मदद कर सकता है? अ ला ने वादा कया क उसक कंपनी जहाज़ से थम ेणी के आने-जाने का टकट, रहने-ठहरने का खच और बतौर फ स 105 पाउं ड दे गी। ल मीदास ने इस वषय म अपने भाई मोहनदास से बात क और मोहनदास को ये बात जंच गई। वह ‘ कसी भी तरह भारत से बाहर’ जाना चाहते थे और सामने ‘एक नए दे श को दे खने और नया अनुभव सीखने का एक ललचाने वाला ताव था’।28 हालां क उनक आ मकथा से लए गए उनके इस व को उनके उ साह के प म न दे खकर थोड़ा सरी तरह भी दे खा जाना चा हए। द ण अ का आने के योते ने उ ह घर म चल रही राजनी तक उठापटक से र होने और एक अ -खासी रकम कमाने का अवसर मुहैया कराया। दादा अ ला का आमं ण 19 व सद के आ खर म ही संभव और उपयु था। इसक वजह ये थी क एक गुजराती ापारी ने टश शासन के साथ चलते ए द ण अ का म अपना कारोबार जमा लया था जहां आधु नक ज़माने के हसाब से अदालत ा पत हो चुक थ । उसी समय एक सरा गुजराती लंदन म बै र टरी क पढ़ाई करने के लए टश सा ा य के ोत (क ) तक प ंच चुका था। अगर ये बात सौ साल पहले क यानी सन 1790 के दशक क होती तो द ण अ का म कोई भी गुजराती ापारी नह मलता और अगर ये बात कुछ दन बाद क यानी 1910 के दशक क होती तो भी सरा य होता। उस समय तक ये गुजराती ापारी अं ेज़ी-भाषी समाज म घुल मल गए होते और अं ेज़ी का ान हा सल कर चुके होते। ले कन सन 1890 के दशक म वै ीकरण और सा ा यवाद क इन दोहरी या ने पोरबंदर के एक ह वक ल और उसी शहर के मुसलमान कारोबारी को साथ काम करने के लए द ण अ का म नज़द क ला दया। पांच साल से भी कम म एक बार फर से अपनी प नी और ब े को पीछे छोड़ते ए मोहनदास गांधी 24 अ ैल 1893 को बंबई से डरबन के लए जहाज़ से रवाना हो गए। गांधी के नटाल जाने से ततीस साल पहले, पहले भारतीय नटाल गए थे। वो ठे के पर लाए गए ( गर म टया) मज़ र का एक समूह था जसे ग ा खेत म मज़ र के तौर पर लाया गया था। जब 16 नवंबर 1860 को उन मज़ र को लेकर गया एस एस टरो डरबन प ंचा तो नटाल मरकरी का एक रपोटर उस घटना को दज करने के लए वहां मौजूद था। जो मुसा फर उस जहाज़ से उतरे वे, वह एक व च मसखर जैसा, वदे शय क तरह दखता पुरवैया लोग का समूह था। पु ष, मुसलमानी पगड़ी पहने ए और नंग-धड़ंग, म रयल और नंगे पांव थे ज ह ने रंगीन कपड़े पहने ए थे। उनम चमकती आंख वाली, लंबे बखरे बाल वाली औरत थ जनका शरीर आधा ढं का आ ले कन सुग ठत था। उनक नगाह कौतूहल से भरी और उनके तीखे नैन-न थे। यारे, बु मान और चपलता से भरे बले-पतले कुपो षत ब े थे...वे साफतौर पर एक अलग न ल और कार के लग रहे थे ज ह हमने पहले अ का या इं लड म नह दे खा था।29

अ का के द ण-पूव तट पर त नटाल उप नवेश टश मूल के लोग ारा नयं त था। सन 1840 के दशक म उ ह ने बोर लोग पर अपना भु व ा पत कर लया था, जो डच मूल के लोग थे और बाद म महा प के आंत रक भाग म पलायन कर गए। नटाल क म और वहां क जलवायु ग े क पैदावार के लए उपयु थी, ले कन सम या ये थी क अ क लोग अपने खेत से व नकालकर मज़ री का काम करने के लए अ न ु क थे। सन 1851 म ेत लोग क ई एक सावज नक बैठक म ये न कष नकाला गया क ‘इस उप नवेश क का फर आबाद पर म क अबाध आपू त के लए नभर रहना असंभव है’। इसी लए सन 1850 के दशक के आ खर से नटाल क सरकार ने भारत से मक को मंगाने का फैसला कया। उसके लए मज़ र को नयु करने के लए एजट को बबई, कलक ा और म ास भेजा गया। उ ह ने वहां पर अपने से नीचे के एजट को बहाल कया ता क दे श के अंद नी ह स को खंगाला जा सके। जन लोग को चुना गया, उ ह वहां से बंदरगाह तक लाया गया और फर डरबन भेज दया गया। जो कुली (भारतीय मज़ र के लए अं ेज़ ारा यु श द) नटाल आए थे उ ह पांच साल के ठे के पर लाया गया था। वे लोग फर से पांच साल के लए नवीकरण करा सकते थे और उसके बाद वदे श वापसी का दावा कर सकते थे या नटाल म ही (सामा य प से) वतं क तरह रह सकते थे। खेती के काम म उ ह रहना, खाना, एक ठ क-ठाक वेतन (10 श लग तमाह) और च क सक य सहायता द जाती थी। नटाल मरकरी ने सन 1865 म लखा, ‘हमारी समृ के लए कु लय का आ वासन ब त ही ज़ री है।’ इसका नतीजा यह आ क सन 1850 के दशक म चीनी का जो औसत उ पादन 500 टन से भी कम था, वो सन 1870 के दशक म 10,000 टन और सन 1890 के दशक म 20,000 टन तक प ंच गया। भारत से स ते मक के आने क वजह से चीनी के नयात म बेतहाशा बढ़ो री ई और मक के आने के पहले दशक म ही इसम पचास गुणा बढ़ो री हो गई! उनम से ब त सारे आ वासी द ण भारत के तेलुगु और त मल भाषी थे। भारत से जहाज़ म भरकर म हला मज़ र को भी लाया गया जसका पु ष से औसत 100 पर 40 था। ा ण और मुसलमान को तरजीह नह द जाती थी, य क वे अपनी औरत को घर से बाहर काम करने से मना करते थे। यादातर मज़ र नचली या म यमवत जा तय से आते थे जो अपने वतन म कृ ष मज़ र या छोटे कसान थे। अपने दे श म उ ह ने पहले कु हार, नाई, बढ़ई या मोची का काम कया था। भारतीय मज र ने नटाल गवनमट रेलवे और कोयले क खदान म भी काम करना शु कया। जहां एक तरफ कुछ मज र करार पूरा होने के बाद वतन वापस लौट गए तो ब त सारे लोग वह रह गए। वे लोग वहां कसान, स ज़ी क खेती करनेवाले, मछु आर और घरेलू नौकर के प म रह गए। जब गांधी का द ण अ का आगमन आ उस समय

तक नटाल के हरेक ह से म भारतीय फैल चुके थे। वे समु तट य इलाक , अंद नी भाग , शहर और लांटेशन (बागान) म मौजूद थे। सन 1870 के दशक के बाद से, एक अलग कार के भारतीय उस उप नवेश म आने लगे। वे लोग मज़ र न होकर ापारी थे और वहां वे ा से आ रहे थे। चूं क वे अपना कराया दे कर आते थे इस लए उ ह ‘मुसा फर भारतीय’ कहा गया। वे मु यतः भारत के प मी तट और खासकर गुजरात से आते थे। उसम से ब त सारे मुसलमान थे जसम बोहरा, खोजा और मेनन जा तय के लोग थे। कुछ ापारी ह भी थे और कुछे क पारसी भी थे। नटाल का पहला भारतीय ापारी, गांधी के गृहनगर पोरबंदर का था। वो एक मेनन था जसका नाम था अबूबकर अमोद झावेरी। उसने द ण अ का आने से पहले कलक ा और मॉरी शयस म काम कया था। सन 1877 म वह पहला अ ेत ापारी बन गया जो बज़नेस एंड रे ज़ड शयल डाइरे टरी ऑफ द नटाल आ पनैक म सूचीब आ था। डरबन, ट गट और वे लम म उसक कान थ और उसके मालवाहक जहाज़ भारत से माल लाते-ले जाते थे। झावेरी क कामयाबी ने उसके कई चचेरे-फुफेरे भाइय को े रत कया। उसी म से एक था गांधी का भावी नयो ा दादा अ ला-जो बाद म नटाल आया और उसने यहां अपना कारोबार ा पत कया। नटाल के लोग ने इन ‘मुसा फर भारतीय ’ को अरब कहा, हालां क वो सही नामकरण नह था–ले कन नटाल वाल ने ऐसा इस लए कहना शु कया ता क उ ह वे उनके हमवतन मज़ र से अलग करके दे ख सक। कुछ ापारी नटाल के मु य शहर डरबन म त थे। कुछ दे श के आंत रक ह स के छोटे शहर म चले गए। वे वहां खदान और ग ा के खेत म मज़ र को अपनी सेवाएं दया करते थे। भारतीय ापारी यादा समय तक काम करते थे और अपने यूरोपीय समक क तुलना म यादा संयमी थे। वे अपने दे श के मक को भी नौकरी पर रखते थे जससे उनक लागत और कम हो जाती थी। इन साल म उ ह ने नटाल और आसपास के शहर म खुदरा ापार म अपनी ह सेदारी बढ़ा ली थी। मसाल के तौर पर सन 1870 म डरबन म भारतीय क केवल दो कान थ , ले कन सन 1889 तक उनक सं या बढ़कर 85 तक हो गई। इन ापा रय ने ज़मीन और मकान म भी नवेश कया और उसे बाद म कराए पर उठा दया। सन 1860 म एस एस टरो पर करीब 340 मज़ र आए थे। सन 1876 तक नटाल म भारतीय क अनुमा नत सं या बढ़कर 10,626 हो गई। सन 1886 म ये सं या बढ़कर 29,589, 1891 म 35,763 हो गई। अब उनक सं या यूरोपीय लोग के लगभग बराबर हो गई जनक सं या 1891 म 46,788 थ (जब क अ कय क अनुमा नत सं या 455,983 थी)। अ का के इस ह से म भारतीय का सबसे यादा जमावड़ा नटाल म था, हालां क कुछ मज़ र और ापारी द ण म केप कॉलोनी और प म के बोर नयं त

इलाके ांसवाल म थी जहां जोहांसबग नाम का शहर सोने क खोज क वजह से तेज़ी से वक सत हो रहा था।30 नटाल सरकार ने भारतीय आ वा सय के काय, उनक जीवन तयां और उनको पेश आनेवाली सम या / शकायत क नगरानी के लए एक ोटे टे र ऑफ इं डयन इ म ट् स (भारतीय आ वा सय का संर क) नयु कया था। सन 1892-3 म द गई रपोट म ये कहा गया क बीते साल क तरह ही मज़ र क एक बड़ी सं या अपना करार पूरा होने के बाद कसानी और स ज़ी क खेती म लग गई है। ोटे टर ने लखा, ‘अपने उ म और वन ता के बल पर भारतीय ने इस उप नवेश म एक अ ा ान हा सल करने म कामयाबी हा सल क है’। उसने आगे लखा, ‘उ ह ने उप नवेश के समाज म एक समृ और नयम-कानून से चलनेवाले वग का नमाण कया है’। डे ढ़ सौ के करीब भारतीय नाग रक क सूची म थे और करदाता थे। वे ानीय चुनाव म वोट दे सकते थे।31 बंबई से रवाना होने के ठ क एक महीने वाद 24 मई 1893 को मोहनदास गांधी डरबन आए। रा ते म उनका जहाज़ लामू, म बासा और जंज़ीबार म का। समु के तट पर दादा अ ला उनका इंतज़ार कर रहे थे जो कंपनी के सबसे बड़े ह सेदार थे। वहां से वे अ ला के घर गए। अ ला प मी-क य डरबन क एक छोट गली म रहता था, जो े ट से र था। वह एक भारतीय या कह क गुजराती ब ती थी। े- ट, व टो रया इंबकमट और बंदरगाह से उ र क तरफ थी। गोरे लोग समंदर के नज़द क के इलाक म रहते थे, और भारतीय को भीतरी ट म रहने क इजाज़त थी। े- ट से दोन तरफ नकलनेवाली सड़क पर मकान के नचले तल पर कान थ जब क ऊपर ऑ फस या आवास थे। उन इमारत के नाम–झावेरी, मूसा, मेहता, अ ला, तमजी–से था क वे प मी भारत से आए ए कारोबारी लोग के मकान थे।32 लंदन म गांधी एक ईसाई जो शया ओ फ के साथ रह चुके थे और इस तरह से राजकोट और बंबई क अपने मोढ़ ब नया जा त के नयम का उ लंघन कर चुके थे। अब द ण अ का म एक मुसलमान प रवार के साथ एक घर म रहना तो मान ह ढ़वा दता का खुलेआम उ लंघन था। ऐसा उस समंदर क वजह से आसान हो गया जो उन दोन जगह के बीच म था–जहां गांधी अब रह रहे थे और जहां के लोग, गांधी क जा त और धम संबंधी आलोचना कर रहे थे। 24 मई को गांधी ने डरबन म कदम रखा और उसी दन वहां के मुख समाचार प ने समाचार का शत कया क बगल के द ण अ का गणरा य म तीसरी बार पॉल ु गर ने रा प त पद क शपथ ली है। अखबार ने रा प त के शु आती भाषण को छापा जसम ू गर ने कहा क यह दे खना उनका ‘ वशेष दा य व’ होगा क,

ऐसा कुछ भी न कया जाए जससे हमारी वतं ता को त प च ं ती हो या वो खतरे म आती हो। ऐसा अ धकार नह दया जाएगा जससे हमारी आज़ाद खतरे म आती हो य क यहां तक क का फर को भी समझना चा हए क हमारे इ तहास म ई र का हाथ है और ई र ने ही हम हमारी आज़ाद ब ी है।33

द ण अ का रप लक (द ण अ क गणरा य), जसे ांसवाल के नाम से भी जाना जाता था, का शासन बोर लोग के हाथ म था। वे लोग कसानी करनेवाले, धम ाण और क र लोग थे जनका यक न था क जो लोग ेत और ईसाई नह ह उ ह उस ज़मीन पर नाग रकता का कोई हक नह है। जब क नटाल के टश लोग वा ण य- ापार म यादा दलच ी लेनेवाले लोग थे और ल खत क़ानून क ब त परवाह नह करते थे। हालां क उनम भी अपने पूवा ह थे, वे पूवा ह मु कतई नह थे। डरबन म पहले स ताह के दौरान दादा अ ला, गांधी को म ज े ट क अदालत म ले गए, जो े ट के पास ही था। दोन ही का ठयावाड़ी अंदाज़ क पगड़ी पहने ए थे। उनक इस वेशभूषा पर कुछ ट प णयां भी आ जसे नटाल एडवटाईज़र ने कुछ यूं दज कया क ‘ब ढ़या वेशभूषा’ म एक भारतीय जो क ‘इं लश बै र टर’ था, अदालत म आया। उसने ‘ बना पगड़ी उतारे या सलामी दए ए अदालत म वेश कया और म ज े ट ने उसक तरफ घूरकर दे खा’। गांधी ने तुरंत इस बात का ीकरण दे ने के लए लखा क जैसे ‘एक यूरोपीय के लए सर से टोपी उतारना सामनेवाले के लए स मान द शत करने के सूचक होता है, वैसे ही भारतीय परंपरा म कसी का सर ढं क कर जाना स मान का सूचक होता है। कसी भ पु ष के सामने नंगे सर जाना स मान दे ने के बराबर नह है।’ बंबई हाईकोट म म ज े ट के सामने सर झुकाने क था नह थी। गांधी ने आगे कहा क ‘ फर भी वो महाम हम से इस बात के लए मा मांगते ह अगर वे उनके कृ य को अवमानना पूण या उनक अ श ा समझते ह। यह सफ अन भ ता का नतीजा है और उनका ऐसा करने का कोई इरादा नह था’।34 दादा अ ला के दावे का मुकदमा टो रया म लड़ा जा रहा था जो बोर नयं त द ण अ क गणरा य क राजधानी थी। एक स ताह डरबन म बताने के बाद गांधी े न से टो रया के लए रवाना ए। उनका टकट थम ेणी के कोच म था। दो घंटे बाद जब े न पीटरमै रट् ज़बग टे शन प ंची, एक रेलवे अ धकारी ने उनसे कहा क वो तीसरे दज के ड बे म चले जाएं। जब गांधी ने इस बात का वरोध करते ए कहा क उनके पास थम ेणी का टकट है तो उ ह और उनके सामान को ड बे से बाहर नकालने के लए पु लस कॉ टे बल को बुला लया गया। टे शन से उ ह ने दो टे ली ाम भेजे–एक टे ली ाम उ ह ने रेलवे अ धका रय को भेजा और सरा दादा अ ला को। दादा अ ला ने पीटरमै रट् ज़बग म भारतीय ापा रय को इस बाबत सूचना द जो गांधी से मलने टे शन आए। उ ह ने भी गांधी को उसी तरह क आपबीती सुनाई जो अतीत म उनके साथ घट चुक थी।

उसके अगले दन गांधी फर से प म क अपनी या ा पर रवाना ए। वह चा सटाउन तक आ खरी टे शन तक गए और जोहांसबग के लए एक घोड़ागाड़ी ( टे जकोच) लया। ेत कोचवान ने उ ह अंदर बठाने से इ कार कर दया जो मुसा फर के लए आर त था। चूं क गांधी के पास उसका टकट था, तो उ ह ने फर वरोध कया तो उस कोचवान ने उनका कान ही उमेठ दया। गांधी कोच क द वार से मानो खतरनाक प र त म लटके बैठे रहे और पहले ही टॉप टडरटन म वे ा से कोच से उतर गए। यहां फर वे कई भारतीय ापा रय से मले ज ह ने उ ह सां वना द । उसके अगले दन शाम के समय वो जोहांसबग प ंचे। यहां पर भी उ ह उनक वचा के रंग के आधार पर होटल का कमरा ं ढ़ने म कुछ द कत का सामना करना पड़ा। या ा के आ खरी चरण तक, उनक सम या जारी रही। जब वह जोहांसबग से टो रया जा रहे थे, तो उ ह फर से गाड ने कहा क वे थम ेणी से तीसरी ेणी के ड बे म चले जाएं। हालां क एक अं ेज़ सहया ी ने कहा क उसे एक भारतीय के साथ ड बा साझा करने म कोई द कत नह होगी। इस घटना के कई साल बीत जाने के बाद भी गांधी ने इस या ा को अपनी आ मकथा म याद कया है। यह एक पीछे मुड़कर दे खनेवाली घटना है–ले कन इसम एक खास नै तक ता है। य क जब वे यह लख रहे होते ह और यहां तक क जब उ ह े न के ड बे से नकालकर सरे ड बे म जबरन भेजा जाता है, वे इस न कष पर प ंचते ह क ‘ जस तकलीफ से म गुज़र रहा था, वो तो ब त ह क तकलीफ थी–वह तो एक गहरे न लभेद क ा ध का एक ल णमा है। अगर संभव आ तो म इस बीमारी को जड़ से मटाने का यास क ं गा और इस या म और भी तकलीफ स ंगा’। ले कन इतना तय है क गांधी के लए वह एक खदायी अनुभव ज़ र रहा होगा।35 ● जस सुबह गांधी टो रया प ंचे, वे उस वक ल से मले जो दादा अ ला का मुकदमा दे ख रहा था। उस आदमी का नाम ए ड यू बेकर था और वह एक स य धम चारक नकला। उसके मा यम से गांधी कई अ य ईसाइय से मले जनके साथ अपने-अपने धम के बारे म उ ह ने गमागम बहस क । गांधी मो तय क एक माला पहने ए थे जो उनक मां ने उ ह द थी। एक ईसाई म ने इसे महज अंध व ास कहकर खा रज कर दया। बस फर या था, उस भारतीय ने उसका करारा जवाब दया। गांधी ने कहा क वे इस बात को नह मानते क ईसा मसीह ई र क इकलौती संतान ह, ‘ य क अगर ई र क कोई संतान है तो हम सब उनक संतान ह’।36 ए ड यू बेकर एक सतरंगा और दलच च र है। वक ल बनने से पहले वह एक बढ़ई था। हालां क उसक वा त वक दलच ी दे सी लोग को ईसा मसीह के उपदे श को बताना

था। वह अ काज़ गो ेन हाव ट के नाम से एक प का भी नकालता था जो ‘धा मक और मशनरी उ मता’ को ो सा हत करती थी। बेकर खदान , अ ताल और जेल म धम चार करता था और ऐसा करके उसने कुछ अ कय को ईसाई बनाया था। फर वे लोग उ र क तरफ गए और वहां उ ह ने ईसा के उपदे श का चार जारी रखा। चच म अ कय को वीकार करने से पहले बेकर इस बात पर ज़ोर दे ता था क वे उन तावीज़ का याग कर जो बुरी आ मा को र करने के लए पहनी जाती थ । वह जोरशोर से संयम का चार करता और अपने समथक को तंबाकू और सुरती से र रहने के लए कहता।37 बेकर ने दे सी उपदे शक को जंगल म उपदे श दे ने भेजा और कभी-कभी वह खुद भी दे श के अंद नी ह स म जाता था। ऐसी ही एक या ा पर वह गांधी को साथ ले गया। उनक मुलाकात एक डच धम चारक से ई जसने एक ेत के एक भूरे रंग के आदमी के साथ या ा करने पर नाक-भ सकोड़ा। हालां क इससे बेकर पर कोई असर नह पड़ा। वह धा मक तो नह ले कन न लीय भेदभाव से ऊपर उठ चुका था। अपने उस ह दो त से वो ये उ मीद कर रहा था क वो ‘ज द ही ई रीय काश के यश के तले आ जाएगा जो पूरी तरह से ईसा के चेहरे पर काशमान है।’38 गांधी ने उसके ‘श द’ और ‘ काश’ का वरोध कया ले कन साथ ही वे ह वाद को भी एक संपूण/दोषर हत के प म कबूल नह कर सकते थे। य क अगर वेद ई र क वाणी है, तो बाइ बल और कुरान भी उसी तरह का होने का दावा य नह कर सकते? वह अपने ान को बढ़ाने के लए और अपने म को र करने के लए ईसाई और इ ला मक धा मक पु तक को पढ़ने लगे। इन धा मक अ ययन के बीच गांधी अपने मुकदम पर भी काम करते थे जसके लए वे द ण अ का आए थे। दादा अ ला ने पैसे क दे नदारी के लए अपने र ते के भाई खान मोह मद तैयब पर मुकदमा ठोका था। जब वे दोन प के कागज़ात और प ाचार से होकर गुज़र रहे थे तो गांधी को ब त सारे गुजराती प का अं ेज़ी अनुवाद करना पड़ा और सं ट नोट् स बनाने पड़े ता क वक ल उसे अदालत म पेश कर सक।39 द ण अ का म रहते ए और अखबार को पढ़ते ए गांधी ने ये साफ अनुभव कया क व भ सामा जक समूह के बीच क वभाजन रेखाएं खची ई ह। जोहांसबग म ेत ापारी भारतीय ापारी से नाराज़ थे और उ ह शहर से बाहर भेजना चाहते थे।40 जब एक अखबार ने लखा क कैसे यूरोपीय ापा रय को ‘धूत और ए शयाई ापारी’ बाहर खदे ड़ रहे ह तो गांधी ने अपने दे शवा सय के प म उसे प लखा। उस ह तानी वक ल ने अखबार को प लखा, ‘अगर एक संपादक अपने अखबार का कसी सरे अखबार क तुलना म बेहतर संपादन करता है और अपने त ं को बाज़ार से बाहर कर दे ता है तो पहले संपादक को यह सुनाना कैसा लगेगा क तुम सरे कामयाब

अखबार के लए जगह छोड़ो?’ गांधी ने पूछा, ‘अगर उनक त ा को आघात न लगे तो या यूरोपीय ापा रय को भारतीय ापा रय से कुछ सीखना नह चा हए क कैसे स ते म ापार कया जाता है और कैसा सादा जीवन जया जाता है?’41 नटाल म उप नवेशवा दय को शी ही एक ‘ ज़ मेवार सरकार’ मलनेवाली थी जसम उनक अपनी वधानसभा होती और अपने मं ी होते। उस वधानसभा का चुनाव सी मत मता धकार के आधार पर होना था। सतंबर 1893 म एक एंट -ए शया टक लीग का गठन आ ता क भारतीय को मता धकार से वं चत कया जा सके। उस समय तक नटाल म सफ 10,729 यो य मतदाता थे। जसम से कुछ को छोड़कर लगभग सारे के सारे यूरोपीय थे। ेत के वच व को बनाए रखने के लए मता धकार सफ शासक न ल को दया गया था। जैसा क एक अखबार ने लखा, ‘यह ब त ही हा या द है क एक अध-बबर न ल को (यहां आने दया गया है और उसे) उसी आधार पर मता धकार का दावा करने दया जा रहा है जस आधार पर वह यूरोपीय लोग को मल रहा है।’ एक खास सीमा तक क संप के मा लक होने क वजह से कुछे क भारतीय ापा रय का नाम मतदाता सूची म था। गोर के संगठन ने म ज े ट से कहा क वो भारतीय को मता धकार से वं चत कर य क नटाल म ‘ए शयाई लोग क आबाद पहले से ही यूरोपीय से यादा है और अगर भारतीय को मत दे ने का अ धकार मल गया तो कुछे क साल म ही यूरोपीय को स ा से बाहर कर दया जाएगा। उसके बाद हमारे ब े हम गा लयां दगे ज ह हमारी वजह से ये दन दे खना पड़े गा’।42 जब गांधी ने टो रया म इन अखबार को दे खा, वह इसका जवाब दे ने पर मजबूर हो गए। उ ह ने ेत नाटा लयन को याद दलाया क ह तान म भारत के लोग हाईकोट म यायाधीश ह और हाल ही म एक भारतीय दादाभाई नौरोजी इं लड क संसद के सद य चुने गए ह। नटाल के भारतीय न त प से इतने ‘स य’ ह क उ ह मत दे ने का अ धकार मलना चा हए। इतना ही नह , उ ह ने उ ह आ त कया क ‘उनके दे श के (यानी भारत के) लोग अपनी आ या मक स ता से इतने खुश ह क वे राजनी त म भाग लेने के बारे म नह सोचते... वे यहां राजनी त बनने नह , ब क रोज़ी-रोट कमाने आते ह...’।43 सन 1893 के उ राध म, मोहनदास दन के व दादा अ ला के मुकदमे का काम करते थे तो शाम को एक कताब लखते थे जसे वह का शत करवाना चाहते थे। यह लंदन जाने को इ ु क लोग के लए ‘लंदन जाने क तैयारी कैसे कर’ क म क एक कताब थी। एक जसने लंदन के इनर टे ल से सफलतापूवक और आराम से बै र टर का स ट फकेट हा सल कर लया था ‘वह उ ह इं लड म उस पढ़ाई के रह य को उजागर करने म मदद कर रहा था’। उस कताब के पहले अ याय म ये पूछा गया, इं लड कसे जाना चा हए? ‘उनको नह जनक कमज़ोर छाती हो और खूब खाने-पीने क इ ा

हो। साथ ही उनको भी नह जाना चा हए जनक उ पचीस साल से ऊपर क हो।’ गांधी ने लखा, ‘जो भारतीय, युवा और चु त- त ह, उनके लए व भ वसाय म या चल रहा है उस क जानकारी के लए इं लड बेहतरीन जगह है।’ उ ह ने लखा, ‘ स वल स वस म वेश करने के लए, बै र टर बनने, च क सा या इंजी नय रग क पढ़ाई के लए इं लड ब ढ़या जगह है। वहां ऐसी मंशा रखनेवाला कोई भी जा सकता है। वह एक ‘खास अव ध म इनके वषय के बारे म जतना इं लड म सीख पाएगा उतना भारत म नह ’। गांधी के अनुसार वहां क श ा का तर ‘ब त ही ऊंचा’ था और वहां कम मान सक वचलन भी थे। अपने अनुभव के आधार पर गांधी ने भारतीय छा के बारे म लखा क– जब कोई भारतीय छा इंगलड म होता है तो उसे उकसाने या आक षत करने के लए उसके साथ उसक प नी नह होती। वह अपने मां-बाप या अपने ब क नगाह से र रहता है या फर कोई दो त उसक पढ़ाई म बाधा नह बनता। वह अपने समय का मा लक होता है। तो अगर उसके पास एक इ ाश है तो वह कुछ भी कर सकता है। उसके अलावा इं लड क खुशनुमा जलवायु भी काम करने के लए े रत करती है, भारत क गम जलवायु उसक तुलना म काम करने के लए ब त अ नह है।

अ य अ याय म बड़े व तार और दलच तरीके से बताया गया क एक भारतीय छा को इं लड म कस तरह के कपड़े पहनना चा हए, उसे कस तरह के फन चर और टे शनरी क ज़ रत पड़े गी और उसे कस तरह का भोजन करना चा हए। हरेक सामान का दाम लखा आ था ( मसाल के लए सीप के मो तय से संबं धत सामान सफ आठ आने का था, ले कन एक मॉ नग कोट जो अ नवाय ही था, 20 पए का था)। गांधी क कताब के कई प े इस पर लखे गए ह क थोक-भाव म और कम क मत पर पौ क आहार कहां से ा त कर। जो लोग अं ेज़ म क तलाश म थे उ ह सहयोगपूवक कहा गया क ‘लंदन वे जटे रयन सोसाइट के लोग भारतीय के त ब त आ त यपूण रवैया रखते ह और द वे जटे रयन के संपादक से यादा भला इंसान खोजना भी मु कल होगा।’ उसम भी जो लोग यादा ढ़वाद और कम योगधम थे, उनसे कहा गया क इस धारणा के उलट क अं ेज़ साफ-सुथरा नह रहते-अ धकांश आधु नक घर म नानागार थे। ‘उसके अलावा भी वहां ऐसा कुछ भी नह है जो आपके शु ह जीवन को बा धत कर सके’। एक अ याय तो ‘भावी बै र टर ’ पर ही क त है। व भ इ स क वशेषता को एक जगह लखा गया है। वहां जाकर छा को कन- कन कताब को पढ़ना होगा ये भी लख दया गया है। साथ ही उनके कपड़े , डनर म उनक उप त और उसक फ स के बारे म भी लख दया गया। उ ह कहा गया क वे महीने म एक बार थएटर ज़ र जाएं ता क ये जान सक क ‘आधु नक इं लड के री त- रवाज़ और उसक आदत या ह’।44 वा तव म यह गांधी का मह वपूण लेखन था जो उनके जीवनकाल म अ का शत ही रह गया, ले कन उनके संक लत लेखन (कले टे ड व स) म उसके 55 प को शा मल कया

गया है। गांधी के कताब लखने के पीछे कई उ े य थे। एक तो कताब लख लेने के बाद बंबई म वे थोड़ा मश र हो जाते जहां वे अभी भी अपना वकालत का पेशा जमाना चाहते थे। वह कताब उनके लंदन जाने के पीछे का ीकरण भी दे ती–कम से कम उनके मोढ़ ब नया समुदाय को जसने उनके लंदन जाने का वरोध कया था। उ ह ने उस वरोध का उ लंघन कया और वहां गए, अब वे सर को भी वहां जाने को े रत कर रहे थे। जस सावधानी से वो कताब लखी गई थी और जस सहजता से उसक क सागोई आगे बढ़ती है, वह साफ दखाता है क वह युवा वक ल लेखन-कम को पसंद करता था और जमकर लखना चाहता था। ● सन 1894 के वसंत म, दादा अ ला और उसके र ते के भाई तैयब खान का मुकदमे का फैसला आया। यायाधीश ने गांधी के मुव कल के प म फैसला दया। अब तैयब खान को 37,000 पाउं ड क रकम खच के साथ अपने र ते के भाई को अदा करनी थी। उसे अब दवा लयापन और सामा जक अ- त ा का भय सताने लगा। गांधी ने एक समझौते का ताव दया क वह उस रकम को नई क त म अदा करे। मई के तीसरे स ताह म गांधी टो रया से डरबन रवाना ए। ऐसा लगता है क उनक वापसी क या ा अपे ाकृत कम तकलीफ भरी थी, य क गांधी ने उसका ज़ अपनी आ मकथा म नह कया है। (शायद इस बार उ ह ने खुद ही थम ेणी म या ा नह करने का फैसला कया था)। अब उनका मुकदमा कामयाब रहा था, उ ह ने भारत आने क तैयारी शु कर द । दादा अ ला ने गांधी के स मान म एक रा भोज का आयोजन कया जसम नटाल वधानसभा के सामने रखे एक वधेयक पर चचा ई। वो वधेयक अगर पा रत हो जाता तो भारतीय लोग वहां पर मतदाता नह बन सकते थे। अ ला के अ त थ चाहते थे क उस क़ानून का वरोध हो और अं ेज़ी बोलने वाले वक ल मोहनदास गांधी उस मामले म सहायता कर। वह वदाई भोज उस क़ानून का वरोध करनेवाली ‘एक कायस म त’ म बदल गया। उन ापा रय ने कहा क जब तक गांधी डरबन म रहगे, वे उ ह एक सालाना मेहनताना दगे। गांधी क आ मकथा म, डनर पाट से ाचार-कमेट म त द ल ई उस पाट पर लखा गया अ याय इस वा य से ख म होता हैः ‘इस तरह ई र ने द ण अ का म मेरे जीवन क न व रख द और रा ीय आ मस मान क लड़ाई के लए बीज बोया’।45 हालां क इस आ मकथा का लेखक ई र के तौर-तरीके से े रत कम और गोर के याकलाप से यादा खफा है। कुछ समय तक नटाल के भारतीय को ब त भेदभाव सहना पड़ा था। सन 1884 म उ ह ने वहां के रा यपाल से आ ह कया क वे उस क़ानून को हटा द जसके अनुसार

यूरोपीय लोग को छोड़कर हरेक को रात म चलते समय एक पास लेकर चलना होता था। ापा रय ने शकायत क क उ ह र ववार के दन अपने माल क ब नह करने द जाती है– जस दन उनके मु य खरीददार भारतीय मज़ र क छु होती थी। साथ ही उस दन उ ह शहर के क म कान नह खोलने दया जाता था। गांधी के आने से पहले वहां पर भारतीय ारा कये जानेवाले वरोध का नेतृ व हाजी मोह मद हाजी दादा नाम के एक ापारी करते थे। उनके नाम से ऐसा लगता था क वे अ सर म का क या ा करते थे। सन 1890 और 1891 म दादा ने कई बैठक बुला जसम नटाल क सरकार से अपने दे शवा सय के लए अ े सलूक क मांग क गई। दादा चाहते थे क भारतीय आ वा सय के संर क ( ोटे टर) को ह तानी और त मल का ान होना चा हए, ब क कसी ह तानी को ही यह पद मलना चा हए। उ ह ने ‘कुली’ श द के इ तेमाल पर रोक लगाने क मांग क और भारतीय को हो संप रखने क इजाज़त दे ने और अपनी सभा के लए डरबन म टाउनहॉल के इ तेमाल क मांग क ।46 माच 1893 म गांधी के बंबई छोड़ने से एक महीना पहले एच. एम. एच. वाडा नाम के एक ापारी ने कॉलो नय के लए से े टरी ऑफ टे ट को एक प लखा। वह प नटाल म भारतीय पर लगा ग पाबं दय के खलाफ वरोध- दशन के बारे म था। उसने मांग क क उनके साथ ‘महारानी क अ य जा के समान ही बराबरी का वहार कया जाए’। अपनी खीझ या गु से को दशाते ए वाडा ने पय के दो फाड़े ए नोट उस प के साथ संल न कर दए।47 नटाल म पहला चुनाव 1893 म आ। उसम भारतीय ने बढ़-चढ़ कर अपने मता धकार का योग कया, साथ ही सं या म यादा गोरे लोग ने भी ऐसा ही कया। उस चुनाव के बाद जॉन रॉ ब सन के नेतृ व म सरकार बनी, जो उस उप नवेश म एक ा पत प रवार से आते थे। उनके पता ने वहां के मुख अखबार मरकरी क शु आत क थी जसे अब उसका बेटा चला रहा था जसका वो मा लक था। रॉ ब सन ने दावा कया क ‘नटाल म भारतीय क उप त, सामा जक, वा ण य, व ीय, राजनी तक और वशेषकर, साफसफाई के आधार पर घातक है’।48 उसने वीकार कया क ‘उप-क टबंधीय इलाक म भारतीय गर म टया मज़ र क उप त आव यक है’ ले कन उसक राय म जन भारतीय ने लांटेशन के काम से कनारा कर लया है वे उप नवेशवा दय के लए एक खतरा ह। य क ‘जब इन ‘कंजूस’ और ‘अद य कु लय ’ क सेवा क अव ध ख म हो जाती है तो वे यह बस जाते ह, फर वे अवैध प से झु गी-झोप ड़य म रह लेते ह– जस हालत म एक अं ेज़ भुखमरी को ा त हो जाए’। स ज़ी उ पादक और कानदार के तौर पर भारतीय को वेश दे ने का मतलब है क ‘अं ेज़ के घर के प म नटाल क संभावना दन त दन धू मल होती जाएगी’। रॉ ब सन ने अब आ ान कया क ‘इस बेतरतीब ‘ए शयाई हमल ’ का मुंहतोड़ जवाब दया जाए’।49

रॉ ब सन के वचार का उसके साथी वधायक , उप नवेशवा दय और ेत नयं त ेस ने समथन कया। एक अखबार ने कहा, ‘उप नवेश क भलाई इसी म है क आनेवाली कई पी ढ़य तक सरकार का नयं ण खासतौर पर गोर के हाथ म रहे।’ सरे अखबार ने लखा, ‘शहर के नज़द क या शहर म एक स ज़ी उ पादक या व े ता के तौर पर तो ‘रामासामी भारतीय के लए यु एक अपमानजनक श द, क उप त ठ क है ले कन ले कन वह एक अ वा यकर उप व है और उसे नाग रक के तौर पर वीकार नह कया जा सकता’।50 नटाल म मत दे ने का अ धकार 21 साल से ऊपर के ऐसे लोग के पास था जनके पास 50 पाउं ड क अचल संप हो या कम से कम जो 10 पाउं ड सालाना कर दे ते थे। उस समय ऐसे भारतीय क सं या 200 से भी कम थी जो इन मापदं ड पर खरा उतरते थे। हालां क कुछ गोर को ये चता ज़ र थी क आ थक ग त के साथ-साथ भारतीय मतदाता क सं या हज़ार या कुछ समय के बाद द सय हज़ार तक प ंच सकती है। सन 1893 म नटाल के एक अ धकारी ने चेतावनी द क ‘भारतीय मूल के लोग हमारे बीच म गंभीर होते जा रहे ह। वे खरगोश क तरह फैल रहे ह और यूरोपीय लोग के लए व वंसकारी ह।’51 नटाल वधानसभा के सामने और फर दादा अ ला के आवास पर बहस के लए जो बल तुत था, उसके पीछे इसी तरह क भावनाएं और पूवा ह थे। भारतीय क उ मशीलता और अपनी बेहतरी के लए उनके सतत य न ने न लीय व ा और शासक के लए एक सम या पैदा कर द थी, जसे वे नटाल म लागू करना चाहते थे। ● मोहनदास के जीवन का पूव अनुभव ऐसा नह था क वो द ण अ का म न लभेद क ती ता के बारे म अंदाज़ लगा पाते। पोरबंदर और राजकोट म भले ही लोग जानते थे क अं ेज़ का शासन आ गया है, ले कन यादातर मामल म और जमीनी मामल म भारतीय क ही चलती थी। अं ेज़ क उप त बंबई म यादा दखती थी, ले कन यहां भी सामा जक और जनसं या क से शहर मूलतः भारतीय का था। लंदन, जहां गांधी छा के प म रहे थे, एक वराट वै क महानगर था जो सभी न ल और रा ीयता के लोग का घर था। खैर, वहां तो भारतीय इतने कम थे क शासक को वे या चुनौती दे ते! न तो उनके साथी शाकाहार-वाद और न ही क़ानून क पढ़ाई करनेवाले म ने कभी इरादतन गांधी से उनक वचा के रंग पर कोई सवाल कया था। लंदन म वे एक ेत के साथ एक ही घर म रह सकते थे ले कन यहां द ण अ का म गोर को े न के ड बे म भी साथ चलना गवारा न था। वहां के अखबार

खुलेआम भारतीय के त ेत क भावना का चार कर रहे थे। गांधी अपने ावसा यक काम से द ण अ का आए थे। ले कन अपने आगमन के कुछ ही महीन बाद उ ह न लभेद के भंवर म घसीट लया गया। जून 1894 म उनके ारा तैयार क गई एक या चका नटाल वधानसभा को भेजी गई। उसम ब त सारे टश लेखक को उ त कया गया ( जसम याय वद और राजनी तक स ांत के णेता हेनरी माइन का नाम भी शा मल था) ज ह ने इस बात को वीकार कया था क भारत म ब त पहले से ही वशासन क परंपरा मौजूद थी। ये परंपरा मैसूर म ाम-पंचायत तर से लेकर आधु नक वधा यका तक थी। गांधी ने तक दया क ए शयाई लोग को उनके अ धकार से वं चत करके, इस नए क़ानून से नटाल म न लभेद क भावना को बढ़ावा ही मलेगा। अगर ये क़ानून पा रत हो जाता है तो ‘यह टश और भारतीय रा के फूल को एकता क तरफ बढ़ने क बजाए पीछे धकेल दे गा जसके लए दोन रा यासरत ह’।52 नटाल के शासक ारा इस दावे को खा रज कर दया गया क भारतीय पंचायत त न या मक लोकतं का उदाहरण ह। इं लड म जो संसद य लोकतं आया था वो हज़ार साल के मक वकास का नतीजा था, जब क भारत क पंचायत इ तहास म ही ठठक कर रह गई थ । हद-से हद उनक तुलना ाचीन रोमन युग के ाम प रषद से क जा सकती थी। नटाल मरकरी ने लखा, ‘इस बात म र ी भर भी त य नह है जसे भारतीय ाथनाप ारा वधानसभा के स मुख रखा गया है क उ ह ेत उप नवेशवा दय के साथ बराबरी का अ धकार दया जाए’।53 सन 1894 के उ राध म गांधी, भारतीय क तरफ से ाथनाप तैयार करने म त थे ज ह ज द ही नटाल म मतदान के अ धकार से वं चत कया जानेवाला था। जो गुजराती ापारी-गण इसके लए खच वहन कर रहे थे और अ सर इस ाथनाप के पहले ह ता र-कता होते थे, वे अं ेज़ी का एक श द भी नह जानते थे। डरबन म ऐसा कोई भी भारतीय नही था जसे गांधी वधानसभा को भेजा जानेवाला अपना मसौदा दखा पाते। ले कन ऐसा लगता है क उ ह ने इसे एफ. ए. लाफ लन को ज़ र दखाया था जो कभीकभी दादा अ ला के मुकदमे के लए अदालत म उप त होता था और जसे गांधी ने दो त बना लया था।54 गांधी ने अपने नाम से नटाल के सभी वधायक के नाम ‘खुला प ’ लखा जसम ये कहा गया क ये भारतीय का क ठन प र म था जसने ‘द ण अ का के इस गाडन कॉलोनी’ का नमाण कया है। उस प म शोपेनहावर, माईन, बशप हेबर, मै स मूलर और सरे प मी व ान का उ रण दया गया ज ह ने भारतीय सं कृ त और यहां क बौ क परंपरा क तारीफ क थी। वधायक से नजी तौर पर पूछा गया क या ‘वाकई वो इस बात म यक न करते ह क कसी भी भारतीय टश नाग रक म इतनी यो यता नह है क वह उप नवेश का पूण नाग रक बन सके या मतदान म ह सा ले सके’।

भारत के पूव (और अपे ाकृत उदार) वॉयसराय और अब स े टरी ऑफ द टे ट फॉर कॉलोनीज़, लॉड रपन को भी 36 पैरा ाफ का एक प भेजा गया। वे अपने पद के हसाब से नटाल के मामल को दे खने के लए अ धकृत थे। वह एक लंबा प था, उसम जो आवेदन था वह उतना ही लंबा था जतना उस पर ह ता र करनेवाल क सं या थी। उस प पर आठ हज़ार लोग ने द तखत कए थे!55 उसम कहा गया क ‘यह क़ानून संपूण भारतीय रा का अपमान है य क अगर भारत के व श बेटे नटाल म ापार करने और बसने आते ह और उ ह मतदान का अ धकार नह मलता है तो उप नवेशवाद कोण से शायद वे इस वशेषा धकार के यो य ही नह ह’। नटाल के वधायक को भेजे अपने प म गांधी ने इस बात को रेखां कत कया क ‘एक अं ेज़ चुनाव े ने एक भारतीय को टश हाउस ऑफ कॉम स म भेजा था’। गांधी, दादाभाई नौरोजी क बात कर रहे थे ज ह ने जून 1892 म लबरल पाट क तरफ से उ री लंदन के फ सबरी से टश संसद के लए चुनाव जीता था। ये बात क एक भारतीय, इं लड म अब सांसद था, इसने नटाल म भारतीय का मनोबल ज र बढ़ाया होगा। साथ ही यह ेत लोग के लए एक चेतावनी थी जो अपने उप नवेश म उस तरह क कसी त को लागू नह होने दे ना चाहते थे। य क अगर भारतीय को मतदान का अ धकार मल जाता, तो फर उनको या उन जैसे कई भारतीय को वहां क वधानसभा म वेश करने म कतना समय लगता? गांधी ने दादाभाई नौरोजी से प ाचार शु कर दया था जो लॉड रपन के दल म थे और उसके संसद य सहयोगी थे। उ ह ने अपने प के साथ द ण अ क सरकार को भेजे ाथनाप क तयां संल न क और नौरोजी से आ ह कया क वे भारतीय के प म ह त ेप कर। उ ह ने कहा क ‘द ण अ का के ( ेत) राजनेता महज इस बात क अफवाह फैलाकर लोग का भयादोहन कर रहे ह क नटाल क सरकार यूरोपीय लोग के हाथ से नकलकर भारतीय के हाथ म चली जाएगी– जसक त नक भी संभावना नह है’। इस क़ानून के समथक नह चाहते थे क ‘भारतीय लोग ेत त न धय को चुन–कम से कम 2 या 3 त न धय को भी चुन सक–जो नटाल क संसद म उनके हत के लए आवाज़ उठाएं’। गांधी अभी प ीस साल के भी नह ए थे। इतनी कम उ म लंदन म पढ़ा वह गुजराती जसने द ण अ का म महज साल भर बताया था, वहां भारतीय का नेता बन गया था। उ ह ने नौरोजी को लखा, ‘जो ज़ मेवारी मुझे द गई है वह मेरी यो यता के हसाब से ब त यादा है।’ वे आगे लखते ह, ‘म अनुभवहीन ं और अभी नौजवान ही ं। इस लए इस बात क आशंका है क म गल तयां कर बैठं ू ।’ उ ह ने उस क ावर और बुजग पारसी नेता से ‘मागदशन क अपील क और कहा क उनक कोई भी सलाह वे उसी तरह हण करगे जैसे कोई बेटा अपने बाप क सलाह को लेता है’।56

जुलाई 1894 के सरे स ताह म मतदान सुधार बल पर नटाल क वधा यका म चचा ई। इस वधेयक को ज़बद त समथन हा सल था। उस अ ध नयम के मुता बक जो मु भर अ ेत मतदाता थे उ ह उनका पुराना अ धकार तो जारी रहता, ले कन भ व य म कोई भी गैर- ेत मतदान का अ धकार हा सल नह कर पाता। य क जैसा क नटाल सरकार के मं ी ने कहा क अगर 8,889 भारतीय ने ज ह ने ाथनाप पर द तखत कए ह, सबको मता धकार मल जाता है तो वे मतदाता क सं या के करीब आधे हो जाएंगे। यूरोपीय कोण से ‘अगर भारतीय मत सं या और ताकत म बढ़ता है’ तो ‘एक बड़े न लीय असंतोष क भावना अ नवाय प से सामने आ जाएगी’ य क गैर- ेत नाटा लयन यादा राजनी तक और शास नक श हा सल करना चाहते ह।57 अपने मं य के वचार को नटाल के गवनर ने लंदन म कॉलो नय के लए से े टरी ऑफ टे ट को सू चत कर दया। लॉड रपन को कहा गया क अगर ए शयाई लोग को मतदान से नह वं चत कया गया तो वे ज द ही नटाल क राजनी त म ‘वच व ा पत’ कर लगे। रपन को आगे कहा गया क जहां एक तरफ ेत लोग म इस बाबत ‘वैचा रक मतै य’ था, ‘वह सरी तरफ शायद नटाल म दजन भर भी ए शयाई नह ह गे ज ह ने इस वधेयक का वरोध कया है। उस आंदोलन का नेता एक युवा पारसी वक ल है जो यहां कुछ ही महीने पहले आया है। अगर वह यहां नह आया होता तो सारा मसला आराम से हल हो गया होता, कसी ने वरोध नह कया होता।’ इस तरह से गवनर ने से े टरी ऑफ टे ट से आ ह कया क वे इस वधेयक पर ह ता र करने के लए महारानी को सलाह द। 58

इसके जवाब म लॉड रपन ने नटाल क सरकार को इस वधेयक को थोड़ा मुलायम बनाने के लए कहा। जैसा क वधेयक के मसौदे म लखा गया था, उसके मुता बक ‘सारे ए शयाई लोग को सफ न ल के आधार पर मता धकार से वं चत करने क बात कही गई थी’, रपन के मुता बक ‘ये बात भारत म असंतोष पैदा कर सकती थी जहां रा ीय आंदोलन के पहले चरण क आहट सुनाई दे रही थी’। साथ ही इससे इं लड म भी असंतोष फैलता जहां अ ेत को भी मत दे ने का अ धकार था (अगर वे संप वषयक मापदं ड पूरा करते ह ) और जैसा क नौरोजी के मामले म दे खा गया वे संसद के सद य भी हो सकते थे। रपन ने ट पणी क क ‘बड़ी बात ये है क न ल के आधार पर तबंध को इतने खुले प म न लखा जाए’। या नटाल क सरकार कोई वैक पक समाधान नह सोच सकती थी? मसाल के तौर पर उ संप क यो यता या यादा समय तक नवास करने क अ नवायता आ द..?’ नटाल क सरकार ने अपने मं य से म रा कया जो वधेयक को मूल प म ही रखने को लेकर अड़े ए थे। साफतौर पर यूरोपीय लोग क ‘इस बात पर भावना इतनी मज़बूत थी क उनक बात न मानने पर नटाल म कोई भी सरकार एक स ताह भी नह चल पाती

अगर वो भारतीय और ए शयाई आ वा सय के मता धकार पर तबंध क बात न करती’। अगर महारानी इस वधेयक पर ह ता र करके उसे क़ानून का प नह दे त , तो उप नवेशवा दय ने कहा क वे ‘तब तक इसे पा रत कर महारानी को भेजते रहगे जब तक क वे इस पर राज़ी न ह जाएं’।59 ● नए क़ानून के खलाफ संघष ने नटाल इं डयन कां ेस को ज म दया जसक ापना डरबन और आसपास रहनेवाले ापा रय के एक समूह ने सन 1894 म क थी। उस कां ेस का अ य अ ला हाजी आदम को बनाया गया जो दादा अ ला क फम म मैनेजर थे और उसम बाईस उपा य बनाए गए। उसम ब सं या गुजराती बोलनेवाले मुसलमान क थी ले कन उसम कुछ त मल भाषी ह भी थे। एक उपा य पारसी ापारी तमजी भी थे। गांधी को स चव बनाया गया। संगठन ने सात उ े य तय कए जसम नटाल म भारतीय क मु कल को र करना, भारतीय सा ह य को ो साहन दे ना और ‘भारतीय और उप नवेश म रहनेवाले यूरोपीय लोग के बीच सहयोग और भाईचारे क भावना को बढ़ावा दे ना’ था।60 नटाल कां ेस ने इं डयन नेशनल कां ेस से अपना नाम हण कया था जसके काम के बारे म गांधी ने दादाभाई नौरोजी और उनके सहयो गय से सुना था। उसी पुराने (और बड़े ) संगठन क तरह इसने भारतीय के लए ापक अ धकार क मांग क । ऐसा उसने आंदोलन या कारवाइय ारा नह ब क आवेदन और ाथनाप के मा यम से ही करने का फैसला कया। दोन ने ही सा ा यवाद शासन का वरोध नह कया, ब क उ ह ने उ मीद क क शासन उन लोग के त यादा संवेदनशील बने जो गैर- ेत टश जा ह। इस नई कां ेस क ापना म मदद करने म गांधी न य ही अपने उन अनुभव से े रत ए थे जो उ ह लंदन म वे जटे रयन सोसाइट क बैठक म हा सल ए थे। उ ह ने सोचा क एक ऐसा संगठन जसक नय मत बैठक ह , जो चंदा इक ा करे और अपनी कायवा हय का योरा रखे, जो सतक अ भयान के तहत अपने सद य क सं या म बढ़ो री करे–उसका उन नजी प से न य ही यादा मह व होगा जो कभी-कभार लोग को भेजे जाते थे। अपनी ापना के तुरंत बाद नटाल इं डयन कां ेस क एक त वीर ली गई थी, जो वाकई काफ कुछ कहती है। उस त वीर म छह लोग बैठे ए ह: लंबे लबादे म दाढ़ वाले, हाथ म छाता या छड़ी लए ए और पगड़ी पहने ए–ये सारे के सारे साफतौर पर गुजराती मुसलमान लगते ह। उसम सात खड़े ह: तीन क दा ढ़यां ह जब क सर क सफ

मूंछ ह। इस सरे समूह म गांधी ह–जो इं लश सूट पहने ए ह, ले कन सर पर एक भारतीय टोपी है। पहली पं म बैठे ापारी पैसे क व ा करते थे जब क पीछे खड़ा बै र टर संगठन के काम करता था। सतंबर 1894 म नटाल बार के लए गांधी का आवेदन वचार के लए पेश आ। उ ह ने अपने स ट फकेट क तयां पेश क , चूं क मूल त बंबई हाईकोट म थ । नटाल बार एसो शएशन ने न ल के आधार पर उनक उ मीदवारी को रोकने का यास कया। संयोग से नटाल के सु ीम कोट पर उसका कोई असर नह पड़ा और गांधी को वकालत का लाइसस दे दया गया। जब वह शपथ लेने के लए अदालत गए, तो मु य यायाधीश ने उनसे उनक पगड़ी हटाने को कहा। गांधी ने वैसा ही कया। जब दादा अ ला ने गांधी से शकायत क क उ ह ने अपना स ांत याग दया है तो गांधी ने कहा क ‘उ ह ने बड़ी लड़ाई लड़ने के लए अपनी ताकत को सहेजने का काम कया है’।61 मता धकार के ववाद ने गांधी को नटाल म एक सावज नक ह ती बना दया। डरबन के एक अखबार ने लखा क ‘वह अपने दे शवा सय पर एक व श भाव रखते ह’।62 टार ऑफ जोहांसबग ने गांधी के मधुर अंदाज़ और उनक ‘ व श कायशैली’ क तारीफ क । उस अखबार ने आगे लखा, ‘उनके लेखन ने उस यो यता का प रचय दया जो ब त सारे आ ममु ध भ पु ष को आ यच कत कर दे गा जो ये व ास करते ह क उ यो यता रखने के लए ेत वचा ही काफ है और यह यो यता कसी अ ेत म हो ही नह सकती।’ हालां क फर भी उस अखबार ने गांधी को यही सलाह द क उ ह भारतीय के मता धकार के मामले को आगे नह बढ़ाना चा हए। य क इस बात पर संदेह है क इस महादे श के ेत, गैर- ेत ारा चलाए जानेवाले कसी ज़ मेवार सरकार को वीकार कर पाएंगे। अखबार के मुता बक, ‘असंभव को हा सल करने’ क बज़ाए यानी समान राजनी तक अ धकार हा सल करने के बजाय गांधी को अ का भर म भारतीय के लए ‘ यायपूण और मानवीय वहार’ क मांग करनी चा हए।63 हालां क ेत समुदाय के अ य लोग गांधी के कटु आलोचक थे। वे उन पर ‘वक ल जैसा आचरण’ करने का आरोप मढ़ रहे थे जो भारतीय जीवन के सफ ‘एक छोटे ’ से प को उजागर कर रहे थे–ब न बत उसके ‘दयनीय’ प के। जहां गांधी ने भारत के व श लोग के ‘च र और उनक उपल य पर यान क त’ कया था, यहां उस लेख म दावा कया गया क द ण अ का म औसत भारतीय ‘पाश वक आदत का उ पाद है और बेईमानी और धोखाधड़ी का काम करता है’।64 एक अखबार ने तो उस वक ल के ाथनाप को दो छोटे ले कन तीखे पैरा ाफ म खा रज ही कर दया: यह बात ववादा द है क म टर गांधी ने अपने आंदोलन से भारतीय समुदाय का कतना भला कया है। उनका मामला कसी मु े को ज़ रत से यादा सा बत करने जैसा है। जब नया के सारे गुण भले ह के ही पास

ह , तो उन बात को जानने वाला सफ उस पर मु कुरा ही सकता है।...जहां तक व ता से संबं धत ह म टर गांधी अपनी दलील से हम राज़ी नह कर सकते, हमने अपनी आंख और नाक से खुद ही इस बारे म पया त अनुभ व कया है। जहां तक मता धकार का सवाल है, ाम पंच ायत क बात के बावजूद वो मता धकार उ ह अपने दे श म ही नह मल पाया है जहां पर सरकार पूरी तरह से नरंकुश है और कसी भी अ ेत वाद ने अपनी अ तरं जत क पना म इस बात क मांग नह क है क वह कसी अ य चीज़ के लए उपयु है। एक दे श और उसके सं वधान जसके बारे म वो कुछ नह जानते वहां वे मता धकार का दावा कर रहे ह–यह अ खड़पन का उदाहरण है। ले कन फर भी अगर म टर गांधी को लगता है क नटाल म भारतीय के साथ अ याय हो रहा है और उ ह सताया जा रहा है तो वे एक मामूली ले कन सा काम कर सकते ह। उ ह अपने दे शवा सय को इस बात के लए राज़ी करना चा हए क वे इस अभागे दे श म न आएं और फर हरेक स ा नाटा लयन उनक मांग का समथन करेगा।65

गांधी पर ए अ य हमले और भी तीखे थे। टाइ स ऑफ नटाल ने एक संपादक य लखा जसम भारतीय दावे को पूरी तरह खा रज कर दया गया। इसके जवाब म गांधी ने लखा क संपादक य का शीषक ‘रै मीसे मी’ अपने आप म ‘गरीब भारतीय का अपमान करने के लए एक सु च तत मान सकता’ को दशाता है। उ ह ने अखबार पर आरोप लगाया क वो वचा के रंग के आधार पर लोग का आकलन कर रहा है– ‘जब तक वचा का रंग ेत है, आपके लए इस बात का कोई मतलब नह है क इसके नीचे ज़हर छु पा है या अमृत’। गांधी ने आगे कहा, ‘ वघो षत ईसाइय का यह रवैया खुद ईसा मसीह के स ांत से मेल नह खाता’। अपने धम के सं ापक (ईसा मसीह) के स ांत को धोखा दे ने का आरोप टाइ स ऑफ नटाल के लए बदा त से यादा था। अखबार ने सफाई क ‘रै मीसै मी’ कहना कोई न लभेद ट पणी नह है, उसने अ सर मक वग के अं ेज़ के लए ‘होज’ श द का इ तेमाल कया है। जहां तक आलोचना क बात थी तोम टर गांधी हमारे कसी भी तक का ठ क से जवाब नह दे त े। उ ह ने हमारी बात का गलत मतलब नकाला है। बना कसी ज़ मेवारी के वह ईसाईयत क आलोचना करते ह और जहां तक उनक मता है वे आ ामक होते ह। हालां क उनका ल य साफ है और वो है अपने आपको अपने दे शवा सय क नगाह म नेत ा बनाना। अगर उन महानुभ ाव को उसी लहजे म अपना चार करने के लए हमसे बात करनी है, तो बेहतर है क वे हमारे व ापन वभाग से बात कर। इससे उनका समय बचेगा।66

गांधी एक ावसा यक झगड़े को सुलझाने के लए द ण अ का आए थे। ले कन बना कसी उ मीद और आकां ा के वह यहां एक राजनी तक मकसद के लए आंदोलनकारी बन गए। अब उस उप नवेश म ब त सारे भारतीय और यूरोपीय लोग उ ह जानने लगे। उ ह ने इस सावज नक लोक यता और सावज नक अनादर का कैसे जवाब दया? इन बात पर उनक आ मकथा मौन है। ले कन यह साफ है क जब-जब ेस म उनका नाम उछला, उ ह ने उसका जवाब दया। अहमदाबाद के अ भलेखागार क एक ट ल क अलमारी म सन 1890 के दशक के नटाल के ब त सारे अखबार क कतरन ह, नःसंदेह उसका सं ह गांधी ने खुद कया था।

● अ ू बर 1894 म मोहनदास गांधी 25 साल के हो गए। उनसे पहले कसी गांधी ने भारत से बाहर क या ा नह क थी। ब क ब त कम ने का ठयावाड़ से बाहर भी कदम रखा था। सन 1886 म अगर उनके पता करमचंद गांधी क मृ यु नह ई होती, तो हो सकता है क मोहनदास का ठयावाड़ ाय प से बाहर भी न आए होते। कूल क पढ़ाई के तुरंत बाद वह अपने भाई ल मीदास के पद च पर ही ाय प के कसी रजवाड़े म कोई छोट -मोट नौकरी कर रहे होते। ले कन वह लंदन चले गए जहां उनक मुलाकात जो शया ओ फ , हेनरी सा ट, वे जटे रयन सोसाइट के लोग और थयोसो फ ट से ई। उसके बाद वह वेदश लौटे तो उनक मुलाकात जैन व ान रायचंदभाई से ई जनसे वह काफ भा वत ए। पोरबंदर के महल म चोरी क घटना ने उ ह द ण अ का जाने पर मजबूर कर दया जहां उनक आ या मक और राजनी तक श ा ए. ड यू. बेकर और दादा अ ला के साथ जारी रही। गांधी अगर का ठयावाड़ म ही रहते तो वे कभी भी इन लोग से दो ती नह कर पाते जो एक प रवतनकारी या के आव यक त बन गए चाहे वो धम के े म ढ़वा दता से उदारवाद क तरफ मुड़े ह , पेशेवर जीवन म वकालत से ए ट व म (आंदोलन) क तरफ मुड़े ह या फर दे श के भीतर एक ढ़वाद भारतीय शहर (राजकोट) से वह एक तर क और व तार करते द ण अ क बंदरगाह शहर (डरबन) आ गए ह । सन 1888 म जब गांधी बंबई का समु तट छोड़ रहे थे तो उस समय वह एक छोटे से शहर के ब नया युवक थे जो अपनी जा त क आदत , पूवा ह और तौर-तरीक से बंधा आ था। ले कन उसके छह साल बाद गांधी एक ऐसे ह बन गए थे जसने नटाल म हर जगह राजनी तक अ भयान का संगठन करते ए ईसाइय से दो ती क थी और मुसलमान के लए काम कया था।

4 डरबन म वकालत

लंदन म श त वक ल मोहनदास डरबन म इकलौते श स थे जो न ल के बीच क री को पाटने क को शश कर रहे थे। वहां पर वह अपने प रवार से र थे और हमेशा डायरी लखा करते थे। उनक डायरी हम बताती है क वे कैसे अपना समय बताते थे और उसका कस तरह से स पयोग करते थे। स ताह भर अपने भारतीय मुव कल के लए वह ठे के और साझेदा रय के सहम तप का मसौदा तैयार करते और उनके अ धकार क आवाज़ उठाते रहते। वहां एक वक ल वधायक हैरी इ कॉ ब भी था जससे उनक जान-पहचान थी। इ कॉ ब ने ‘उनके मता धकार क यायपूण मांग’ को तो वीकार कया ले कन उसने कहा क ‘वह कुछ मदद नह कर सकता’। हां इतना उसने कया क संवेदना और अनुकंपा दखलाते ए उसने नटाल बार म गांधी को वेश दलाने म मदद क । गांधी ने वहां एक आ यूज़ दं प से भी दो ती क जनक आ ा मेथो ड ट मत म थी और वे ‘ब त दयालु भ पु ष’ थे। उनक शाद एक ‘ब त ही दयालु म हला’ से ई थी। वह दो ती कायम रही और तब तक कायम रही जब तक क उस ह मेहमान ने (गांधी ने) अपने म ज़बान को अपने वचार क गंभीरता से सशं कत नह कर दया। 16 सतंबर 1894 को लखी डायरी कुछ यूं कहानी कहती है: आ यूज़ दं प से उनके घर पर मला। ीमती ए. को मेरा शाकाहारवाद या बु म पर बात करना अ ा नह लगता। उ ह ये भय है क कह उनके ब े मेरी बात से भा वत न हो जाएं। उ ह ने मेरे उ े य को लेकर सवालजवाब कए। मने कहा क अगर मेरा इरादा सही नह है और म स य क खोज म नह लगा ं तो मुझे उनके घर नह जाना चा हए। मने उनसे कहा क ये मेरे बूत े से बाहर क बात है क म उ ह यक न दलाऊं क मेरा इरादा सही है और मेरी कोई इ ा नह है क म अपने आपको उन पर एक म के प म थोपूं। मने उनसे ये भी कहा क म उनके घर एक जासूस के प म नह आता क म उनके ब का धम-प रवतन करवा ं गा।1

गांधी ने ईसा क तुलना बु से क थी, इसने ीमती आ यू को नाराज़ कर दया। उस पर गांधी का शाकाहारवाद और भी बड़ी सम या थी। मेज़बान के युवा बेटे ने गांधी को मांस का टु कड़ा न उठाकर सेब का टु कड़ा उठाते दे ख उनसे उसका कारण पूछा था। उस पर उस भारतीय वक ल ने हेनरी सा ट से सीखा आ वो नै तकता वाला तक उसके सामने ब रख दया। सरे दन उस लड़के ने अपनी मां से मांस न दे ने का आ ह कया। उसक मां इस बात से मुतमईन थी (सभी अ े ईसाइय क तरह) क मांस खाने से ब े मज़बूत

होते ह और उसने गांधी से कहा क आगे से वे सफ उसके प त से बात कर। गांधी ने कहा क अगर ऐसी बात है तो बेहतर है क वे आगे से उनके घर ही नह आएंगे।2 अदालत म और उससे बाहर भी गांधी ऐसे यूरोपीय लोग से मल रहे थे जो ईसाई भी थे। वे अपने-अपने धम के बारे म बात करते थे। गांधी ने ऐसे ही अपने एक म से कहा क वे चच क सेवा म ह सा लेना चाहते ह। उस दो त ने उनके आ ह को पादरी तक प ंचा दया। गांधी को ेत ालु के साथ बैठने दे ना असंभव था तो ऐसे म पादरी क प नी ने सहानुभू त और एक व क भावना का दशन करते ए उ ह चच क दहलीज़ म अपनी सीट बैठने को दे द , जहां से उ ह ने उपासना क कायवा हय को सुना।3 गांधी का धा मक ब लतावाद समय से थोड़ा पहले ही प रप व हो गया था। 19व सद के आ खरी भाग म जहां एक तरफ बु जी वय म ना तकता का भाव तेज़ी से फैल रहा था तो सरी तरफ ईसाई मशन ारा आ ामक धमप रवतन का काम भी ज़ोर-शोर से शु आ। यहां तक क जस समय गांधी डरबन म ईसाइय से मल रहे थे तो उनके का ठयावाड़ी भाई दयानंद सर वती उ र भारत क या ा कर ह को ईसाइय के लोभन से र रहने क चेतावनी दे रहे थे।4 अपनी मां क तरह ही बना कसी क रता के गांधी अपने धम को लेकर ब त तब थे। पुतलीबाई के पंथ के सं ापक ाणनाथ, कुरान को उ त करते थे, खुद पुतलीबाई भी जैन साधु क संगत म रहती थ । खुले मन से मोहनदास अपनी मां के पद च पर चल रहे थे, ले कन चूं क वे एक ी थ और बाहर क या ा क आज़ाद से वं चत थ , मोहनदास अब उस सावभौ मकता को गहरे प से आगे बढ़ा रहे थे। वे व भ मतावलं बय से मुलाकात करते थे और व भ धम क पु तक पढ़ते थे। द ण अ का के अपने शु आती साल म उ ह ने उदार और एक हद तक ना तक ईसाइय ारा लखी दो कताब पढ़ , ज ह ने उन पर काफ भाव डाला। उसम से एक कताब थी अ ा क सफोड और एडवड मेटलड ारा लखी द परफे ट वे। क सफोड पहली अं ेज़ म हला थ ज ह ने मे डकल क ड ी हा सल क थी। पे रस म अ ययन करते समय उसने अपने श क को इस बात के लए राज़ी कया था क कसी एक भी जानवर को काटे बना वह डॉ टरी क पढ़ाई उ ीण कर लगी। वतन वापसी के बाद वह वे जटे रयन सोसाइट के काम म स य हो ग । मेटलड एक धा मक असंतु और एक पादरी का बेटा था। उसका श ण ईसाई धम क परंपरा के मुता बक आ था, ले कन बाद म वह थयोसो फ ट बन गया। क सफोड क सरी कताब म एक कताब थी द परफे ट वे इन डाईट, जसम तक दया गया क मनु य के चेहरे और जबड़े का आकार, उसके पेट क बनावट और काय णाली यह दशाती है क मानव को कृ त ने शाकाहारी और फलाहारी बनाया है न क मांसाहारी। क सफोड ने लखा क ह समाज, जहां ‘शु शाकाहारी भोजन प व ता

का पहला आव यक ह सा माना जाता है’, सबसे पहला स य समाज है जसका ‘अपना एक धा मक व ास और आचार-सं हता है, एक सा ह य है और एक धा मक व ा है जसे ब त से लेखक म क स यता से भी पुराना मानते ह’। उस शाकाहारी डॉ टर क राय म मांसाहार क वृ ब त सारी बीमा रय और वकृ तय को ज म दे ती है। ट बी, ग ठया और मग अ य धक मांसाहार क वजह से होते ह। उसने लखा, ‘ वकास के अपने उ चरण म मानव शकारी नह रह गया, वह कृषक बन गया था। खेती या वा नक क भावना का शकार क भावना के साथ कोई तालमेल नह है और मानव जीवन के वकास का स दय ये है क वह ह या या ताड़ना क भावना को अपने भीतर से ख म करे’।5 सन 1886 म क सफोड क मृ यु के बाद मेटलड ने उसक याद और वचार के त अपने आपको सम पत कर दया। सन 1891 म उसने ‘गूढ़ ईसाई संघ’(इसोटे रक चयन यू नयन) नाम क सं ा का गठन कया जसने लोग से आ ह कया क वे अपने आंत रक मनोभाव के हसाब से खुद क समी ा कर, न क कसी पंथ या धमा धकारी के कहने पर। उसका वह तरीका सावभौ मकता से े रत था। द परफे ट वे, जसका उपशीषक था ‘ऑर द फाइं डग ऑफ ाइ ट’ म ह , बौ ो, सू फय और यूनानी वचार क शंसा क गई। आ धका रक ा या और चच के ( वघो षत) अ धका रय क आलोचना करते ए उसम इस बात पर ज़ोर दया गया क आ मा के इस वराट नाटक म सफ दो लोग शा मल ह, ‘एक है और सरा ई र’।6 क सफोड-मेटलड के ईसाइयत संबंधी वचार ने गांधी को आक षत कया य क इसने कसी खास तारणहार का गुणगान नह कया था, ब क को अपने ववेक के त न ावान रहने क बात कही थी। ये बात क कताब का मूल लेखक एक शाकाहारी था और कताब म पूवज के मत के बारे म अ बात कह गई थ , उसने उस कताब के आकषण को और भी बढ़ा दया। सरी कताब जसने उ ह आक षत कया वो थी लयो टॉल टॉय क कताब द कगडम ऑफ गॉड इज़ व दन यू(1893)। उस कताब म भी उसी तरह से कसी बशप या चच के बजाए के हाथ म ही मु का सू होने क बात कही गई है और उसम भी याग और सादा जीवन पर ज़ोर दया गया है। सन 1880 के दशक से ही टॉल टॉय ने कथा से अपना मुंह मोड़ लया था और अब वे पच और धा मक कताब के मा यम से अ भ करना चाहते थे। उनके झान म प रवतन उसक जीवनशैली पर भी दखने लगा- जहां एक ज़म दार अपने हाथ से काम करने लगा, एक यु ो माद शां तवाद बन गया और सी ऑथ डॉ स चच का एक ज़माने का अ तधा मक सद य अब सरे धम क तरफ झान रखने लगा।7 गांधी उनके उप यासकार प से यादा उनके नै तकतावाद प से भा वत ए। ऐसा नह लगता क उ ह ने अ ा कैरे नना या वार एंड पीस पढ़ होगी ले कन उ ह ने द कगडम ऑफ गॉड इज़

व दन यू ज़ र कई बार पढ़ । यह एक घुमावदार और दोहराव से भरी पु तक है जसका एक क य और श शाली संदेश है क एक अ े ईसाई को ज़ार , बशप और जनरल क बात मानने क बजाए अपने ववेक क आवाज़ सुननी चा हए। कताब का नाम उस ट पणी से लया गया है जो कभी खुद ईसा मसीह ने क थी जब उनसे पूछा गया था क जब ई र का रा य आ जाएगा तो कोई उसक पहचान कैसे करेगा? तो ईसा का जवाब था क ई र का रा य बाहर और नह है, ब क इंसान के खुद के भीतर है। टॉल टॉय ने ईसा मसीह क श ा और ा पत चच व ा के कायकलाप म वरोधाभास को दशाया। जहां एक तरफ ईसा मसीह हसा क नदा करते थे, वह चच यु और मृ युदंड को ो सा हत करता था। ईसा क बात का सार सरमन ऑन द माउं ट म मलता है जसम गरीब, बल, स र और शां त य लोग क शंसा क गई है, जसम कहा गया है क ‘तुम ह या नह करोगे’ और लोग से आ ह कया गया है क वो अपने श ु से भी यार करगे और उनके लए आ मांगगे। सरी तरफ बशप ने नाइसीन ड (ए शया माइनर के ाचीन शहर नाई सया के नाम पर चले पंथ) का अनुपालन करना शु कर दया जसने ईसा को नणयकारी और चच को अप रहाय और इसके सद य से पूण आ ाका रता क मांग क । टॉल टॉय के पास चच या धम नरपे बु जी वय के लए समय नह था जो हसा क तारीफ करते थे। उ ह ने ए मल ज़ोला को उ त कया जो ‘यूरोप का सबसे लोक य उप यासकार था’। उसने लखा, ‘ सफ एक सश रा ही श शाली और महान हो सकता है’, ‘एक यु ो मत रा ही मज़बूत हो सकता है और फलफूल सकता है,’ पूरे ‘ व म नःश ीकरण क भावना नौ तक गरावट को ज म दे गी और सामा य अयो यता को बढ़ावा दे गी जो मानवता क ग त को रोक दे गा’। सरी तरफ टॉ सटॉय ने ववेक पु ष को सलाम कया जो ‘अपने मानवीय ग रमा क र ा क बात करता है, अ े का आदर करता है और सबसे बड़ी बात क वह इस बात के त न त रहता है क वह ई र का काम कर रहा है’। अपनी कताब के अंत म टॉल टॉय ने स ाधारी वग के दय-प रवतन, जबरन कर न वसूलनेवाले और दया कर कै दय को छोड़ दे ने वाले ववेकवान अ धका रय और उन अमीर म उ मीद क करण दे खी ज ह ने गरीब के लए अ ताल, कूल और घर बनवाया। ले कन असली मु तभी आएगी ‘जब हरेक अपनी मता के अनुसार स य का संधान करेगा या उस बात को वीकार करेगा जसे उसने महसूस कया हो या जसका वह अपने जीवन म पालन करता हो और जानता हो’।8 कई साल के बाद गांधी ने इस बात को याद करते ए लखा क जब उ ह ने पहलेपहल द कगडम ऑफ द गॉड इज़ व दन यू पढ़ तो वह इस कताब क ‘ वतं सोच, नै तकता और स यता’ से काफ ‘अ भभूत’ ए।9 टॉल टॉय क कताब ने उनके खुद

के उदार चतन, चच या यन या ह जैसे कसी धम से इतर भी अपने लए खुद से एक आ या मक राह ं ढ़ने क उनक ज़द को प रल त कया। इस बीच गांधी भी गीता का पुनपाठ कर रहे थे जसे उ ह ने एक धमयु के प म कम ब क नै तक आचरण, ेम व नफरत और सांसा रकता और न ृहता म सामान भाव अपनाने क श ा दे नेवाली पु तक के प म दे खा।10 ● नवंबर 1894 म मोहनदास गांधी ने नटाल के अखबार म एक व ापन दया जसम उ ह ने कहा क वह ‘इसोटो रक यन यू नयन (गूढ़ ईसाई संघ)’ और ‘लंदन वे जटे रयन सोसाइट ’ के एजट ह जसके सा ह य का उनके पास सं ह है और जसक वे ब करते ह। उस व ापन को पढ़कर एक पाठक ने ट पणी क ः ‘हम कस समय इस नया म आते ह? हम या ह और हम कधर को जाएंगे?’ यह इनो के ू ट सा ट का व ापन नह है। ये ऐसे तीन सव सवाल ह जो, हम बताया गया है क, मानवता ने अपने आपसे पूछ ा है। और जसके बारे म म टर गांधी हम आ त करते ह क ये अपना पूण और संत ु दायक जवाब उन दो छोटे -छोटे दाश नक काय म पाते ह जसके बारे म वह दलच ी रखते ह।11

आ यूज जैसे पुरातनपंथी ईसाइय से मलते ए और क सफोड और टॉ सटॉय जैसे उदार ईसाइय को पढ़ कर गांधी उनके वचार क तरफ उ सा हत ए, ले कन उसने उनके मन म उलझन भी पैदा क । सन 1894 क ग मय के आ खर म कसी समय उ ह ने भारत म अपने म और ेरणापु ष रायचंदभाई को कई प लखे जसम उ ह ने अपने म का ज़ कया। उ ह ने उनके सामने दो दजन सवाल रखे जसम अ य बात के अलावा उ ह ने आ मा के काय, ई र का अ त व, वेद क पुरातनता, ईसा मसीह क दै वीयता और जानवर के साथ कए जानेवाले वहार पर उनसे कए। गांधी के इन तमाम सवाल का रायचंदभाई ने धैयपूवक और लंबा जवाब दया। उ ह ने कहा, ‘आ या मक धैय आ म ान का सार है। गु सा, अहंकार, छल और लालच इसके वरोधी ह। ई र एक भौ तक प नह है, ‘आ मा के बाहर उसका कोई घर नह है’। ई र न त प से इस ांड का नमाता नह है। कृ त के सारे त व जैसे परमाणु, आकाश आ द शा त ह और अ न मत ह। वे अपने अलावा कसी अ य चीज़ से न मत नह हो सकते।’ रायचंदभाई इस बात म भी व ास रखते थे क ‘हम भौ तक व तु का हज़ार तरह से संयोग या उसका उलटा बना सकते ह, ले कन चेतना का नमाण करना असंभव है।’ उस जैन व ान ने ह क रपं थय के उन दाव को मानने से इ कार कर दया क नया के सारे धम वेद से नकले ह। हालां क वे इस बात को मानते थे क वे ंथ ब त

पुराने थे और बौ व जैन ंथ से भी पुराने थे। ले कन ‘इस बात म कोई तक नह था क जो कुछ पुराना है वह सही है जो नया है वह सही और वा त वक नह है।’ वेद क तरह ही बाईबल भी ये दावा नह कर सकता है क उसी के पास वा त वक और एकमा स य है। उनका कहना था, ‘ला णक प से ये सही है क जीसस को ई र का पु माना जा सकता है ले कन ता कक प से ऐसी सोच असंभव है।’ नटाल म अपने अनुभव से े रत होकर गांधी ने एक सवाल कया थाः ‘ या नया म इस वषमतामूलक व ा से परे कभी कोई समतामूलक व ा पैदा हो सकती है?’ इस पर उस जैन व ान का जवाब सुधारवाद और गैर-का प नक था। उनका कहना था, ‘ये बात ाथ मकता वाली होनी चा हए क हम समाज म समता लाने का यास कर और जीवन के अनै तक और अ यायपूण रा ते का प र याग कर। ले कन साथ ही ‘ये बात असंभव है नया के सारे जी वत ाणी एक ही दन वषमता का प र याग कर दगे और हर जगह समानता ा पत हो जाएगी।’ रायचंद भाई ने कहा क ‘बेहतर होगा’ क वे दोन इस मु े पर मल और ‘इस पर व तृत चचा कर’। चूं क वे दोन अलग-अलग दे श म थे—एक भारत म और एक द ण अ का म—तो ऐसे म उ ह ने गांधी को सलाह द क वे वहां रहकर एक ‘ नरपे भाव वक सत कर और अगर उ ह उसम कोई संदेह हो तो वे उ ह फर से प लखने के लए वतं ह। यह नरपे मनः त ही है जो संयम के लए श और ढ़ता दान करती है और आ खरकार आ मा को नवाण के माग पर अ सर करती है’।12 इस तरह गांधी क आ या मक खोज जारी रही। सन 1895 म उ ह ने नटाल के ऊंचे इलाक म एक े प ट मठ (सं या सय का एक ऐसा पंथ जो सादगी और अपने मौन के लए जाने जाते ह) का दौरा कया और उ ह ने अपने दौरे के बारे म द वे जटे रयन म लखा। उसम उ ह ने लखा, ‘वहां के सं यासी मांस, मछली या कसी प ी का मांस नह खाते ह, हालां क स टर के लए कुछ छू ट द गई है ज ह स ताह म चार दन मांसाहार क इजाज़त है य क ऐसा माना गया है क वे पु ष क तुलना म यादा नाजक होती ह’। उस मठ म हमेशा कुछ न कुछ काम-काज क खटर-पटर होती रहती थी और वहां के लोग जूते, मेज़ और रसोई के काम आनेवाली चीज़ बनाया करते थे। ले कन जस चीज़ ने वहां उस भारतीय या ी को भा वत कया वो था न लभेद का न होना। जहां एक तरफ पूरे नटाल म भारतीय के त एक खास तरह का पूवा ह था, वह े प ट ‘रंगभेद म कतई यक न नह रखते थे। दे सी लोग के साथ वही सलूक कया जाता था जो गोर के साथ कया जाता था वे वही खाना खाते थे जैसे वहां के अ य भाई लोग खाते थे...और उसी तरह का कपड़ा पहनते थे।’ सरे गोरे ईसाइय के साथ ये गजब का फक था। गांधी ने लखा, न कषतः यह ये सा बत करता है क धम उस हसाब से दै वीय या शैतानी ताकत लगती है जस हसाब से उसके चारक उसे तुत करते ह।’13

● जून 1895 म नटाल के गैर-मठ य इसाईय ने एक नया वधेयक पेश कया जो गांधी के हमवतन भारतीय को ल य कर बनाया गया था। इस वधेयक म ताव कया गया क जो मज़ र अपने ठे के क अव ध के बाद द ण अ का म रहते ह उ ह 3 पाउं ड सालाना के हसाब से कर दे ना होगा जो उस समय एक खासी रकम होती थी। उस कर के समथक ने ऐसा इस उ मीद म कया क इससे भारतीय मज़ र फर से करार करने को बा य ह गे या ह तान वापस चले जाएंगे। उसके बाद तीन स ताह तक उस संबंध म तीन मसौदे तैयार कए गए और उन मसौद को गांधी ने व भ सं ा को भेजा। जन सं ा को गांधी ने मसौदा भेजा उसम से एक थी नटाल वधानसभा, सरा था उप नवेश के लए इं लड के रा यमं ी का कायालय और तीसरा था भारत के वॉयसराय का कायालय। नटाल के लोग से उस प के मा यम से पूछा गया क कसी का एक भारी-भरकम रकम टै स के प म दे ना य ज़ री है जब क वह करार के तहत पहले ही वहां 10 साल बता चुका है’? से े टरी ऑफ टे ट को यह याद दलाया गया क यह टश सं वधान क आ मा के खलाफ है क कसी को अनंत काल तक बंधन म रखा जाए। भारत के वॉयसराय को कहा गया क वो वशेष, घृ णत कर इस लए लागू कया जा रहा है क— नटाल के भारतीय हमेशा के लए परतं रह, हमेशा यथा त म तकलीफ क त म रह। हमेशा अपने झ पड़े म ही रह, इस बाबत कभी न सोच क वे कभी बेहतर आवास, बेहतर भोजन और स मानजनक व हा सल कर सकते ह। उसे अपने ब क पढ़ाई के बारे म सोचना तक नह चा हए। उसे कभी अपने या अपनी प नी के मनोरंजन के बारे म सोचना भी नह चा हए।14

उस समय इं लड म ‘यू नय न ट’ नाम का एक गठबंधन स ा म था जसने उन कंज़रवे टव और लबरल दोन को साथ लया था ज ह ने आयरलड म होम ल के पर अपनी पाट छोड़ द थी। सन 1895 म ए चुनाव म दादाभाई नौरोजी फर से चुनाव जीतने म नाकामयाब रहे ले कन यू नय न ट के तौर पर चुनाव लड़ रहा एक भारतीय जसका नाम मंचेरजी भौवना ी था, सांसद बनने म कामयाब हो गया था। ब मघम के ापारी और पूव लबरल जोसेफ चबर लन उस समय उप नवेश मामल के से े टरी ऑफ टे ट थे। सतंबर 1895 म चबर लन ने नटाल क सरकार को मता धकार बल के बारे म लखा जो अभी भी अपनी वीकृ त के इंतज़ार म था। उसने कहा क वह वधेयक ‘सबसे ानी और सबसे अन भ दे सी भारतीय के बीच कोई भेद’ नह करता था। जब क पहले क तरह के ानी भारतीय क त और उनक उपल यां उ ह ‘हर तरह से इस यो य बनाती थ क वे एक नाग रक के कत और वशेषा धकार को हा सल कर सक’। उसके मुता बक नटाल

के लोग ‘ न त ही इस बात से अवगत थे क पछले कुछ साल म दो मामल म इस दे श के मह वपूण े के नवाचक ने भारतीय भ पु ष को न केवल इस यो य समझा था क उ ह मतदान का अ धकार दान कया जाए ब क उ ह इस का बल भी समझा था क वे हाउस ऑफ र ेज़टे टव म सद य बन।’ चबर लन ने इस बात को वीकार कया क ‘नटाल उप नवेश का भा य आं ल-से सन न ल के लोग ारा ही नधा रत कया जाएगा और कसी ए शयाई समूह के झुंड को आगमन से रोकने का यास कया जाएगा’। फर भी अपने पूववत लॉड रपन क तरह ही वह उस वधेयक के अ त न लवाद प को लेकर च तत था। रपन क तरह ही वह एक भारतीय सद य के साथ सरकार का सद य था— फर भी एक ऐसे उप नवेश म जसके त वह ज़ मेवार था, भारतीय को उनके मता धकार से वं चत कया जा रहा था। उसने तक दया क ‘एक ऐसा वधेयक जो बना कसी अपवाद के सारे के सारे भारतीय को आमतौर पर मता धकार के लए अयो य घो षत कर दे ता हो और जो ऐसे कोई उपाय न सुझाता हो जससे भारतीय उस अयो यता से बाहर आ पाएं...भले ही उनक तभा, उनक श ा-द ा कतनी भी य न हो या इस दे श म उनका ब त कुछ य न दांव पर लगा हो...भारत के लोग के लए अपमान क बात होगी, जसक ज़ मेवारी कोई भी टश सरकार नह लेना चाहेगी’। इं लड म ये माना जाता था क भारतीय का एक चय नत समूह गोर का सहयोग करने और उनके साथ काम करने के लए सामने आएगा। नौरोजी और भौवना ी जैसे लोग के उदय क कहानी इसी तरह के उदार संर णवाद क सबूत थी। ले कन उप नवेश म इस तरह क ग तशीलता क क पना या उसे हा सल करना क ठन था। खासकर द ण अ का म जहां शासक न ल ारा ये मान लया गया था क रंगीन न ल (गैर- ेत) के सारे लोग को हमेशा के लए हीन त म रहना ही होगा। उप नवेश के क रपं थय और लंदन के उदारवा दय के बीच एक म यमाग अपनाते ए नटाल के गवनर ने उस वधेयक म एक उपबंध का समावेश कया जसके मुता बक सफ उ ह लोग को मता धकार दया गया जनके अपने मूल दे श म त न या मक सं ाएं थ । इस नयम से भारतीय लोग मता धकार से वं चत हो गए जब क अ य सारे अं ेज़ और यूरोपीय लोग को फायदा आ जनके अपने दे श म संसद काम कर रही थी। इस तरह से एक न लीय वधेयक ‘मता धकार वं चत करने के उस न न दशन’ से बच गया जसका पहले उस पर आरोप लगाया गया था। उस संशो धत मसौदे को नवंबर 1895 म चबर लन को भेजा गया जसने संकेत दया क अगर इस तरह का वधेयक नटाल क वधानसभा ारा पा रत कया जाता है तो वह महारानी को इस पर ह ता र करने क सलाह दे गा।15 ●

अपनी नजी ज़दगी म आ या मक स य क तलाश करहते ए और सावज नक जीवन म न लीय भेदभाव से लड़ते ए गांधी अपने मूल पेशेवर कत को नह भूले थे—यानी अपनी वकालत को ा पत करने का काम। यहां उनके सारे के सारे मुव कल भारतीय थे। जन जज और वक ल के सामने वह बहस करते थे वे सारे के सारे यूरोपीय थे। सामा जक या पेशेवर प से गांधी का अ कय से कोई संबंध नह था जो नटाल क जनसं या म ब मत म थे। द ण अ का म अपने पहले संर क दादा अ ला के लए गांधी पूववत काम करते रहे जसक तरफ से उ ह ने जहाज़ के क तान के खलाफ मामला दायर कया था जसने अपने मा लक क जानकारी के बना मुसा फर को सरे दज से तीसरे दज म जाने को मजबूर कया था और बीच का पैसा खा लया था।16 एक सरे मुकदम म उ ह ने ‘दो ब ढ़या वेषभूषा वाले, इ ज़तदार से दखते युवा भारतीय का त न ध व कया जसम से एक करानी था और सरा श क’। उन पर ये आरोप था क वे रात म ‘आवारागद ’ कर रहे थे और बना अनुम तप के घर से बाहर थे। ‘ म टर गांधी ने कहा क उस को पूरा अ धकार है क घर से बाहर रहे य क वे लोग भलीभां त जाने-पहचाने ए लोग थे। वे लोग इ ज़तदार नौजवान थे’। उस बात से जज सहमत आ और उनके खलाफ मुकदमा खा रज कर दया गया।17 गांधी ने अमीर , म यमवग य लोग और गरीब मक का प लया। एक गर म टया मज़ र पर ये आरोप था क उसने कसी पु लस वाले पर हमला कया है। इस पर उस भारतीय वक ल ने कहा क उसके मुव कल को उकसाया गया और उसे अपमा नत कया गया था। एक अखबार ने गांधी पर आरोप लगाया क वे इ स ऑफ द कोट (लंदन म क़ानून क पढ़ाई का सं ान) के नयम का उ लंघन कर रहे ह। उस अखबार ने लखा, ‘ याय क अवहेलना के लए कसी भी हद तक चले जाना, कसी भी तरह से उ चत नह ठहराया जा सकता।’ अखबार ने आगे लखा, ‘ जतनी ज द वे भारतीय समुदाय से अपनी इ त रकम हा सल कर ल और भारत, गुआम या टे न के लए रवाना हो जाएं, उतना ही यह उनके लए और उप नवेश के लए बेहतर होगा।’18 हालां क वह आरोप अनु चत था। न य ही पैसा बनाना गांधी का एक मा ल य नह था। मसाल के तौर पर बालासुंदरम के मामले को ली जए जसे उसके मा लक ने पीटा था। वह कई दन तक अ ताल म अपना इलाज करवाता रहा और उसके बाद वह याय क आस म गांधी से मला। वहां के ानीय म ज े ट ने उसके मा लक के खलाफ एक स मन जारी कर रखा था। गांधी ने उस मामले म यादा दबाव नह डाला, वह चाहते थे क दोन म समझौता हो जाए। ले कन उ ह ने इतना कया क बालासुंदरम को एक कम बबर मा लक के पास नौकरी लगवाने का इंतज़ाम करवा दया।19

सन 1895 और सन 1896 म गांधी उन ापा रय के मुकदमे लड़ते रहे जनका बकाया फंसा आ था, उन प रवार के लए लड़ते रहे जो अपने मृत पूवज क संप म ह सा मांग रहे थे। उ ह ने उन लोग का भी मुकदमा लड़ा ज ह पु लस ने या बागान मा लक ने सताया था। एक मुकदमा जसक खासतौर पर चचा होती थीः उ ह ने एक ऐसे मुसलमान का मुकदमा लड़ा जसने म ज े ट के सामने अपनी पगड़ी उतारने से इ कार कर दया था। भले ही एक वक ल के प म गांधी खुद बना पगड़ी के अदालत जाते थे और ऐसा करने के लए बा य थे, ले कन एक नाग रक क आ ा और उसके व ास के मुता बक पगड़ी पहनने के हक के लए लड़ना वे अपना कत समझते थे।20 एक बार गांधी को उनके एक यूरोपीय सहयोगी ने ये सलाह दे ने के लए बुलाया क उस संप का या कया जाए जो एक मु लम ापारी क है और बना वसीयत के जसक मौत हो गई है। उस मामले क सुनवाई वा टर रैग नाम का जज कर रहा था जसने पहले नटाल बार म गांधी के वेश का वरोध कया था। ऊपर से तो उसने उनका वरोध इस लए कया था क गांधी ने इनर टे ल के मूल माणप के बदले अपने माणप क व मा णत त पेश क थी, ले कन असली बात ये थी क वह एक अ ेत के अदालत म वेश को पचा नह पा रहा था। इस बार रैग ने कहा क ‘गांधी इ लामी क़ानून के लए वैसे ही अजनबी ह जैसे क एक ांसीसी होता है... म टर गांधी एक ह ह और न य ही वह अपने धम के वषय म जानते ह गे। ले कन वह इ लामी कानून के बारे म कुछ नह जानते’। गांधी ने गंभीर वर म इसका जवाब दया क ‘अगर म मुसलमान होता तो म एक ऐसे मुसलमान जज ारा याय दए जाने पर न य ही खी आ होता जसक एकमा यो यता उसका मुसलमान होना ही है। यह एक ई रीय उ जैसा ही है क एक गैर मु लम कभी भी इ लामी कानून के बारे म राय दे ने क ह मत नह करता’।21 एक रपोटर ने, जो अदालत म गांधी क ग त व धय को अ सर दज करता था, ट पणी क क जहां वह अपना काम भलीभां त करते थे, उनका तौर तरीकाआ ामक नह ब क आ ह करनेवाला या मनाने वाला था। वह कोई अ े व ा नह थे, जब वह अदालत को संबो धत करते थे तो वह मुखर नह होते थे ब क धीमे बोलते थे। बहस करते समय वह सामनेवाले पर ब त हार नह करते थे ब क अपनी बात को बार-बार एक ही तरह के श द से हराते थे। उदाहरण के लए, एस एस एस (हां हां हां)...योर वर शप (महानुभ ाव)...हां हां हां...यह गरीब म हला एक अश स टर क सेवा म थी और जब वह घर वापस आ रही थी तो उसी समय क यू क घंट बज उठ और उसे गर तार कर लया गया। म ीमान से आ ह करता ं क उसे जेल न भेजा जाए ब क चेतावनी दे कर छोड़ दया जाए।’22

एक कुशल व ा न होने के बावजूद, ज द ही गांधी नटाल बार के एक मुख सद य बन गए। उनके पास मुव कल का एक सम पत समूह था और वह जा त, धम और े से परे सभी भारतीय के वक ल थे। इस बात ने उनक काफ मदद क । जो वक ल बंबई और राजकोट म नाकाम रहा था वह डरबन म काफ कामयाब सा बत हो रहा था। गांधी को नया-नया हा सल आ यह आ थक सुर ा का भाव रास आ रहा था ले कन ऐसा लगता है

क उ ह उससे यादा सामा जक त ा से खुशी हो रही थी। वह भारतीय के वक ल, उनके व ा और उनके त न ध बनकर खुश थे। ● गांधी के जीवन म डरबन चौथा बंदरगाह शहर था और यह लंदन, पोरबंदर या बंबई क तुलना म ब त ही नया था। सन 1850 के दशक म यहां सफ दो दोमं ज़ला मकान थे। जैसे-जैसे बंदरगाह का वकास आ और आंत रक ह से म ग े क खेती का व तार आ, शहर भी फैलने लगा। सन 1860 और 1880 के दशक के बीच खूबसूरत प र से बनी भ इमारत शहर म खड़ी हो ग जनम कोट हाउस, टाउन हॉल, एक रॉयल थएटर, बक, होटल, चच और एक लब भी शा मल थे जो सफ गोरे लोग के लए थे। शहर के अंदर का यातायात घोड़े क ब घी से या हाथ- र ा से होता था।23 डरबन म गोरे लोग क सं या बंबई म उनक सं या से ब त यादा थी, फर भी वे वहां यादा भयभीत थे। भारत के यूरोपीय लोग जानते थे क एक वशाल जनसं या वाले दे श म उनक सं या ब त ही कम है। वे ये भी जानते थे क वे लोग यहां शासन करने आए ह न क ायी प से बसने। सरी तरफ कनाडा, ऑ े लया और यूज़ीलड क तरह नटाल एक ‘लघु यूरोप’ था जहां क जलवायु, पयावरण और अ प जनसं या ने गोर के मन म उन प र तय को पैदा करने क आकां ा भर द थी जो उनक मातृभू म म मौजूद थ । इस एहसास के साथ क इस दे श को वे सदा के लए अपना बना सकते ह, अं ेज़ उसे ायी ठकाना बनाने क को शश कर रहे थे।24 जस समय गांधी डरबन म अपना क रयर बना रहे थे उसी समय डरबन के गवनर, लंदन म अपने ोता को उस उप नवेश म जीवन के व वध आकषण के बारे म बता रहे थे। गवनर ने कहा क नटाल म बेहतरीन ाकृ तक य और अ ा मौसम है (उसने कहा क ‘वहां मले रया जैसी बीमा रयां नह ह’), चुर ाकृ तक संसाधन ह और एक उफान मारता आ बागान उ ोग ( लांटेशन इंड ) है। उसने कहा क डरबन मचौड़ी, सीधी और प क ग लयां ह। वहां ाम क ब ढ़या सु वधा है, बजली क रोशनी है और ब ढ़या जलापू त व ा है। डरबन म छोटे -छोटे ब ढ़या पाक (बगीचे) ह। वहां एक बड़ा टाउन हॉल है जो इतना बड़ा है क डरबन से छह गुणे बड़े शहर के लए उपयु है। उस टाउन हॉल म एक ऑरगेन (वा यं ) है जसक क मत 3000 पाउंड है (इस पर ता लयां बज )। डरबन म एक कृ ष दशन ली है, केट और एथले ट स का मैदान है, रेसकोस, गो फ लक, सावज नक नानागार ह, सं हालय, सावज नक पु तकालय, थएटर, एक बेहतरीन लब इ या द ह। समंदर के कनारे मेरे याल से 80,000 पाउंड क लागत से इनर हाबर क तरफ एक खुले मैदान का नमाण कया जा रहा है जो नमाण के आ खरी चरण म है और यह शहर क खूबसूरती म चार चांद लगाएगा और इसके आकषण को बढ़ाएगा।25

इस ववरण के मुता बक नटाल सफ एक नव-यूरोप या एक लघु इं लड नह था जो कोहरे, धुएं और बफ से मु था। ब क यहां द जा रही सु वधा पर इं लड के वपरीत सभी वग के गोर के लए छू ट थी। इस तरह से नटाल ने सं ांत वग से इतर सामा य वग के लोग को बड़ी सं या म आक षत कया और वे लोग झुंड के झुंड वहां आने लगे। मशनरी, सपाही, वक ल, खदान मक, कसान, जहाज़ी और श क के प म उ ह ने इस उप नवेश म खासा पैसा, नाम और त ा अ जत क जो उनक मातृभू म म उनक प ंच से बाहर थी और जसे वे हा सल भी नह कर पाते।26 नटाल के अ क लोग अ श त थे और दे श के अंद नी ह स म बखरे ए थे। ले कन यूरोपीय लोग के राजनी तक और आ थक भु व को अ य खतरा एक अ य समुदाय से महसूस हो रहा था। वो समुदाय भारतीय का था, खासकर वैसे भारतीय का ज ह ‘पैसजस’ (मुसा फर) कहा जाता था जो मज़ र के तौर पर नह ब क ापारी के तौर पर अ का आए थे। हक कत तो यह थी क अगर भारतीय ापारी वहां नह गए होते और उनक सं या, उनक समृ और उनक ग तशीलता ने वहां भाव पैदा न कया होता तो अ क तट पर त डरबन आराम से कालांतर म एक यूरोपीय शहर म त द ल हो जाता। ग े के खेत म काम करनेवाले मज़ र के वपरीत ये भारतीय ापारी शहर म रहते थे, जहां उ ह ने कारोबार ा पत कए और मकान बनाने के लए ज़मीन खरीद ल । सन 1870 के दशक म डरबन शहर म 665 भारतीय थे जनके पास महज दो कान थ और जनक संप 500 पाउं ड थी। ले कन शता द के आ खर तक डरबन म ह ता नय क सं या 15000 तक प ंच गई जनक 400 कान थ और जो 600,000 पाउं ड से यादा क संप के मा लक थे। अं ेज़ पर भले ये आरोप लगाया जाता था क वे एक ब नया रा ह ले कन उस कालखंड म इस जगह पर तो उ ह भारतीय ापा रय से ही कड़ी चुनौती मल रही थी और भारतीय इसम भारी पड़ रहे थे।27 आ थक चुनौती से बड़ी चुनौती जनसं या के आकार क भी थी। सन 1870 के दशक म हरेक पांच-पांच यूरोपीय क तुलना म डरबन म एक ह तानी था, ले कन सन 1890 तक यह औसत दो और एक का हो गया। नटाल के सरे शहर म भी कमोबेश यह त थी जहां यूरोपीय लोग क आबाद लगभग 40 फ सद थी तो भारतीय क सं या 20 फ सद तक प ंच चुक थी! जैसा क रॉबट हटे नबैक ने लखा है भारतीय क इस बढ़ती ई शहरी जनसं या ने ब त सारे यूरोपीय लोग को भयभीत और अपमा नत करके रख दया है जनके लए यह एक घरेलू नकटता क वजह से चुनौती और ावसा यक त धा दोन ही है’।28 अब इस सामा जक नज़द क और आ थक त धा के साथ एक तीसरी चुनौती भी जुड़ गई। वो चुनौती थी राजनी तक त धा क । सन 1891 म एक ‘ ज़ मेवार सरकार’ दे ने के नणय के समय, नटाल के गवनर ने मतदान- वहीन अ कय से एक ब त र का

खतरा ज़ र दे खा था, ले कन वो कोई गंभीर और आस खतरा नह लगा था। उप नवेश के लए नयु सेकरेटरी ऑफ टे ट को भेजे अपने प म गवनर ने लखा, ‘भ व य म अगर कोई खतरा पैदा होगा तो वह दे सी लोग के जागरण से ही होगा और वह भी कसी अनपे त राजनी तक आंदोलनकता के इशारे पर होगा जो इस बात पर आंदोलन कर सकते ह क उप नवेश म उनके हत सही तरीके से नह दे खा जा रहा। ले कन मेरे याल से यह एक ऐसी बात है जसे भ व य पर छोड़ दे ना चा हए और जब वह सम या सामने आएगी तब उसका नदान खोजा जाएगा’।29 गवनर को इस बात क लेशमा भी आशंका नह थी क तरोध क आवाज़ अ कय क तरफ से न उठकर सबसे पहले भारतीय क तरफ से उठे गी और उनक आकां ा को उस राजनी तक आंदोलनकता ारा हवा द जाएगी जो उस आकलन के समय लंदन म एक शम ला और अपने आहार को लेकर अ तच तत रहनेवाला क़ानून का व ाथ था। वह छा अब नटाल इं डयन कां ेस (एनआइसी) का सेकरेटरी था। अग त 1895 म नटाल इं डयन कां ेस ने अपनी पहली वषगांठ मनाई। उस समारोह म पहले वष के याकलाप पर गांधी ने रपोट पेश करते ए कहा क ‘डरबन से बाहर इसका फैलाव सरे शहर म भी हो चुका है। इसक शाखाएं पीटरमै रट् जबग, वे लम, यूकैसल और चा स टॉउन म भी खुल गई ह’। गांधी ने कहा क चंदे के प म 500 पाउं ड क रकम जमा हो गई है ले कन उनके मुता बक ‘कां ेस को मज़बूत आधार पर खड़ा करने के लए 2000 पाउं ड के कोष क ज़ रत है’। उस चंदे म नकद के बदले उपहार के तौर पर अ य व तु को भी वीकार कया गया था और गांधी ने कहा क ‘पारसी तमजी (जो वहां खड़े थे) ऐसा दे नेवाल म अ णी ह’। तमजी डरबन म मसाल और सूखे फल के ापारी थे ज ह ने कां ेस को लप, कागज़, पेन, एक घड़ी और बैठक ल (हॉल) क सफाई करने के लए एक मक दया था। अ य सरे गुजराती भी वहां चंदा दे नेवाल म स य थे जब क सेकरेटरी (गांधी) ने कहा क ‘त मल सद य ने कां ेस के काय म ब त उ साह नह दखाया’।30 ऊजावान तमजी का ज म सन 1861 म बंबई म आ था। उ के तीसरे दशक क शु आत म वह नटाल आ गए और शु म एक भारतीय कान म उ ह ने वे लम म काम कया था। उसके बाद उ ह ने अपना खुद का कारोबार शु कया जो तेज़ी से फैलता गया। सन 1893 म (जब गांधी का अ का म आगमन आ) वह डरबन के बड़े कारोबा रय म से एक थे। उनका पूरा नाम जीवनजी गोरोकूडो तमजी था। हालां क वह एक पारसी थे ले कन वह दाता पीर क मज़ार पर जाकर अ सर म ा टे कते थे। दाता पीर एक त मल मु लम थे जो एक गर म टया मज र के तौर पर डरबन आए थे और बाद म सूफ संत हो गए। डरबन के ह तानी समाज म एक कहानी च लत थी क तमजी पर एक बार केसर के आयात के लए का मुकदमा दज कया गया था जस पर उस समय कानूनन गोर

का एका धकार था। तमजी ने दाता पीर क मज़ार पर जाकर म त मांगी थी उसके बाद उनके गोदाम से वह केसर अचानक इलायची म बदल गई थी और वह क टम इं े टर क जांच से बच गए थे।31 जब मोहनदास गांधी डरबन म ा पत हो गए तो पारसी तमजी उस ह वक ल के भ बन गए। वह इं डयन नटाल कां ेस के क र समथक बन गए। कां ेस क बैठक अ सर उनक फ ट वाली कान म आ करत और दशक वहां अनाज क बो रय और अचार क बोतल के बीच खड़े होकर या बैठकर कायवाही को सुना करते। सतंबर 1895 म लगभग हरेक र ववार को गांधी ने ह -मु लम ोता के समूह के सामने भाषण दया। उस समय वह 26 साल के भी नह ए थे। उस भाषण म उ ह ने अपने भ व य क योजना पर काश डाला। एक सरकारी जासूस ने गांधी के इस भाषण को कुछ यूं दज कया: अगले पांच या छह महीन म म ह तान लौट सकता ं ले कन आपके पास चार से पांच ऐसे वक ल ह गे जो आपके हत को दे खने के लए मौजूद रहगे...वे इस बात को दे खगे क भारतीय के साथ कसी तरह का भेदभाव न हो...उ ह यूरोपीय लोग जैसा ही अ धकार मले। अगर आप एक रहगे और हम मेहनत करगे तो हम ब त मज़बूत हो जाएंगे। मुझे इस बात का ख है क जोहांसबग के भारतीय के पास कोई ऐसा नह है जैसा क 32 म आपके साथ ं। ले कन ज द ही उनके बीच भी कोई ज़ र ऐसा आएगा।

कां ेस के संर क क सूची म व तार के लए गांधी ने अ य एनआईसी (नटाल इं डयन कां ेस) के कायकता के साथ पूरे नटाल का दौरा कया। पु लस ने एक लांटेशन मा लक से कहा क वो गांधी क ग त व धय पर नज़र रखे। इस तरह हम मालूम है क नवंबर के पहले स ताह म गांधी और उनके सहयो गय ने उमगेनी नद पार क , कुछ ज़म दा रय का दौरा कया और रात म वे लम म के। यहां खासा चंदा आ जो करीब 50 पाउं ड के बराबर था। ले कन अगले दन उ ह कड़े तरोध का सामना करना पड़ा जब व टो रया गांव के भारतीय ने शायद अपने गोरे मा लक के डर से चंदा दे ने से इ कार कर दया। गांधी ने अपनी पगड़ी उतार द और उनके पैर म रख द । वे और उनके सहयो गय ने उनके लए लाए गए भोजन को खाने से इ कार कर दया। उनके इस वरोध का असर आ। एक के बाद एक भारतीय ने उ ह चंदा दे ना शु कर दया। गांधी का आ खरी मुकाम था ट गट लांटेशन जहां उ ह ने गर म टया मज़ र को संबो धत कया। वहां के पु ल सया मुख बर क गांधी के बारे म द गई रपोट ज़ा हरन ब त सकारा मक नह थी। उसने लखा, ‘मुझे कोई शक नह है क गांधी न य ही कुछ न कुछ बखेड़ा खड़ा करगे। ले कन वह ऐसे नह ह जो कसी बड़े आंदोलन का नेतृ व कर सक। उनका व कमजोर है। वह न य ही उगाहे गए चंदे के साथ धांधली करगे। उनके चेहरे को दे खकर मने यही राय बनाई है।’33

एक औसत चेहरेवाले, अदालत म हचकने वाले, अखबार के वन लेखक और बातचीत म सहज मोहनदास गांधी ने ही फर भी नटाल म यूरोपीय भु व को पहली चुनौती पेश क थी। सन 1890 के दशक तक केप के इलाके म अ क लोग ने राजनी तक अ भ का आधु नक तरीका ं ढ़ लया था। सन 1879 म एक ने टव एजुकेशनल एसो शएशन का गठन आ था जसके सद य मशन रय ारा श त और अं ेज़ी म कुशल लोग थे। उसके ठ क बाद एक साउथ अ कन ने टव एसो शएशन और ांसकेई युचुअल इं ूवमट सोसाइट क शु आत ई। केप म कुछ भावशाली अ क सुधारक थे जैसे श क जे. ट . जबावू जो एक अखबार का संपादन करते थे जसम भेदभाव क घटना को दज कया जाता था और वो अखबार ेत और अ ेत के बीच नज़द क संबंध क वकालत करता था। केप म कुछ उदारवाद ेत लोग भी थे जो अ ेत लोग को भी संप और शै णक मापदं ड के आधार पर मतदाता सूची म जगह दए जाने का समथन करते थे। जब क नटाल म त सरी थी। वहां के गोरे यादा त यावाद थे और अ क मूल के लोग कम श त थे। जब वहां नटाल इं डयन कां ेस क ापना ई, उस समय तक दे सी अ कय का कोई संगठन उस उप नवेश म नह था। सन 1894 और 1895 म नटाल म कोई अ क गांधी नह था, कोई भी अ ेत वक ल नह था जो कोट म पेश हो सके या अखबार म नय मत प से लख सके।34 इस तरह से अपनी कोमलता और सामंज यता के बावजूद गांधी और उनके सहयोगी नटाल के आधु नक इ तहास म कुछ ां तकारी बात का त न ध व करते थे। उनके काय से वहां जो त याएं सामने आ , वो इस बात क गवाह ह। अं ेज़ी अ र ‘एच’ के नाम से लखनेवाले एक तंभकार ने नटाल मरकरी म गांधी और उनके काय के बारे म नय मत प से तीखी आलोचनाएं लख । अ ू बर 1895 म उसने लखा क गांधी, भारतीय ापा रय क तरफ से ‘वेतनभोगी आंदोलनकारी’ ह। ‘एच’ ने यूरोपीय लोग का आ ान कया क वे उठ खड़े ह और ‘उस छोटे से आंदोलन को ख म कर द जसका गांधी और उनके सहयोगी अगुआई कर रहे थे’। गांधी पर ए इस हमले ने गांधी के कायालय म काम करनेवाले एक नौजवान करानी जोसेफ रॉये पन को यह जवाब दे ने पर मजबूर कया क ‘गांधी को नटाल इं डयन कां ेस क ब मू य सेवा करने के बदले एक भी पे ी नह मला है’। ले कन ‘एच’ को इससे कोई फक नह पड़ा। उसने लखा क ‘उसे बताया गया है क एक सूची तैयार ई है जसम भारतीय और भारत के ापा रय ने गांधी को वहां रहने के बदले 300 पाउं ड दे ने के लए ह ता र कया है’। उसने गौर कया क रॉये पन बीस साल का भी नह है और लखा क ‘उसे भ व य म गांधी ारा लेखन के लए चय नत भारतीय लड़क को जवाब नह दे ना चा हए। बरादरी काफ बड़ी है और मेरे पास समय ब त कम है।’35

अ ू बर-नवंबर 1895 म सरकार के मता धकार क़ानून के समथन म नटाल के ेत लोग ने कई बैठक क । नटाल के लांटेशन और खनन वाले इलाक म खासकर भारतीय के खलाफ काफ आ ोश था। टगर म ई इसी तरह क एक बैठक म एक व ा ने कहा क — ह तानी लोग नीची जा त के ह और मता धकार के लायक नह ह... उनसे इस दे श को कोई फायदा नह आ। उ ह ने यहां कोई पैसा नवेश नह कया है। उ ह इस दे श से जतना मलना चा हए था, उतना मल चुका है और वो सब बटोकर वह यहां से जा चुके ह। वह काल और गोर के बीच म फक को रेखां कत करना चाहेगा। वह म टर गांधी जैसे को भी वोट दे ने के हक का वरोध करेगा।36

कुछ नाटा लयन, बोर भु व वाले ांसवाल क ओर ई या से दे खते थे, ‘जहां उ ह ने पूरी तरह उसे अपने क ज़े म कर रखा था और वहां भारतीय क त ऐसी थी क उसे दे खकर नटाल के ेत ई या करते थे’। वहां के भारतीय सफ मता धकार से ही वं चत नह थे ब क वे वहां पर कसी तरह क संप भी नह खरीद सकते थे या अपने नाम से कोई ापार ही कर सकते थे। ांसवाल म बोर लोग के ‘अ डग और अटल रवैये’ ने उस सम या का समाधान ढ़ लया था जो ‘जो नी ो लोग के त सहानुभू त रखनेवाले टश लोग क घबराहट से पैदा ई थी। सरी तरफ नटाल के उप नवेशवा दयो के ढ लेढाले और आधे-अधूरी कारवाइय ने सनक टश उदारवा दय और अनै तक भारतीय 37 आंदोलनका रय को मजबूत ही कया था’। अब गु साए ए गोर ने ‘सभी भारतीय को मतदान के अ धकार से वं चत’ करने क मांग क । उ ह ने चेतावनी दे ते ए कहा क अगर ऐसा नह कया गया और होम गवनमट (एक हद तक वशासन) क अ यायपूण और दानवी नी त उन पर थोपी गई— तो सन 1900 के दशक क शु आत म शायद या कह क न त ही, हम नटाल म कुछ इस तरह क सरकार पाएंगेधानमं ी—अली बेनघारी उप नवेश स चव—दो त मोह मद अटॉन -जनरल—सईद मोह मद खजांच ी—रामासामी इसके अलावा हम अपने सव यायालय और अ य यायालय म गांधी को मु य यायाधीश के तौर पर पाएंगे और अ य लंबे और सफेद चोगा वाले य को यायाधीश के तौर पर— जसे गांधी ह तान से बुला लगे। ऐसा ही अ य सभी सावज नक वभाग म होगा...। या च ाकषक य होगा! हमारी यूरोपीय त ा और रा भ को इससे यादा खूबसूरत चीज़ या मलेगी! हमारे संघष और हमारी महा वाकां ा को इससे यादा पुर कार या हा सल होगा! ब क ये क हये क एक का फर मं मंडल (दे सी लोग का मं मंडल) उससे भी यादा अ ा होगा। वे लोग आदमी क तरह वहार करते ह, बहा र ह और सीधे ह—जब क ह तानी लोग वैसे नह होते।38

सन 1895 के आ खर तक मोहनदास गांधी को डरबन म रहते ए साल भर से ऊपर हो गया था। वह वहां अपने घर म रह रहे थे जो बीच ोव के क य इलाके म था। वह मकान

काफ बड़ा था और दो मं ज़ला था जसम एक बरामदा था और एक छोटा सा बगीचा भी था। बैठक खाने म जो फन चर था वह अपया त था जसम एक सोफा था, कुछ कु सयां थ और एक कताब रखने क दराज़ थी। उस दराज़ म शाकाहार वषयक कताब, कुरान, बाइ बल, ह धम से संबं धत कताब और टॉल टॉय क रचनाएं थ । उस घर म गांधी के साथ एक गुजराती रसोइया भी था जसका नाम हम मालूम नह हो सका है। साथ ही म ास का त मल भी था जसका नाम वसट लॉरस था जो गांधी के लए करानी का काम करता था। हर सुबह गांधी और लॉरस बीच ोव से उनके कायालय तक पैदल जाते थे जो वे ट और फ ट के कोने म था। जन सड़क से होकर वे जाते थे वो उसम भारतीय और यूरोपीय क कान थ । भारतीय लोग घूम-घूमकर फल, स ज़ी और रसोई के काम आने वाले बतन बेचा करते तो अं ेज़ लोग थोड़ा कम ज़ री सामान जैसे दवाई और चॉकलेट बेचा करते थे। गांधी के चबर के नीचे एक कान थी जसम सगार बेचा जाता था और जसका मा लक डरबन का एक पूव ड ट मेयर था।39 कुछ समय के लए गांधी के घर म उनका पुराना कूली दो त शेख मेहताब भी रहा था जो हाल ही म राजकोट से डरबन आया था। ले कन एक बार फर मेहताब ने गांधी के व ास को ध का दया। एक दन जब वे दन म खाना खाने घर आए तो उ ह ने मेहताब को एक वे या के साथ पाया। यह दे खकर गांधी काफ नाराज़ ए और दोन म गमागम बहस ई। गांधी ने पु लस को बुलाने क धमक द , मेहताब चुपचाप वहां से नकल गया। 40

हालां क उनके लक और रसोइये ने उ ह कसी तरह क परेशानी नह द । वसे ट लॉरे स उनसे ड टे शन लेता था, उसे टाइप करता था और जब ज़ री होता था तो उसे त मल म अनुवाद करता था जो नटाल म काम करनेवाले ब त सारे भारतीय मज़ र क मातृभाषा थी। जहां तक रसोइए क बात थी, खाना बनाने और घर को सुचा प से चलाने के अलावा वह अपने मा लक के काम म कसी तरह का वधान नह डालता था। वे आराम से पढ़ने- लखने का काम करते थे। सन 1895 के आ खरी स ताह म गांधी ने ‘भारतीय के मता धकार’ वषय पर एक लंबा पचा का शत कया जसे द ण अ का म रहनेवाले ‘हरेक टश नाग रक के लए एक अपील’ के तौर पर लखा गया था। वह पचा पचास प का था और उसम नटाल म रहनेवाले भारतीय क सम या पर व तृत चचा क गई थी। गांधी ने तक दया क ‘स य न ल के लोग के साथ भारतीय क बराबरी क मांग और उनक उपयु ता’ इस त य से मा णत होती है क टश भारत म भारत के लोग व र नौकरशाह, हाईकोट के यायाधीश और व व ालय म उप-कुलप त के पद को संभाल रहे ह। भारतीय सै नक ने टश नज़ाम क र ा के लए अपना र बहाया है। उनके दे शवासी वामीभ और

क़ानून को माननेवाले ह। इस लए उनके साथ टश सा ा य के कसी भी ह से म सरे दज के नाग रक के सामान वहार करना अनु चत है। गांधी ने गोर के मन म ा त इस भय क भावना को खा रज कर दया क अगर भारतीय को मता धकार दे दया गया तो वे यूरोपीय लोग पर वच व ा पत कर लगे। नटाल म 10,000 नबं धत मतदाता म सफ 251 ही भारतीय थे जनम यादातर ापारी थे। गांधी के मुता बक ापार करनेवाले ऐसे भारतीय क सं या उस उप नवेश म लंबे समय तक ऐसी ही रहनेवाली थी। य क ‘जहां एक तरफ ब त सारे लोग हर महीने ापार करने भारत से वहां आते थे, ले कन उतनी ही सं या म लोग भारत वापस भी चले जाते थे।’ फर भी सरकार को अगर यह चता थी तो वह उसम भी यादा संप वषयक मापदं ड लागू कर सकती थी। ले कन असली बात ये थी क ‘भारतीय को सबसे यादा आप रंगभेद क नी त को लेकर थी—यानी वचा के रंग के आधार पर भेदभाव कए जाने को लेकर।’ उस पच म गांधी ने तक और सा य को मज़बूत ढं ग से पेश कया और उसे अ य मंच और लेखन क अ य वधा म भी चा रत कया। ले कन पहली बार वह एक मजबूत वचार सामने रख रहे थे। नटाल इं डयन कां ेस के आंदोलन के बारे म कहा जा रहा था क ‘कुछे क ह तानी लोग राजनी तक स ा हा सल करना चाहते ह और ये कुछे क लोग मु लम आंदोलनकारी ह और अपने अतीत के अनुभव से ह को सीखना चा हए क मु लम शासन उनके लए वनाशकारी होगा।’ गांधी ने इसका जवाब दे ते ए कहा क ‘पहला वा य ब कुल आधारहीन है और आ खरी वा य ब कुल भा यपूण और खदायी है’। उ ह ने कहा, ‘यह नटाल म ह को मुसलमान के खलाफ लड़ाने क एक शरारती को शश है जहां पर दोन ही समुदाय सबसे यादा अमन और भाईचारे के साथ रह रहे ह।’41 गांधी ने उस पच को इं लड म अपने म ड यू. ड यू. हंटर को भेजा जो एक लेखक और एक नौकरशाह थे। उस प को पढ़कर हंटर ने इं लड क सरकार के भारत मं ी से मलने का समय मांगा। हंटर ने गांधी को लखा, ‘ भा य से टश जनमत के सामने नटाल के भारतीय क मांग और भारतीय कां ेस पाट क उसी तरह क मांग का घालमेल हो गया है।’ सन 1885 म ा पत ई भारतीय रा ीय कां ेस, सरकार म सभी तर पर भारतीय के त न ध व को बढ़ाए जाने क मांग कर रही थी। हंटर ने पाया क ‘गांधी और उनके सहयो गय का मु ा (भारतीय रा ीय) कां ेस के मु के साथ मुखता से जुड़ा आ दखता है और इस वजह से उस पर यान नह दया जा रहा’।42 इधर गांधी ने उस पच क तयां भारत म कां ेस के नेता को भी भेजी थ । ऐसा ही एक प जो पूना के आंदोलनकारी बाल गंगाधर तलक को भेजा गया था, गलती से बंबई म एसएम तलक एंड कंपनी के द तर प ंच गया। कंपनी के मैनेजर ने उस पैकेट को खोला

और उस पच को दे खकर उसने पच के लेखक को एक शंसा से भरा आ खत लखा। उसने लखा, ‘म वदे श क ज़मीन पर आपके आंदोलन को ब त उ सुकता से दे ख रहा ं। म तहे दल से आपके काय क तारीफ करता ं और सलाम करता ं जो आप जान क बाज़ी लगाकर अपने दे शवा सय के लए कर रहे ह। म आशा करता ं क ई र आपको आपके काय म ज़ र सफल करेगा।’ उसके बाद उस मैनेजर ने उ ह बाल गंगाधर तलक का सही पता दया (संपादक, केसरी और मराठा, पूना सट ) और साथ ही अंत म खेद कट कयाः ‘कृपया मुझे कारोबार म लगने के लए माफ कर’। (रा ीय सेना म लाने के बजाए!)43 पता नह इसम गांधी क गलती थी या डा कए क । ले कन उस गलती के लए ज़ र हम कृत होना चा हए य क उस गलती क वजह से हम वह खूबसूरत प मला है जसे उस अ ात भारतीय ने गांधी को लखा था। गांधी को कसी शंसक क तरफ से भेजा गया वह पहला अनाम खत था! नटाल म गांधी ारा भारतीय मता धकार पर लखा गया वह पचा ापक तौर पर बांटा गया। गोर के बीच इसे लेकर संशय के गहरे भाव पैदा ए और कई बार तीखी श ुता क भावना पैदा हो गई। एक अखबार ने वीकार कया क कम से कम वक ल के लखने का लहजा ‘अ त शालीनता से भरा’ था। ले कन साथ ही उसम चता क गई क ऐसा होने से आगे चलकर भारतीय लोग ापक त न ध व क मांग करने लगगे। वे भारत क तरह ही यहां भी नौकरशाह, यायाधीश और द ण अ का म समाचार प के संपादक का पद मांगने लगगे। एक अ य अखबार ने इस पच को ‘ दखावट ’ कहकर खा रज कर दया। उसने लखा, ‘ म टर गांधी कतनी ही मज़बूती से अपने तक य न रख ले कन हम द ण अ क लोग को कभी भी इस बात पर राज़ी करने म कामयाब नह हो पाएंगे क ए शयाइय क नाग रकता का वागत कया जाए।...यह सही है क समय के साथ उनके वचार म प रवतन हो सकता है ले कन अमूमन वह संशोधन करने म काफ आलसी ह।’44 नटाल एडवरटाइज़र नाम के एक तीसरे अखबार ने अपनी बात को तुकबं दय म सामने रखा। हालां क वह तुकबंद करनेवाला ब त द नह था। फर भी चूं क वह क वता गांधी पर अभी तक लखी गई क वता म सबसे पहली है और ब त गहराई से यूरोपीय लोग के मन म गांधी के त नफरत क भावना को दशाती है, मुझे लगता है क उस क वता को संपूण प म यहां तुत कया जाना चा हएः गूज़ी, गूज़ी गांधी ओह! (एक पुराना गीत है जसे खेद स हत फर से गाया गया) ओह, म एक बड़ा आदमी ं

और मुझे अ है सयत चा हए य क म एक बड़ा राजनेता बन सकता ं य क अपने लोग के लए म संसद क भीड़भाड़ म खड़ा हो सकता ं इसी लए म ह तान के समु तट से ए शयाई लोग ारा पैसे के बल पर बुलाया गया। कोरस मओह म एक नय मत गूज़ी ं गांधी म एक अ त तभावान आदमी ं इस वशाल दे श म जहां सूरज क रोशनी खूब चमकती है म बेहतरीन पचा लखता ं, मेरा मजाज़ चॉकलेट क तरह मुलायम है मेरे हाथ म हमेशा कताब और कलम रहते ह तुमने मेरे जैसा सामा जक बोर नह दे खा होगा जैसा क गूज़ी गूज़ी गांधी ह ओह! जब ेस और जनता नाराज़ थी, और मूख क तरह वहार कर रही थी, म एक कताब लखता ं ता क ये दखाया जा सके क वे कमज़ोर ह, और गुयाना म हम जमा होते, म यहां कु लय के लए लड़ने आया ं, जैसा क मने पहले के प म भी कहा क उ ह समान अ धकार चा हए, और म उ ह कुछ न कुछ बेहतर दलाकर र ंगा।

कोरस मम एक नय मत गूज़ी गांधी ं ओह! मेरे पास चुर तभा है और मेरे पास आचोलना से भरा एक पचा है जो इस सूरज क करण से रोशन और वशाल दे श के लए काफ है। मेरा मजाज़ चॉकलेट क तरह मीठा है

और मेरे हाथ म कलम और कताब है तुमने ऐसा सामा जक प से उबाऊ आदमी नह दे खा होगा जैसा क यह गूज़ी गूज़ी गांधी है ओह!45 ● गांधी के शु आती राजनी तक लेखन उनके कले टे ट व स (गांधी वां मय) म सं हत ह। उनके शु आती कानूनी क रयर का योरा नटाल के अ भलेखागार और पुराने अखबार के रेकॉड म है। हम जो चीज़ हा सल नह हो पाई है वो है डरबन से अपने प रवार को लखे गए उनके प । वह राजकोट म अपनी प नी और अपने भाई को कतने दन म च यां लखते थे? और वे लोग उन प का कतने दन बाद जवाब दे ते थे। इस बारे म हम कुछ नह मालूम। हम सफ इतना जानते ह क मई, 1896 म कुछ महीन के लए गांधी भारत लौटे थे। उनके मुता बक द ण अ का म अभी ‘उ ह पया त समय तक रहना था’ य क ‘वहां के लोग को उनक अभी ज़ रत थी’। गांधी ने लखा, ‘इसी लए मने मन बनाया क म ह तान जाकर अपनी प नी और ब को लेकर वापस डरबन आ जाऊं और वहां बस जाऊं।’46 उसम ‘वहां’ श द का जो मतलब है वो द ण अ का या खासकर नटाल से है। अपनी पैतृक ज़मीन का ठयावाड़ या बंबई म ा पत होने म नाकाम रहे गांधी उस उप नवेश म अब सबसे यादा भावशाली भारतीय थे। गुजराती, त मल, ह और मुसलमान—सबके सब उनक तरफ कानूनी और राजनी तक सलाह लेने के लए उ मीद भरी नगाह से दे खते थे। ापा रय और मज़ र दोन ही के लए वह ‘गांधी भाई’ थे जससे लोग यार करते थे और जसे इ ज़त दे ते थे। उ ह ने नटाल म अपना एक नाम बनाया था, अब वे नटाल म अपना घर भी बनाना चाहते थे। उनसे पहले और बाद म आनेवाले ब त सारे आ वा सय क तरह ही, वह भी योग के तौर पर द ण अ का पहले अकेले आए थे। जब वहां उनका क रयर ा पत हो गया और उ ह एक मकसद मल गया तो वे फर से ह तान वापस चले गए और क तूरबा और अपने ब को अपने साथ ले आए।

5 घुमंतू आंदोलनकारी

4 जून 1896 को डरबन के म ासी और गुजराती भारतीय ने मोहनदास गांधी के लए एक वदाई समारोह का आयोजन कया। उस वक ल को समुदाय के लए कए गए काय के लए एक शॉल और एक मेडल भट कया गया। अपने सं त भाषण म गांधी ने कहा क भारतीय के उस जमावड़े ने ये ‘दशाया है क चाहे वे कसी भी जा त-धम से य न संबं धत ह , ले कन नटाल म वे सभी एक नज़द क संघ के प म एकमत ह’। गांधी के लक व सट लॉरस ने उनके भाषण का त मल म अनुवाद कया। ‘उसके बाद कई गीत गाए गए और कई लोग ने भाषण दए जसने उस समारोह को जीवंत और उ साहवधक बना दया।’1 उसके अगले दन गांधी लैन मै लयोड नाम के जहाज़ से भारत के लए रवाना हो गए। उ ह बंदरगाह तक छोड़ने के लए करीब पांच सौ लोग समु तट तक आए और जब वह जहाज़ पर सवार ए तो सबने उ ह हाथ हलाकर वदा कया।2 लोग के यार ने समंदर तक उनका साथ नह छोड़ा। जब वह जहाज़ पुतगाली ई ट अ का के मु य बंदरगाह लॉरको माकस पर का तो वहां भी ह ता नय ने उनका भ वागत कया। उन लोग को पारसी तमजी ने एक टे ली ाम भेजा था जो कुछ इस तरह का थाः ‘बै र टर गांधी डे लागोआ के रा ते ह तान रवाना ए ह। कृपया वहां जाइए और उनका वागत क जए।’3 अब तक वह वक ल अनुभवी या ी बन चुका था। पछले आठ साल म उसक यह चौथी अंतरा ीय समु या ा थी और यह मूलतः व-प र कार म तीत ई थी। उस या ा के दर यान उ ह ने शतरंज खेला, अपने एक सहया ी से उ का पाठ पढ़ा और एक कताब क सहायता से खुद से त मल सीखने क को शश क ।4 तीन स ताह के बाद लैन मै लयोड कलक ा प ंचा। वहां से गांधी राजकोट जाने के लए प म क तरफ जाने वाली एक रेलगाड़ी पर सवार ए। वे मई 1893 से प रवार से र थे। उनके बेटे ह रलाल और म णलाल अब मशः आठ और तीन साल के हो चुके थे। अपने बेट को लेकर उनके मन म या चल रहा था और कैसा भाव था, उसके बारे म कोई जानकारी उपल नह है। हम नह मालूम क उनके पालन-पोषण को लेकर उनक या

त या थी या फर अपनी प नी से उनके कैसे संबंध बने। वह उस समय एक पच क तैयारी म त थे जसे वह भारत के लोग के सामने तुत करना चाहते थे क उनके हमवतन के साथ द ण अ का म कैसा सलूक कया जा रहा है। वह पचा अ का म अं ेज़ी सरकार को दए उनके पूव आवेदन पर आधा रत था ले कन उसम उनके कुछ हाल के गत अनुभव को भी शा मल कया गया था। उ ह ने भारतीय से कहा, ‘एक ऐसे दे श क क पना क जए जहां आप नह जानते क कौन, कब आप पर हमला कर दे गा— इससे कोई फक नह पड़ता क आप कौन ह या आपको कतने मान सक भय का सामना करना पड़े गा। ऐसा कभी भी हो सकता है, भले ही आप रात भर के लए कसी होटल म के ह या कह और। आप क पना क जए क कन हालात म हम नटाल म जी रहे ह।’ गांधी ने अपने दे शवा सय से कहा क नटाल म क़ानून के मुता बक वहां के दे सी लोग और गर म टया मज़ र को रात म बाहर नकलने के लए अनुम तप ज़ रत होती है। गांधी ने कहा, ‘इसका मतलब है क वे मानते ह क भारत के लोग बबर होते ह। वे मानते ह क दे सी लोग का नबंधन ज़ री है य क उ ह लगता है क उ ह स यता और म क आव यकता को सखाने क ज़ रत है। ले कन भारतीय इसे जानते ह और चूं क उ ह इसक जानकारी है, इस लए उनके म का आयात कया जाता है’। घाव पर नमक छड़कते ए रेलवे टे शन पर ‘शौचालय ’ के बाहर लखा होता है—‘दे सी और ए शयाई’ लोग के लए’। नटाल म गांधी का संघष यन े डो क टॉलॉ टॉय ारा क गई ा या पर आधा रत थी। उ ह ने कहा, ‘द ण अ का म हमारा तरीका इस घृणा को यार ारा जीतना है। हम नह चाहते क दोषी य को सज़ा मले और हम संतोष कर ल, ब क एक नयम के तहत हम चाहते ह क हम उनके ारा सताएं जाएं। सामा यतः हमारी ाथना ये नह है क उनके ारा कए गए अतीत के अपराध के लए हम अनुकंपा के तहत कुछ मल जाए ब क हम चाहते ह क वे भ व य म हराएं न जाएं और उनके मूल कारण को ख म कया जाए।’5 गांधी ने उस पच क 10,000 तयां छपवाई जसे लोग ज द ही ‘हरे पच’ (उसके रंग के कारण) के प म जानने लगे। उ ह ने उसे पूरे दे श म अखबार के संपादक को भेजा। वे बंबई म भी हमेशा अपने साथ उस पच क तयां रखते थे जहां उ ह ने सन 1896 के अग त और सतंबर महीन का यादातर ह सा गुज़ारा। वहां वे दे श क सावज नक जीवन क महान ह तय से मुलाकात करते रहे और उ ह अपने उ े य के बारे म बताते रहे। वहां उनक मुलाकात एक ह समाज-सुधारक महादे व गो वद राणाडे , एक मु लम समाज सुधारक बद न तै यबजी और एक पारसी समाज सुधारक फरोज़शाह मेहता से ई।6 राणाडे और तै यबजी दोन ही यायाधीश थे जब क मेहता एक वक ल और वधानसभा के सद य थे। ले कन गांधी ब त सारे ऐसे लोग से भी मले जो कम मश र थे जनसे

मलकर वे उ ह अपने उ े य के बारे म बताते थे और अपना पचा दे ते थे। नटाल इं डयन कां ेस का एक अकांउट बुक उनके त काय म क त द क करता है जसम गांधी सारी बात योरेबार लखते थे। 20 अग त के एक ऐसे ही योरे म लखा हैः ‘ब गी से—घर से फोट, फोट से बीके रोड, हाउस से अपोलोबंदर, अपोलोबंदर से माकट और माकट से हाउस’। इन पांच या ा को करने म उ ह दो पए का खच आ। उसके बाद उ ह ने एक बु मानी भरा फैसला लया और उसी गाड़ी और उसके चालक को दन भर के लए कराए पर रख लया।7 गांधी क वे को शश रंग ला । टाइ स ऑफ इं डया ने एक लंबा अ लेख छापाः म टर गांधीज़ एबल एंड ाइ कग पपलेट ( म टर गांधी का सारग भत और आ ामक पचा)। उस अखबार ने उस पच को उ त करते ए कुछ पं य को भी जगह द जसम नटाल म ‘घनघोर अ याचार और उ पीड़न’ क बात कही गई थी और जसे गांधी ने लखा था। मसलन, ाम से भारतीय का नकाला जाना, भारतीय को तीसरे दज के रेलवे के ड ब म या ा करने को मजबूर करना और ‘ त त भारतीय ’ को भी कठोर वै े सी लॉ (खानाबदोश लोग के लए बनाया गया क़ानून जसम पु लस को मनमाने अ धकार दए गए थे) के तहत उ पी ड़त करना।8 26 सतंबर को ामजी कोवासजी सं ान म द ण अ का म भारतीय क सम या पर चचा करने के लए एक सभा का आयोजन कया गया। उसक अ य ता फरोज़शाह मेहता ने क । उस सभा म बोलते समय गांधी काफ वच लत थे। गांधी के व को उनक तरफ से पारसी राजनेता डी ई वाचा ने पढ़कर सुनाया। वाचा ने गांधी के भाषण को पढ़ते ए कहा क द ण अ का क त भारत से ब कुल अलग है, यहां पर ‘ त न ध सं ा ...को धीरे-धीरे ले कन न त तौर पर उदार बनाया जा रहा है’ जब क नटाल म ‘इन सं ा के दरवाज़े हमारे लए बंद कए जा रहे ह’। भले ही चय नत प से ही सही ले कन भारत म टश शासन ने अपनी जा को यायाधीश और यु न सपल काउं सलर बनने क इजाज़त द है ले कन नटाल म वे चाहते ह क हम अस य का फर ( ानीय काले अ कय के लए यु संबोधन) क तरह रह जसका एकमा पेशा शकार कर भोजन जुटाना हो और जसके जीवन क एकमा आकां ा कुछ मवेशी जुटाना हो ता क वो अपने लए एक प नी खरीद सके और पूरी ज़दगी वह सु ती और नंगेपन म गुज़ार दे ...हम हरेक तरह से द ण अ का म दबा कर रख दया गया है’। नटाल म हम ‘उ पीड़न के बीच’ रह रहे ह। ‘भारत के लोग हमारे बड़े भाई ह और अपे ाकृत यादा वतं ह, उनक ज़ मेवारी है क वे हमारे इस उ पीड़न को र करने म हमारी मदद कर’।9 गांधी के इस भाषण ने लोग को उ े जत कर दया। ब त सारे लोग इस पर त या दे ने लगे क ‘हमारे दे शवा सय को द ण अ का म कन यातनामय तय म रहना

पड़ रहा है’। उनके अपमान और उ पीड़न क भावना को एक सरे संदभ म महादे व गो वद राणाडे ने भी सामने रखा जो उस दन कोवासजी सं ान क उस सभा म उप त थे। कुछ ही दन बाद दए अपने एक भाषण म राणाडे ने ह से कहा क वे ‘ज़रा अपने समाज क तरफ भी झांककर दे ख’। कुछ सरे रा वा दय के वपरीत राणाडे अपने ही समाज ारा समाज के एक ह से पर कए जा रहे अ याचार के त काफ च तत थे। उ ह ने कया, ‘ या यह सहानुभू त भारत म रहनेवाले दबे-कुचले लोग के त भी है या सफ उन लोग के त ही है जो दे श छोड़कर बाहर चले गए ह? या इस सहानुभू त का व तार उन कृ य क आलोचना म भी होगी जसके ारा भारत क नचली जा तय पर हर रोज़ जु म ढाया जाता है? या ये सहानुभू त उन लोग ारा कट क जाएगी जो अपने दे श म तो रोज़ अ याचार सहते ह ले कन वे द ण अ का के अपने दे शवा सय के लए आवाज़ उठाएं’?10 ● बंबई से अब गांधी पूना क तरफ रवाना ए। यहां वे रा ीय राजनी त के दो उभरते ए सतार से मले। उनम से एक थे उदारवाद गोपाल कृ ण गोखले और सरे थे उ पंथी बाल गंगाधर तलक। राणाडे के श य गोखले क राय म सामा जक सुधार उतना ही ज़ री है जतना राजनी तक सुधार। मुसलमान क भावना को यान म रखते ए वह अपने भाषण म ह मुहावर के योग से बचते थे। सरी तरफ तलक टश शासन के घोर वरोधी थे और उ ह ने गणेश उ सव और म यकालीन ह यो ा शवाजी पर कए जानेवाले उ सव को बढ़ावा दया।11 गांधी दोन से मले और द नो ने उ ह सावज नक सभा करने म मदद का आ ासन दया।12 पूना से गांधी ने द ण क े न ली और म ास प ंचे। उस समय वह एक बंबई के वक ल से प ाचार कर रहे थे जो द ण अ का आना चाहता था। पछले सतंबर म उ ह ने नटाल के भारतीय से वादा कया था क वे भारत से कुछ वक ल को लाएंगे जो उ ह उनके आंदोलन म मदद करगे। उनका पहला चुनाव था एफ. एस. तालेयारखान, जो उनके साथ सन 1891 म जहाज़ पर लंदन से बंबई तक आया थे। गांधी ने तालेयारखान से कहा क अगर वो उनके साथ नटाल चल तो वे दोन साझेदारी म एक फम क ापना करगे और मुनाफे को आपस म बांट लगे। गांधी सोच रहे थे क वे 150 पाउं ड तमाह तक कमा लगे। ले कन फर भी उ ह ने तालेयारखान को चेतावनी द क कसी भारतीय को ‘इस लए द ण अ का नह जाना चा हए क वो वहां पर अकूत पैसा जमा कर लेगा। वहां पर हम आ म-ब लदान क भावना से जाना चा हए। हम वहां पर धन से एक खास री बनाकर रखनी चा हए। उसके बाद धन खुद ही आपके पीछे -पीछे चलेगा। अगर आप धन पर नगाह

डाले रहगे तो वो ऐसी छलना है क आपको परेशान करेगा। द ण अ का म मेरा यही अनुभव है।’ तालेयारखान एक पारसी था जसे मांस-मछली ब त पसंद थी। गांधी ने कहा क अगर वे डरबन म साथ-साथ रहे तो वे उसे ‘सबसे वा द शाकाहारी भोजन’ उपल करवाएंगे जसे ‘इं लश और भारतीय अंदाज़’ म बनाया जाएगा। ले कन अगर तालेयार को मांसाहार ही पसंद हो तो वे सरा रसोइया रख सकते ह। गांधी ने सोचा क तालेयारखान ‘इन बात को अपने द ण अ का दौरे म आड़े नह आने दगे। उ ह ने कहा क उनक राय म वे इस बात के त न त है क गांधी अकेले जतना काम करने म स म ए थे, वे लोग द ण अ का म उ मीद से बेहतर और यादा काम करगे।’13 गांधी 14 अ ू बर को म ास प ंचे। यह उनक पहली म ास या ा थी जो म ास ेसीडसी क राजधानी थी। म ास उस े का राजनी तक और ावसा यक क था जहां से द ण अ का म रहनेवाले ब त सारे गर म टया मज़ र ता लुक रखते थे। वह म ास म दो स ताह तक रहे और ब कघम होटल म ठहरे जहां उनका बल 74 पए था। उनके सरे खच म टे ली ाम भेजने, ब घी, ाम का कराया, कागज़, याही और पेन क खरीद, अंतदशीय प , मुहर और स फर का लेप (इसके बारे म हम नह मालूम क ये उ ह ने य खरीदा) का खच शा मल था।14 म ास से गांधी ने गोखले को प लखा जसम उ ह ने द ण अ का म भारतीय के संघष के बारे म व तृत ववरण दया। वह इस बात से ो सा हत ए थे क बुजगवार ने ‘उनक बात म गहरी दलच ी’ ली थी, जब वे पूना म मले थे। गांधी ने लखा क अब उ ह अपने उ े य के लए ‘भारत म शी ा तशी स य और मुख कायकता क एक कमेट ’ बनानी होगी और गांधी ने इस बात पर ज़ोर दया क जब तक ‘हमारे दे श के महान लोग... बना कसी दे री के इस को नह उठाएंगे’, द ण अ का का उदाहरण सरे टश उप नवेश म भी हराया जाएगा जहां पर इसी तरह से भारतीय को मता धकार से वं चत कर दया जाएगा और उनके अ धकार छ न लए जाएंगे। और अगर ऐसा आ तो ‘ब त ज द भारत से बाहर भारतीय ारा कए जानेवाले कसी भी ापार क संभावना ख म हो जाएगी और भारतीय उ म ख म हो जाएगा’।15 गांधी क म ास या ा का मु य क ब उनका प चय पा सभागार म दया गया भाषण था, जो 26 अ ू बर क शाम को आ। जस पच म उस भाषण का चार कया गया था उसम 41 लोग के द तखत थे जसम शहर के कुछ मश र वक ल, संपादक और ापारी थे। जो लोग गांधी के उ े य का समथन कर रहे थे उनम खासे तादाद म ा ण और चे यार ापारी थे, कुछ तेलुगु व ा थे, दो मुसलमान थे और कम से एक ईसाई था। वहां टश सरकार से सर क उपा ध ा त रामा वामी मुद लयार भी थे।16

बंबई क ही तरह गांधी ने भाषण म ‘हरे पच’ म शा मल वषय को फर से उठाया। इसे उ ह ने वहां के ोता के हसाब से संदभ म ढाला और लोग को बताया क कैसे म ास के ापा रय क एक काफ त त कंपनी को वहां ‘कुली कानदार’ कहा जाता है और कैसे एक ब ढ़या वेश-भूषा वाले म ासी स न डरबन म ‘अपमा नत कए जाने के भय से मु य सड़क पर चलने क ह मत नह करते ह। उ ह हमेशा भय रहता है क कोई उ ह उठाकर वहां से फक न दे ’।17 गांधी के उस भाषण के बारे म म ास मेल ने लखा क गांधी ने ‘ बना कसी अ तरंजना के द ण अ का म अपने दे शवा सय क त के बारे म व तार से और सही तरीके से बताया’। अखबार ने गांधी और उनके सहयो गय को इस बात क शी सफलता क शुभकामना द क वे लोग उप नवेश और भारत के बीच बेहतर समझदारी क भावना को वक सत कर रहे ह। साथ ही अखबार ने कहा क ‘उप नवेश म कसी भी क़ानून के ारा न लीय भेदभाव जारी रहता है तो ये मान लया जाए क टश सरकार अपने कत को पूरा करने म नाकाम हो रही है जसक चता एक टश नाग रक को होनी ही चा हए’।18 उस बैठक म उस पच को खरीदने के लए इतनी मारामारी थी क ज द ही लेखक का टॉक ख म हो गया। उसके कुछ ही समय बाद उस पच के पुनमु ण का ऑडर दे ते ए उ ह ने ये दज कया क म ास म उन तय क मांग वाकई ऐसी बात थी ‘ जसे कभी नह भूला जा सकता था’।19 अ ू बर के आ खरी स ताह म गांधी ने म ास से ऊपर कोरोमंडल तट होकर कलक ा क या ा क । यह उनक हाल के महीन म तीसरी लंबी रेल या ा थी। धीरे-धीरे वे भारत क भौगो लक और सामा जक व वधता से सा ा कार कर रहे थे। वह म ल, मैदान, समु तट और पठार से होकर या ा कर रहे थे, साथ ही व भ वा तुकला ारा न मत भवन को दे ख रहे थे, अलग-अलग भाषा को सुन रहे थे और अलग-अलग तरह के भो य पदाथ का अनुभव ले रहे थे। े न से उ ह ने खेत म काम कर रहे कसान को दे खा, हालां क शहर और क ब म जहां भी वो के उनक बाततीच मु यतः संपादक , वक ल और लगातार व तार कर रहे म यवग के सद य से ही ई। बंबई और म ास जैसे ेसीडसी राजधानी म गांधी का भ वागत आ था। कलक ा, बंगाल ेसीडसी क राजधानी था और साथ ही यह भारत म टश सामा य क राजधानी भी था। सन 1896 म वह शहर भारतीय रा वाद का सबसे स य क था। यहां पर ापाक त न ध व क मांग यादा ज़ोरशोर से सुनी जा रही थी। एक ऐसे के तौर पर जसने वदे श म ापक अ धकार क मांग क थी, गांधी को उ मीद थी क उनक बात यहां भी सहानुभू तपूवक सुनी जाएगी। ले कन वहां उ ह लोग ने ब त यान से नह सुना। वहां पर भारतीय अखबार के संपादक ने उनके साथ ऐसा वहार कया मानो वह कोई ‘भटकता आ य द हो’। एक सरे संपादक ने उ ह एक घंटे तक इंतज़ार करवा दया

और जब आ खर म उ ह बुलाया गया तो गांधी को साफतौर पर बता दया गया क ‘आपके जैसे लोग यहां आते ही रहते ह। बेहतर है क आप चले जाएं। म आपक बात को सुनने के लए यहां नह रखा गया ं।’20 कलक ा म उ साहहीनता क इस कमी क एक वजह ये भी हो सकती है क द ण अ का म ब त कम बंगाली थे। या ये भी हो सकता है क ये अहंकार क एक अ भ हो। गांधी, कलक ा म दो स ताह तक रहे और वह शहर के क म त होटल ेट ई टन म रहे। वह वॉयसराय के आवास के सामने ही सड़क के सरी तरफ था। उनके अकांउट बुक के हसाब से ऐसा लगता है क वह म ास और बंबई क तुलना म कलक ा म कम त थे। उ ह ने वहां अपने बाल बनवाए, अपने कपड़े धोए और वहां से ब त सारे प और टे ली ाम भेजे। एक शाम वह थएटर भी गए जहां उ ह ने एक बंगाली नाटय संगीत दे खा। ले कन वहां वे एक भी सावज नक सभा करने म नाकाम रहे।21 5 नवंबर को गांधी ने तालेयारखान को प लखकर पूछा क या वह उनके साथ नटाल जाने को तैयार है (पारसी ने उनसे कुछ और व क मांग क थी)। वह नवंबर ख म होने से पहले ही बंबई से रवाना हो जाना चाहते थे। जनवरी म नटाल वधानसभा क बैठक होनेवाली थी जसम उस संशो धत मता धकार कानून, 3 पाउं ड कर और भारतीय से संबं धत सरे मु पर चचा होने वाली थी। उसके बाद फर गांधी प मी तट क तरफ रवाना ए। वे पूना प ंचे जहां उ ह ने एक सावज नक सभा म भाषण दया, बंबई म लोग से मेल-मुलाकात क और फर द ण अ का जाने के लए अपने प रवार को तैयार कया। वह खासतौर पर अपनी प नी और अपने ब के कपड़ को लेकर च तत थे। उ ह ने सोचा क इस मामले म पार सय क नकल करना ही ठ क होगा जो उस समय भारत के सबसे यादा ग तशील लोग समझे जाते थे। इस तरह से लड़क को ॉउज़र और लंबा कोट पहना दया गया जब क क तूरबा ने पारसी म हला क तरह साड़ी पहन ली जसम कढ़ाई क ई थी और उनक बाँह पूरी तरह से ढं क ई थ ।22 30 नवंबर को एस एस कौरलड नामके जहाज़ से मोहनदास गांधी, क तूरबा, हीरालाल और म णलाल बंबई से डरबन के लए रवाना ए। उनके साथ गांधी का भांजा गोकुलदास भी था जसक दे खभाल का ज़ मा उ ह स पा गया था। उस या ा म उ ह कराया नह दे ना था य क उस जहाज़ का मा लक मोहनदास का दो त, मुव कल और भारतीय समुदाय का आंदोलनकारी दादा अ ला ही था। जब गांधी अ का से बाहर थे तो नटाल म ेत समुदाय के लोग भारतीय के पर और आंदो लत हो उठे थे। अग त 1896 म ट गट शुगर कंपनी ने सरकार से कोई तीस ट बछानेवाले, बढ़ई, फटर और लुहार को ह तान से लाने म मदद का अनुरोध कया था। कंपनी ने कहा क वे उन मक को गर म टया मज़ र क तलुना म तीन गुना वेतन दगे।

कंपनी ने कहा क ‘उ ह इस बात क चता नह है क वे म ास के ह या कलक ा के। हां वे सही आदमी होने चा हए।’ बेहतर उ पादन और स ते म के आकषण से े रत ये नजी उ मी कह से भी कुशल मक को लाने क होड़ म लगे ए थे। ले कन उनका यह ता कक और पूंजीवाद कोण रा ीय और न लीय पूवा ह क भट चढ़ गया। आ खर एक गोरे उ ोगप त क इतनी ह मत कैसे ई क वह उन काय लए ए शयाई मक को बुलाए जस काम को गोरे लोग भी कर सकते थे? और आ खरकार ट गट शुगर कंपनी का आवेदन ेस को कसी ने गु त प से भेज दया जसने हंगामा बरपा दया। उस आवेदन के लीक होने के बाद डरबन म ‘यूरोपीय मक क एक बैठक ई’ जसम इस बात पर चता क गई क भारत के लोग उन सारे धंध पर क ज़ा कर लगे जो पहले गोर के हाथ म थे। उस बैठक ल पर ‘कमरे म लोग खचाखच भरे ए थे और एक सरे से सटकर खड़े थे’। एक व ा ने मज़ाक म कहा क शायद ट य को मारने के लए वो लोग मकान पट करनेवाले कु लय को बहाल करगे और उ ह ऐसी छड़ी दगे जो प े के रंग से रंगे ह गे (हंसी!)। उस बैठक म ‘काले क ड़े ’ और ‘उ ह हम यहां नह आने दगे और उन पर 100 पाउं ड का टॉल टै स लगा दगे’ जैसी बात सुनने को मल । उस बैठक म सरकार से त काल मांग क गई भारत से आनेवाले मक और कामगार को उप नवेश म आने से रोका जाए। उस वरोध के फल व प कंपनी ने सरकार को दया अपना आवेदन वापस ले लया। उप नवेश के लए नयु भारत मं ी को लखे अपने प म नटाल के गवनर ने कहा ‘वह घटना इस बात को दशाती है क कम से कम कुशल मक के मामले म ए शयाई मक क मांग कतनी है और इसके लए कस हद तक एक सरे के त जलन क भावना पैदा हो गई है’।23 तो उस अग त म वहां इस तरह का वातावरण था। सतंबर म नटाल मरकरी ने समाचार एजसी रायटस ारा भेजा एक समाचार का शत कया जसम गांधी के ‘हरे पच’ को सं त प से छापा गया था जो उसी समय राजकोट के ेस से तुरंत ही का शत आ था। उसे एक वा य म जगह द गई और उसका मजमून कुछ यूं थाः ‘भारत म छपा एक पचा यह कहता है क नटाल म रहनेवाले भारतीय को लूटा जाता है, उनके साथ मारपीट क जाती है और उनके साथ जानवर सा सलूक कया जाता है। उ ह कसी तरह का याय नह मलता’। अखबार ने उस पर ट पणी करते ए लखा क इस तरह क ‘झूठ बात ’ का चार करके गांधी ने ‘अपने दे शवा सय का अ हत ही कया है’।24 गांधी के चालीस प े के उस पच के उस वकृत सं तीकरण क वजह से भारतीय और खासकर के गांधी के खलाफ तेज़ मौ खक हमले शु हो गए। नटाल मरकरी ने लखा, ‘एक बड़ी बात जो भारतीय लोग नजी और सामू हक तौर पर भूल जाते ह वो ये क दे सी लोग से एक लंबी लड़ाई के बाद द ण अ का पर क ज़ा कया गया था और उसम

बहाया गया खून और खच ए धन का एक भी ह सा भारतीय ारा वहन नह कया गया था, न ही एक बूंद भारतीय खून वे ा से बहाया गया था।’25 संपादक य प े पर लखनेवाले एक लेखक ने गु से म लखा क बंबई म अपने दे शवा सय के सामने ‘आंदोलनकारी गांधी के अनाप-शनाप के बयान ने उ चत ही यूरोपीय उप नवेशवा दय के मन म गु से को बढ़ावा दया है।’26 डरबन ेस म गांधी पर ए हमले ने उनके अलग रह रहे म शेख मेहताब को गांधी के बचाव के लए सामने आने को े रत कया। गांधी के घर से नकाल दए जाने के बाद मेहताब उन दन अकेले टै मफोड हल नाम के इलाके म रह रहा था। वहां से उसने लखा क गांधी के हरे पच पर जो बवाल मचा आ है उसक वजह उनके ारा पहले क गई गई ‘अपील’ और वे ‘खुले प ’ ह जो उ ह ने भारतीय क सम या के त टश समाज के गणमा य लोग को लखे थे। मेहताब ने नटाल एडवरटाइज़र के पाठक को अपनी ट पणी म कहा क अगर ‘नटाल के सारे भारतीय को लूटा जाता है, उनके साथ मार-पीट क जाती है और उनके साथ जानवर सा सलूक कया जाता है और वे कसी भी तरह के याय पाने म नाकाम रहते ह तो आपको इस पर आ य नह करना चा हए।’ उसने गांधी ारा पूव म लखे गए पच को फर से पढ़ने का आ ह करते ए नटाल के यूरोपीय बंधु से कहा, ‘अगर आप फर से वे दोन कताब पढ़गे तो आप कुछ मु को आसानी से समझ पाएंगे। अगर आप वीकार करते ह क वे दोन पु तक सही ह तो आपको इस बात पर ता ुब नह करना चा हए क भारतीय के साथ यहां ‘शमनाक वहार’ कया जाता है।’27 ● अग त और सतंबर म भारत से कई जहाज़ डरबन आए। उसम बागवानी काय के लए ब त सारे गर म टया मज़ र, उप नवेश के ब त सारे नवासी जो फर से अपने गृह दे श म वापस आ गए थे और कुछ नए आ वासी भी थे। उस जहाज़ ने फर से यूरोपीय लोग को भया ांत कर दया और उनम असुर ा का भाव भर दया। मज़ र से भरे वे जहाज़ यूरोपीय लोग को ऐसे तीत ए मानो वह एक ‘संग ठत यास’ हो और ‘आ वा सय क वराट लहर कभी-कभार एक दे श से नकलकर सरे दे श म चली जा रही ह जसम एक दे श से आबाद का बोझ कम करके सरे दे श म भर दया जाता हो’। 15 अ ू बर को नटाल सरकार के सद य ने अपने धानमं ी सर जॉन रॉ ब सन को एक ज़ री टे ली ाम भेजा जो उस समय इं लड म थेः पछले स ताह पांच सौ वतं भारतीय नटाल आ गए ह। उनके इस आवक को रोका जाना चा हए नह तो नचले दज का सारा ापार उनके हाथ म चला जाएगा। कृपया इस बात क जानकारी म टर चबर लन को द जए और उनसे क हए क

हम यू साउथ वे स (ऑ े लयन उप नवेश जहां अ ेत आ वा सय के आगमन पर रोक लगा द गई थी) के उदाहरण को अपनाना चा हए।28 नटाल के मं ीगण अपने मतदाता क भावना के हसाब से त या दे रहे थे। 26 नवंबर को डरबन के टाउन हॉल म एक वशाल बैठक बुलाई गई जसम सरकार से मांग क गई क नटाल को एक अं ेज़ी उप नवेश के तौर पर बचाकर रखा जाए और भारतीय के अ वास पर रोक लगाकर ‘हमारे न ल क शु ता को बरकरार रखा जाए’। वह सभागार खचाखच भरा आ था जसम ब त सारी म हलाएं भी मौजूद थ । उसम एक व ा म टर ओ हया ने कहा, यह दे खना खद है क इस उप नवेश के ार इन काले और बदरंग लोग के लए खुले ए ह जो कसी भी तरह से हमारे समाज के लोग के लए उपयोगी नह ह। ये लोग कसाइय के लए भी उपयोगी नह ह य क वे मांस नह खाते (ठहाके)। ये लोग बेकर के लए भी उपयोगी नह ह य क वे सफ चावल खाते ह (ठहाके)- जनके वकास का सारा पैसा भारत चला जाता है और जनके यहां आने से दादा अ ला और मूसा जैसे जहाज़ मा लक को फायदा प ंच ता है (ज़ोरदार ठहाका)। वे लोग जूत े बनानेवाल के लए भी अनुप योगी ह य क वे नंगे पांव रहते ह और वे लोग द ज़य के लए भी अनुप योगी है य क उ ह कसी भी तरह के कला मक प रधान क ज़ रत नह होती(म हला को दे खते ए थोड़ा श द छायावाद कर दया गया) ता क वे अपनी अवणनणीय चीज़ को दशा सक।29

उसके अगले पखवाड़े भारतीय आ वा सय के वरोध के लए तीन अलग-अलग सभाएं बुलाई ग । कारपटर और वाइनस सोसाइट के चेयरमैन ने कहा क ‘अगले चुनाव के व सद य को सीधे उन उ मीदवार को मत दे ना चा हए जो ए शयाई लोग के हमल को रोकने के लए काम कर सक’। इस तक पर क भारतीय भी टश नाग रक ह उस व ा ने कहा, उ ह ये बात मालूम होनी चा हए क अगर उनको सूत कातने या कपड़ा बुनने के लए लकशायर या यॉकशायर लाया जाता तो कब तक इं लड के लोग इस बात को बदा त करते। वहां अगर ऐसा होता तो 24 घंट म ही अं ेज़ क भावनाएं उबल पड़त और वहां क सरकार इन ए शयाई लोग को इं लड से नकाल बाहर करने के लए मजबूर हो जाती। और अगर इं लड म वे ऐसा रा ता अ तयार कर सकते ह तो न त ही नटाल क सरकार भी ऐसा कर सकती है।30

सन 1896 के तीसरे स ताह म एस एस कौरलड डरबन के तट पर लगा। उसके साथ एक सरा जहाज एस एस नादे री था और वह भी भारत से ही आ रहा था। उन दोन जहाज़ पर करीब 600 भारतीय थे जनम मोहनदास गांधी का प रवार भी एक था। जहाज़ को आदे श दया गया क वो कुछ दे र समंदर म ही रहे य क मुसा फर क डॉ टरी जांच होनी थी। बंबई ेसीडसी म लेग का कोप आ था और नटाल के अ धकारी इस बात को लेकर डरे ए थे। हालां क लेग के कोप से तो सब प र चत थे ले कन ये ा पत नह हो पाया था क इस बीमारी को फैलाने म चूह और म खय क भू मका होती है। कुछ डॉ टर और यादातर लोग ये सोचते थे क ये बीमारी मानवीय संपक से भी फैल सकती है।31

जस समय वो जहाज़ नटाल के तट पर खड़ा था, कलक ा म भारतीय रा ीय कां ेस क 12व वा षक बैठक हो रही थी। हालां क गांधी उसम उप त नह थे ले कन हाल ही म उ ह ने भारत म द ण अ का म भारतीय क त के बारे म काफ चार कया था। कां ेस ने जन चौबीस ताव को पा रत कया था उसम एक ताव द ण अ का म भारतीय क त के बारे म भी था। उसम भारतीय पर ‘तमाम तरह के तबंध और यूरोपीय लोग ारा उनके अपमानजनक भेदभाव का कड़ा वरोध कया गया’। उस ताव को पेश करते ए म ास के जी. परमे रम प लई ने कहा क जहां भारत म भारतीय लोग वधान प रषद के सद य हो सकते ह और इं लड म वे हाउस ऑफ र ेज़टे टव के सद य हो सकते ह, वह नटाल म हम ाम से बाहर फक दया जाता है, हम फुटपाथ पर नह चलने दया जाता, हम होटल म नह ठहरने दया जाता। हम सावज नक नानागार म नान नह करने दया जाता और हम पर थूका जाता है। हमारा मज़ाक उड़ाया जाता है, हमारे साथ मारपीट होती है। हम गाली द जाती है। हम पर तरह-तरह के अ याचार कए जाते ह जसे कोई भी इंसान बदा त नह कर सकता।32

जब क समंदर के पार सरी तरफ मजाज़ ब कुल अलग था। नटाल म गांधी गोरे लोग के लए घृणा क व तु बन चुके थे, य क उ ह ने अपनी भारत या ा के दौरान क थत प से नटाल के अं ेज़ क तीखी आलोचना क थी। 23 दसंबर को नटाल एडवरटाइज़र ने एक ाथना के प म अपील को का शत कया जसम ‘महान गांधी के खलाफ कठोर कारवाई क मांग क जो एक आ ामक सेना के हरावल द ते के प म ह तान से द ण अ का आया था और वह सेना हमसे हमारी ज़मीन और हमारा घर छ न लेना चाहती थी...हम इसके लए तैयार हो जाना चा हए और संग ठत प से इस हमले का जवाब दे ना चा हए।’33 उसके एक स ताह बाद उसी अखबार ने डरबन के श ुतापूण रवैया रखनेवाले गोर क तरफ से एक काययोजना का खुलासा कया। उसम कहा गया— जस दन भारतीय लोग जहाज़ से उतरगे, उनका सामना वरोध करनेवाले यूरोपीय लोग के समूह से होगा। वे लोग मानव ृंखला बनाकर उनका वरोध करगे और ‘हाथ म हाथ डालकर’ तीन चार कतार ‘उनके कसी तरह के वेश को रोकने का यास करेगी’।34 गांधी और उनके सहयो गय के खलाफ जो गु सा और भय क भावना थी वो उस बात से और भी बढ़ गई क भारतीय अपने साथ बीमारी के क टाणु लाए ह। वे डॉ टर जो दो जहाज़ पर जांच कर रहे थे उनह ने कहा क भारतीय को अभी जहाज़ से उतरने क इजाज़त नह द जा सकती य क उनक राय म लेग का क टाणु वक सत होने म दो स ताह का समय लेता है। ऐसे म इंतज़ार करना ही बेहतर होगा। जहाज़ के क तान को नदश दया गया क रोज़ाना वो डे क को पानी और काब लक ए सड के म ण से साफ

कर। मुसा फर क पूरी सफाई के लए स फर फायर को दन-रात जलाया जाता ता क कसी भी तरह क आशंका न रहे।35 इसी बीच एक अफवाह डरबन प ंची क जहाज़ पर सवार भारतीय, उ ह गैर-कानूनी प से रोकने के लए नटाल सरकार को अदालत म घसीटगे। उस अफवाह के आधार पर एक ानीय अखबार ने लखा क— काब लक ए सड के छड़काव और शु करण के बाद गांधी क ती ण कानूनी बु ने तुरंत इस बात को सूंघ लया है क उस ‘सं त कारावास’ के बाद कैसे इसका आ थक फायदा उठाया जाए। मुकदमा लड़ने के लए उन लोग से जो पैसा इक ा कया जाएगा वो वाभा वक प से गांधी क जेब म जाएगा चाहे मुकदमे म हार हो या जीत। और उस भ पु ष के लए इससे ब ढ़या बात या हो सकती है क एक ऐसा दलच मुकदमा समंदर तट पर उतरते ही उनक झोली म गर जाए।36

गांधी के इस तरह के े षपूण और लालची के प म च ण ने उनके खलाफ समु तट पर जनभावना को और भी उभार दया। 4 जनवरी 1897 को कोई 400 गोरे डरबन के माकट वेयर म जमा ए। एक कसाईखाने का मा लक हैरी ा स उस सभा क अ य ता कर रहा था, य ही वह कुस पर बैठने के लए गया, बा रश होने लगी। उसने उस सभा को नज़द क के टाउन हॉल म बुलाने का फैसला कया। उसके बाद, एक मत से वह वतः ू त भीड़ नगरपा लका भवन क तरफ बढ़ चली। मु य वेश ारा के पास बरामदा और सारी जगह लोग से खचाखच भर ग । कुछ ही समय बाद ार को खोल दया गया और ब यां जला द ग । उसके कुछ ही दे र बाद दरवाज़ को खोल दया गया और फश से लेकर छत तक लोग ही लोग भर गए। जब म टर ा स ने बोलना शु कया तो लोग क सं या न य ही 2000 के आसपास रही होगी...।37

उस बैठक म सरकार से आ ान कया गया क उन दोन जहाज़ को तुरंत भारत वापस भेज दया जाए और गर म टया मज़ र को छोड़कर सारे भारतीय के नटाल म वेश पर तबंध लगाया जाए। भीड़ म से कोई च लाया: ‘उनके साथ गांधी को भी भेज दो!’ मु य व ा एक डॉ टर मै कजी ने, धूत म टर गांधी के बारे म अपने वचार तुत कए...उसने कहा क म टर गांधी ने ह तान क ना लय म हमारी त ा को बहा दया है और उ ह ने नटाल क गंद और याह त वीर पेश क है जैसा क उसक वचा का रंग है... म टर गांधी इस उप नवेश म उन सारी अ और साफसुथरी चीज़ को हा सल करने के लए आए ह और उ ह ने इसका ये सला दया है क उस आ त य के बदले बाहर जाकर नटाल क स पर का लख पोतने का काम कया है। वे म टर गांधी को इस बात का सबक सखाएंगे जो हम उनके कायकलाप से अनुभ व कर रहे ह। गांधी अभी तक उन बात से संतु नह ए ह जो उ ह नटाल म हा सल आ है, लगता है उ ह कुछ और चा हए। उ ह ज़ र यहां से कुछ और मलेगा।

डॉ. मै कज़ी ने आरोप लगाया क भारतीय को डरबन ढोकर ला रहा वो जहाज़ एक बड़ी सा जश का ह सा है जसके तहत नटाल म न लीय व ा को उलट दया जाएगा। इन कोमल और मुलायम ा णय का यह असली उ े य है क वे उस एकमा अ धकार को हा सल कर ल जो अभी तक नटाल के शासक ने अपने हाथ म रखा है और वो चीज़ है—मता धकार। उनका उ े य है क वो संसद

और वधानसभा म जाएं और यूरोपीय लोग के लए क़ानून बनाने का काम कर। वे चाहते ह क वे उनके घर के क व ा पर अ धकार कर ल और यूरोपीय लोग को रसोई म भेज द।38

उसके तीन दन के बाद डरबन के गोर ने एक सरी बैठक क जसम डॉ टर मै कज़ी एक बार फर से मु य व ा थे। उसने कहा, ‘इन भारतीय के लए हद महासागर उ चत जगह है जहां उ ह फक दे ना चा हए(ता लयां)। वहां पर गोरे लोग पानी म उनके अ धकार पर चोट करने नह जाएंगे ले कन गोरे लोग को इस बात के लए सतक रहना होगा क वे ऐसा सु न त कर क वे पानी के नकट ज़मीन पर उ ह उनका अ धकार नह दगे(ता लयां)।’39 यह बैठक पछली बैठक से बड़ी थी और यादा उ ेजनापूण थी। इसने दखाया क(नटाल मरकरी के मुता बक)म टर गांधी ने ये क पना करके बड़ी गलती क है क नटाल के यूरोपीय लोग उनके याकलाप पर चुप बैठे रहगे जब क वे भारत म एक वतं आ वास एजसी चलाते रह और आ वा सय को 1000 से 2000 तमाह क दर से अपने दे श से यहां भेजते रह...अपनी इस चालाक के बावजूद म टर गांधी ने एक बड़ी भूल क है...हमारे पुरख ने तलवार के बल पर इस दे श को जीता था...और ये दे श हम वरासत म एक ज म स अ धकार के तहत मला था। वो ज म स अ धकार हम उसी तरह ानांत रत करगे जैसे वो हम मला था।’40

सन 1896 के आ खरी स ताह म एक मुहावरा और एक अखबारी सुख नटाल के अखबार म काफ लोक य ई थी और वो सुख थी—‘ए शया टक इनवेज़न’ यानी ‘ए शयाई हमला’। उप नवेशवाद इस बात से डरे ए थे क समु म जहाज़ पर इंतज़ार कर रहे कुछ सौ या ी उस बड़े पैमाने पर होनेवाले एक आ वास क शु आत है जो आ खरकार नणया मक प से नटाल क जनां कक य त को बदल कर रख दे गी। और ये माना जा रहा था क उस भीड़ का नेतृ व वो इकलौता श स और वक ल कर रहा है जसका नाम मोहनदास गांधी है। गांधी, जहाज़ पर हर रोज़ नटाल के अखबार को पढ़ रहे थे जो खा और अ य आपू त वाली नौका के माफत आते थे। उ ह समु तट के मजाज़ के बारे म अपने कुछ म ारा लखे गए प से भी पता चला था। 8 जनवरी को एक अं ेज़ वक ल ने गांधी को लखा क अगर वे जहाज़ से उतर तो उनके साथ ‘कुछ भी बुरा होने क आशंका’ है। उसने लखा क ‘दरअसल आपके और वतं भारतीय के यहां आने के खलाफ लोग म इतना गु सा है... क मुझे संदेह है क आप तट पर उतर पाएंगे भी या नह ।’ गांधी क गैरमौजूदगी म वह अं ेज़ अब उनके मुव कल क सहायता कर रहा था और अब उनसे फ स के प म चेक भेजने को कह रहा था। य क ऐसा ब कुल लग रहा था क नादे री और कौरलड नाम के जहाज़ को नटाल के हालात को दे खते ए अपने या य के साथ जबरन वहां से वापस बंबई भेज दया जाता।41 उन जहाज़ को कोई बीस दन तक ऐसे ही समंदर म खड़ा रहना पड़ा। डरबन म इन ए शयाइय के हमल का तकार करने के लए एक ‘यूरोपीय ोटे न एसो शएशन’ का

गठन कया गया। उस एसो शएशन क पहली बैठक 10 जनवरी को आ त क गई। जब एक व ा ने कहा क इन भारतीय का मु य ‘ व ा’ गांधी ‘नाम का एक जं◌ेटलमैन है’ तो ोता म से कसी ने च लाकर कहा—‘उसे जटलमैन नह क हए’। एक अफवाह ये फैली क गांधी इन वरोध दशन से घबरा गए ह और एक अखबार ने तो यहां तक ‘दावा कर दया क जहाज़ का दौरा करनेवाले कुछ अ धका रय ने कहा है क म टर गांधी और उनके साथ के भारतीय ‘सदमे’ क अव ा म ह और ब त सारे लोग तो ये ाथना कर रहे ह क उ ह सीधे ह तान वापस भेज दया जाए।’ 11 जनवरी को नटाल एटवरटाइज़र का एक रपोटर एस एस नादे री जहाज़ के कै टन से सा ा कार करने गया। उसने पाया क जहाज़ पर 356 लोग सवार ह जसम ‘म हला क गोद म ब े’ भी शा मल ह और जैसा क तट पर लोग को भय था उनम से कोई भी श पी या कारीगर नह था। कै टन से ये पूछने पर क जहाज के या ी गांधी के बारे म या राय रखते ह, कै टन ने कहा, ‘जहाज़ पर कोई भी ऐसा आदमी नह है जो यहां आने से पहले गांधी के बारे म जानता हो। मने भी उनके बारे म नह सुना था और मेरे (और साथ ही जहाज़ के) जबरन यहां इतने दन तक रोके जाने के दौरान ही मने उनका ये पचा पढ़ा।’42 अगले दन उस संवाददाता ने खुद गांधी का सा ा कार लया। उस वक ल ने उस अफवाह को खा रज कर दया क जहाज़ पर लुहार और बढ़ई सवार ह या क वे भारत से एक छापाखाना ला रहे ह। गांधी ने कहा क यादातर या ी नटाल के ही नवासी ह जो छु बताकर ह तान से वापस आ रहे ह। नए आनेवाले लोग ापारी, कानदार के सहयोगी और फेरीवाले ह। और उ ह ने कहा क उनका ‘इन नए आनेवाल से कोई लेनादे ना’ नह है। गांधी ने उस सा ा कार म ापक सा ा यवाद आयाम क तरह यान आक षत कया। उ ह ने टप णी क क— हरेक अं ेज़ इस बात पर सहमत है क टश सा ा य का गौरव उसके भारतीय सा ा य को रखने पर आधा रत है और इस बात के म े नज़र उप नवेशवा दय के लए यह बात काफ दे श ोहपूण है क वे इतने तीखे ढं ग से भारतीय के यहां आगमन का वरोध कर रहे ह जब क उनक समृ काफ कुछ भारतीय के म पर नभर करती है। भारतीय को कई तरह के अ धकार से वं चत रखना ठ क नह है और उव नवेशवा दय को भारतीय के मता धकार को वीकार करना चा हए। और ये भी क जन- जन मामल म भारतीय पूरी तरह से स य नह ए ह उसम उप नवेश के लोग को उ ह और भी स य बनाने म मदद करनी चा हए। ऐसा म न त प से सोचता ं क अगर टश सा ा य का सभी ह सा सम वय म रहना चाहता है तो ये नी त पूरे उप नवेश म लागू क जानी चा हए।

उस रपोटर ने पूछा, ‘आपके वापस आने का या मकसद है?’ गांधी ने जवाब दया, म यहां पैसा बनाने के उ े य से वापस नह आया ं, ब क दोन समुदाय के बीच एक वन भा षए के प म काम करने आया ं। दोन समुदाय के बीच म काफ नासमझी का माहौल है और म तब तक दोन समुदाय के बीच पुल बनने का काम करता र ंगा जब तक दोन समुदाय को इस पर कोई एतराज न हो।’43

डरबन एक खूबसूरत ाकृ तक बंदरगाह था जहां ज़मीन क दो प य के बीच समंदर का पानी घुस आया था जसे ‘ वाइंट’ कहते थे और बगल म ही दर त से भरी पहा ड़यां थ जसे ‘ लफ’ कहा जाता था। बंदर के वेश ार पर एक बालू का चलायमान ट ला जो बड़े जहाज़ के लए अवरोध था ले कन सरे तरीके से बंदरगाह क सुर ा भी करता था। जब उस बंदरगाह क ापना ई थी तो पानी क गहराई नचले भाटा के आने तक महज चार फुट क थी ले कन दशक के बाद खुदाई क वजह से गहराई बढ़ा द गई थी, ले कन 1897 म एक बार फर से बड़े जहाज़ के लए आसानी से बंदरगाह म आना क ठन हो गया था। इसी लए वे समु म ही लंगर डाल दे ते थे जहां से छोट नौका से या य और उनके असबाब को तट तक लाया जाता था।44 12 जनवरी 1897 को आ खरकार अ धका रय ने भारतीय या य को तट पर उतरने क इजाज़त दे द । नादे री और कौरलड के क तान को अगले दन सुबह म आगे बढ़ने क इजाज़त दे द गई। यह फैसला तब लया गया जब भारत के वॉयसराय और लंदन म उप नवेश के लए सेकरेटरी ऑफ टे ट ने चेतावनी द क नटाल सरकार के उस फैसले ने महारानी व टो रया के शासनकाल के डायमंड जुबली साल म सा ा य म भाईचारे पर सवा लया नशान खड़ा कर दया है।45 ● समझौते या वचन के श द डरबन म गोरे दशनका रय तक प ंच गए। 13 जनवरी क सुबह को झुंड के झुंड लोग शहर से नकलकर वाइंट क तरफ अपने पेशे के हसाब से समूह म बढ़ने लगे। सबसे आगे रेलवे के कमचारी थे, फर लुहार, उसके बाद बढ़ई, उसके बाद मैके नक, उसके बाद कान म काम करनेवाले, दज़ , ट का काम करनेवाले और आ खर म ऐसे गोरे लोग जो कसी खास पेशे से संबं धत नह थे जसे उस अखबार क रपोट म ‘जनरल प लक’ कहा गया था। उस वरोध- दशन म 5 हज़ार से यादा यूरोपीय लोग ने ह सा लया था। उनके साथ 500 दे सी अ क भी थे और उनके नेतृ व का ज़ मा एक बौने को दे दया गया था जो (गोर के मनोरंजनाथ) ‘उनके आगे-पीछे अपनी लाठ चलाते ए, नाचते-गाते ए और च लाते ए माच कर रहे थे’।46 उस दशन के बारे म जब नटाल के अटॉन -जनरल हैरी इ कॉ ब को सूचना मली तो वह वाइंट तक भागता-भागता आया। इ कॉ ब नाटा था और अपनी आवाज़ को लोग तक प ंचाने के लए वह लकड़ी के एक ढे र पर चढ़ गया और गु साई भीड़ को शांत करने का यास करने लगा। उसने कहा क उन दोन जहाज़ पर जो या ी ह वे नद ष (औरत और ब े भी) ह और नटाल के लोग क उ भावना के बारे म कुछ नह जानते। उसने लोग क भीड़ को ‘शांत, मानवीय और तब ’ बनने क अपील क और ‘हड़बड़ी म न आने

और पागलपन न दखाने’ क अपील क । उसने कहा क लोग अपनी सरकार म यक न रख, नटाल पहले भी ेत उप नवेश था और आगे भी रहेगा। उसने लोग को आ ासन दया क ज द ही संसद क एक बैठक बुलाई जाएगी और एक क़ानून पा रत कया जाएगा जसके तहत ए शयाई लोग के आने पर पाबंद लगा द जाएगी। इ कॉ ब के इस बात का जवाब लोग ने ‘ ह ता नय को वापस भेजो’ कहकर दया। लोग च ला रहे थे, गांधी को तट पर लाओ, उसक तमाम गल तय के लए पकड़कर उसे यहां लाओ। ए कॉ ब ने एक बार फर से भीड़ से शां तपूवक पीछे हट जाने का आ ह कया। उसने कहा क यह महारानी व टो रया के शासनकाल का 60वां साल है और ‘उनके जीवन क सां यवेला म यह कभी नह कहा जाना चा हए क नटाल म कुछ ऐसा हो गया जससे उस महान सा ा ी के दल को चोट प ंची हो’। अब सा ा य क त ा और महारानी के नाम ने भीड़ पर कुछ असर कया और लोग धीरे-धीरे शांत होने लगे। धीरे-धीरे भीड़ छं ट गई।47 दन भर छोट नौका से लोग नादे री और कौरलड से उतारे जाते रहे और तट पर आते रहे। एक तु ीकरण क नी त अपनाते ए जहाज़ के मा लक ने जहाज़ पर यू नयन जैक फहरा दया था। चुपचाप जहाज़ के या ी जहाज़ से उतर गए और भारतीय इलाक क तरफ चले गए। क तूरबा और उनके ब े अब सुर त तट पर आ चुके थे ले कन गांधी अभी तक नादे री पर ही थे जहां उनके एक म और डरबन के सॉ लसीटर एफ. ए. लॉ टन मल गए। अटॉन -जनरल ने संदेश भेजा था क सूया त होने के बाद ही गांधी के लए तट पर उतरना ठ क होगा। ले कन लॉ टन को ये वचार पसंद नह था क गांधी, ‘रात के समय शहर म एक चोर क तरह वेश कर’। खैर कसी तरह वाइंट म हालात सामा य हो गया था। गोरे लोग ततर- बतर हो गए थे और अब ऐसा लगा क गांधी के लए तट पर उतरना ठ क है।48 दोपहर पांच बजे से कुछ ही पहले गांधी और लॉ टन को लेकर नौका तट पर लगी। जैसे ही इसने बालू के ट ले को पार कया तो दा हनी तरफ मुसा फर को डरबन शहर दखाई दया और बा तरफ र तक फैला, दर त से भरा और कम ऊंचाई क पहाड़ी जसे लफ के नाम से जाना जाता था। उनके पीछे वशाल समंदर फैला आ था। यह एक अ त नज़ारा था जो कसी अ य समय म ज़ र मन को आनं दत कर दे ता। ले कन उस समय एक तरफ लफ था तो सरी तरफ एक श ुतापूण रवैया वाला शहर। गांधी का वतन और समंदर तज पर र छू टता जा रहा था और उस समय उ ह यह ज़ र एहसास हो रहा होगा क वह कहां फंस गए ह। जस समय उनक नौका तट के पास आ रही थी, मटरग ती करते कुछ गोरे लड़क ने उ ह दे ख लया और पहचान लया। उ ह ने लौटती भीड़ को गांधी के आने का संदेशा भेजा, जो आनन-फानन म वाइंट पर जमा हो गई। ला टन और गांधी ने एक र ा लया और वहां से तुरंत नकलना चाहा, ले कन लड़क ने र े का प हया थाम लया। गांधी ने सरा

र ा लेना चाहा ले कन र ावाले ने भीड़ का मजाज़ दे खकर उ ह मना कर दया। अब गांधी और ला टन ने अपने सामान के साथ पैदल ही चलने का फैसला कया। व टो रया इंबैकमट (तटबंध) से लेकर उ र क तरफ टगर ट तक वे पैदल ही चले और उनके पीछे गोरे लोग क भीड़ चली जो बड़ी होती गई थी। लोग उन पर ताने कसते और उनका मज़ाक उड़ाते जा रहे थे। उसके बाद उ ह ने वे ट ट क तरफ अपना ख कया। जब वे श स होटल के पास प ंचे—जैसा नाम से ही था क वो एक ऐसी जगह थी जसे जहाज़ी लोग पसंद करते थे—तो गांधी और लॉ टन को घेर लया गया और गांधी पर लोग टू ट पड़े । गांधी पर ‘लात-जूत क बरसात क गई, उन पर क चड़ और सड़ी ई मछ लयां फक ग , कसी एक ने उन पर चाबुक भी बरसाए, जब क सरे ने उनक टोपी उछाल द ।’ गांधी को पीटा गया ले कन वे झुके नह । उनक गरदन के नीचे से खून बह रहा था ले कन च मद द के मुता बक ‘वह डटकर खड़े रहे और उस जानलेवा हमले के बीच त नक भी नह घबराए।’ उस हमले से उ ह एक ेत म हला ने बचाया जसने हमलावर को र रखने के लए अपने छतरी का इ तेमाल कया। वह लंबे समय तक पु लस सुप रटडट रहे आर.सी. अले ज़डर क प नी थी। कुछ भारतीय ारा सू चत कए जाने के बाद पु लस का एक ज ा गांधी और ीमती अले जडर क सुर ा म वहां प ंच गया। कुछ दे र बाद खुद पु लस अधी क अले ज़डर वहां आ गए। पु लसवाल ने गांधी को सुर त फ ट म पारसी तमजी क कान तक प ंचा दया और य ही उ ह ने कान म वेश कया उसका दरवाज़ा भीतर से बंद कर दया गया। कान के बाहर गांधी के खून क यासी भीड़ अनवरत नारे लगाती रही। अब पु लस अधी क के साथ शहर के ड ट मेयर भी आ गए थे और उ ह ने भीड़ से वापस चले जाने का आ ह कया। ले कन उस कान के पास गोर क अ खासी भीड़ जमा हो गई जो बढ़ती ही गई। उ ह ने वहां एक अ ा खासा ‘गांधी वरोधी जमावड़ा’ कर लया। उस ल पर मौजूद एक रपोटर के मुता बक उस भीड़ ने पु लस अधी क को ‘ताना दया क वह कैसा इंसान है और गांधी से य इस तरह का यार भरा वहार कर रहा है। पास ही कह शीरे का एक पीपा था और अगर पु लस अधी क गांधी को भीड़ को स प दे ता तो वे ज़ र उस शीरे से भरा आ पीपा उन पर पलट दे ते। उसके बाद वे एक गीत गाने लगे जसके शु के श द थे—‘हम उस बूढ़े गांधी को एक ख े सेब के पेड़ पर फांसी पर लटका दगे।’ इस बीच अले ज़डर सोचता रहा क गांधी को कैसे सुर त उनके मुकाम तक प ंचाए। वह टोर गया और गांधी को सरकारी चपरासी के कपड़े पहनने को दे दए। गांधी का चेहरा काले रंग से रंग दया गया और मफलर से ढं क दया। उसके बाद दो जासूस क सुर ा म

गांधी बगल के दरवाज़े से बाहर नकले जो तमजी के गोदाम तक जाता था। उसके बाद तीन सड़क पर आ गए और एक घोड़ागाड़ी ले ली जो उ ह लेकर पु लस टे शन तक आई। कुछ दे र बाद खुद ही अले ज़डर भीड़ के सामने कट आ और उसने कहा क गांधी अंदर नह ह। उसने भीड़ म से कुछ लोग को इस बात क त द क करने के लए अंदर बुलाया। भीड़ म से तीन लोग तमजी के टोर के अंदर दा खल ए और ‘उ ह ने कहा क गांधी जहां कह भी ह , ले कन उस इमारत के अंदर नह ह।’ अब तक शाम ढल चुक थी और बा रश शु हो गई। जैसे ही बा रश क बौछार ती होती ग , भीड़ का हौसला टू टता गया। अब ‘लोग सड़क के बीच गांधी को खोजने क बजाए बा रश से बचने का ठकाना ं ढ़ने लगे।’ अब आ खरकार भीड़ छं ट गई। वे लोग कहां गए इस बारे म वह संवाददाता हम कोई ववरण नह दे ता। शायद वह कोई ऐसी जगह होगी जहां चाय के अलावा कुछ अ य खाने-पीने क व तुएं मलती होग ।49 15 जनवरी को नटाल मरकरी ने ‘आ टर द डमां े शन’ नाम से एक संपादक य छापा। उस संपादक य म इस बात को वीकार कया गया क गांधी पर आ हमला एक ‘अस य और नामदगी भरा कृ य’ था। ले कन उसके बाद उसने पी ड़त पर ही सारा दोष मढ़ दया। अखबार ने लखाइसम यादा गलती म टर गांधी क ही है। उ ह ने लोग क भावना को भड़काया है। इतना जानते ए उ ह सलाह द जानी चा हए थी क उनक वजह से पैदा ए इन दशन के म य वे त काल शहर के क म आने क को शश न कर।50

उस संपादक य क त या म एफ. ए. लॉ टन ने गांधी के प म अखबार को एक लंबा प लखा। उस वक ल ने लखा क जब नादे री और कौरलड तट पर आने के इंतज़ार म समु म खड़े थे तो गोर क ेस और नटाल क जनता ने गांधी पर कई भयावह आरोप लगाए। उन लोग ने दावा कया क ‘गांधी ने उनक त ा को भारत क ना लय म बहा दया है और अपने चेहरे क ही तरह गोर क याह त वीर वहां पेश क है’। उ ह ने दावा कया क वे जहाज़ पर सरकार के खलाफ मुसा फर से बात कर रहे थे और मं ाणा कर रहे थे। ये आरोप लगाया गया क वह भयभीत थे और समु तट पर आने से ब त घबरा रहे थे। एक अफवाह के मुता बक ‘वह कौरलड के डे क पर अ य धक उदास मु ा म बैठे थे’ जब क एक सरी अफवाह के मुता बक ‘वह गहरे अवसाद क मु ा म थे।’ गांधी से जान-पहचान और मेल-मुलाकात के सल सले म लॉ टन के ‘मन म उनके त इ ज़त काफ बढ़ गई थी’। उसने पाया क ‘कानूनी और ए शयाई दोन ही मामल म गांधी एक त त तप ी ह’। वह एक ‘ऐसे बड़े राजनी तक मसले म नेतृ व करने के ब कुल का बल ह जसम उनके दे शवासी और हम समान प से दलच ी लेते ह और जो हमारी ही तरह अपने राजनी तक वचार को करने के अ धकारी ह’। लॉ टन ने लखा क जब बार-बार गांधी को ‘कायर नदक’ कहकर चा रत कया गया तो गांधी ने तट पर आने

का फैसला कया ‘ता क वे जनता के सामने अपने आपको नद ष ठहरा सक’ और ‘अपने वरो धय को ये कहने का मौका न दे सक क वो इसे ‘भयभीत’ कर रहे थे।’ रात का इंतज़ार करने के बजाए ‘गांधी ने पौ ष और नेतृ व का प रचय दे ते ए या कह क उ चत ही था क शाम म भीड़ का सामना करने का फैसला कया’। एक वक ल के प म लॉ टन ने गांधी का साथ दे ने का फैसला कया और साथ ही ‘ऐसा करके उसने द शत कया क म टर गांधी एक स मानजनक पेशे से जुड़े ए एक स मानजनक सद य ह’। गांधी के साथ जैसा सलूक कया जा रहा था, ‘उसक त या म लॉ टन ने ऐसा कया और इस उ मीद म कया क उसक उप त से उनको अपमान से बचाया जा सकेगा’। लॉ टन ने उस उ लेखनीय प का अंत अपने शहर और अपने न ल के लोग से ये अपील करके क क वे गांधी से माफ मांग। उसने इस बात पर ज़ोर दया क ‘डरबन ने इस का काफ अपमान कया है’। आगे लॉ टन ने कहा: म इस लए डरबन का नाम ले रहा ं य क डरबन ने ही इस तूफान को ज म दया है और इसके नतीजे के लए वह ज़ मेवार है। गांधी के साथ ए इस वहार से हम सब अपमा नत ह। समान अ धकार और समान बताव क हमारी परंप रा लगता है धूल म मल गई है। हम स य मनु य जैसा वहार करना चा हए और हम चाहे जतना भी बुरा लगे, हम आदरपूवक और उदारतापूवक खेद कट करना चा हए।’51

ला टन, डरबन के उन गने-चुने यूरोपीय लोग म से एक था जसक सहानुभू त उस भीड़ क बजाए गांधी के साथ थी, जो गांधी को घेरकर मार दे ना चाहती थी। कुछ अ य लोग जो इसी तरह के थे, उनम शा मल थे पु लस सु प रटडट आर. सीअले ज़डर और उनक प नी जेन। अले ज़डर दं पती ारा गांधी क र ा कए जाने के एक स ताह बाद गांधी ने उ ह एक भट के साथ ध यवाद का एक प भेजा। हालां क वह प अब उपल नह है और न ही हम ये जानते ह क गांधी ने उ ह भट व प या भेजा था। हां, अले ज़डर दं पती का जवाब ज़ र बचा रह गया है। ीमती अले ज़डर ने अपने जवाब म लखा क उनक छतरी ारा उनको बचाया जाना ‘उस अ याय क तुलना म कुछ भी नह था जो उनके दे शवा सय ने उनके साथ कया था’। वह चाहती थ क गांधी ारा भेजे उपहार को उ ह लौटा द ले कन ‘उ ह ने महसूस कया क ऐसा करने से उस अपमान म बढ़ो री ही होगी जो उ ह ब त सारे लोग से मला होगा’। जहां तक पु लस क तान क बात थी तो उनक राय म उ ह ने गांधी के बचाव म ब त कुछ खास नह कया। उसने लखा, ‘ब क म तो ब त खी ं क मेरे पास पया त पु लस बल नह था क म आपको कसी तरह के हमल या तान से बचा सकता। जस तरह का अपमान आपको झेलना पड़ा या जस तरह से भीड़ से बचकर आपको नकलना पड़ा, उससे म आपको बचा नह सका।’ क तान ने व ास कया क ‘उसके अपने मसीहा (ईसा मसीह) क तरह ही गांधी को जब इसक जांच या से (ई र के सम ) गुज़रना

पड़े गा तो वह उन लोग को माफ कर दगे, य क वे जानते ही नह ह क वे या कर रहे ह।’52 लॉ टन और अले ज़डर दं पती के इस कदर समथन से गांधी गहरे तक भा वत ए। इसी बीच डरबन के एक अ य यूरोपीय नवासी ने, जसे हम उसके शु आती नाम ‘डी. बी.’ के तौर पर जानते ह, गांधी के बारे म सहानुभू तपूवक एक लेख लखा। वह लेख यूयॉक के आ ामक सा ता हक द नेशन म का शत आ। उस लेख म डरबन म भीड़ ारा कए गए उप व और गांधी के साथ क गई बदसलूक के आधार पर ये सवाल उठाया क न लीय मामल म कहां के लोग यादा त यावाद होते ह—अमे रक या टश? ‘डी. बी.’ ने कहा क उ ीसव सद के म य म अं ेज़ को ग तशील सा ा यवाद माना जाता था ज ह ने दास था का अंत कया और मु ापार को बढ़ावा दया। टश सा ा य के दरवाज़े ‘हर रा ीयता के लोग के लए खुले ए थे और इसक चारद वारी के अंदर कसी तरह का भेदभाव नह था। वहां ीक या य द , खतना कए लोग या बगैर खतना कए लोग, बारबे रयन, सी थयन, बंधुआ या मु य के बीच कसी तरह का भेदभाव नह था’। ले कन ज द ही चीज़ बदलने लग । ‘सन 1857 के भारतीय व ोह और सन 1865 के जमायकन व ोह के बाद हमने एक ऐसी ू रता अपना ली जसे कभी कसी स य जगत ने द शत नह कया था और जसे उ को ट क सं कृ त वाले लोग ने यायो चत ठहराने क को शश क ’। उप नवेश-दर-उप नवेश हम संर णा मक नी तयां लागू करने लगे, दे सी लोग का दमन करने लगे, अ ेत आ वा सय पर रोक लगाने लगे और द णी अमे रका के लोग क तरह ही न लवाद द वार खड़ी करने लगे।’ टश दखावट पन सबसे यादा द ण अ का म सामने आ रहा था जहां भारतीय के साथ ‘उनका वहार उस स ांत के ब कुल उलट था जसम सा ा य सभी जा को बराबर अ धकार और सुर ा का वादा करता था’। ‘डी. बी.’ ने ‘ ह वक ल एम. के. गांधी’ ारा लखे पच का सं त प तुत कया जसने सा ा य क भारतीय जा के त हो रहे ‘भेदभाव के त लोग का यान आक षत कया था’। इसके बदले गांधी को भीड़ का गु सा सहना पड़ा और उनक जान पर बन आई। उस हमले और उसके ापक प रणाम को ‘डी. बी.’ ने दो वलंत प म पैरा ाफ म कया: अपने दे शवा सय के त कए जा रहे भेदभाव को उजागर करने के लए गांधी क नटाल वापसी पर भीड़ ने जो उनके साथ सलूक कया वो हम संयु रा य अमे रका म दास था उ मूलन के शु आती दन क याद दलाता है। जब उनका ट मर तट के पास आकर लगा तो गोर क एक उप वी भीड़ ने उ ह घेर लया। वह भीड़ प र और ला ठय से लैस थी। कसी तरह उ ह बचाकर एक दो त के घर ले जाया गया, उन पर ट-प र फके गए और उनके खलाफ कटु बाते कह ग ।

स ाई तो ये है क अं ेज़ी भाषी प रवार क महान शाखा अपने इस आंत रक गुण या बलता पर गौरव महसूस नह कर सकती। जब क उसी समय समान अ धकार के कानून

वाला अमे रक सं वधान (भले ही वह वग य पूवा ह क वजह से तोड़ा-मरोड़ा गया हो) ब त तेज़ी से बराबर अ धकार और वतं ता क तरफ झुका आ नज़र आता है, ब न बत टश सा ा य के सं वधान के— जसम सा ा यवाद पूवा ह और अ धकार के त भेदभाव असमान क़ानून के तहत मा य ह।53 अमे रक ेस म यह गांधी का थम च ण है जो सन 1920 और 30 के दशक म एक रा वाद नायक के प म उनक ापक ग त व धय क मानो भू मका के समान है। नटाल के अखबार म अपने बारे म छपा दे खने और आलोचना पढ़ने के गांधी आद हो चुके थे। कभी-कभार जो भारतीय समाचार प म सकारा मक खबर छप जाया करती थ , वही उ ह सां वना दे ती थ । अगर उ ह ने द नेशन म छपा यह लेखा दे खा होता तो न य ही वह ब त खुश होते।53 एफ. ए. लॉ टन, अले ज़डर दं पती और ‘डी. बी.’ जैसे लोग कुछ ऐसी आवाज थ जो वहां गनीचुनी थ ले कन वे बहा र आवाज़ थी। नटाल म गोर के मजाज़ के बारे म टाइ स ऑफ नटाल म छपी कुछ ट प णयां यादा काश डाल रही थ जसम कहा गया था क गांधी ने ‘ दन के उजाले म तट पर उतर कर बड़ी बेवकूफ का प रचय दया य क उस समय शहर उ ेजना से उबल रहा था’। अखबार क राय थी क डरबन शहर क आलोचना या उसक भ सना करने क बजाए ‘उसे बधाई दे ना चा हए। उसके नाग रक ने भावकारी तरीके से ये दखाया है क वे भारतीय के बड़े हमले के खलाफ ह...उस हमले के खलाफ आवाज़ उठाकर डरबन ने पूरी जनता का यान अपनी तरफ आक षत कया है...और ऐसा करके वह सारे उप नवेशवा दय के ध यवाद का पा है।’54 17 फरवरी 1897 को, यानी गांधी के डरबन आने के चार स ताह बाद कसाई हैरी ा स ने (उस भीड़ को उकसाने वाला मु य ष ं कता जसने गांधी पर हमला कया था) फर से टाउन हॉल म यूरोपीय लोग क एक उ ेजक बैठक बुलाई। उस बैठक म उस क़ानून को लाने पर ज़ोर दया गया जसके तहत गर म टया मज र के अलावा कसी भी भारतीय के वहां आने पर पाबंद हो। ा स ने कहा, ‘वह अपने घर के लए अपनी जान तक दे ने के लए पूरी तरह से तैयार है’। एक अ य व ा ने मांग क क सा ा य क सरकार ‘भारतीय को तु करने के लए नटाल को एक कचराघर क तरह इ तेमाल न करे’। एक तीसरे व ा ने कहा, म टर गांधी के बारे म कई तरह क बात कही जा चुक ह। आप पाएंगे क उ ह डरबन म महज 50 या 60 लोग का समथन हा सल है और उनक कसी भी सभा म 150 से यादा ए शयाई नह जुटते ह। ये कहना क म टर गांधी या उनक कमेट को उप नवेश के 50,000 लोग का समथन हा सल है, एक अनाप-शनाप त य है।55



डरबन म वाइंट पर ए हमले से साढ़े तीन साल पहले पीटरमै रट् ज़बग रेलवे टे शन पर मोहनदास गांधी को एक थम ेणी के कूपे से बाहर फक दया गया था। बाद क कहानी सबको मालूम है, ब क कुछ यादा ही मालूम है। अगर द ण अ का म गांधी के जीवन के बारे म कोई एक बात भी जानता है तो इस बारे म ज़ र जानता है। एक कताब और एक फ म म इस घटना का ब ढ़या च ण कया गया है। सन 1951 म लुईस फशर ने द लाईफ ऑफ महा मा नाम क एक कताब लखी जसे लेखक ने गांधी से अपने नजी प रचय और नज़द क के आधार पर लखा था जो गांधी के जीवन के अं तम दशक पर आधा रत था। नजी अंतरंगता और ताज़ा यादगार लेखन उस कताब को बेहद पठनीय बना दे ता है। वह कताब अपने थम काशन से लेकर अब तक हमेशा पाठक क पसंद रही है। थम ेणी के ड बे से बाहर नकाल दए जाने क घटना को फशर ने गांधी के जीवन के सबसे ‘रचना मक’ अनुभव का दज़ा दया। उसने दावा कया क ‘मै रट् जबग म बीती उस कटु रात को गांधी के भीतर सामा जक तरोध का बीज पैदा आ।’ अपनी आ मकथा म गांधी का वो ववरण एक गहन उ े जत पैरा ाफ म दज है। फशर ने क पना के आधार पर खुद को गांधी के ान पर रखते ए लखा: या उ ह भारत लौट जाना चा हए? इस कांड ने एक वराट प र त को त ब बत कया। या उ ह इसे खुद ही सुलझाना चा हए और अपनी नजी त क भरपाई कर, मुकदमे को रफादफा कर चुप चाप भारत लौट जाना चा हए? रंगभेद क खतरनाक बीमारी से उनका सामना आ था। ऐसी प र त म वहां से भाग जाना, अपने दे शवा सय को असहाय छोड़ दे ना एक कायराना काम होता। उस कृषकाय वक ल ने अपने आपको डे वड क भू मका म दे खना शु कया जो न लीय भेदभाव क वजह से गो लयथ पर हमला कर रहा था।56

सरी बार इस ववरण को रचड एटनबरो क मश र फ म गांधी म फ माया गया जसम (इस फ म व अ य सरे ए पसोड के लए) फशर क कताब को मु य ोत के तौर पर लया गया। वह फ म सन 1948 म गांधी क ह या से शु होती है और फर सीधे सन 1893 पर चली जाती है जहां गांधी को े न से नकाल दया गया था— जसम इसे महा मा गांधी के जीवन और क रयर क पहली मह वपूण घटना के तौर पर द शत कया गया। इस लए एक लोक य कताब और उससे भी यादा लोक य फ म पर आधा रत गांधी के जीवन का कथानक उस रेलवे टे शन पर घट घटना और उसके बाद उनके ारा द ण अ का और भारत म चलाए गए जनआंदोलन तक सीधे वाह म बहती है। डरबन म ए हमले और उसक पूवपी ठका के त य (जो हाल तक लगभग अ ात ही थे) उस कथानक क रेखा को यादा पैनी, यादा आक मक और यादा स य बना दे ती है। जब उ ह पी मै रज़बग म े न के ड बे से बाहर फका गया, गांधी को शारी रक प से कोई चोट नह लगी। वह फर से अपनी या ा पर रवाना हो गए। डरबन म उन पर फर

हमला आ और उ ह पीटा गया। हालां क दोन घटना म मु य अंतर कुछ यूं हैः े न म गांधी एक के न लवाद के शकार थे जो एक ही बार अ भ आ था। ले कन जब वह डरबन के तट पर उतरे तो वह नटाल के (लगभग) सभी गोर के सामू हक गु से का शकार ए जो क कई स ताह तक लगातार चलता रहा। गांधी पर डरबन म आ हमला पीटरमै रट् ज़बग म ए अपमान से ब त यादा मह वपूण था और द ण अ का क न लीय राजनी त और मोहनदास गांधी ारा झेली जा रहे चुनौ तय को तरीके से बयान करता था।

6 वफादार वक ल

माच 1897 म हैरी इ कॉ ब नटाल के धानमं ी चुने गए जो उसका उप नवेश के त द गई लंबी सेवा का तफल था। सन 1838 म लंदन म हैरी इ कॉ ब का ज म आ था और अपनी नौजवानी म वह डरबन आया था। ज द ही वह एक उभरता आ वक ल बन गया और वकालत से बाहर भी उसने कई े म काफ योगदान दए। मसाल के तौर पर नटाल हाबर बोड के अ य के प म उसी क दे खरेख म बालु के उन ट ल को हटाया गया जो जहाज़ के डरबन हाबर म आने क राह म बाधा थे।1 इ कॉ ब वक ल था तो उसने नटाल और ांसवाल क अदालत म भारतीय क तरफ से मुकदमे भी लड़े थे। उसने दादा अ ला एंड कंपनी के लए भी कुछ काम कया था। उसी ने नटाल बार म गांधी का अनुमोदन भी कया था। दोन क अ सर कभी अदालत म तो कभी सड़क पर मुलाकात होती रहती थ — य क इ कॉ ब, गांधी के नवास से कुछ ही र बीच ोव के इलाके म रहता था। नजी तौर पर म होते ए भी गोर का त न ध होने के नाते इ कॉ ब के मन म भारतीय के त म त भावनाएं थ । सन 1890 म सांसद बनने के तुरंत बाद जब वह एक बार घर आ रहा था तो एक गोरे मैके नक ने उसका रा ता रोका और चेतावनी द क ‘अगर उसने भारतीय को नकाल-बाहर करनेवाले क़ानून के प म वोट नह दया तो उसे जाना होगा।’ उस घटना ने उसे और भी स य बना दया। इस तरह मई, 1895 म 3 पाउं ड वाले कर का समथन करते ए उसने संसद म कहा क ‘उसक सुर ा म एक भारतीय का रखा जाना ज़ री है’। उस कर म नटाल के लोग क इ ा का स मान कया गया था जसम कहा गया क ‘मज़ र के प म भारतीय का वागत है ले कन बा शद और त धय के प म नह ’।2 सन 1896-7 म भारतीय और गांधी वरोधी आंदोलन ने इ कॉ ब के वचार को और भी पु ता कर दया। जब वह धानमं ी बना तो उसक सरकार ने तीन नए कानून का ताव कया। पहला क़ानून उप नवेश को यह अ धकार दे नेवाला था क ऐसी जगह से आनेवाले लोग को फर से वापस भेज दया जाए जहां वतमान म लेग या कोई अ य महामारी फैली ई है। सरे क़ानून के अनुसार ‘ऐसे आ वासी को तबं धत आ वासी माना जाना था जो

कसी यूरोपीय भाषा म अपना ह ता र नह कर पाते ह । तीसरे क़ानून के मुता बक टाउन बोड को ये अ धकार मलने वाला था क जो ापारी अपना रेकॉड अं ेज़ी म नह लखे या जसका कायालय या कान साफ-सुथरा या शौचालय यु नह होगा उनका लाइसस नवीकृत नह कया जाएगा’।3 हालां क उस वधेयक म कह भी ‘भारतीय या ए शयाई’ श द का ज़ नह था, ले कन साफ था क कसको ल य करके वह ताव लाया गया था। संसद म नए वधेयक को पेश करते ए धानमं ी ने कहा क ‘नटाल को एक टश उप नवेश बनाए रखने का हरसंभव यास कया जाना चा हए।’ और इसे ‘ए शयाई आ वा सय क बाढ़ म डू बने से बचाया जाना चा हए’। इ कॉ ब ने आगे कहा: हमने खुद ही यहां 50,000 भारतीय को बसाया है और उनके पीछे अब ब त सारे भारतीय यहां आते जा रहे ह। ऐसा इस लए है य क ये भारतीय जब अपने मु क, अपने गांव जाते ह तो ये बताते ह क नटाल भारतीय आ वा सय के लए वग है। ऐसा है भी। और अगर आप उ ह इसे भारतीय के लए वग बनाने क अनुम त दगे तो जहां तक यूरोपीय लोग का संबंध है आप पाएंगे क यह वग से ब कुल उ टा हो गया है।4

सन 1897 के पहले महीने म पारसी वक ल एफ. एस. तालेयारखान ने गांधी को कई प लखा और अपने डरबन आने के बारे म पूछा। माच क शु आत म गांधी ने उनके प का जवाब दे ते ए चता क और कहा क ‘वतमान माहौल म उ ह नह लगता क डरबन आने क सलाह दे ना उ चत होगा। सावज नक जीवन जीनेवाले कसी का डरबन आना उस के जीवन के लए अभी खतरा हो सकता है। मुझे इस बात क न त तौर पर खुशी है क आप मेरे साथ नह आए।’5 अपने जीवन को खतरे म डाल चुके गांधी ने अपने म को डरबन आकर खतरा मोल लेने क सलाह दे ने से इ कार कर दया। उसके दो स ताह के बाद गांधी ने नटाल मरकरी को एक लंबा प लखा, जो उनक वापसी के बाद उनका पहला सावज नक व था। उ ह ने इस बात से इ कार कया क उ ह ने भारत म उप नवेश क ‘ याह त वीर’ सामने रखी है या क वे उप नवेश को भारतीय से भर दे ना चाहते ह और उनक कोई राजनी तक मह वाकां ा है। वह नटाल म इस लए नह ह क दोन समुदाय (भारतीय और यूरोपीय) के बीच म असंतोष पैदा कर। ब क वे चाहते ह क दोन समुदाय के बीच सामंज य पैदा हो...मुझे बताया गया है क इं लड और भारत लंबे समय तक साथ रह सकते ह, ले कन ऐसा तभी हो सकता है जब दोन समुदाय के लोग के बीच एक साझा भाईचारे क भावना पैदा हो। टश प और भारत के महानतम बु मान लोग उस उ े य क पू त के लए बेचैन ह। म तो सफ उनके पद- च का अनुसरण कर रहा ं और महसूस करता ं क नटाल म यूरोपीय लोग क जो हा लया कारवाई है वो अगर रोकने नह तो कम से कम उस अ भ से पीछे हटने क एक सोची समझी को शश है।

उ ह ने यहां तक कहा क नटाल क संसद म जो मौजूदा वधेयक पेश कए गए ह वे ‘पूवा ह से त ह और भारतीय के हत को भा वत करनेवाले ह’।6 ेस को भेजे जाने वाले इस प के साथ नटाल वधानसभा (उप नवेश क संसद का नचला सदन) को भेजा गया एक आवेदन भी संल न था। गांधी ने कहा क न लवाद के संदभ म दखावट समानता के बावजूद ‘नए वधेयक सफ भारतीय को ल य करके बनाए गए है’। जन ापा रक लाइसस को नवीकरण से वं चत कर दया गया था उसे कोट म अपील करने क अनुम त नह थी। गांधी ने कहा क ‘यह स य जगत म कह भी मनमानापूण फैसला माना जाएगा’।7 ले कन इससे उप नवेशवा दय पर र ी भर असर नह पड़ा। उसके बाद नटाल इं डयन कां ेस ने उप नवेश मामल के सेकरेटरी जोसेफ चबर लन को प लखा जसम उस वधेयक ारा भारतीय को ापार से बाहर रखने और उनके साथ भेदभाव कए जाने के त वरोध कट कया गया। उस प म इस बात को रेखां कत कया गया क कसी भारतीय भाषा म पढ़े - लखे को सफ इस आधार पर उप नवेश म नह आने दया जाएगा क वह अं ेज़ी म अपना नाम नह लख पाता।8 लगता है चबर लन ने प का जवाब नह दया। वह महारानी से वधेयक को सहम त दलवाना चाहता था। लंदन म उप नवेश के धानमं य क एक बैठक को संबो धत करते ए चबर लन ने कहा क उसे ‘इन उप नवेश के गोरे नवा सय क उन तब ता से पूरी सहानुभू त है जो हज़ार लाख ए शयाई लोग क तरह ही लगभग यह सोचते ह क ऐसे लोग क बाढ़ को रोका जाना चा हए जो स यता, धम और री त- रवाज़ म हमसे ब कुल अलग ह’। जब चबर लन का यह भाषण नटाल के ेस म छपा तो गांधी ने दादाभाई नौरोजी को एक सतकता भरा प लखा। उस प म उ ह ने लखा क ‘उप नवेश मामल के सेकरेटरी ने पूरी तरह से भारतीय हत क अनदे खी क है और व भ उप नवेश के दबाव के सामने झुक गए ह’। गांधी ने इं लड म भारतीय समुदाय के उस स मा नत नेता को लखा, ‘हम श वहीन हो गए ह। अब ये सब कुछ हम आप पर छोड़ते ह। हमारी एकमा आशा क करण आप ही ह क आप फर से इस मामले म आंदोलन कर और हमारे प म दोगुनी ताकत के साथ अपनी बात को रख।’9 नौरोजी ने चबर लन से मुलाकात का व मांगा ले कन उ ह व नह दया गया। उसके बाद उ ह ने कुछ तीखे ढं ग से उसे प लखा, ‘मुझे सफ इतना ही कहना है क हम बारबार कहा गया है क हम सब टश सा ा य क जा ह और महारानी क जा इस दे श म दास नह है। म हमेशा से इन बात को महारानी के व और उ ोषणा क नगाह से दे खता आया ं।’10 उन घोषणा म वो घोषणाएं सबसे मह वपूण थ जो महारानी

व टो रया ने तब क थ जब सन 1858 म टश सरकार ने सीधे तौर पर भारत का शासन अपने हाथ म ले लया था। उसम कहा गया था क टश सा ा य और स ाट भारतीय जा के साथ उसी तरह तब ह जैसे वे सा ा य के सरे े क जा के साथ ह। और परम पता के आशीवाद से हम उन तमाम तब ता को पूरा करगे...और हमारी ये इ ा है क हमारी तमाम जा चाहे जस भी न ल क हो या कसी भी मत को माननेवाली हो उसे उसक यो यता, श ा, न ा के मुत ा बक बना कसी भेदभाव के हमारी सेवा म जगह द जाएगी...।11

नौरोजी ने चबर लन को याद दलाया क नटाल का वधेयक साफतौर महारानी क उस घोषणा का उ लंघन था। सतंबर 1897 म पाट म आंत रक मतभेद क वजह से हैरी इ कॉ ब को धानमं ी पद से इ तीफा दे ना पड़ा। इ तीफा दे ने से पहले उसने ‘भारतीय समुदाय के बीच संदेश सा रत करने के लए गांधी को लखा क कस तरह उनके ारा दए गए अ े वचार के आधार पर उसने मू य न मत कए’। फर प को गत व प दे ते ए उसने गांधी को इस बात के लए ‘ध यवाद दया क उ ह ने भारतीय समुदाय के साथ उसक नकटता म मदद दान क और एक सरे को समझने म मदद क जो अपने आप म एक बड़ी उपल है।’12 ले कन कुछ ही महीने पहले जस तरह के भेदभावकारी वधेयक को इ कॉ ब ने संसद म पा रत करवाया था, उसके म े नज़र उसका प ब कुल तु और कपट से भरा आ था। या ऐसा हो सकता है क भले ही वह भारतीय समुदाय के लोग को समान नाग रक के प म वीकार न कर पाया हो, ले कन उसे अपने कानूनी पेशे म अदालत म मुव कल के तौर पर भारतीय क ज़ रत थी? इसका कोई भी जवाब प के तौर पर नह दया जा सकता, य क साल के ख म होने से पहले ही इ कॉ ब क मौत हो गई। ● बीच ोव का वो मकान जहां गांधी कभी अकेले रहते थे, अब उनक प नी और ब का भी आवास बन गया। अब यह उनक वैवा हक ज़दगी के पं ह साल म पहली बार हो रहा था क वह और उनक प नी साथ-साथ प रवार चला रहे थे। राजकोट म वे लोग एक पारंप रक संयु प रवार म रहते थे जो दो-मं ज़ला मकान था और जसे ‘कबा गांधी नो डे लो’ के नाम से जाना जाता था। मकान के पतृ-पु ष जनके नाम पर इसका नामकरण आ था, सन 1885 म वग सधार चुके थे ले कन उनके ब े अब भी उसम अपने ब के साथ रहते थे। उस घर म कई कमरे थे, ले कन रसोई एक ही थी। ह रलाल और म नलाल अपने चचेरे भाइय के साथ आंगन और ग लय म खेलते थे और रवाज़ के हसाब से जैसा क परंपरा थी, उ ह अपना ही भाई मानते थे। भोजन और सोने के समय

उनक मां के साथ-साथ उनक चा चयां भी उनका दे खभाल करत थी। ले कन यहां डरबन म गांधी प रवार एक एकल प रवार के प म जीने क आदत डाल रहा था जहां क तूरबा अपने रसोई और ब क एकमा दे खरेख करनेवाली थ । हरेक सुबह गांधी अपने ब और प नी को छोड़कर अपने नए वकालत के कायालय क तरफ नकल पड़ते थे जो मरकरी लेन नाम के एक पेड़-पौध से आ ा दत सड़क पर था। उनका चबर शहर के मु य अखबार नटाल मरकरी के कायालय के सामने था।13 मोहनदास गांधी क वकालत क ै टस के कुछ ववरण नटाल क राजधानी पीटरमै रट् ज़बग के सावज नक अ भलेखागार म सुर त ह।14 उनका यादातर काय अनुम तप और पर मट हा सल करने से संबं धत था। नटाल म भारतीय के लए या ा और आवास क ज़ रत दन दन ह होती जा रही थ । ऐसे म गांधी का काम लोग को ता का लक प से राहत दलवाना था। केप का एक ापारी डरबन म अपने पाटनर से मलने आना चाहता था, गांधी ने उसक तरफ से एक महीने के अनुम तप का आवेदन दया। भारत जाने वाले मुसा फर बंदरगाह पर अटक गए थे, गांधी ने अ धका रय से आ ह कया क उ ह शहर घूमने क इजाज़त द जाए और रात को वे जहाज़ पर लौट जाएंगे। एक ापारी कुछ दन के लए भारत जाना चाहता था, गांधी ने उसके भाई को उसक जगह पर ापार करने क इजाज़त दे ने के लए आवेदन दया। गांधी के मुव कल का नाम-दादाभाई, मुताले, मु नसामी, हसनजी, तमजी, अपासामी, नायडू , एडवड नंद , ठाकरसी-उनके अलग-अलग समुदाय को द शत करते ह। वे लोग पारसी, ह , ईसाई और मुसलमान थे और गुजराती, हद , तेलुगू, उ और त मल बोलते थे। उसी तरह मुकदम क व वधता भी गज़ब क थी। एक भारतीय जो एक अ ा टाइ प ट था, वो स वल सेवा म जाना चाहता था, गांधी ने सरकार से आ ह कया क जब नौकरी क र आएगी तो उसे उसम शा मल कया जाए। गांधी के मा यम से एक यो य भारतीय डॉ टर ने नटाल म मे डकल ै टशनर के तौर पर र ज े शन के लए आवेदन दया। एक भारतीय ापारी पर हमला आ और यूरोपीय लोग ने उसे लूट लया। हमलावर को गर तार कर लया गया, ले कन ज़मानत दे द गई। गांधी ने आवेदन कया क ज़मानत क रकम से उनके मुव कल क भरपाई क जाए। एक खास तरह का मुकदमा था मुह मद सैन का जो लेडी मथ म एक भारतीय ापारी का भाई था। ज म से ही वह वकलांग था, उसे सफ एक पैर और एक हाथ था। वह गुजरात म रहता था, जब क उसका प रवार नटाल म समृ हो गया था। सतंबर 1899 म गांधी ने आवेदन दया क क णा क भावना को यान म रखते ए सैन को नटाल आने दया जाए। उ ह ने कहा क ‘ सैन का प रवार उसे अपने साथ रखना चाहता था ता क खच भी बचे और सैन उनके साथ रहकर भावना मक संबल भी हा सल कर सके।’ उसके बाद गांधी ने कहा, ‘मेरे वचार म यह इ ा ब त ही ाकृ तक है और उ चत है। यह

ए शयाई लोग क बाढ़ को रोकने के क़ानून के आड़े नह आती है।’(हालां क भा यवश हम कसी रकॉड से पता नह चलता क मोहमद सैन को नटाल आने दया गया या नह ।) गांधी के ऑ फस ारा जो प चार होता था, उससे उनके पेशेवर संपक क लंबी सूची का भी पता चलता है। उनका जन यूरोपीय से प चार होता था उसम एक फा स, एक फेयरफ और एक े ज़र महाशय का नाम आता है जो शायद सबके सब वक ल थे। साथ ही उन प चार म उनके पुराने म मसलन ए. ड यूबेकर और एफ. ए. लॉ टन का नाम भी सामने आता है ( जनका ज़ यहां भी है)। वदे श से आनेवाले कई प म से दादाभाई नौरोजी के प भी ह। डरबन म गुजराती ापा रय के नाम उतने अ धक नह ह, शायद इसक वजह ये है क इसम सफ अं ेज़ी प को ही शा मल कया गया है और गांधी क अपने दे शवा सय से यादातर बातचीत अपनी ही भाषा म होती थी। कुछ प ाचार ोटे टर ऑफ इ म ट् स (आ वा सय का संर क-जो सरकारी पद होता था) के साथ भी है और वो संभवतः गर म टया मज़ र के साथ कए जानेवाले वहार को लेकर है। इ ेरजा शुगर इ टे ट के एक आं ल-भारतीय सुपरवाइज़र ने गांधी को कु लय ( गर म टया मज़ र ) के साथ कए जानेवाले वहार के बारे म लखा था। उ ह कड़ाके क ठं ड और बा रश म भी लंबे समय तक काम करने को बा य कया जाता था। शकायत करने पर उनक पटाई क जाती थी। उस सुपरवाइज़र ने ‘कभी जानवर को भी इतनी यातना म नह दे खा था जैसा उन अभागे मज़ र के साथ वहार कया जाता था’। उस सुपरवाइज़र ने गांधी से आ ह कया क उसका नाम का शत कए बगैर वो इस मु े को ोटे टर के सामने उठाएं।15 वह रेकॉड जनवरी 1895 से लेकर माच 1898 तक के प चार का ववरण दे ता है। उसम सबसे यादा उलझाऊ व दो प को लेकर है जो न त तौर पर म टर एम. ए. ज ा का है। यह वही आदमी ह जो खुद लंदन म श त एक गुजराती वक ल थे और सन तीस और चालीस के दशक म गांधी के सबसे बड़े भारतीय त ं बन गए थे। अब तक के इ तहासकार ने ये द शत कया है क ज ा, द ण अ का म गांधी के सावज नक काय के बारे म सन 1908 से जानते थे, ले कन जैसा क यह लॉगबुक ( रकॉड) खुलासा करता है (जो अहमदाबाद के साबरमती आ म क दराज म करीने से रखा आ और जसम गांधी को भेजे गए लगभग सारे प मौजूद ह) क वे दोन उससे करीब एक दशक पहले से संपक म थे।16 ये प 21 जनवरी और 24 जुलाई 1897 के ह। उस प का मज़मून तो नह पता चल पाया है ले कन दोन य क ज़दगी से जो भी हम पता चला है, उस आधार पर कुछ अनुमान तो नकाले ही जा सकते ह। या ज ा का पहला प कोई शुभकामना संदेश था

जो उ ह ने डरबन म वाइंट पर गांधी पर ए हमले के बाद भेजा था? या दोन ही प द ण अ का म कसी संभा वत क रयर क खोजखबर या तलाश के लए भेजे गए थे? सन 1896 म ज ा, लंदन से अपने गृहनगर कराची लौट आए। उसके कुछ ही दन बाद वह बंबई आ गए। वहां गांधी क तरह ही ज ा को भी एक वतं वकालत का वसाय ा पत करने म द कत ई। हम ात है क गांधी भारत से कुछ वक ल को नटाल लाने के इ ु क थे, जससे उ ह मदद मल सके। इसी लए उ ह ने पारसी वक ल एफ. एस. तालेयारखान को इसका योता भेजा था। ज ा, लंदन और बंबई म ज़ र तेलयारखान को जानते ह गे और इस वजह से उ ह समंदर पार अ का म कसी संभावना क भनक लगी हो सकती है। तो या उ ह ने गांधी से इस लए संपक कया था क इस दशा म कैसे आगे बढ़? या गांधी ने ही आगे बढ़कर ज ा से इस बाबत बात क थी? ज ा एक गुजराती मुसलमान थे और जहां तक गत और पेशेवर पृ भू म क बात है तो वह नटाल के भारतीय के बीच काम करने के लए ब कुल ही सुयो य वक ल थे। ये बात क ज ा ने गांधी पर हमले और उनके घायल होने के बाद संवेदना संदेश भेजा होगा, ब कुल संभा हो सकती है। ये बात भी पूरी तरह से असंभव नह है क ज ा ने गांधी से द ण अ का म कसी तरह क कानूनी साझेदारी म काम करने क इ ा क हो। ले कन इससे आगे हम अनुमान नह लगाना चा हए। फलहाल हम यही जानते ह क ह तान और पा क तान के बंटवारे और उसक आज़ाद से पचास बरस पहले दोन दे श के रा पता कसी न कसी वजह से एक सरे से प ाचार कर रहे थे! ● अदालत म गांधी क तभा क उन अं ेज़ ने भी तारीफ क जो उनका वरोध कर रहे थे। एक दवा लएपन के मुकदमे म उ ह ने कसी कज़ दे ने वाले का त न ध व कया, जब क आर. एच. ताथम ने सरे प का। जब गांधी का ताव- क कज़ लेनेवाले के कारोबार को बेच दे ना चा हए— वीकार कर लया गया और ताथम का एक वैक पक ताव खा रज हो गया तो ताथम ने वनोदपूण लहजे म ट पणी क , ‘गांधी े ह। अ ेत क ेत पर फर से वजय।’17 युवा वक ल के काय ने वदे श से आनेवाले दो या य का यान आक षत कया। माच 1897 म या ी और एक फौजी ां सस यंगह बड नटाल आया। उसने गांधी से मुलाकात क और उसने उनका ‘भारतीय समुदाय के व ा और गोरे आंदोलनका रय के लए तकलीफ क वजह के प म वणन कया’। उसने पाया क वो ‘एक ती ण बु के और सु श त ह’। गांधी ने उस या ी को अपने ‘सुस त अं ेज़ी वला’ म आमं त कया जहां कुछ ‘अ य भारतीय ापा रय ने भी उसे उस समय क तमाम घटना पर

अपनी राय रखकर भा वत कया’। उसने लखा क ‘ऐसे लोग वाभा वक तौर पर ‘कुली’ श द से नाराज़ थे। ले कन वे जहां एक तरफ यूरोपीय वग से खुद को अलग कए जाने से नाराज़ थे, उससे भी यादा नाराज़ इससे थे क का फर क उनसे तुलना क जाती थी।’18 उसके अगले साल जब गांधी प रवार डरबन म पूरी तरह से व त हो गया तो ाणजीवन मेहता उनसे मलने द ण अ का प ंचे। लंदन म पढ़ाई के दन से ही दोन म नज़द क संबंध था और यह इस वजह से और भी गाढ़ आ था क बंबई म मेहता के घर ही गांधी क मुलाकात जैन मनीषी रायचंद भाई से ई थी। मेहता उस समय रंगून म थे और सोने-चांद का कारोबार कर रहे थे। सन 1898 क ग मय म उ ह ने यूरोप क या ा क और वापसी के समय द ण अ का म गांधी से मलने आ गए। जब वह केप टॉउन म उतरे तो उ ह ये एहसास हो गया क ‘वे एक ऐसी जगह प ंच गए ह जहां वचा का रंग ब त मायने रखता है और मनु य का गुण कुछ नह ’। कई होटल म उ ह कमरा नह मला और केप से पूरब क तरफ जब वो डरबन आ रहे थे, तो े न म भी उनके साथ ब त अ ा वहार नह आ।19 ले कन जब वो नटाल प ंचे तो मेहता ब त खुश ए। अपने दो त का साथ पाकर और ये जानकर वो वहां या कर रहे ह, वाकई उनक खुशी का ठकाना रहा। मेहता ये दे खकर ‘दं ग रह गए क गांधी के नेतृ व म कस तरह व भ समुदाय के लोग एकताब ह और एक सरे के हत क र ा करने के लए सतक ह।’ वह अपनी मातृभू म के साथ आ वा सय के संपक और लगाव को दे खकर अ भभूत हो गए क कैसे उ ह ने भारत म जब 1896-7 म लेग फैला था और अकाल आया था तो 1200 पाउं ड क रा श मदद के तौर पर नटाल से भेजी थी। मेहता ने डरबन म गुजराती ोता के सामने बोलते ए कहा, ‘भारत के लोग आपक उस चता से गवा वत ह जो आपने उनके त दखाई है, जब क आप भारत से हज़ार मील र रहते ह।’20 ● हालां क वे नटाल म रहते थे ले कन गांधी को ांसवाल म भारतीय क सम या म भी शा मल होना पड़ता था। यहां पर शासक न ल बोर थी जो अ क भाषा बोलती थी और मु यतः डच मूल से नकली थी। जब उ ीसव सद के शु आती दशक म अं ेज़ ने केप पर अपना नयं ण मज़बूत कर लया तो बोर दे श के अंद नी भाग क तरफ ‘पलायन कर गए’। उ ह ने अपने आपको वाल और औरज न दय के पार ा पत कर लया और अ कय को खदे ड़ दया। उ ह ने उस इलाके म वशाल उपजाऊ ज़मीन पर क ज़ा कर लया। वहां क अथ व ा और उनका सारा अ त व खेती, पशुपालन और शकार पर

टका आ था। एक तरफ जहां टश लोग समु तट पर जमे ए थे जो उ ह उनको पूरब के उनके र न ( वेल ऑफ द ई ट) भारत के सा ा य से जोड़ता था, तो बोर के क ज़े म ये अंतदशीय इलाके थे। सन 1850 के दशक म उ ह ने दो अध- वाय गणरा य क ापना क थी जसका नाम था-ऑरज टे ट और ांसवाल (बाद म ांसवाल को सन 1880 के दशक से द ण अ क रप लक के नाम से जाना गया।)21 ांसवाल क न लीय राजनी त नटाल से यादा ज टल थी। यहां बोर लोग टश से अलग और वतं अपने लए ज़मीन क तलाश म आए थे। कई दशक तक उनका व सुर त रहा ले कन सन 1886 म जोहांसबग म सोने क खोज हो गई जसने पागलपन क हद तक आ वास को बढ़ावा दया। जस समय सन 1893 म गांधी ने पहली बार इस शहर क या ा क , अं ेज़ी-भाषी आ वा सय क सं या अ क भाषी बोर क सं या से यादा हो गई थी। यह अनुपात अब दो एक का हो गया था। खदान म काम करनेवाले मक यादातर अ क थे ले कन बंधक, सुपरवाइज़र और मा लकान यादातर अं ेज़। और जैसे-जैसे जोहांसबग तर क करता गया, ये अं ेज़ थे ज ह ने होटल, रे ां, अ ताल, लब, थएटर और आधु नक शहर के अ य वसाय ा पत कर लए। आ थक तर क के इस तेज़ दौड़ म बोर कह पीछे छू ट गए। ‘ओवाइटलडस’(बाहरी लोग के लए यु अ क श द) के प म जाने-जानेवाले अं ेज़ के पास सं याबल था और पैसा था। अब उ ह राजनी तक स ा म साझेदारी चा हए थी। उधर बोर का दावा था क ांसवाल उनका (होमलड) गृह दे श है जब क ओवाइटलडस लालची वदे शी लोग ह। इस लए वहां मता धकार उ ह लोग तक सी मत कर दया गया जो उस गणरा य म 14 साल से यादा से रहते आ रहे थे। इसका ओवाइटलडस ने वरोध कया जनक अपनी अलग शकायत थ । उन शकायत म से एक थी—उदाहरण के लए—रा य का डायनामाइट के उ पादन और उसक ब पर एका धकार था जो खनन उ ोग के लए बेहद ज़ री है। सन 1890 के दशक म ांसवाल क राजनी त म मु य सवाल बोर और टश लोग के बीच का संघष था। ले कन इस बीच एक सरा सवाल आन खड़ा आ। वो सवाल था-बोर के व - दे श म एक समूह और अं ेज़ क तुलना म कम वां छत भारतीय समूह का आ मलना। रड म खनन उ ोग के उफान से भारतीय क सं या तेज़ी से बढ़ गई थी। उ ह ने मु य शहर म कान खोल ल और दे श के अ य ह स म भी ापार ा पत कर लए। कम पूंजी वाले फेरीवाले ग लय म सामान बेचने लगे। जब गांधी ने जोहांसबग क या ा क तो शहर म 100 से अ धक गुजराती ापारी मौजूद थे। कुछ कंप नयां तो ब त बड़ी थ जनक पूंजी द सय हज़ार पाउं ड म थी और उनक शाखाएं डरबन, केप और बंबई म थ । वहां एक उभरता आ भारतीय मक वग भी था जसम मक, घरेलू नौकर और फेरीवाले शा मल थे। जोहांसबग के मु य होटल

म बेयर के प म अं ेज़ क तुलना म ‘भारतीय को यादा तव ो द जाती थी इसक मु य वजह उनक सुस यता, वन ता और अनुशासन यता थी।’22 कुछ भारतीय ऑरज टे ट म भी वेश कर गए थे। ले कन इससे पहले क उनक सं या बढ़ पाती वहां क संसद यानी वो कआड ने उ ह नकाल बाहर कर दया। कुछ वशेष अनुम त प के अंतगत भारतीय लोग टे ट म वैसे काय म स म लत हो सकते थे जसम कठोर शारी रक म लगता था-जैसे खेत म नौकर का काम इ या द। ले कन यादा त त और मुनाफे वाले वसाय के दरवाज़े उनके लए बंद थे। टे ट के नयम-कानून से उ सा हत होकर सन 1885 म ांसवाल के वो क ाड ने एक क़ानून पा रत कया जसके अनुसार ‘तथाक थत कुली, अरब, मलय और तुक सा ा य के मुसलमान के लए संप खरीदने पर तबंध लगा दया गया’। उस क़ानून के अनुसार सरकार को ये भी अ धकार मला वो कुछ खास सड़क और ान को च त कर सकती थी जहां ए शयाई लोग रह और ापार कर सकते थे। हालां क पा रत होने के करीब एक दशक बाद तक वह क़ानून सरकारी फाइल म ही बंद रहा। ले कन सन 1894 म बोर राजनेता इस बात से च तत हो उठे क अब भारतीय क सं या दजन म नह ब क हज़ार म प ंच चुक है। उ ह ने अब उस क़ानून को लागू करने का फैसला कर लया। ऐसे नो टस जारी कए गए क जो ापारी गोरे नह ह उ ह उन खास इलाक म भेजा जा सकता है जसे ‘लोकेशंस’ के नाम से च त कया गया था। उ ह इलाक म उ ह अपना कारोबार करना था।23 इससे भारतीय समुदाय म बेचैनी फैल गई और उ ह ने ांसवाल के रा प त से मुलाकात का व मांगा। उस समय वहां का रा प त चड़ चड़ा और क र बुजग जनरल पॉल ू गर था। ू गर अपने हाथ म बाईबल लेकर उनसे मलने आया। भारतीय ने उसके सामने अपनी सम याएं रख । उस यन धमयो ा ने अपने ंथ के हवाले से अथ नकालकर कहा क वे लोग ईसा और इ माईल के वंशज ह और ई र क तरफ से दास था के लए तब ह। उसके बाद ू गर अपना बाई बल लेकर महल के अंदर चला गया। भारतीय लोग भ च के से वापस लौट गए।24 अब भारतीय ने अं ेज़ से ह त ेप का आ ह कया। लंदन म सन 1884 म ह ता रत एक समझौते के मुता बक महारानी क जा को ये अ धकार था क वे द ण अ क गणरा य म जहां चाहे रह और ापार कर सकते ह। भारतीय ापा रय ने सफ यही कहा क इस नयम का पालन होना चा हए। सन 1895 म अं ेज़ के दबाव म द ण अ का गणरा य ने एक म य को नयु कया जो टे ट का एक पूव मु य यायाधीश था। उसने दोन प क बात सुनी और अपने बोर दे शवा सय के प म मज़बूती से खड़ा हो गया। उसने कहा

‘द ण अ क गणरा य का सं वधान, जससे टश सरकार अनजान नह है, साफतौर पर कहता है क गोर और अ ेत के बीच कसी तरह क समानता को वीकार नह कया जाएगा...हरेक यूरोपीय रा या यूरोपीय मूल के रा को यह पूरा अ धकार है क वह उन वदे शी त व को नकाल बाहर करे जसे वो अपने वकास और अ त व के लए खतरनाक समझता है—खासकर ए शयाई त व को यहां बसने से रोके।’25

हालां क उस म य ने भारतीय के लए सुलह क एक खड़क खोल रखी थी, उसने कहा क भारतीय अपने मामले को टो रया के उ यायायल म ले जा सकते ह। अब एक गुजराती ापारी ने उस क़ानून के खलाफ हाईकोट म अपील दायर क जसके मुता बक उसे ‘लोकेशंस’ म भेजा जा रहा था (उसका नाम तैयब खान था जसका दादा अ ला के साथ ववाद आ था और गांधी जस वजह से द ण अ का आए थे)। उस मुकदमे क पैरवी गांधी ने क और कहा क भारतीय समुदाय के लोग ‘इंडो-जमन’ मूल के ह इस लए ांसवाल क संसद क न लीय क़ानून क प र ध से बाहर ह। खंडपीठ म तीन जज म से एक गांधी के तक से भा वत था, जब क दो अ य भा वत नह थे। आ खरकार अग त 1898 म अदालत ने तैयब खान के खलाफ फैसला दया। अब ापा रय पर बाहर नकाले जाने का खतरा मंडराने लगा। 31 दसंबर 1898 तीस ापा रय के समूह ने उप नवेश मामल के से े टरी को हमाम संदेश भेजा। उ ह ने कहा क अगर अदालत के फैसले को लागू कर दया गया तो ‘ ांसवाल म भारतीय कारोबा रय का वनाश हो जाएगा’। कसी भी ण उनक ‘ कान बंद क जा सकती थ और उ ह ऐसी जगह पर भेजा जा सकता था जहां जीवन जीने लायक प र यां नह थ , सफाई का इंतज़ाम नह था, ापा रक प र त नह थी—और इन सब म उनका कोई दोष नह था’।26 ● सन 1898 म नया म होनेवाली सोने क आपू त का एक चौथाई से भी यादा ांसवाल से आता था। ओइटलडस (बाहरी अं ेज़) खदान मा लक ने इस धंधे म अकूत मुनाफा कमाया। ले कन बोर ारा नयं त रा य ने भी ब त बुरा दशन नह कया। सन 1886 म रा य का राज व 196,000 पाउं ड था जो दस साल बाद बढ़कर 400,000 पाउं ड हो गया। जन उ ोगप तय ने सरकारी खज़ाने म योगदान दया था, वे अब चाहते थे क सरकारी धन के खच म उनक भी यादा से यादा सहम त हो। सरी तरफ रा यस ा पर जनका क ज़ा था, वो अपना नयं ण खोना नह चाहते थे।27 सा ा यवाद भावना से उ सा हत ापारी से सल रोड् स क पहल पर— जसका द ण अ का म बड़ा ापा रक हत था—ष ं का रय के एक समूह ने ताकत के बल पर ू गर क स ा को पलटने क योजना बनाई। इसके लए जे सन नाम के एक अ धकारी

को 1,000 लोग के साथ सीमा पार कर ांसवाल आना था और उसी बीच ांसवाल के अं ेज़ नवा सय को व ोह कर दे ना था। ले कन ऐसा आ क जे सन क सेना को बोर ने घेर लया और आ मसमपण करने पर मजबूर कर दया और दे श के अंद नी भाग म होनेवाला अं ेज़ का व ोह कभी नह हो पाया। सन 1895 म ‘जे सन छापामार’ क असफलता ने बोर और टश के बीच क खाई और चौड़ी कर द । सा ा यवाद-समथक दल का नेतृ व उप नवेश मामल के सेकरेटरी ऑफ टे ट जोसेफ चबर लन और केप टॉउन के हाई क म र लॉड मलनर कर रहे थे। दोन इस बात म यक न रखते थे क द ण अ का म और नया म ेट टे न के मशन को पूरा करने के लए ांसवाल पर नयं ण आव यक है। फरवरी 1898 म मलनर ने चबर लन को लखा क ‘द ण अ का क सम या का समाधान या तो ांसवाल म राजनी तक सुधार है या यु है। वतमान म ांसवाल म राजनी तक सुधार क कोई संभावना नह है’। उसके अठारह महीने बाद चबर लन ने टश कै बनेट को एक मेमो भेजा जसम शकायत क गई क ‘बोर, टश नयं ण और ह त ेप को सफलतापूवक नकार रहे ह’ और ये भी क उससे आगे जो भी होगा वो इस पर नभर है क ‘ जस सव े ता का हमने दावा कया है और कई बार उसे लागू भी कया है— या उसे आ खरकार ा पत कया जाना चा हए या हमेशा के लए छोड़ दे ना चा हए’।28 उस समय तक टश सरकार, द ण अ का के तट पर बड़ी सं या म सेना उतार रही थी। दस हज़ार सेना भारत और भूम यसागरीय इलाके से मंगाई गई और कई हज़ार जवान इं लड से मंगाए गए। उनक वह यु यता चरम पर थी। अ ू बर 1899 म बोर ने कहा क जुलाई से जो सेना भेजी गई है उसे वापस ले लया जाना चा हए। जब अं ेज़ ने इससे इ कार कर दया तो वे नटाल म घुस गए और यु शु हो गया। ● टश-बोर यु का एक नतीजा ये आ क द ण अ क गणरा य से भारतीय पलायन कर गए। टश जा के प म उ ह मन म शुमार कर लया गया। झुंड के झुंड भारतीय नटाल म घुस गए और उप नवेश म अपने भारतीय दे शवा सय के यहां शरण लेने लगे। गांधी और नटाल इं डयन कां ेस ने उनके लए घर क व ा क और उनके लए पैसे जुटाए। नटाल के भारतीय, ापारी और मक थे। उनम से ब त कम के पास सै य अनुभव था। फर भी गांधी ने सोचा क टश सा ा य क जा होने के नाते उ ह अपनी तरफ से कुछ समथन दखाना चा हए। उस समय वह डरबन के एक अ ताल म वयंसेवक का काम कर रहे थे जो एक स मा नत डॉ. बूथ के ारा चलाया जा रहा था। अब डॉ. बूथ

के ो साहन से उ ह ने भारतीय एंबुलस मक के द ते के गठन का ताव कया जो कमज़ोर और घायल लोग क सेवा कर सके। 17 अ ू बर 1899 को लड़ाई शु होने के कुछ ही दन पहले गांधी ने अपने ताव पर वचार के लए अपने लोग क एक बैठक बुलाई। कुछ भारतीय टश सरकार को समथन दे ने के वरोधी थे। लोग का कहना था क या अं ेज़ ने बोर क तरह ही उनका शोषण नह कया था? और उस समय या होगा जब सरा प जीत जाएगा? तो या उस समय बोर उनसे बदला नह लगे? गांधी ने इसके जवाब म कहा क वे द ण अ का म टश जा के प म रहते ह। अगर इस समय अं ेज़ क मदद क गई तो उन पर ये आरोप लगना बंद हो जाएगा क भारतीय सफ ‘पैसा कमाने यहां आए ह और सा ा य पर बोझ ह’। यह उन आरोप को आधार वहीन बताने का ‘ व णम मौका’ है।29 गांधी का तक लोग को समझ म आ गया। अगले दन उ ह ने नटाल क सरकार को ‘बे हचक और बेशत’ सहयोग का ताव दया। उ ह ने लखा क द ण अ का म बसे भारतीय को ह थयार चलाने का ान तो नह है ‘ले कन वे यु े के अ ताल या सेना के रसद वभाग म ज़ र कुछ काम कर सकते ह’। इस तरह से वे ‘महारानी क अ य जा क तरह ही यु े म अपने शासक के त अपने कत के नवहन के लए तैयार ह’। 30

जनवरी 1900 के थम स ताह तक एंबुलस सेवा म काम करने के लए 500 भारतीय तैयार हो गए। वयंसेवक क एक सूची बताती है क गुजराती ापारी उससे बु मानी से अलग ही रहे। बड़ी सं या म भारतीय ईसाई अपने शासक क मदद को सामने आए। एंबुलस सेवा म शा मल ए अ य लोग म मक वग के ह खासकर त मल मूल के ह थे।31 भारतीय को यु भू म म भेजा गया जहां उ ह ने श वर-दर- श वर फौ जय का अनुसरण कया और घायल क सेवा क । वहां क प र तयां काफ खराब थ , उ ह दन म पचीस मील तक चलना पड़ता था, घंट तक बना खाना और पानी के रहना होता था और खुले म सोना पड़ता था। वो यु भू म के ब कुल नज़द क होते थे, जो जानलेवा होता था, घायल को सुर त जगह पर लाते थे और उनक बगल म व ोटक गोले गरते रहते थे। कुछ वयंसेवक को कहा गया क वे बोर क टे ली ाफ लाईन को काट द। कइय को कहा गया क वे मन ारा छोड़े गए राइफल और कारतूस क पे टयां जमा कर।32 एंबुलस सेवा के काय का ववरण एक टश प कार ने व तार से दया है। योन कॉप म पीछे हटने के बाद उसने दे खा क ‘भारतीय ख र गाड़ी कॉप क ढलान पर चढ़ रही है और ाकुल सपा हय को पानी पला रही है जो ज़मीन पर न ाण से थे’। रात भर काम के बाद, जो ‘ कसी भी बड़े कोण के को तोड़कर रखने के लए काफ ’ था, वह संवाददाता अ लसुबह ‘गांधी से मला जो सड़क के कनारे बैठे ए थे और सेना

को मलनेवाला ब कुट खा रहे थे’। जहां एक तरफ टश सपाही ‘हताश- नराश थे, गांधी शांत- च से बैठे थे, खुश मजाज़ से थे और बातचीत म आ म व ास से भरे ए थे। उनक आंख दयालुता से भरी ई थ ’।33 गांधी ने अपने एक इले शयन अं ेज़ म हरबट क चन से एक एंबुलस सेवा का गठन करने को कहा था। क चन क दलच ी भारतीय दशन म थी। गांधी एक इकाई क व ा दे ख रहे थे तो क चन सरे क । एक तरफ भारतीय वक ल यॉन कॉप म था तो क चन इलड् सलैग म। वहां से उसने अपने ‘ त और उ ेजना मक’ समय का ववरण भेजा: म आठ भारतीय के एक दल के साथ था। जसम एक कॉरपोरल और एक सेप र था जो लेडी मथ के नज़द क बोर टे ली ाफ लाईन के एक ह से को काट रहे थे। हमने तीन बोर मोच को पार कया। सारे के सारे क चड़ से भरे ए और य त ...कारतूस क पे टयां बखरी ई थ ...ब त सारी बोतल और इं लश ब कुट के टन। हमने एक बोरी कारतूस जमा कर ली होती...ले कन हमारे दल के लोग बोर दल का नशाना बन गए जसने उसके बीच एक गोला छु पा रखा था। सौभा य से कोई भी घायल नह आ...मने एक आवारा घोड़ा दे खा जो शायद बोर से छू ट गया था। ले कन वह ब त जंगली क म का था, इस लए म उसे पकड़ नह पाया। अगर वह पकड़ म आ जाता तो म उसे अ क मत म बेच दे ता।34

हालां क वह सपाही नह था, फर भी वह अं ेज़ इस यु का आनंद ले रहा था। वह उन घृ णत बोर क तकलीफ और उनके ारा छोड़ी गई चीज़ का मज़ा उठा रहा था। गांधी ने तो एक कत और वामीभ क भावना के तहत अं ेज़ को समथन दया था। इस प का उ ह ने या जवाब दया वह हम नह मालूम। ले कन ऐसा लगता है क उस शाकाहारी ब नए ने यु को शायद ही उस तरह से दे खा हो जैसा क उस अं ेज़ ने दे खा था —उस यु भू म म जानलेवा हमले के बीच रोमांच और आनंद के भाव से। यु के शु म अं ेज़ को गंभीर झटका लगा। बोर लोग बड़े लड़ाकू थे ज ह उस इलाके का च पा-च पा मालूम था। हालां क समय के साथ-साथ सं या-बल और उ त यु क साज़ोसामान क बदौलत अं ेज़ भारी पड़ने लगे। सन 1900 क ग मय तक यु कमोबेश जीता जा चुका था, हालां क बोर गु र ला लड़ाक का द ता कई महीन तक अं ेज़ को पूरे इलाके पर क ज़ा करने से रोकता रहा। अं ेज़ क वजय म भारतीय एंबुलस सेवा ने अहम भू मका नभाई थी। इसे रेखां कत करने के लए डरबन के कां ेस हॉल म एक बैठक बुलाई गई। नटाल के अखबार ने लखा क यह ‘पहला मौका है क उप नवेश के यूरोपीय और भारतीय लोग एक साझे उ े य के लए एक साझे मंच पर एक ए ह’।35 सभा क अ य ता नटाल के पूव धानमं ी सर जॉन रॉ ब सन कर रहे थे। रॉ ब सन ने कहा, ‘अं ेज़ और बोर के बीच े ता क लड़ाई म ह ता नय ने लाजवाब काम कया है’। नटाल के नेता ने भारतीय से कहा, ‘म आपके सुयो य दे शवासी म टर गांधी क उनके समयब , नः वाथ और अ त-उपयोगी वयंसेवी एंबुलस सेवा क श द म यादा तारीफ नह कर सकता।’36

उस यु म जो भी वयंसेवी थे वो गांधी का लहाज करके उनके कहने पर आए थे और गांधी, टश सा ा य का लहाज कर रहे थे जसक वे एक वफादार जा थे। इसम उनके ारा नटाल सरकार क आलोचना करने का कृ य कतई आड़े नह आ रहा था। ब क उस आलोचना म यही कहा जा रहा था क भेदभावकारी क़ानून टश पंरपरा के खलाफ ह। सन 1894 म लखा गया उनका ‘खुला प ’ इसी बात को लेकर था जसम उ ह ने उप नवेशवा दय से उनके टश दे शवा सय क तरह उदार बनने का आ ह कया था और वहां क तरह अ धकार दे ने क बात कही थी। गांधी ने कहा, ‘म आपको याद दलाता ं क इं लड म रहनेवाले अं ेज ने अपने लेखन, भाषण और अपने कृ य से दखाया है क वे दो समुदाय के लोग के दल को जोड़ना चाहते ह, क वे रंगभेद क नी त म यक न नह रखते और ये भी क वे अपने साथ-साथ भारत का भी वकास करगे, न क उसके वनाश पर अपना वकास।’ गर म टया मज़ र को फर से करार-ब करने के लए जो 3 पाउं ड का टै स आयद कया गया था उसके वरोध म गांधी ने एक आवेदन दया और ‘उसे टश सं वधान के मूलभूत स ात के खलाफ बताया’। सन 1895 म उप नवेश मामल के से े टरी ऑफ टे ट को भेजे एक मांग-प म कहा गया क ‘नटाल सरकार क नी तयां टश याय स ांत के ब कुल वपरीत है’। जुलाई 1899 म नटाल सरकार को भेजे एक प म कहा गया क ‘डीलस लाईसस ए ट वा तव म खराब है और गैर- टश है’।37 उस प म जो मु य श द था—अन- टश—वह एक मश र कताब म शा मल होने क वजह से मश र हो गया जो सन 1901 म दादाभाई नौरोजी ने लखी जसका नाम था —पॉवट एंड अन- टश ल इन इं डया। इस कताब म तक दया गया क अकाल का फैलाव, धन का ब हगमन, भारतीय व नमाता का दमन उन नी तय के प रणाम थे जो शासक वग के आदश से र थे। गांधी, नौरोजी को जानते थे और उनक इ ज़त करते थे और उस पारसी बुजगवार क तरह ही गांधी भी आ म-आलोचना और सुधारवाद काय क उदार टश परंपरा और उसक श य के शंसक थे। भले ही वो परंपरा वा त वक या का प नक हो। एक सरे भारतीय नेता, जसक गांधी इ ज़त करते थे—वे थे गोपाल कृ ण गोखले। गोखले ने ‘संक ण सा ा यवाद ’ और ‘भले सा ा यवाद ’ म फक को महसूस कया था। संक ण सा ा यवाद इस बात को मानते थे क ये नया सफ ‘एक ही न ल के लोग के लए बनी है’ जब क भले सा ा यवाद मानते थे क ‘जो लोग सा ा य म शा मल हो गए ह वे सब बराबर से सा ा य के फल के भागीदार ह’।38 यु के समय गांधी का काम शासक वग के अंदर इ ह ‘भली’ भावना को जगाने या पुनजागृत करने का था। जैसा क बाद म उ ह ने लखा, ‘मने महसूस कया क अगर म टश नाग रक के प म सामान अ धकार क मांग करता ं तो मेरा यह भी कत है क म टश सा ा य क र ा

म अपना योगदान ं । फर मने ये न कष नकाला क भारत टश सा ा य के अधीन और उसके ारा ही अपनी पूण अ भ पा सकेगा।’39 सन 1899-2002 का ए लो-बोर यु अमूमन ‘गोर क लड़ाई’ माना जाता है, जो पूरी तरह सही नह है। यु क हरेक मु य लड़ाइय म गैर-यूरोपीय लोग ने अपनी भू मका नभाई। जहां कुछ भारतीय ने एंबुलस सेवा म काम कया वह ब त सारे अ ेत अ कय —जलू, जोसास और अ य —ने ह थयारबंद लड़ाईय म ह सा लया। एक इ तहासकार ने अनुमान लगाया है क शायद 30,000 अ ेत अं ेज़ क तरफ से लड़े थे। अ य लोग ने काउट, जासूस, नौकर और संदेशवाहक के तौर पर काम कया। गांधी क ही तरह इन अ क वयंसेवक ने ये व ास कया या उ मीद क क ‘अं ेज़ क जीत अ ेत लोग के लए राजनी तक, शै णक और वसा यक अवसर के दरवाज़े खोलेगी’। 40

● इन साल म गांधी ने जो कुछ भी लखा वो उनके कले टे ड व स (गांधी वां मय) म संक लत ह। उ ह जो कुछ लखा गया उसके नमूने द ली के गांधी सं हालय और साबरमती के गांधी आ म क दराज़ म सुर त ह। ये लेखन एक वक ल के प म उनके क रयर और एक सामुदा यक संगठनकता के प म गांधी पर वृहत काश डालते ह। हालां क उनके जीवनीकार उनक जा त और पा रवा रक ज़दगी के समकालीन ववरण को दज करने म नाकाम रहे ह। हम जानते ह सन 1898 म क तूरबा ने उनके तीसरे बेटे रामदास को ज म दया और उसके दो साल बाद उनके चौथे बेटे दे वदास का ज म आ। ले कन ये समझना क गांधी प रवार म या चल रहा था और वहां कैसा माहौल था, इसके लए हम गांधी के सं मरण और अनुमान पर ही नभर रहना पड़ रहा है। कई साल के बाद डरबन म अपने जीवन के बारे म लखते ए गांधी कहते है क उनके सामने मु य चुनौती ये थी क वे अपने ब े को कहां पढ़ाएं। गर म टया मज़ र के ब को पढ़ाने के लए कुछ कूल वहां थे जो ईसाई मशन ारा संचा लत थे। वग य च र क वजह से शायद गांधी अपने ब को वहां पढ़ने दे ना नह चाहते ह गे। गांधी ने ट पणी क , ‘म चाहता तो एक अपवाद के प म कसी से अनुमोदन करा के अपने ब को उन कूल म भेज सकता था जहां यूरोपीय ब े पढ़ते थे। ले कन वहां सरे भारतीय ब के दा खले क इजाज़त नह थी।’41 इस बात क त द क नटाल के अ भलेखागार के द तावेज़ से भी होती है जो हम बताते ह क फरवरी 1897 के आ खरी स ताह म गांधी ने एक आवेदन दया जसम कहा गया क उनके त मल ईसाई मुव कल के बेटे जे स गॉड े को गोर के लए आर त डरबन हाई कूल म दा खला लेने क इजाज़त द जाए। उनका

वह आ ह खा रज कर दया गया और कूल के अधी क ने दावा कया क अगर गॉड े को इजाज़त द गई तो ‘अ धकांश मां-बाप अपने ब को वहां से हटा लगे और जो ब े वहां रह भी जाएंगे वे गॉड े का मज़ाक बनाकर उसका रहना वहां भर कर दगे।’42 जब एक ईसाई ब े को न लीय ट पणी से मु नह मल पा रही थी तो एक ह ब े क या बसात थी! तो गांधी ने इस पर काफ वचार कया और आ खरकार अपने बेट ह रलाल, म नलाल और भतीजे गोकुलदास को घर म ही पढ़ाने का फैसला कया। उ ह ने उ ह अपनी मातृभाषा गुजराती के अ र खुद ही सखाए। सरे वषय के लए एक अं ेज़ श का को नयु कया गया। उनक मां उ ह ह धम क पौरा णक और नै तक कहा नयां सुनाया करत ।43 ब े तो एक सरे के साथ खेल लेते थे ले कन यह समझना मु कल है क क तूरबा अपना समय कैसे काटती थ । घर म कोई सरी म हला थी नह । बाजार का काम एक पु ष नौकर के हाथ था। सामा जक री त- रवाज़ और हचक क वजह से गांधी क प नी अकेले डरबन क सड़क पर जा नह पाती थ । उनके प त के यादातर मुव कल गुजराती मुसलमान थे। एक ही भाषाभाषी होते ए भी धम म अंतर क वजह से क तूरबा उनक प नय के साथ भोजन नह कर सकती थ । अगर वह चाहत भी तो ऐसा नह हो पाता य क घर म चार ब े और एक भतीजा था और प त क दे खभाल का सारा ज़ मा क तूरबा पर ही था। डरबन म गांधी एक कामयाब वक ल थे और उ ह ने रहने के लए कसी भारतीय ब ती को नह ब क शहर के बाहर खुले इलाके म बीच ोव को चुना था। उनका ‘सुस त इं लश वला’ (यंगह बड के मुहावर के अनुसार) उस इलाके के कई मकान म से एक था। सरे जो मकान थे वे उन लोग के थे जो न ल और आ मा दोन ही से अं ेज़ थे। अपने हम वतन के इलाक से र एक सं ांत इलाके म रहने और अपनी सामा जक है सयत को च त करने क गांधी क ये इ ा उनक प नी के लए गंभीर सम या का सबब बनी। वह अं ेज़ी नह जानती थ और परंपराएं उ ह गोरे लोग से बात करने से मना करती थ । शहर के क य ह से से उपनगर क जो री थी, उससे बड़ी वो सामा जक री थी जो उ ह अपने गोरे पड़ो सय से बात करने से रोकती थ । वह े ट म गुजराती म हला से मलने अकेले नह जा सकती थी। इन सब काय के लए उनके प त उनके लए उपल नह थे (और शायद इ ु क भी नह थे)। ऐसे म उ ह ने अपने आपको घर के काय म झ क दया जहां उनके ब े उनके साथ होते थे। वे उनके दो त भी थे और उनक सां वना क वजह भी। बीच ोव के इसी घर म गांधी और क तूरबा के बीच एक बार झगड़ा भी आ जसके बारे म उ ह ने अपनी आ मकथा म ज़ कया है। गांधी प रवार के साथ एक गुजराती रसोइया और एक त मल लक ( करानी) वसट लॉरस रहता था। धम प रवतन से पहले

लॉरस का प रवार पंच मा के प म जाना जाता था जसका मतलब ‘पांचवी’ जा त यानी अछू त होता था। क तूरबा ने उस लक के चबर पॉट (एक ऐसा बतन जसे मू याग के लए इ तेमाल कया जाता था) को धोने से इ कार कर दया और उ ह ने अपने प त से भी कहा क वो ऐसा करके अपने आपको अप व न कर। इस पर गांधी ब त ो धत ए, ‘म अपने घर म यह बकवास बदा त नह क ं गा’। उस घटना को याद करते ए वह अपनी आ मकथा म आगे लखते ह क इतना ही नह गु से म वे क तूरबा को घर के दरवाज़े तक घसीटते ए ले गए। उनक प नी रोने लग और उ ह ने कहा क या पराए दे श म उ ह अपनी प नी को घर से बाहर नकालते ए शम नह आती, जहां पर उसके मां-बाप या कोई अ य संबंधी दे खभाल करनेवाला नह है। गांधी तुरंत शांत हो गए और प नी के साथ घर वापस आ गए।44 ● मई 1901 म गांधी को पता चला क उनके ेरणा ोत और आ या मक गु रायचंदभाई इस नया म नह रहे। उस समय उनक उ महज़ ततीस साल थी। गांधी को इसके बारे म अपने ऑ फस म एक अखबार से पता चला, जो डाक से आया था। उ ह ने अखबार को एक तरफ रखा और अपने काम म लग गए। ले कन जैसा क उ ह ने अपने एक म को लखा, ‘म इसे अपने दमाग से नह हटा सका। जब भी कभी थोड़ी फुरसत मलती है, मन उधर चला जाता है। सही या गलत जो भी था, म उनसे ब त भा वत था और म उनसे ब त यार करता था। वह सब अब ख म हो गया।’45 जुलाई 1891 म ई उस पहली मुलाकात के बाद गांधी ने रायचंदभाई को अपना आ या मक गु मान लया था। गांधी जब अपने लड़कपन म थे, तभी उनके पता क मृ यु हो गई थी। उनके बड़े भाई लोग उ ह नै तक (या बौ क) नदश दे ने लायक नह थे। यह वो खालीपन था जसे उस जौहरी- वचारक ने भरा था। उसने गांधी को उनक मां क मौत से ए सदमे से उबरने म मदद क थी। जब सन 1892 म बंबई म वह एक बेरोज़गार वक ल थे, तो अ सर अदालत से रायचंद क कान पर चले जाते और उनसे बात करते। कुछ साल के बाद द ण अ का म भी कई ध मक मत के बीच म फंसे और मत गांधी को एक बार फर से रायचंद भाई का सहारा मला था और उ ह ने उनका म र करने क को शश थी। रायचंद भाई, गांधी के लए या थे? उ ह ने उनसे या सीखा था? हालां क इस बारे म समकालीन ववरण या प ब त कम ह, इसी लए हम इन का उ र गांधी के जीवन पर बाद म पड़े भाव और उनके याकलाप म ं ढ़ना होगा। सन 1915 म रायचंद के

ज म दन पर बोलते ए गांधी ने कहा, ‘वे कसी संक ण मत का अनुसरण नह करते थे। वह एक ांडवाद थे और उनका व के कसी भी धम से कोई झगड़ा नह था।’46 उसके नौ साल बाद गांधी ने अपने गु पर लखी गई एक गुजराती पु तक के लए लंबी भू मका लखी। उस भू मका म उ ह ने याद कया क— रायचंद जब अपनी कान म रहते थे तब भी ज र कुछ धा मक पु तक उनके आसपास होती थ और जैसे ही वह अपने ाहक से नबटते वह उन कताब को खोल लेत े या अपनी नोट बुक म उस समय दमाग म आए वचार को दज कर लेते। हर दन मेरे जैसे लोग ान क खोज म उनके पास आते रहते थे। उ ह उनके साथ धा मक वषय पर बात करने म कोई हचक नह होती थी। वह क व ापार के सामा य नयम का पालन नह करता था और कसी खास समय पर ही धम के बारे म ववेच ना न करके जब भी समय मलता कर लेत ा था। वह एक समय म एक ही काम नह करते थे।

गांधी ने उनसे एक ही साथ कई काय को करने क ेरणा पाई। वह एक ही साथ मेहनती वक ल और अ या म का ान हा सल करनेवाले उ सुक छा बन गए। रायचंद तो गांधी को क़ानून के बारे म ब त नह बता सकते थे, ले कन उ ह ने उ ह धम को ापक संदभ म दे खने के लए ज़ र उ सा हत कया। उस धम ाण ने कहा क ‘धम का मतलब सफ शा का पठन-पाठन या आंख मूंदकर उन पर व ास करना नह है’। यह तो सै ां तक और ावहा रक ान का म ण है। एक खास तर के धा मक नदश के बाद धम ंथ कोई मदद नह करते, ब क आपका खुद का अनुभव मदद करता है। रायचंद ने तक दया क हरेक महान धम क श ा म समानता पाई जाती है। सभी धम अस य और हसा के खलाफ उपदे श दे ते ह। ले कन अपने-अपने धम ंथ के उपदे श को क रता से अनुसरण कर मनु य ने ‘ऊंची-ऊंची जेल क द वार खड़ी कर ली ह’ जसम वे आ या मक से कैद हो गए ह। रायचंद क बात का अनुसरण करते ए गांधी इस न कष पर प ंचे क ‘अपने अनुया यय के कोण से हरेक धम पूण है और सरे धम के अनुया यय के हसाब से अपूण। ले कन अगर वतं कोण से दे खा जाए तो हरेक धम कुछ न कुछ पूण है और कुछ न कुछ अपूण’। जब जोहांसबग और डरबन म उनके ईसाई दो त उनपर धम प रवतन के लए दवाब डाल रहे थे तो रायचंद ने उ ह सलाह द क वे ह धम म ही बन रह ले कन अ य धम क श ा के त अपने मन का दरवाज़ा खुला रख। रायचंद कहते थे क ‘अलग-अलग धम बंद कमरे के समान ह जसम नया के ी-पु ष बंद ह’। रायचंद का अनुसरण करते ए गांधी य तो उसी कमरे (धम) म रहते थे जसम उनका ज म आ था, ले कन अ सर उसक द वार फांदकर सरे धम क हवा हण कर लेते थे। उ ह ने कभी भी ायी प से सरे धम के लए ह धम का प र याग नह कया ले कन सरे धम क बात को सुन कर या अ ययन कर वह उन बात को साफ तौर पर दे ख रहे थे क कौन-सी बात उ ह जोड़ती है और कौन सी बात उ ह अलग करती है।47

● रायचंद क मृ यु के कुछ महीन के बाद गांधी ने भारत जाने का फैसला कया। हालां क यह एक रह यमय क म का कदम था य क उनक वकालत अब जम गई थी और नटाल म वह एक नामी- गरामी श सयत बन गए थे। अपनी आ मकथा म वह लखते ह क वह अब ‘भारत क कुछ सेवा करना चाहते थे’ जहां पर राजनी तक अ धकार के लए आंदोलन थोड़ी-थोड़ी जड़ जमा रहा था।48 ले कन न त तौर पर कुछ सरी भी वजह रही ह गी जसम एक तो अपने ब को अ श ा दे ने क भी थी। उनका बड़ा बेटा ह रलाल अब लड़कपन म वेश कर रहा था। डरबन म उसके या उसके भाइय के लए कोई उपयु कूल नह था। जब क राजकोट म वे अपने पता के पुराने व ालय म दा खला ले सकते थे और बंबई मै कुलेशन का इ तहान दे सकते थे और बाद म अपने मन का पेशा या क रयर चुन सकते थे। ये बात क नटाल म एक सरा भारतीय वक ल आ गया था, इसने गांधी को घर वापसी के लए सोचने को े रत कया। उसका नाम रहीम करीम खान था जो लक स इन से पढ़ा बै र टर था और सन 1899 म द ण अ का आया था। उसने गांधी के कायालय म नौकरी शु क और समय के साथ उसने अपने मुव कल तैयार कए। एक मुसलमान के प म उसे डरबन के ब त सारे मुसलमान ापा रय का व ास हा सल हो गया। खान के आने के बाद गांधी ांसवाल जाने, अपने धा मक झान को पूरा करने और अब सन 1901 म वदे श वापसी के लए भी वतं थे।49 ऐसा लगता है क गांधी से भी यादा वदे श लौटने को क तूरबा बेचैन थ । सन 1883 म जब मोदनदास से उनका ववाह आ था तो अपनी मां और दाद क तरह ही उ ह ने सोचा था क वह का ठयावाड़ के ही इलाके म अपना प रवार बसाएंगी। शाद के बाद वह अपने प त के साथ रहने राजकोट आ ग जसके कुछ साल बाद मोहनदास उ ह और उनके न ह बेटे को छोड़कर लंदन चले गए। उसके बाद वह भारत लौटे और एक बार फर क तूरबा उ मीद से । मई 1893 म गांधी फर से घर से नकल पड़े , इस बार वे द ण अ का चले गए। उसके तीन साल बाद ही पूरा प रवार एक साथ हो पाया। क तूरबा के लए द ण अ का का पहला प रचय वो भीड़ थी जसने उनके प त पर हमला (श द से और याकलाप से) कया था। उस घटना के बाद तो उनके लए गोरे लोग पर व ास करना क ठन हो गया। ले कन अपने घर म बंद क तूरबा क कोई भारतीय सहेली या सखी भी नह थी। ले कन राजकोट अपना था। राजकोट के बाज़ार और सड़क पर वही भाषा बोली जाती थी जो क तूरबा घर म बोलती थ । वहां उनके म और र तेदार थे जो उसके ब के

म और र तेदार बन सकते थे। ले कन डरबन म उ ह ने साढ़े चार साल वैसे अजनबी क तरह बताया था जो उस जगह को कभी अपना नह कह सकता था। तो इस तरह से गांधी प रवार ने वदे श लौटने का फैसला कर लया। 12 अ ू बर को पारसी तमजी ने ‘नटाल म भारतीय हत के लड़ने वाले के लए’ एक वदाई भोज का आयोजन कया। वह भोज ‘ कसी भारतीय ारा दया गया या कसी भारतीय के अनुभव म सबसे भ भोज था’: द वार पर कला मक च थे, बजली क वशेष व ा थी, रंग- बरंगे फूल सजाए गए थे और संगीत का इंतज़ाम था। एक प कार ने लखा क सजावट के अनु प ही वदाई भोज म खाने-पीने क व ा थी, ‘अ त थय के लए पूरब का शानदार भोजन मौजूद था।’ जब लोग ने भोजन कर लया तो तमजी ने गांधी के गले म एक ‘मोटा सोने का हार डाल दया और उ ह एक मू यवान सोने का लॉकेट और एक बड़ा सोने का मेडल भट म दया जस पर शुभकामना संदेश लखे ए थे। उ ह सफेद गुलाब एक गुलद ता भी भट कया गया और ता लय क गड़गड़ाहट के बीच उ ह माला पहनाई गई।’ उसके बाद उनके ब को सोने के मेडल दए गए।50 उसके अगले स ताह गांधी प रवार एक सरे समारोह का मु य अ त थ बना जसका आयोजन नटाल इं डयन कां ेस ने े ट के अपने क म कया। यह मान एक आनंददायक ण था जसम सी ढ़य को फूल से सजाया गया था और हर जगह चीनी ब यां जलाई गई थ । उस समारोह म कारोबारी अ ल का दर ने पहला भाषण दया और गांधी के बारे म कहा क ‘हमारे जीवन के सभी ण म, चाहे वो राजनी तक, सामा जक या नौ तक हो, गांधी हमारे पथ दशक रहे ह और हरेक भारतीय के दल म उनका नाम सदा के लए अं कत रहेगा।’ उसके बाद बोलते ए अं ेज़ वक ल एफ. ए. लॉ टन ने कहा क यह ‘उनके लए एक आ य का वषय है क म टर गांधी एक ऐसे समय म जा रहे ह जब बार म उनका नाम काफ त त हो गया है और भारतीय समुदाय म उनका काफ भाव है। वह म टर गांधी क वापसी का हमेशा वागत करगे।’ इस समारोह म भी गांधी को भट व प काफ वण-आभूषण दए गए। उसम पूरे समुदाय क तरफ से द गई एक हीरे क अंगूठ थी, गुजराती ह क तरफ से दया गया एक सोने का हार था, अ ल का दर क तरफ से दया गया एक हीरे क पन था और दादा अ ला एंड कंपनी क तरफ से भट म द गई एक सोने क घड़ी थी।51 गांधी ने वे भट (और उनक तारीफ) को वीकार कर लया ले कन उसके तीन दन बाद उ ह ने पारसी तमजी को लखा क वह उन भेट को लौटा रहे ह। उ ह ने इ ा क इससे नटाल इं डयन कां ेस एक आपातकालीन कोष बनाए जो भ व य म कभी काम आ सके।52 उन उपहार को लौटा दे ने के फैसले से गांधी प रवार म एक नया हंगामा खड़ा हो गया। क तूरबा ने कहा, ‘हो सकता है आपको इन गहन क आव यकता न हो, आपके ब को न हो। बहलाने-फुसलाने पर वे आपक बात मान लगे। मुझे उसे पहनने न दे ने क आपक

मजबूरी को म समझ सकती ं। ले कन मेरी ब का या होगा? उ ह तो ये वण आभूषण चा हए ही ह गे। कल या होगा, कौन जानता है। म कसी क मत पर उन उपहार को नह जाने ं गी।’ गांधी ने इस पर जवाब दया क उनको मले उपहार पर क तूरबा को फैसला लेने का कोई अ धकार नह ह। इस पर क तूरबा ने कहा, ‘समुदाय क जतनी सेवा आपने क है उतनी ही मने भी क है। मने आपके लए रात-रात भर जागकर काम कया है। या वह सेवा नह है?’ ले कन उनक प नी का वरोध उनके दोन बेट के समथन के आगे न भावी हो गया। तेरह साल के ह रलाल और नौ साल के म णलाल ने कहा क उपहार लौटा दे ना चा हए। अपने बेट क सहायता से गांधी ‘ कसी तरह अपनी प नी क वीकृ त’ पाने म सफल रहे। 53

अब पारसी तमजी ने गांधी से ाथना क क वे अपने फैसले पर पुन वचार कर। समुदाय ने उन उपहार के ारा अपने ‘महान और त त’ नेता के त अपने ेम का इज़हार कया था। उसने कहा क गांधी का ये ेरणादायक रवैया उस ‘महान उपल के वघटन’ का कारण बन जाएगी— जसका नाम नटाल इं डयन कां ेस था—‘ जस उपल का ेय मु यतः उ ह को जाता था’। उसने आगे कहा क उपहार को लौटाए जाने से ‘उपहारदाता और उपहार ा तकता के उ े य के बारे म गलत बात फैलेगी’।54 ले कन गांधी टस से मस नह ए। उन उपहार को नटाल कां ेस को भेज दया गया जब क उनका नेता वदे श को जाने को तैयार हो गया। सन 1901 के तीसरे स ताह म गांधी डरबन से रवाना ए। उ ह ने एक ऐसा जहाज़ लया जो मॉरीशस होकर जाता था, ऐसा शायद इस लए था क वो पहला जहाज़ था जसम उनका टकट था। शायद गांधी उस उप नवेश को भी जानना चाहते थे जो पहले ांसीसी क ज़े म था और बाद म टश नयं ण म आ गया और जहां नटाल क तरह ही ह ता नय क एक अ -खासी आबाद थी। वे लोग भी वहां ग ा मज़ र के तौर पर लाए गए थे। जब गांधी मॉरीशस प ंचे तो उनसे पहले उनक या त वहां प ंच चुक थी। एक ानीय अखबार ने छापा क ‘कैसे उ ह ने बहा रीपूवक अपने दे शवा सय के हत क र ा क है।’ वहां के मुसलमान जो नटाल के उलट गुजरात से न होकर उ र भारत के थे, उ ह ने उनके लए एक बागीचे म चाय पाट का इंतज़ाम कया। हवा म झंडे और बंदनवार लहराने लगे, ब े और बुजग उनके वागत म जुट गए। गांधी ने मु लम समुदाय को ‘सलाह द क वे अपने ब को कॉलेज भेज य क श ा क बदौलत ही वे अपनी ज़दगी म उ लेखनीय सुधार हा सल कर सकते ह’। उ ह ने भारतीय समुदाय से अपील क

क वे राजनी त म बढ़चढ़ कर ह सा ल-इस लए नह क उ ह सरकार से लड़ना है, ब क इस लए क वे अपने ाकृ तक अ धकार और वाधीनता को हा सल कर सक।’ जब गांधी को पता चला क उनके मेज़बान का बेटा वहां नगर पाषद के चुनाव के लए खड़ा है तो उ ह ने उसक उस ‘खूबसूरत और अ े ’ इरादे के लए तारीफ क । गांधी क ट प णय ने उप नवेश के एक मुख बु जीवी, क व और पु तकालया य लयो वल लहोम को नाराज कर दया और उसने तीखी त या द । उस ांसीसी बागान मा लक ने कहा क ए शयाई जीवनशैली ‘हमारी जीवनशाली से ब कुल वपरीत है’। उसने आगे कहा क अगर एक ह तानी यहां का पाषद बन जाता है तो पोट लुइस के मेयर को एक ऐसे से हाथ मलाना पड़े गा ‘ जसके माथे म जूं ह गी’। जो यूरोपीय लोग मॉरीशस म बसे ह वे एक महान सै य और राजनी तक परंपरा के वा रस ह। ऐसे म ऐसे लोग के साथ स ा म साझेदारी का मतलब होगा उन परंपरा को ‘इमली ापार के व य र ज टर क हद तक तक घटा दे ना’ और उप नवेशवा दय को खुद को ‘गैर-ईसाई आबाद के रहमोकरम पर छोड़ दे ना’। गांधी को गोरे उप नवेशवा दय से गाली सुनने क आदत पड़ गई थी। ले कन इस तरह क आलोचना वह नह दे ख या पढ़ पाए, य क वह ांसीसी म क गई थी। मॉरीशस से जो याद लेकर वह लौटे , वह भारतीय क वशाल- दयता क याद थ । उनक वदाई समारोह म समारोह के मु य व ा एक मुसलमान ने उनक तुलना आधु नक काल के फराओ ( ाचीन म के शासक) से क जसने ‘उफनते समंदर म अपने दे शवा सय को सतह के नीचे के च ान से बचने म राह दखाई’।55 ● नवंबर 1901 के आ खरी स ताह म गांधी प रवार बंबई प ंच गया। क तूरबा और ब को राजकोट म छोड़कर गांधी े न म सवार ए और कलक ा म होनेवाले भारतीय रा ीय कां ेस के 17व महा धवेशन म भाग लेने उपमहा प के दौरे पर नकल पड़े । सन 1901 के कां ेस महा धवेशन म कुल 896 त न ध आए थे। उसम से आधे से यादा तो मेज़बान ांत बंगाल से थे। गांधी, बंबई ेसीडसी के ततालीस त न धय म से एक थे। वह ड रोड म इं डया लब म ठहरे और र े से बीडॉन वेयर गए, जहां खुले मैदान म कां ेस का अ धवेशन हो रहा था। बैठक क शु आत सरोला दे वी घोषाल र चत एक गीत से ई जो क व रव नाथ टै गोर क भांजी थ । इसे अठावन य और लड़क के एक समूह ने गाया और उसे भावशाली बनाने के लए ‘करीब 400 वयंसेवक ने उसे कोरस म गाया’।

कलक ा कां ेस के अ य थे डी. ई. वाचा, ज ह ने सन 1896 म गांधी के ान पर उनका भाषण पढ़ा था। वाचा के भाषण का लहजा मुलायम था। धीमे आ थक वकास पर बोलते ए उ ह ने कहा क ‘इसम शक नह क हमारी सरकार अ है ले कन बुराइय से अछू ती नह है। लोग क इ ा ये है क बुराइय को र कया जाए और समय के साथ हम एक अ सरकार मले।’ सरे व ागण उस तुलना म यादा मुखर थे। म ास के जी सु म यन अ यर ने कहा, ‘ या भारतीय रैयत इसी तरह जानवर क तरह जीते-मरते रहगे? या वह इंसान नह ह? या उनके पास तक, भावनाएं और छु पी ई तभा नह है?’ उ ह ने आगे कहा क टश शासन म लोग का जीवन तर बद से बदतर हो गया है और बीस करोड़ भारतीय क त ‘गंभीर बनी ई है और वे बना कसी जीवन क उ मीद, आराम या मज़ा, आशा और आकां ा के चुपचाप अपनी तकलीफ को सहे जा रहे ह। वे इस लए जए जा रहे ह य क इस नया म उनका ज म आ है और वे इस लए मरे जा रहे ह यो क उनके शरीर म अब जीवन को रखना असंभव हो गया है।’56 अपने भाषण म गांधी ने कहा क अगर कां ेस के अ य , जो क एक पारसी भ पु ष ह, ांसवाल क या ा कर तो उ ह ‘कुली’ क ेणी म रखा जाएगा। द ण अ का के भारतीय अपनी ज म-भू म से काफ लगाव रखते ह, जब उनसे बंबई म अकाल-पी ड़त क मदद के लए कहा गया तो उ ह ने 2000 पाउं ड क रा श एक त करके भेजी थी। गांधी ने आ ह कया क वे अपने द ण अ क भाइय का अब बदला चुकाएं। उ ह ने कहा, ‘मेरे सामने उप त महानुभाव म से कुछ अगर आज क रात उस प व भावना के साथ द ण अ का के लए रवाना हो जाएं, तो हमारी मांग न य ही पूरी हो जाएगी।’57 सन 1896 म जब गांधी कलक ा आए थे तो ानीय नेता ने उ ह मह व नह दया था। ले कन पांच साल बाद अब उ ह हाथोहाथ लया जा रहा था। द ण अ का म उनके काम को लोग जान गए थे। इसके अलावा भारत म उनके एक भावशाली संर क गोपाल कृ ण गोखले थे ज ह ने उ ह अपनी छ छाया म ले लया था। हालां क गोखले, उ म गांधी से महज़ तीन साल बड़े थे, ले कन सावज नक जीवन म उनका अनुभव ब त यादा था। एक श क, लेखक, समाज-सुधारक और वॉयसराय क काउं सल के सद य गोखले ह तान क एक मश र श सयत थे। गोखले का ज म प मी तट के एक गांव म आ था और उनके पता पु लस म नौकरी करते थे। वह गरीबी और अभाव के बीच काफ मेहतन और वा याय से ऊपर उठे थे। मराठ क पुरानी राजधानी पूना म उ ह ने फ युसन कॉलेज म अ यापक क नौकरी कर ली जो आधु नक श ा का बड़ा क था। वहां वह जॉन टु अट मल और एडम मथ क रचनाएं छा को पढ़ाते थे। ह -मु लम भाईचारा और जा त आधा रत भेदभाव के खलाफ वह भारतीय संदभ म अपने उदारतावाद को दे खते थे। भारतीय रा ीय कां ेस क सालाना बैठक म वह एक मुख व ा थे और अ सर इं लड क या ा करते थे और

सा ा य क सरकार से भारतीय ज़ रत और आकां ा के त यादा से यादा संवेदनशील होने का आ ह करते थे। क ज म उनको सुनते ए नौजवान जॉन मेनाड क स एक बार उनसे ब त भा वत आ था और उसने अपने एक दो त से कहा था क गोखले के पास ‘भावनाएं ह, ले कन वे भावनाएं वचार से नयं त ह और उनम ऐसा कुछ नह है जो हम एक त न ध राजनी तक आंदोलनकारी क याद दलाए’।58 जब बैठक ख म हो गई तो गांधी अपर सकुलर रोड पर गोखले के आवास पर गए। भोजन करते समय और साथ-साथ घूमते समय गोखले ने गांधी से कहा क उन पर समाज सुधारक महादे व गो वद राणाडे का एक कज़ है जनक कुछ माह पहले मृ यु हो गई थी। गांधी ने गौर कया क ‘गोखले के मन म राणाडे के त अपार इ ज़त थी और वो हर बात म दे खी जा सकती थी। गोखले क हरेक बात म राणाडे का ज़बद त भाव था और राणाडे का संदभ आ खरी संदभ था।’ गांधी ने उसी नगाह से अपने इस गु को दे खना शु कया जैसा क उ ह ने लखा क ‘गोखले को काम करते दे खना उसी तरह क स ता दे ता था मानो कोई श ा हण कर रहा हो। वह एक मनट भी बबाद नह करते थे। उनक नजी दो ती और संबंध सब के सब सावज नक हत के लए थे।’ गांधी के आ या मक गु रायचंद क हाल ही म मृ यु हो गई थी। उस खालीपन को एक ऐसे व ान ने भरा जो उ ह सावज नक जीवन म राह दखा सकता था। हालां क कुछ आप यां बरकरार थ । उसम से एक गोखले क जीवनशैली थी। गांधी ने पूछा क गोखले सावज नक ामकार म चलने क बजाए नजी ब घी म य चलते ह? तो इस पर सा ा य के उस पाषद (वॉयसराय के पाषद) ने जवाब दया क ऐसा आराम के लए नह है, ब क नजता क सुर ा को लेकर है। गोखले ने गांधी से कहा, ‘मुझे ाम म चलने क आपक वाधीनता से ई या होती है, ले कन मुझे खेद है क म ऐसा नह कर सकता। जब आप मेरी तरह ही लोक यता के शकार हो जाएंगे तो ामकार म चलना अगर असंभव नह तो आपके लए भी मु कल ज़ र हो जाएगा।’59 19 जनवरी 1902 को उ री कलक ा म कॉलेज ट के सामने अलबट हॉल म ई बैठक म गांधी मु य व ा थे। गोखले ने लोग से उनका प रचय करवाया ज ह ने उनक ‘यो यता, ईमानदारी और रणनी त’ क शंसा क और द ण अ का म कए गए उनके काय क ‘काफ सराहना’ क । गोखले ने कहा क ‘ म टर गांधी उस धातु से बने ह जस धातु से नायक का नमाण होता है।’ अगर ‘ म टर गांधी अपने दे श आ जाते ह तो सारे गंभीर कायकता का ये कत है क उ ह उनके लायक स मा नत जगह यानी नेतृ व के ान पर बठाएं’।60 अ बट हॉल क बैठक म गांधी ने आनेवाले स ताह म भी भाषण दया। उनका एक भाषण द ण अ का म भारतीय क बेचारगी पर क त था। सरे भाषण म ए लो-बोर यु और भारतीय के उसम योगदान पर वे बोले। गांधी ने याद कया क जब शां त का

समय होता है तो उप नवेशवाद (अं ेज़) अ खड़ और श ुतापूण रवैयवाले होते ह ले कन यु के समय टश सै नक ‘वैसे ब त यारे होते ह। वे हम लोग के साथ वतं तापूवक घुलते- मलते ह। जब भी उनके पास कोई अ व तु होती है, वे उसे हमसे बांटते ह।’ यु भू म म अपने अनुभव को याद करते ए गांधी इस उलझाऊ और ज टल न कष पर प ंचे क ‘एक ह के प म म यु म यक न नह करता। ले कन अगर कोई बात आं शक प से भी मुझे सुकून दे सकती है तो वो ये हमने लड़ाई के मोच पर वशद अनुभव हा सल कया।’61 जनवरी के आ खरी स ताह म गांधी कलक ा से रंगून के लए रवाना ए। जहाज़ पर ही उ ह ने गोखले को एक ध यवाद प लखाः ‘म आसानी से उस बात को नह भूल सकता क आप हमारे बीच क रय को पाटने म कतने च तत थे’। उसके बाद उ ह ने इस बात के लए उनसे मा मांगी क उ ह ने गोखले के या ा करने के तरीक पर सवाल उठाया था। उ ह ने लखा क उ ह ‘सोमवार क शाम को उनक पसंद पर सवाल उठाने का कोई अ धकार नह था...अगर मुझे पता होता क इससे आपको तकलीफ होगी—जो मेरे पूछे जाने से आपको ई—तो म वह सवाल पूछने क आज़ाद कदा प नह लेता।’ उसके बाद उ ह ने और भी आ मीयता से लखा क ‘ श ा के े म आपके ारा कए जा रहे महान काय के कई सारे शंसक इस छोटे से जहाज़ पर भी मौजूद ह।’62 गांधी, अपने पुराने म ाणजीवन मेहता से मलने रंगून गए थे। अपनी डॉ टरी क ड ी के बावजूद मेहता ने ज़ेवरात का अपना पा रवा रक कारोबार शु कर दया था और बमा म अपने कारोबार क एक मुनाफा दे नेवाली शाखा खोल ली थी। उ ह ने अपने आपको आ वासी भारतीय के एक मुख सद य क है सयत से ा पत कर लया था। मेहता लंदन के दन से ही गांधी प रवार के व त थे। वे अ सर एक सरे से प चार करते थे और मेहता ने सन 1898 म डरबन म गांधी से मुलाकात क थी। रंगून म उनक या बात ई इसका हमारे पास कोई योरा नह है, जो गांधी के भारत म भावी काय म पर काश डालता। जब गांधी कलक ा म थे तो उ ह ने अपने एक भतीजे छगनलाल को उनके ब क पढ़ाई- लखाई क दे खभाल करने को कहा था। वह चाहते थे क उनके ब े का ादोहन से कहा नयां पढ़ जो ह पौरा णक कथा और दं तकहा नय का गुजराती सं ह था। वे ऐसा इस लए चाहते थे चूं क उनके श द म ‘अं ेज क वय क क वता म हमारी पुरानी कथा-क वता क तरह यादा नै तकता क श ा नह थी’। उनका भतीजा जो उस समय खुद उ के तीसरे दशक म था उसे कहा गया क वो ये दे खे क ‘ब े कसी गंद आदत का शकार न हो जाएं और उ ह इस तरह तैयार करे क उनके मन म स य के त गहरा ेम ज म ले ले।’63

फरवरी क शु आत म ही गांधी राजकोट वापस लौट आए। उ ह ने अपने बड़े बेटे ह रलाल को पास के ही शहर ग डल के आवासीय व ालय म भेजने का फैसला कया। छगनलाल सरे ब को पढ़ाया करते, जब क गांधी वकालत को जमाने का यास करने लगे।64 वह अपने मां-बाप के पुराने मकान म रहते थे जहां अभी भी उनक मां ारा ा पत नयम-कायदे चलते थे। सुबह शाम ाथना और भजन गाया जाता। इस बीच गांधी ब पर यान दे ते, घूमने नकल जाते और मुव कल को दे खते। पोरबंदर म ई उठापटक अब पुरानी बात हो गई थी। महल म ई चोरी क घटना के एक दशक बाद जसम उनके भाई एक क थत सहअपराधी थे, अब का ठयावाड़ के इस गांधी के ऊपर कोई भी संदेह का आवरण नह था। फर भी राजकोट म उ ह अपनी वकालत जमाने म काफ द कत का सामना करना पड़ा। महीन क मेहनत के बाद उ ह सफ तीन मुकदमे मल पाए। उसी एक मुकदम के सल सले म वह वेरावल गए जहां लेग फैलस आ था। अदालत क कारवाई शहर से बाहर खुले खेत म हो रही थी। उस अनुभव ने गांधी को बीमार लोग के लए चंदा जमा करने को े रत कया। उ ह ने लेग के इलाज पर ाणजीवन मेहता से एक पु तका लखने को कहा और उसे वयंसेवक म बांट दया। गांधी ने खुद को द ण अ का से संबं धत काय म भी त कर लया। वह अखबार के लए लेख लखते और आवेदन क तयां भारत म सावज नक जीवन म काम करनेवाले लोग को भेजते। उसका खचा नटाल इं डयन कां ेस वहन करती थी जसने उ ह एक लक रखने क इजाज़त द थी ता क वो उसे अपना ड टे शन दे सक और वो उसे प क श ल म उसे पो ट कर सके।65 हालां क मुकदमे अब भी नह आ रहे थे। अब मोहनदास गांधी राजकोट म एक नाकाम वक ल थे जहां उनके पता कभी द वान के प म शहर के सरे सबसे मह वपूण आ करते थे। जुलाई 1902 म वह हाईकोट म खुद को ा पत करने क एक और को शश म बंबई गए। उ ह ने एक कराए का ऑ फस लया और गरगांव म प रवार के लए कुछ कमरे लए। बाद म वे शहर के उ री उपनगर सांता ू ज़ के एक बड़े मकान म चले गए। इस बीच द ण अ का म बोर के आ खरी गु र ले द ते ने आ मसमपण कर दया। मई 1902 के आ खरी दन वीरी न गग म दोन यु रत प ने एक समझौते पर द तखत कया जसके मुता बक बोर ने टश स ाट को अपना अ धप त मान लया। इसके बदले अं ेज़ ने ये बात मान ली क व ालय , ांसवाल क अदालत और ऑरज टे ट म डच भाषा जारी रहेगी। उन दोन पूव गणरा य को ‘ ाउन कॉलोनी’ का दजा दे दया गया जसका शासन सीधे लंदन से चलाया जाना था। समय के साथ वहां पर उनक अपनी वधा यका होनी थी। हालां क उस समझौते म ये बात दज क गई क ‘दे सी लोग को मता धकार दान करने का सवाल तब तक तय नह कया जाएगा जब क वहां व-शासन

क व ा न हो जाए।’66 इस आ खरी उपबंध के साथ यह साफ हो गया क (बाद के इ तहासकार के श द म) वीरी न गग का समझौता दरअसल ‘एक आ दम शां त व ा थी जो सफ यूरोपीय हत को दे खकर लखी और मानी गई थी’।67 ये बात क अब पूरा का पूरा द ण अ का टश नयं ण म आ गया, उप नवेश मामल के से े टरी ऑफ टे ट जोसेफ चबर लन के लए बड़े गौरव क बात थी। उसने नए साल के अवसर पर इन नए उप न वश के दौरे का फैसला कया। इस बात क खबर सुनकर नटाल इं डया कां ेस ने गांधी को वापस आने को कहा। भारतीय लोग को नए नज़ाम के तहत अपने अ धकार को सुर त करने क आव यकता थी और इसके लए गांधी का आना ज़ री था। गांधी त काल राज़ी हो गए। नवंबर क शु आत म गांधी ने अपने एक म को लखा था क उ ह ने अभी तय नह कया है क क तूरबा उनके साथ जाएंगी या नह । अगर वह जाती भी ह तो वह ह रलाल और म णलाल को राजकोट म छोड़ दगे जहां वे उनके पुराने कूल म पढ़गे और एक ‘ व ासपा वेतनभोगी कमचारी उनके पढ़ाई क दे खभाल करेगा’। उनका वह दो त जो लंदन म उनका सहपाठ था, अब राजकोट म एक कामयाब वक ल बन चुका था। उससे गांधी ने कहा क वह ब को अपने टे नस कोट का इ तेमाल करने दे ।68 इस बीच क तूरबा और ब ने बंबई म रहने का फैसला कया। ह रलाल, ग डल के बो डग कूल म थे जब क सरे ब े अपनी मां और अपने बड़े चचेरे भाई छगनलाल क दे खरेख म थे।69 जैसा क सन 1893 म आ था, इस बार भी गांधी बेहतर भ व य क तलाश म द ण अ का के लए नकलने वाले थे। अपनी आ मकथा म गांधी इस बात के त अबूक बने ए ह क डरबन छोड़ने के एक साल बाद फर से वे डरबन य रवाना ए जसे वे अपनी समझ से हमेशा के लए छोड़ रहे थे (और उ ह उ मीद भी यही थी)। वे लखते ह क ‘उ ह ने बंबई म व त होने के बारे म सोचा था’ और ‘महसूस कया क ज द ही हाईकोट म वे अपनी वकालत जमा लगे’। ले कन ‘ई र ने मेरी कसी भी योजना को मेरे हसाब से पूरा नह होने दया। उसने उसे अपने तरीके से ही होने दया है।’70 ब त सारे सं मरण गुमराह करने के लए कु यात होते ह—इस लए क याद कु यात प से दोषपूण होती ह। जब गांधी ने सन 1920 के दशक म अपनी आ मकथा लखी, उस समय वे एक महान रा वाद नेता के तौर पर ा पत हो चुके थे और आज़ाद के लए संघषरत रा के तीक बन चुके थे। अब सवाल ये है क वे उन बात को खुद को और अपने दे शवा सय को कैसे बताएं क उ ह ने सन 1902 म बारा भारत य छोड़ा? स ाई तो ये थी क द ण अ का जाने का फैसला भा य के रह यमय इशार ारा तय नह आ था, ब क उनक वकालत जमाने म नाकामयाबी का भी उसम हाथ था। अग त 1902 म अपने एक म को लखते ए गांधी ने कहा, ‘वह हाईकोट म मटरग ती करने

और अपने म वक ल को ये बतलाने के लए आज़ाद ह क मुकदमा- वहीन वक ल म एक क बढ़ो री हो गई है’। राजनी तक वग से भी त या उसी तरह से नराशाजनक मल रही थी। उ ह ने लखा क जब वे फरोज़शाह मेहता के पास सलाह लेने के लए गए तो ‘उस क ावर राजनेता ने भी मुझे कोसा। हालां क उनका कोसना भी मेरे लए आशीवाद के बराबर है। मेरी उ मीद के मुता बक उ ह ने सोचा क म नटाल म जो कुछ थोड़ी-ब त बचत करके लाया ं, उसे मूखतापूवक बंबई म उड़ा ं गा।’71 कुल मलाकर गांधी बंबई हाईकोट के ा पत वक ल के बीच जगह बनाने म नाकामयाब रहे। उनके हमउ वक ल जो सन 1890 के दशक म वहां वकालत करने गए थे, उ ह गांधी क तुलना म एक दशक का अनुभव हो चुका था। अब पेशेवर और सामा जक दोन संदभ म राजकोट से डरबन और वहां से बंबई आया आ वह उनके लए बाहरी हो गया था। खैर जो भी बात हो, नटाल से आया आ प उनके लए कोई अदालती स मन नह था, ब क एक आमं ण मा था। अगर उस ताव ने गांधी को आक षत कया तो इसक वजह ये हो सकती है क बंबई म वह अभी भी एक नाकामयाब वक ल थे जब क द ण अ का म उनके ढे र सारे भ और शंसक मुव कल मौजूद थे।

7 भूर के खलाफ गोरे

नवंबर 1902 के आ खरी स ताह म गांधी बंबई से रवाना ए। उनके साथ उनके भतीजे मगनलाल और आनंदलाल थे ज ह ने द ण अ का म अपने भा य को आज़माने का फैसला कया था। दसंबर के तीसरे स ताह म उनका जहाज़ डरबन प ंच गया। गांधी के भतीजे ट गट गांव क तरफ रवाना ए जहां उ ह ने एक कान खोलने क योजना बनाई थी। इस बीच उनके चाचा ने अपने आपको समुदाय क सेवा म सम पत कर दया। डरबन के मेयर ने द ण अ का क या ा पर आए उप नवेश मामल के से े टरी ऑफ टे ट जोसेफ चबरलेन से मलने के लए भारतीय श मंडल का समय नयत कर रखा था। उस मुलाकात का समय 26 दसंबर क दोपहर को रखा गया था। गांधी ने मुलाकात के समय म एक दन क बढ़ो री का आ ह कया जो मान लया गया था य क 26 तारीख को शु वार था और ‘ श मंडल के अ धकांश [मुसलमान] सद य के लए नमाज़ का खास दन था और अगर उस दन मुलाकात रखी जाती तो वो उसम शा मल नह पाते’।1 27 को चबरलेन के साथ ई बैठक म उसे एक आवेदन स पा गया जसम अ य बात के अलावा लाइसस क़ानून म राहत दे ने और भारतीय ब के लए कूल के इंतज़ाम क मांग क गई। उसके बाद चबरलेन े न से जोहांसबग चला गया और गांधी भी कुछ दन के बाद वहां प ंचे। ांसवाल के भारतीय ने कहा था क वे पछले कुछ साल से ‘वक ल म टर गांधी ारा ही नद शत’ कए जा रहे ह सो वह भी से े टरी ऑफ टे ट से मलने आएं। इस पर सरकार ने ठं डा जवाब दया क क उस ‘ श मंडल म 15 से यादा सद य नह हो सकते और चूं क म टर गांधी ांसवाल के नवासी नह ह, वे उसके सद य नह हो सकते।’2 कुल मलाकर वहां के ापारी अपने त न ध (गांधी को) उस श मंडल म नह ले जा सके, ले कन इतना तो आ ही क गांधी ारा तैयार कया गया मांगप ही चबरलेन के पास प ंचा। उसम मांग क गई क भारतीय को कसी खास जगह (लोकेशंस) क बजाए कह भी संप रखने और ापार करने क इजाज़त द जाए। उसम दावा कया गया क ांसवाल के भारतीय क त आं ल-बोर यु के ‘पहले क त से भी बदतर’ हो गई है। उसके अगले स ताह गांधी केप टाउन के अपने भारतीय म को एक आवेदन भेजा

जसे वे चबरलेन के केप दौरे के दौरान स पने वाले थे। इस तरह से द ण अ का लौटने के महज दो स ताह बाद गांधी ने अपने दे शवा सय क तरफ से तीन व भ आवेदन भेजे जो तीन अलग ांत म उनक सम या से संबं धत थे। हालां क उन आवेदन के नतीज के बारे म वह ब त उ मीद नह कर रहे थे जैसा क जनवरी 1903 के आ खरी स ताह म उ ह ने दादाभाई नौरोजी को लखा भी था। उ ह ने लखा क चबरलेन उप नवेशवा दय के उन दाव से भा वत हो गए ह क ‘जब तक कठोर कदम नह उठाए जाते, यह उप नवेश भारतीय से आ ा दत होता रहेगा।’3 उनका प रवार अब भारत म था, गांधी मु यतः अपने भतीजे छगनलाल से प चार करते थे। उसी के माफत वह क तूरबा और ब से संवाद ा पत करते। क तूरबा गुजराती पढ़ना जानती थ ले कन ऐसा लगता है क वह वाह म गुजराती लखना नह जानती थ । इसके बदले वे अपना कुशल- ेम भतीजे के माफत ही भेजा करत ।

फरवरी के पहले स ताह म गांधी ने छगनलाल से कहा क संगीत क क ा से म णलाल का नाम कटवाना ठ क नह है: ‘इसम तु हारी कोई गलती नह है, तु हारी चाची क गलती है।’ फर उ ह ने अपनी दशा बतानी शु क । उ ह ने लखा क वहां उनका भ व य ‘ब त अ न त’ था, एक वक ल-आंदोलनकारी का जीवन ‘कोई गुलाब क सेज नह थी’। अगला महीना काफ मह वपूण था। अगर उ ह लगा क अब द ण अ का म रहना संभव नह है तो वह भारत लौट आएंगे। सरी तरफ अगर उ ह ने वहां रहने का फैसला कया तो उ ह ने आगे लखा क उसके ‘छह महीने के बाद ही तुम सब लोग को साथ लाना संभव हो पाएगा।’4 उस समय गांधी ने खुद को जोहांसबग म ही ा पत करने का फैसला कया। लड़ाई के बाद ांसवाल को ‘ ॉउन कॉलोनी’ के प म त द ल कर दया गया था। उस समय वहां का गवनर लॉड मलनर वहां के शासन का मुख था। समय के साथ-साथ उस उप नवेश म खुद क चुनी सरकार होनी थी जो ेत वधा यका ारा संचा लत होती और सफ ेत जनता ारा चय नत होती। ऐसे म, इस सं मण काल म गांधी का वहां रहना ज़ री था ता क वह अपने दे शवा सय के हत क र ा के लए माहौल बना सक। माच 1903 के आ खरी स ताह म गांधी ने ांसवाल के सु ीम कोट म एक वक ल के प म काम करने का आवेदन दया। उ ह ने इनर टपल का एक स ट फकेट और बंबई हाईकोट और नटाल के सु ीम कोट म काम करने का सबूत आवेदन के साथ संल न कया। 14 अ ैल को उनका आवेदन मंज़ू कर लया गया।5 उसके कुछ महीन के बाद उनको र सक एंड एंडरसन ट के कोने म एक कायालय मला और उसी लॉक म रहने के लए एक कमरा भी।6 सन 1900 के दशक म जोहांसबग अपने नमाण के दौर से ही गुज़र रहा था। वहां काफ काम हो रहा था। उस समय के बारे म प कार लोरा शॉ ने ब ढ़या तरीके से लखा है और ट पणी क है क वह ‘शहर भौ तक सम या क वजह से बुरी तरह त था। यह

डरावना, अ चपूण, बना व ा क समृ , कला के बना मौज-म ती, सु चपूण भावना के बना धन और ग रमा के बना तड़क-भड़क का दशन था।’7 एक सरे टश प कार ने दज कया क ‘जोहांसबग का दै नक जीवन लग रहा था क वाभा वक बेचैनी से भरा आ था। ऐसा लगता है क हरेक अपने नवास बदलता रहता है। हरेक महीने के अंत म व वध कार के फन चर शहर के कसी नए उपनगर म गा ड़य से लादकर ले जाए जाते।’8 जोहांसबग म पु ष का भारी जमावड़ा था। वहां ेत के लए ल गक अनुपात दो पु ष पर एक ी का था तो अ ेत के लए तो दस पु ष पर एक का। सामा जक व वधता तो गजब क थी, यूरोप के लगभग सभी दे श का वहां त न ध व था और द णी अ का के लगभग हरेक आ दवासी समूह क नुमाइंदगी वहां थी। जोहांसबग म नौकरी क तलाश म और अपनी तकद र बनाने आए लोग क भारी सं या थी। वहां पर ‘धरती के कोने-कोने से लोग आए थे-मोज़ां बक, यासालड, कानवाल और ऑ े लया से खननवाले, कॉटलड से श पी और इंजी नयर, लथुआ नया और गुजरात से कानदार, इं लड और जमनी से वसाय म धन लगानेवाले—वहां कौन नह थे’! यह ऐसा शहर था ‘जहां हर कोई कह न कह से आया आ था, वहां सारी सामा जक व ाएं ा पत होनी थ और हरेक चीज़ हड़पे जाने के लए मौजूद थी’।9 गांधी के वहां प ंचने के कुछ ही दन बाद वहां एक जनगणना ई जसम ये अनुमान लगाया गया क जोहांसबग क आबाद डे ढ़ लाख से कुछ यादा है। यह करीब 10 फ सद सालाना क दर से बढ़ रही थी। ऐसा लगता है क शहर के लोग ‘सतत हड़बड़ी’ म है। लगातार नई सड़क बनाई जा रही थ , नए घर और कायालय बनाए जा रहे थे। ज़मीन पर लक ड़यां और अ य भवन नमाण साम ीय के ढे र दखते थे और हवा म धूल का बादल छाया रहता था। नजी उ म और इसके अ तरेक को बं धत करने के लए एक नगरीय व ा क ापना क जा रही थी। जब सन 1903 म गांधी ने जोहांसबग को अपना ठकाना बनाया, पहला भू मगत नाला बछाया जा रहा था और पहला ऐसा नाला बनाया जा रहा था जो सड़क पर एक त पानी को नकाल सके। उसी साल शहर म गैस और बजली का भी आगमन आ।10 जस साल गांधी जोहांसबग गए उसी साल लेखक जॉन बुकान ने शहर का एक छोटा और सट क च ण लखा। बुकान उस समय रा यपाल लॉड मलनर के टाफ के तौर पर काम कर रहे थे। उसने जोहांसबग को एक ऐसे शहर के प म दे खा जो अभी भी ‘परी ण के दौर से गुज़र ही रहा था, जो संवेदनशील, महा वाकां ी और अपने मजाज़ से ब कुल ही अनजान था’। उसने लखा क इसका एक ब त ही ‘छोटा और उतार-चढ़ाव वाला अतीत’ है जो पहले कभी एक खदान का श वर था और बाद म खनन काय का शहर बन गया। या यह कभी सं कृ त और कला का उफनता आ क और वै क महानगर बन

पाएगा? बुकान ने सवाल कया क या जोहांसबग का वही हाल होगा जैसा ब त सारे औप नवे शक शहर का आ और या यह एक अक , कूपमंडूक, अहंकारी, भावना म ब त कम अं ेज़ीदां, कोण से लगातार भौ तकवाद और वैसे य क संक णता के साथ संक ण, जो सोचते ह क राजनी त का मतलब घसी- पट बात म लपटे ानीय हत होते ह, जैसे लोग का शहर बन जाएगा? या फर जैसे क यह अपने पूवव तय से पहले ही यादा समृ और बु है और उनसे यादा मश र है (जैसे क ऑ े लया म मेलबॉन या यूज़ीलड म वे लगटन), जोहांसबग उ धरातल पर अपनी या ा शु करेगा और सही मायन म एक सा ा य- तरीय नगर बनेगा जहां (अपनी मातृभू म के साथ) भाईचारे क नज़द क भावना पनपेगी और यादा उदार सं कृ त होगी’?11 जोहांसबग म भारतीय मूलतः दो उपनगर म रहते थे। प म म फोड् सबग और उ र-प म क तरफ ेडे ॉप म। हालां क मोहनदास गांधी शहर के क म रहते और काम करते थे जो उसके शेयर बाज़ार, इसके मु य डाकघर और अदालत के ब कुल नकट था। द ण अ का के रा ीय अ भलेखागार म सुर त गांधी के वकालत के रकॉड हम बताते ह क उनके सारे मुव कल करीब-करीब भारतीय ही थे। उनम से कुछ यु से पहले ांसवाल म रहते थे और अब फर से उस ांत म पुनवापसी चाहते थे। कई सारे पहले से ही ांसवाल म रहते थे ले कन ापा रक कानून म राहत चाहते थे। कई लोग ऐसे थे जो द ण अ का के व भ ांत म आवाजाही का अनुम त-प चाहते थे। गांधी उनक अपील तैयार करते और अ धका रय के सम रखते थे।12

नटाल क तरह ही गांधी क वकालत और उनका सावज नक काय साथ-साथ चलता था। पहला काम जीने के लए ज़ री था, जब क सरा काम (कह क) जीवन के लए। ांसवाल म एक टश इं डयन एसो सएशन भी था। उसके अ य एक मु लम ापारी अ ल गनी थो जनक कंपनी मेसस मोह मद का सम कम न एंड कंपनी क शाखाएं डरबन और जोहांसबग दोन जगह पर थ । उस संगठन का नाम उ लेखनीय है, वे सफ भारतीय ही नह थे—ब क ‘ टश भारतीय’ थे, जससे ये कट होता था क वे महारानी क जा ह और सा ा य म उनका उतना ही अ धकार है जतना कसी और जा को! मई 1903 के तीसरे स ताह म एसो सयेशन ने लॉड मलनर से मुलाकात का व मांगा। अ ेत के त मलनर का दोहरा रवैया उसके उन दो लगातार प से ज़ा हर होता है जो उसने लंदन के अपने व र को भेजा था। 11 मई को उसने ताव कया था क भारतीय और ची नय को उनक ‘अ य धक अ व ता वाली आदत ’ क वजह से एक खास इलाके म रहने (और काम करने) के लए भेज दया जाए। साथ ही ऐसा करने से ‘उस श ुता क भावना म भी कमी आएगी जो यूरोपीय समुदाय के मन म उनके त है-एक ऐसी श ुता जसक वशासन लागू कए जाने क संभावना के साथ उनके लए बड़े खतरे के तौर पर उभरने क आशंका है’।13 अगले दन मलनर ने लखा क रेलवे और खनन काय के लए वह भारतीय और चीनी मक को बुलाए जाने के प म है। द ण अ का के ‘अ य धक संसाधन’ का मक क कमी क वजह से पूरा दोहन नह कया जा सका है जो ‘अब भयावह प लेता जा रहा

है’। मलनर ने शकायत क क वतमान म, ‘हमारी त ये है क हम भारतीय ापारी और फेरीवाल क बाढ़ से परेशान ह, जसका हमारे समुदाय को कोई फायदा नह मल पा रहा। ले कन हम भारतीय मज़ूदर को नह लाने दया जा रहा है जसक हम ज़ रत है।’14 22 मई को जब गांधी मलनर से मले तो गांधी ने उस शासक से कहा क उनके लोग को लगातार ‘अनुम त प और पर मट से नजात दलाए जाने क ज़ रत है जो उ ह पग-पग पर चा हए होता है’। इस पर मलनर ने जवाब दया क ‘ ेत जनमत के बल दवाब के म े नज़र उसक है सयत के इ तेमाल का कोई मतलब नह होगा’। उसने उस नी त का समथन कया जसके तहत सरकार ‘ सफ ए शयाइय के लए बाज़ार’ बनाना चाहती थी। उसने तक कया क ‘य कु और हरेक जगह भारतीय समुदाय के लोग को बसने और आम जनता ारा वरोध झेलने क तुलना म उनका एक जगह रहना और ापार करना यादा फायदे क बात होगी—खासकर तब जब यहां के ेत लोग उ ह अपने बीच बसने नह दे ना चाहते ह।’15 उसके दस दन बाद मलनर एक अ य संगठन के सद य से मला जसका नाम हाईट लीग था। उ ह ने गवनर से कहा क वे ए शयाई लोग के खलाफ़ ह, चाह वे ापारी ह या मक। उ ह ने दावा कया क ‘चीनी लोग तो सबसे यादा अनै तक ह’। जहां तक भारतीय क बात थी तो ‘कुली लोग उ पादक नह ह, वे ापारी ह’। उसम से एक गोरे ने गु से म मलनर से कहा: ‘कनाडा म ऐसी बात कहां सुनते ह? वहां तो उ ह जब भी मज़ र क ज़ रत होती है तो उ ह गोरे मज़ र मल जाते ह।’16 हाईट लीग वाल के जवाब म ह ता नय ने भी एक बैठक क । वे जोहांसबग के फॉ स ट के एक हॉल म जमा ए जहां उनके व ा टश इं डयन एसो सएशन के चेयरमैन अ ल गनी थे। वहां वे ये शकायत करने के लए जमा ए थे क टश स ाट (सरकार) ने उनके साथ धोखा कया है। अगर ांसवाल क धरती ‘अं ेज़ के र से सनी ई है तो या ह ता नय ने उसम ह सेदारी नह क है?’ उ ह ने उ मीद क थी क टश वजय उनके लए याय लेकर आएगी और जस दन राजधानी के ऊपर यू नयन जैक लहराएगा उसी दन ‘उनक वकलांगता मानो जा ई तरीके से र हो जाएगी’। ले कन ऐसा नह होना था। य कस ा म कसी ने तुरंत भांप लया क भले ही हम टश जा ह ले कन आ खरकार हम ह तो ए शयाई ही। और हमारी गदन पर नगरानी के लए ए शयाई ऑ फस लाद दया गया। अब ए शयाई ऑ फसर वाभा वक प से अपने अ त व को सा बत करने के लए हमारे लए ए शयाई क़ानून लेकर आए ह। ऐसी त म हम पूरी तरह से सामा जक वनाश के कगार पर खड़े ह...हम अलग वग के प म च त कर दया गया है, हम ‘लोकेशंस’ पर भेजा जा रहा है जसे ये लोग उ साह से बाज़ार कह रहे ह और शायद हम बाज़ार के अलावा ज़मीन के एक टु कड़े को हा सल करने से भी वं चत कर दया जाएगा और हम 3 पाउंड का नबंधन टै स भी भरने को मजबूर होना

पड़ेगा। सं ेप म कह तो असल बात ये है क अगर हम ांसवाल म रहना है तो हम सामा जक अछू त (कु रोगी) के प म रहना होगा।17

सन 1897-8 म गांधी जब नटाल म थे तो उ ह ने द ण अ का म भारतीय समाज के लोग के मु को उठाने के लए एक अखबार नकालने क सोची थी। अब सन 1903 क ग मय म उ ह ने उस वचार को फर से या वत करने के बारे म सोचा और दो ऐसे य क खोज क जो उ ह मदद दे ने को इ ु क ह । उसम पहले का नाम था मनसुखलाल हीरालाल नज़र जो गुजराती था और ज ह ने नया भर क या ाएं क थ । मनसुखलाल ने बंबई म मे ड सन क पढ़ाई क थी और द ण अ का आने से पहले लंदन म ापार कर चुका था। सरे का नाम था मदनजीत ावहा रक जो एक पूव कूल श क थे और डरबन के े ट म एक टग ेस चलाते थे। उस ेस म शाद के काड, बजनेस काड, मीनू, अकांउट फॉम, मेमोरडम, सकुलर, रसीद बुक इ या द क ‘गुजराती, त मल, हद , उ , ह ू, मराठ , सं कृत, च, डच, जलू इ या द भाषा म छपाई होती थी।’18 इस ापक सूची म अब एक सा ता हक वैचा रक अखबार भी जुड़नेवाला था। नज़र और ावहा रक दोन ही नटाल इं डयन कां ेस के स य सद य थे। सन 1895 और ‘96 म गांधी ने नज़र से कहा था क वे े ट म घर-घर जाकर कां ेस के लए चंदा जुटाएं। चूं क उनक लखावट अ थी और लखवाने वाला गांधी जैसा एक यो य वक ल था, तो इस तरह से नज़र ने सरकार को भेजे जाने वाले कई आवेदन को भी कागज़ पर उतारने का काम कया था। इस बीच सन 1897 म नज़र ने गांधी के कहने पर भारतीय के खलाफ़ उप नवेशवा दय के चार का जवाब दे ने के लए लंदन क भी या ा क थी।19 गांधी के सहयोगी डरबन म थे जो द ण अ का म भारतीय ग त व धय का मु य क था। अब ावहा रक का काम ये था क वे ापा रय से चंदा कर और चार भाषा म उस सा ता हक को छापने के लए टाइप क व ा कर (उस ज़माने म टाइप को हाथ से लगाना पड़ता था) वो चार भाषाएं थ —अं ेज़ी, गुजराती, हद और त मल। नज़र का काम हरेक अंक क योजना, लेख क व ा, अनुवाद, लेख का संपादन और अखबार को ेस तक प ंचाना था। जोहांसबग से गांधी उसके लए बौ क और नै तक मागदशन दे ते जसम उनके ारा कई लेख का लखा जाना भी शा मल होता था।20 सन 1903 म डरबन म चौदह टग ेस थे। सफ एक को छोड़कर सबके सब ेत ारा संचा लत थे और उसके मा लकान और कमचारी भी वह लोग थे। बाक बचा एक छापाखाना ावहा रक का था। यह ब भाषी प उन एकरस वाली प -प का के बीच म एक अलग और व श पहचान के तौर पर कट ई। पहले से का शत प काएं सफ अं ेज़ी म ही लखी, छापी और पढ़ जाती थ , ले कन इस प म ऐसा नह था। इस

अखबार म काम करनेवाले लोग भी व वध क म के थे— जसम एक केप का अ ेत, एक मॉरीशस का नवासी, कई गुजराती और कम से कम दो त मल थे।21 अखबार का नाम रखा गया इं डयन ओ प नयन । उसका पहला अंक 4 जून 1903 को का शत आ और उसम घोषणा क गई क वह प भारतीय समुदाय क आवाज़ बनेगा —जो ‘द ण अ का क राजनी त म एक जाना-पहचाना कारक त व’ है। ‘उप नवेशवा दय के दमाग म उनके त पूवा ह’ उन ‘महान सेवा को भा यपूण प से भुलाए जाने पर आधा रत है जो भारत ने उनक मातृभू म को दया है जब से नय त ने ह तान को बरता नया के झंडे तले ला खड़ा कया है’। उसी अंक म एक लेख म उस वामीभ के बारे म उ लेख कया गया क अगर द ण अ का म ‘कोई यूरोपीय अपराध करता है या अनै तक आचरण करता है तो यह उसका गत वहार है जब क यही काम अगर कोई भारतीय करता है तो पूरे दे श को बदनाम कर दया जाता है।’22 इं डयन ओ प नयन शु करके गांधी अपने आपको एक ान का आदान- दान करनेवाले म य और सं कृ तक मय के बीच पुल का काम करनेवाले के प म सामने रख रहे थे। उस प का म द ण अ का म रह रहे भारतीय , भारत म रह रहे भारतीय , ‘सभी वषय —सामा जक, नै तक और बौ क’ पर सामा य लेख छपने वाले थे। उस प म भारतीय के मु क ‘वकालत’ क जाती, और साथ ही यूरोपीय लोग को ‘भारतीय सोच और आकां ा’ के बारे म जानकारी द जाती। हालां क इस अखबार के उ े य म एक बात नह झलक रही थी और वो बात थी—द ण अ का क आबाद के सबसे बड़े तबके यानी मूल अ कय का ज़ ।23 इं डयन ओ प नयन का हरेक अंक आठ प का था। उसके मुख—पृ पर अखबार का शीषक और उन भाषा का ज़ था जसम इसे छपना था। उसके बाद व ापन क एक ृंखला थी। डरबन क एक कान ने अपने रॉले साइ कल के बारे म व ापन को ‘मजबूत, व रत और भरोसेमंद’ के प म छापा। एक सरे व ापन म अपने पाठक को ‘ओ रयंटल वेलरी’ के सी मत टॉक के बारे म आगाह कया गया था! नटाल म रहनेवाले सामा य कारोबा रय ने अखबार म अपने व ापन दए थे, साथ ही सगरेट और कपड़ा बेचनेवाली खास कान ने भी व ापन दए थे। अ य व ापन अखबार ने खुद दए थे जसम ‘अ े मशीन चलानेवाले’, एक ‘ थम ेणी का त मल कंपोज़र’ और एक ऐसे आदमी के लए व ापन दया गया था जो हद और अं ेज़ी दोन पढ़ सके। तो उस अखबार का पहला प ा ऐसा था! उसके बाद समाचार और ट प णयां अगले पृ पर थ । बाद के प म गुजराती म लेख थे और आ खर म हद और त मल म। नटाल म साल के लए अखबार क क मत बारह श लग और छह पस रखी गई थी जब क अ य जगह के लए 17 श लग (जो क अ म ही दे य था) रखी गई थी। अखबार का एक अंक तीन पस म मलता था।

नटाल या ांसवाल म भारतीय को भा वत करनेवाले नए कानून, वदे श म होनेवाले वरोध- दशन, लेग या कसी महान दे शभ के बारे म कोई समाचार—ये सब लेख इं डयन ओ प नयन क सारी भाषा के सं करण म छापे जाते थे। अ य ब त सारे लेख अलग-अलग समुदाय से होते थे। त मल खंड म उन योहार के बारे म लखा जाता था जो सफ द ण भारत म मनाए जाते थे। उस खंड म लड़ कय के लए कूल पर भी काफ यान क त कया जाता था य क उस ज़माने म गुजरा तय क तुलना म त मल अपनी म हला को श त करने के यादा इ ु क थे।24

इं डयन ओ प नयन का गुजराती और अं ेज़ी खंड यादातर गांधी ारा लखे गए लेख पर ही आधा रत था (जो अ सर बना उनके नाम के छपता था)। वह व वध वषय पर लघु-आलेख और संपादक य लखते थे। उस प का म मेयर और गवनर के बयान छापे जाते। सरकारी प और द तावेज़ को सं त प से छापा जाता। उ पीड़न और भेदभाव के मामल क ा या क जाती। डरबन और जोहांसबग के बीच म डाक हमेशा आता-जाता रहता। उस डाक से च यां, लेख और संपादन के लए भेजी जानेवाली ब त सारी साम ी अनवरत प से इं डयन ओ प नयन के संपादक और उस वक ल के बीच आती-जाती रहत जो सैकड़ मील र रहकर इसके संचालन को नद शत करता था। उस काय म एम. एच. नज़र काफ ती ग त से काम करते थे और हरेक अंक क तैयारी एक स ताह पहले ही कर लेते थे। वे लेख को दे खते, उसका संपादन करते और अनुवाद को परखते। इधर धन क सम या आ खड़ी ई और टाइप कम पड़ने लगे। एक टं कक ने नज़र से कहा उ ह अं ेज़ी के अ र ‘ए’ के गुजराती समक का कम इ तेमाल करना चा हए य क टॉक (भंडार) म वो टाइप कम है। नज़र ने गांधी को लखा क उसके पास ‘सारी साम ी ख म हो गई है’ और वह ‘कुछ भी नह सोच पा रहे’। संपादक को अखबार के छपने के दन आधी रात तक काम करना होता था जसका मतलब था क घर जाने के लए उसे ाम नह मल पाता था और उसे डरबन क उन अंधेरी सड़क से होकर रात को पैदल ही घर जाना होता था।25 जहां तक गांधी का सवाल था तो उन दन उनका लेखन उनके सावज नक जीवन के काय से ही यादा संबं धत था। इं डयन ओ प नयन के लए लख गए सैकड़ प े के संपादक य, रपोताज, अ धका रय और वधायक को दए आवेदन , कानूनी द तावेज़ और इं लड और भारत म अपने समथक को लखे प के अलावा उनक नजी ज़दगी से संबं धत ब त अ प और ब त सं त जानकारी मलती है। उसम एक ही दन यानी 30 जून 1903 को लखे दो प शा मल ह जो द ण अ का म उनके आने के छह महीने के बाद लखे गए थे। पहला प राजकोट त उनके वक ल म ह रदास वोरा को लखा गया है। उस समय गांधी के चौदह साल के बड़े बेटे ह रलाल क तबीयत खराब थी।

भारतीय के बारे म आम जनभावना

टश भारतीय के तक

उनक जीवन शैली घ टया और गंद है

वे इस बात से इ कार करते ह क वे सरे नाग रक क तुलना म बुरे नाग रक ह। वे सफाई और नगरपा लका के मानक को पूरा करने के लए तैयार ह।

अपनी न न-जीवनशैली क वजह से वे ऐसे पा र मक पर काम करने के लए तैयार हो जाते ह जस पर एक गोरा कभी काम नह कर सकता।

वे श ा ा त करने के लए च तत ह और उससे लाभ उठाने म स म ह।

वे ब ढ़या उप नवेशवाद नह ह। वे अपने साथ नवेश नह लाते और अपनी बचत अपने दे श को भेज दे ते ह।

वे लोग मेहनती ह, वन ह, न य ह। क़ानून का पालन करने वाले ह और इस दे श म बसने के लए तैयार ह।

द ण अ का एक ऐसा दे श है जहां गोरे लोग रह सकते ह और उसे अपना बना सकते ह और अपने न ल को ा पत कर सकते ह। पूरब क न ल के पास ब त सारे अवसर ह जहां वे उप नवेश बना सकते ह। ऐसी जगह म जा सकते ह जहां का वातावरण उ ह मुफ द लगे और जहां गोरे नह बस सकते।

टश राजा के प म वह रंग, जा त और मत के भेदभाव के बना समान अवसर पाने के हकदार ह।

ये बात क वदे शी अ ेत लोग के त अप रहाय श ुता और घृणा क भावना ने रंग के आधार पर एक ऐसी खाई पैदा क है ए शयाई लोग ेत लोग के वेश ने यहां एक तीसरा त व और द ण अ का क सम या के समाधान म एक अ त र ज टलता पैदा कर द है इससे इनकार नह कया जा सकता।

उ ह ने सा बत कया है क वे आमजन के साथ ह, उदार और जनसेवी ह और वे अपने गरीब भाईय क दे खभाल करते ह।

वोरा ने उस त म उनक मदद क थी और वह अब व थे। गांधी ने अपने दो त को ध यवाद दया क ‘उ ह ने उनके बेटे क पता के सामान दे खभाल क ...म यही कामना करता ं क वह मेरे पास होता और म उसक दे खभाल करता..और मुझे इस बात का खेद है क वह मेरे लए एक चता और मान सक तकलीफ का सबब बनता, जो वह नह बना...।’ उसके बाद उ ह ने जोहांसबग म अपनी ज़दगी के बारे म बताना शु कया। उ ह ने लखा क ‘उ ह ने अपनी वकालत ब ढ़या तरीके से जमा ली है’ ले कन उनके सावज नक जीवन का काय उनके लए ‘बड़ी चता क बात बनता जा रहा है’। उस काय क वजह से वह सुबह 9 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक त रहते ह। बीच म वह सफ खाना खाने और थोड़ा टहलने के लए वराम लेते ह। ले कन गांधी क राय म अभी आराम का व नह था य क ांसवाल क सरकार भारतीय को ल य करके नया वधेयक लानेवाली थी। बंबई से रवाना होने से पहले उ ह ने अपनी प नी से कहा था क या तो ‘म साल के अंत तक दे श वापस आ जाऊंगा या उसे उस समय तक अ का आना पड़े गा।’ उ ह उ मीद नह थी क वो इस वादे को पूरा करने म सफल हो पाएंगे। क तूरबा उनके साथ रहने के लए आ सकती थ ले कन उ ह ने चेतावनी

द क ‘नटाल म उसे उनका सा य कम मला, हो सकता है जोहांसबग म और भी कम मले।’ अगर उनका प रवार द ण अ का आ जाता और काम के बजाए प रवार के साथ समय गुज़ारने म समय बीतता तो उ ह अपनी ज़ मेवा रय को पूरा करने म दस साल तक का व लग जाता। सरी तरफ अगर वे भारत म ही रहते तो गांधी के मुता बक उससे ‘उ ह अपने सावज नक जीवन के काय पर पूरा यान दे ने का मौका मल जाता’ और वह यादा तेज़ी से या कह क ‘तीन या चार साल म’ वदे श लौट आते। उ ह ने पूछा क या क तूरबा वहां ‘उतने समय तक वहां रहने के लए राज़ी होगी?’ ऐसा सवाल करके उ ह ने अपने एक दो त से कहा क म चाहता ं क ‘म उसक भावना से हमेशा नद शत होता र ं और अपने आपको पूरी तरह उसके हाथ म स प ं ।’ 30 जून 1903 को गांधी ने अपने भतीजे छगनलाल को भी एक प लखा जसम उ ह ने ह रलाल वोरा को लखे प क एक त को संल न कया था। उ ह ने छगन से कहा कइसे पढ़ना और अपनी चाची को सारी प र य के बारे म अवगत करा दे ना। मेरी इ ा है क वह अभी वह रहे य क यहां रहना काफ महंगा है। अगर वो वहां रहती है तो यहां क बचत से भारत म उसके लए और ब के लए अपे ाकृत अ ज़दगी जीने क व ा क जा सकती है। उस त म म दो या तीन साल म वापस आ जाऊंगा....ले कन अगर वो आना ही चाहती है तो फर अ ू बर तक सारा इंतज़ाम कर लो और नवंबर म पहले जहाज़ का टकट कटवा दो। ले कन पहले अपनी चाची को इस बात के लए राज़ी करो क उसके लए ह तान म ही रहना सही होगा।26 द ण अ का म अपने शु आती दन से ही गांधी ने न ल के बीच के संबंध पर अखबारी कतरन को जमा कया था। इन कतरन का इं डयन ओ प नयन म इ तेमाल शु आ। ांसवाल लीडर क एक रपोट म हाईट लेबर लीग पर एक फ चर का शत कया गया जसने ए शयाई लोग के आ वास का वरोध कया था। लीग इस बात म यक न करता था क ‘द णी गोलाध म सबसे मज़बूत भौगो लक त वाला यह रा कसी बड़ी यूरोपीय लड़ाई क त म द ण और पूरव क चाबी अपने हाथ म रखेगा और इसका भ व य कभी भी बंधुआ मज़ र क न ल के हाथ म नह स पना चा हए।’27 एक उदार अखबार टडड ने ट पणी क ‘पूरे द ण अ का म ऐसा लगता है क ह के साथ ऐसा ही सलूक आ है जैसे म यकालीन यूरोप म य दय के साथ आ था या कुछ-कुछ आज भी स म उनके साथ वैसा ही हो रहा है।’28 सतंबर 1903 म ांसवाल सरकार म एक अ धकारी ड यू. एच. मूर ने भारतीय के पर एक रपोट तैयार क । उसने आकलन कया क यु के समय वहां पर करीब 13,000 भारतीय थे। जब लड़ाई शु ई तो उसम से यादातर नटाल, केप और पुतगीज़ े क तरफ पलायन गए। सतंबर 1901 से वे फर से वापस आ रहे ह और ‘ भावशाली

ए शयाइय क एक स म त’ बनाई गई है जो इस बाबत सलाह दे रही है क कसे अनुम तप दया जाए। सतंबर 1902 म इस स म त को भंग कर दया गया और ांसवाल म पुनवापसी के लए एक ‘ डपाटमट ऑफ ए शया टक अफेयस’ का गठन कया गया। यु ख म होने के बाद से लेकर माच 1903 तक कोई 4,900 अनुम त प जारी कए गए। उस रपोट को संपूण प से इं डयन ओ प नयन ने छापा। मूर ने ांसवाल म गोर के ‘आम मजाज़’ और टश भारतीय ारा दए गए त-तक को सं त प से कया था। उसने ऐसा मब तरीके से कया था ले कन मने उसे एक ता लका म तुत कया है ता क उसे साथ-साथ पढ़ा जा सके। अनपे त प से नह तो दलच तरीके से उस अ धकारी ने भारतीय प क तुलना म यूरोपीय लोग के प को व तृत तौर पर सामने रखा।29 ●

इं डयन ओ प नयन म छपे एक संपादक य म ‘त वीर के सुनहरे प ’ क तरफ दे खने का यास कया गया। हालां क त काफ खराब लग रही थी ले कन लंबे समय म उ मीद ये थी क जैसे-जैसे यूरोपीय समुदाय पुराना होता जाएगा तो उनके अंदर भय का वातावरण कमज़ोर हो जाएगा। साथ ही नकट भ व य म सा ा य के व भ वग वा त वक शां त क त म साथ-साथ रहने के यो य हो जाएंगे। हो सकता है क वो समय इसी पीढ़ म न आए। हो सकता है क हम इसे न दे ख पाएं, ले कन ऐसा ज़ र होगा और कोई भी आदमी इससे इ कार नह कर पाएगा। और ऐसा होने दे ने के लए हमम से येक को उसके ज द आगमन के लए यास करना चा हए...हम अपने वरो धय क जगह खुद को रखकर दे खना चा हए क उनके दमाग म या चल रहा है...हम सफ व भ ता के ब ही नह ब क सहम त के ब भी खोजने चा हए।31 यह बात उस घटना के पांच साल बाद क है जब डरबन म गांधी पर एक भीड़ ने हमला कया था जो कुछ मु भर उदारवा दय को छोड़ दया जाए तो पूरे गोर क नुमाइंदगी का दावा करती थी। हालां क उस समय जब वह ऐसा लख रहे थे तब भी गोरी ेस म उनके खलाफ़ कटु तापूण लेखन होता था और उनके दे शवा सय के साथ दै नक प से न लीय भेदभाव जारी था। ले कन फर वह भारतीय का वह नेता अपने उ पीड़क के साथ ‘वा त वक शां त’ क उ मीद कर रहा था। न त तौर पर यह आशावा दता उन म ता क वजह से पनपी थी जो उ ह ने द ण अ का म कायम क थी। जो शया ओ फ और लंदन क वे जटे रयन सोसाइट के सद य, डरबन म वक ल एफ. ए. ला टन और पु लस सुप रटडट आर. सी. अले ज़डर,

टो रया म धम चारक ए. ड यू. बेकर और इस सूची म जोहांसबग के कुछ गोरे लोग शा मल हो गए थे जनके साथ गांधी टहलने जाते थे, खाना खाते थे और द ण अ का म व भ न ल के लोग के अ धकार पर बहस कया करते थे। जोहांसबग म पहले साल गांधी ने चार यूरोपीय को म बनाया। वग य और शै णक कोण से वे उन लोग के यादा नकट थे, ब न त क उन भारतीय के जनका वह अदालत म त न ध व करते थे। इन म म उनक ज़दगी म वेश करनेवाले पहले म थे एल. ड यू. रच। वह एक य द था और मूलत लंदन से था जहां (गांधी क ही तरह) उसने वेदांत के वचार के साथ अपने धा मक वचार को व तृत करने क को शश क थी। वह सन 1894 म जोहांसबग आया और वहां थयोसो फकल लॉज ा पत करने म योगदान दया। उसक बैठक हरेक गु वार को होती थी और उसम मैडम लाव क और ए ी बेसट के काय पर बहस क जाती थी। द थयोसो फ ट को लखे प म रच ने ांसवाल क कुछ यूं ा या क : यह एक नाममा का गणरा य है। गैर- ेत न ल क कसी भी रा ीयता के लोग के त न लीय घृणा यहां क सबसे बड़ी वशेषता है। ऐसा ही नटाल म भी है जहां हाल ही म भारतीय क एक बड़ी सं या को आने से रोका गया, हालां क वह यास सफल नह हो पाया। उसके सफल न होने के पीछे हमारे भारतीय वक ल म म टर गांधी के धैय और वरोध का बड़ा योगदान था—जो लंबे समय से नटाल म भारतीय के लए लगभग अकेले ही लड़ाई लड़ रहे ह।

एल. ड यू. रच क गांधी से पहली मुलाकात आं ल-बोर यु से पहले ई थी—जब एक बार गांधी डरबन से जोहांसबग आए थे। यु के दर यान रच ने शहर छोड़ दया। जब शां त समझौते पर ह ता र हो गए तो वह फर से लौटा और उसने फर से थयोसो फकल लॉज को ा पत करने क को शश क । यह नया समावेशी, वै क मत शहर के उन अंत न हत गुण से ब कुल अलग था जसका दशन ‘ वाथ, वैय कता, लालच और भौ तकतावाद क पूजा के क त भाव से हो रहा था’। गांधी जो क लगभग अकेले ही भारतीय लड़ाई को लड़ने के लए अब जोहांसबग चले आए थे—वे नय मत प से लॉज आने लगे। इन बैठक म और बाहर भी उ ह ने और रच ने पाया क उनके पास बातचीत करने को काफ कुछ है।32 गांधी के जो दो अ य म बने उसक वजह भोजन क चयां थ । गांधी अ सर अपना खाना जोहांसबग के एकमा शाकाहारी रे ां म करते थे, जसका नाम—द अले ज़ ा ट म था। उस रे ां म सरा नय मत या ी अलबट वे ट नाम का एक अं ेज़ था। उसने उस जगह और वहां के माहौल के बारे म बड़ा ही ब ढ़या च ण कया है। (करीब 1903 के आसपास)। एक बड़े टे बल के चार तरफ ब त सारे लोग बैठे ह जसम अमे रका का एक शेयर दलाल है जो वहां के शेयर बाज़ार म सोने और हीर के शेयर पर काम करता है। नटाल का एक अकाउंटट, एक मशीनरी एजट, थयोसो फकल सोसाइट का एक नौजवान य द सद य (यह एल. ड यू. रच रहा होगा), स का एक टे लर,

वक ल गांधी और म टर- भी बैठे ए ह। जोहांसबग म हर कोई शेयर बाजार के बारे म बात करता है ले कन ये लोग भोजन (खा आदत के सुधारक) सुधारक ह जो शाकाहारी भोजन म दलच ी लेते ह, यून नान ( स जमन नेच ुरोपैथ लुइस यून के ारा बताई गई नान- व ध) मृदा- नान, उपवास इ या द क बात करते ह। ह तान के इस क तरफ म खासतौर पर आक षत ं और ज द ही गांधी और म नज़द क दो त बन गए। 33

यह वह रे ां थी जहां गांधी क मुलाकात हेनरी सोलोमोन लयोन पोलक से ई थी जो एक बला-पतला बु जीवी य द था जो हाल ही म टे न से आया था। वे ट क तरह ही वह उ के तीसरे दशक क शु आत म था और गांधी से पूरा दस साल छोटा था जसे वह म बनाने वाला था। उसका प रवार मूलतः पूरे यूरोप म फैला आ था। उसके नाना डच बोलते थे जब क दादा जमन। बाद म वे लोग इं लड आ गए थे जहां पोलक के पता ने एक अखबार म व ापन बंधक क नौकरी कर ली। हेनरी क पढ़ाई यूशटे ल के एक कूल म ई थी—जो वट् ज़रलड का एक ांसीसी भाषी ह सा था और उसके बाद उसने लंदन व व ालय म पढ़ाई क थी। अपने छा जीवन म ही हेनरी पोलक ने राजनी तक वषय पर एक य द सा ता हक म लखना शु कर दया। उसे मली ाहम नाम क लड़क से ेम हो गया जो एक इसाई थी और और एक ‘गहन समाज सुधारक’ के प म म हला मता धकार क समथक थी। हेनरी का प रवार इस ेम से खुश नह था, सो उ ह ने उसे उसके चाचा के पास द ण अ का भेज दया। हालां क जब वह द ण अ का के लए रवाना आ तो उसने मली के साथ मंगनी क औपचा रकता के लए ज़ोर दया।34 शु म पोलक ने केप टाउन म अपने चाचा के कारोबार म काम कया। उसके तुरंत बाद वह जोहांसबग आ गया जहां उसने एक ानीय सा ता हक ांसवाल टक म नौकरी कर ली। उसने लयो टॉल टॉय क रचना को पढ़ना शु कया और टॉल टॉय के भ अपने एक पटर साथी, जो क रंगमंच का अ भनेता भी था, को लेकर उस शाकाहारी रे ां म आया जसका संर क एक भारतीय था और जो खुद टॉल टॉय का शंसक था। सन 1904 म जब एक दन उ ह ने उस रे ां म ेवेश कया तो उस पटर ने इशार से उसे गांधी क तरफ दे खने को कहा। उसके बाद पोलक नेटे बल पर अकेले चुप चाप, छरहरे, खूबसूरत से बैठे ए गांधी को दे खा। उनके पेशे के हसाब से काली पगड़ी और उनके सांवले रंग के बावजूद, उस मश र (पूरब के) भारतीय नेता म ऐसा कुछ नह था जसे उ लेखनीय कहा जा सके। म नराश आ। मने एक लंबे-चौड़े और आ ामक व क उ मीद क थी जो बोर यु के दौरान ई ट इं डयन एंबुलस कॉ स का साजट मेजर रहा था...उस समय म ये अनुमान नह लगा पाया क म एक ऐसे को दे ख रहा ं जो अपने समय का सबसे महान ए शयाई बनने वाला था!

खैर, दोन य का प रचय आ और उ ह ने पाया क वे सफ टॉल टॉय के ही शंसक नह ह ब क कुछ अ य गुमनाम व अ स लेखक जैसे रटन टु नेचर जैसी कताब के लेखक एडो फ ज ट के भी शंसक ह। पोलक गांधी के लॉ चबर म भी गया और जैसे-जैसे उनक दो ती गाढ़ होती गई, पोलक के श द म, ‘हम रोज़ ही मलते रहे

और ज़ोर-शोर से ऐसी सम या पर वचार करते जसम हम म से कसी क भी दलच ी होती।’ ये वातालाप अमूमन उस शाकाहारी रे ां म रा के भोजन के दौरान होती जहां वे सलाद खाते जसम एक खास तरह के तीखे याज़ क इतनी ब लता होती क पोलक मज़ाक म कहता क उ ह एक ‘अमेलगमेटेड सोसाइट ऑफ ओ नयन इटस’( याज़ खानेवाल का एक म त समूह) क शु आत करनी चा हए!35 पोलक से मुलाकात के पहले या उसके कुछ ही दन बाद गांधी हरमन कालेनबाख के संपक म आए। वह भी एक य द था, हाला क अलग पृ भू म और मजाज़ का था। वह उ म गांधी से दो साल छोटा था और मूलतः लथुआ नया का था, उसका पालन-पोषण शया म आ था और वह एक वा तु वद था। लंबे-तगड़े , मजबूत कद-काठ का और अ य धक कसरती बदन वाले कालेनबाख को आउटडोर (खुले मैदान म खेले जानेवाले) खेल ब त पसंद थे, उसे स दय म के टग और ग मय म तैराक और (कांटे से) मछली मारना पसंद था। कसरत करना उसका अ य शौक था। सन 1896 के आसपास वह द ण अ का चले आए। उ ह जोहांसबग म भवन नमाण म आए उछाल का ब त फायदा मला और उ ह ने शहर क दय ली म वशाल इमारत का न ा बनाया। रच और पोलक क तरह ही वे भी द ण अ का म आनेवाले य द अ वास क एक ठ कठाक लहर का ह सा थे। सन 1880 और 1904 के बीच द ण अ का म य दय क सं या बढ़कर दस गुणी हो गई। कालेनबाख क तरह ही ब त सारे य द स और पूव यूरोप से आए थे जो सेमे टक- वरोधी भावना का क बन गया था।36 कालेनबाख का ऑ फस गांधी के लॉ चबर के पास ही था। उनक पहली मुलाकात एक भारतीय कारोबारी के मा यम से ई थी जो दोन का यानी उस वक ल और वा तु वद का मुव कल था। कालेनबाख के साथ गांधी क दो ती शेख मेहताब के साथ उनक शु आती दो ती का एक उ टा प थी। एक द एथलीट के प म कालेनबाख एक तरह से प रप व शेख मेहताब था, सवाए इस बात के क खुद एक ेरणा ोत बनने के बजाए वही गांधी का शंसक था— जनक आ या मक वषय म दलच ी और उ े य क धीरता उस वा तु वद (कालेनबाख) क बेचैनी और उसक खं डत यौन इ ा के ब कुल वपरीत थी (वह अ ववा हत था और शायद उस समय तक कुंआरा भी था)।37 यह गौर करनेवाली बात है क जोहांसबग म गांधी के चार दो त म से तीन य द थे। य द भी गोरे थे ले कन वे टश या बोर नह थे और न त तौर पर ईसाई नह थे। वे ऐसे प रवार से आते थे जो उ पीड़न और पूवा ह का मारा आ था। उ ह ने ांसवाल के शासक के अता कक न लवाद को अ य यूरोपीय लोग क तुलना म तेज़ी से समझ लया और उसके आलोचक थे। साथ ही उ ह ने तेज़ी से एक ऐसे भारतीय का गमजोशी से वागत कया जो ज़दा दल, बु मान और अपने धा मक व ास म उदार था। 38

गौरतलब ये भी है क उनका कोई भी दो त गुजराती या यहां तक क ह तानी भी नह था। लंदन म ऐसे कई सारे भारतीय छा थे जनके साथ गांधी क बातचीत थी। ले कन जोहांसबग म वह अपने समुदाय के एकमा पेशेवर इंसान थे। कोई सरा भारतीय वक ल, डॉ टर, श क, संपादक या बंधक ांसवाल म नह था। हालां क वे अपने दे शवा सय के साथ भावना और सां कृ तक वजह से जुड़े ए थे ले कन पु तक और वचार उनक खुराक का ह सा नह थे, न ही फल और स ज़यां। जोहांसबग के गुजराती, मुसलमान क तरह ही मांसाहारी थे। ऐसा ही त मल और तेलुगू भाषी मक वग था जो भारतीय समुदाय का अ य ‘आधा भाग’ था। ये लोग उनके मुव कल थे और हम-वतन भी थे। वे उनके सुख- ख को समझते थे। उनका दन उ ह लोग के नजी और सामू हक मु सम या को आगे बढ़ाने से शु होता था। ले कन बातचीत और साथ-साथ भोजन करने के लए गांधी को कह और जाना होता था, कसी और से बात करनी होती थी। सन 1893 म टो रया म गांधी ने गाइड टु लंदन नाम क कताब लखी थी जसम उ ह ने लखा क वदे श म एक भारतीय छा अपने ‘समय का मा लक’ होता है। य क ‘वहां उसक प नी नह होती जो उसके साथ ेमालाप कर सके या ठठोली कर सके, उसके मां-बाप नह होते और उसके ब े नह होते जसक उसे चता हो’। अब दस साल के बाद वह फर से एक बार एकाक जीवन बता रहे थे और उ ह ने प रवार से र रहने क इस आज़ाद का इ तेमाल जोहांसबग क असंतु उप सं कृ तय क खोज म करने का न य कया। शहर के ब त सारे पेशेवर लोग उ ह क तरह अकेले थे और अपनी प नी और ब से र थे। वे अपने समय का इ तेमाल बाहर खेलने म करते या साथ मलकर मौजम ती करते। ले कन गांधी को र बी, केट या घुड़सवारी का कोई शौक नह था, न ही लब क ज़दगी या शकार ही उ ह पसंद था। ले कन हां, भोजन म योग और व भ धम के बीच संवाद और उसके त व क जानकारी हा सल करना उ ह ज़ र पसंद था। उनक ये दलच यां या झान पहले-पहल लंदन म दे खे गए थे। उसे उ ह ने अब फर से समु च ान पर बसे इस नए शहर म ज़ोर-शोर से य दय , वेदांतवा दय , टश ोटे टट और शाकाहा रय के बीच योग करना शु कया। ● द ण अ का से बाहर लंदन म गांधी के दो बल समथक थे और दोन ही पारसी थे। एक थे पूव सांसद दादाभाई नौरोजी और सरे थे वतमान सांसद एम. एम. भवनागरी। गांधी उ ह द ण अ का म भारतीय क सम या पर नय मत प लखते रहते थे और वे लोग इन चता को महारानी क सरकार तक प ंचाने का काम करते थे। सन 1903 म ही

दादाभाई नौरोजी ने गांधी क तरफ से इं डया हाउस को उ ीस प भेजे—जो अपने आप म उस नौजवान वक ल क नरंतरता और बुजगवार के संर ण- ो साहन को दशाता है।39 हालां क भवनागरी उनक तुलना म शायद ही थोड़े कम ऊजावान थे। वह संसद म ब त सारे सवाल पूछते थे जहां उ ह ने एक बार भारत म एक भारतीय- वरोधी वधेयक को ‘घोटाला’ करार दया था और सतंबर 1903 म उ ह ने बीस प का एक प उप नवेश मामल के से े टरी ऑफ टे ट जोसेफ चबरेलन को लखा। गांधी ारा भेजे गए प के आधार पर लखे गए उस प म ‘ ांसवाल म टश भारतीय ारा झेली जा रही अयो यता और अपमान ’ का ववरण दया गया। भवनागरी ने चेतावनी द क ‘ टश स ाट के त भारतीय जनता ारा दशाए जा रहे यार और आदर को द ण अ का म चल रही घटनाएं नज़रअंदाज़ कर रही ह’। उसके कुछ ही दन बाद चबरलेन ने इ तीफा दे दया। भवनागरी ने अब चबरलेन के उ रा धकारी अ े ड लटे लटन को वह प भेजा जसने उसे ांसवाल के गवनर लॉड मलनर को इस ट पणी के साथ भेज दया क ‘उसे उस प म कए गए वचार से सहानुभू त है ले कन उसे आशंका है क वह पूरे संतोषजनक तरीके से उनक मांग का जवाब नह दे सकता।’ लटे लटन क ट पणी के साथ भवनागरी के उस अ सा रत प को दे खकर अब लॉड मलनर ने अपने ले टनट-गवनर अ े ड लॉले को कहा क वह इसका जवाब तैयार करे। 13 अ ैल 1904 को लॉले ने भारतीय के त अपनी नी त के समथन म तक से लैस अपने आका को एक प भेजा। उसम कहा गया, ‘इस दे श म सौ म से एक भी ऐसा नह है जो गोर के साथ अ ेत क बराबरी क बात वीकार कर सके।’ उसके बाद उसने जोड़ा, ‘म उस पूवा ह को यायो चत नह ठहराना चाहता, म सफ उ ह व त करना चाहता ं। उ ह नज़रअंदाज़ नह कया जा सकता, उनक अपनी अह मयत है।’ मलनर क तरह ही लॉले सोचता था क मज़ र के प म भारतीय का वागत है ले कन ापा रय के प म वे ांसवाल के यूरोपीय हत के लए खतरा ह। इसके अलावा भी एक खतरा था—अगर उनके ब ने पढ़ाई- लखाई कर ली तो वे पेशेवर नौक रय म भी घुस सकते थे। इस तरह द ण अ का म ए शयाई सवाल ‘आधु नक स यता के सबसे क ठन सम या म से एक प म सामने आया’। टश सा ा य म सभी तरह क जलवायु और वन तय वाले इलाके शा मल थे। भारत जैसे उ ण क टबंधीय इलाके और क य अ का जैसे शु क दे श ‘गोरे रा के लोग के लए ायी आवास बनने के लायक नह थे’। जब क सरी तरफद ण अ का उन कुछ दे श म से एक था जहां यूरोपीय और ए शयाई दोन लोग रह सकते थे और इस समय ऐसे कसी सवाल के बारे म सोचना मु कल है जो पूरब और प म के बीच इन अध-बसावट वाले इलाके के

उ रा धकार के संघष से यादा समय-ब बना ान के ढे र सारे वादे कए गए ह।

हो। उन वाद को पूरा करने के जो नतीजे ह गे उसक अवधारणा या

अगर उन वायद को तोड़े जाने क बात जस पर सर एम. भवनागरी गंभ ीरता से नभर करते ह, उसका मतलब ये है क आनेवाले पचास या सौ साल म यह दे श प मी लोग के हाथ से नकल कर पूव लोग के हाथ म चला जाएगा तो स यता के कोण से इन वाद को उस ेणी म गनना चा हए जसे पूरा करने से बेहतर तोड़ना ही होगा।

इस लए लॉले ने अपनी बात ख म करते ए कहा, ‘इस दे श के राजनी त का पहला काम ये होना चा हए क वे गोरे लोग के लए आवास क सं या म बढ़ो री कर’। 18 अ ैल को मलनर ने सा ा य क सरकार को प लखा जसम उसने लॉले के वचार का अनुमोदन कया। उसने लखा क एक तरफ चुनौती ये है क ‘ए शयाइय क अबाध आमद को रोका जाए’ तो सरी तरफ ‘गोर क सं या म भारी बढ़ो री क जाए’। जहां तक पहले से मौजूद भारतीय क बात थी तो मलनर क राय म ‘अ ेत का द ण अ का म गोर क बराबरी करना ब कुल अ ावहा रक है और उससे भी यादा सै ां तक प से गलत है।’40 मलनर क अ खड़ता को दे खते ए एम. एम. भवनागरी ने फर से टश संसद का ख कया। फरवरी और अग त 1940 के बीच उ ह ने द ण अ का म भारतीय के साथ कए जानेवाले सलूक पर कम से कम बारह सवाल पूछे।41 वह उस बहस को ेस म भी ले गए और उ ह ने डे ली ा फक से कहा क ‘ ांसवाल म स ाट क भारतीय जा के साथ बोर के शासनकाल से भी बुरा सलूक कया जा रहा है।’ जब उनसे पूछा गया क ‘वहां ऐसा त यावाद कदम य उठाया जा रहा है’ तो भवनागरी ने जवाब दयाः ‘म इसे हाईट लीग का भाव मानता ं जो एक आतंकवाद संगठन है...और ऐसा लगता है क उसने ांसवाल क सरकार म मह वपूण भाव कायम कर लया है।’42 ● इस बीच गांधी इं डयन ओ प नयन म लेख लखने म त थे और अपने दे शवा सय के डगमगाते ए मनोबल को मजबूत करने का यास कर रहे थे। नवंबर 1903 म उ होने दादाभाई नौरोजी को उनक 78वी वषगांठ पर बधाई द । उ ह ने कहा क ‘लोग उस पारसी बुजग को ह कुश से लेकर क याकुमारी और कराची से कलक ा तक जतना यार करते ह उतना कसी जी वत भारतीय क नह करते’। उसके दो महीन के बाद उ ह ने लखा क ‘जॉन ऑफ आक और ाई ट क ज़दगी ने ये दशाया है क अपने समुदाय को लाभ प ंचाने के लए य को अपनी जान क कुबानी दे नी पड़ती है’। गांधी क राय म प र त ऐसी नह है क ‘भारतीय को बीरतापूण व लदान दे ने क ज रत पड़े ’, ब क ज़ रत ऐसी है क ‘भारतीय को एक टकाऊ, लगातार और एक आंदोलनपूण संवैधा नक

उपल के लए यास करना चा हए’। य क अगर टश शासनतं धीमे काम करता है और रा क तभा ढ़वाद हो गई है, तो ऐसे म काय के त गंभीरता और एकता के बारे म सोचना और समझना चा हए।’43 फरवरी 1904 म टश तं को स य बनाने के लए गांधी ने चीफ मे डकल ऑ फसर को कई प लखे जसम शकायत क गई क जोहांसबग के उ र-प म म भारतीय के ‘लोकेशन’ (वो जगह जहां सफ भारतीय ही रहते थे) म ‘अ य धक भीड़भाड़ है और वहां उनको दे खनेवाला कोई नह है’। चूं क भारतीय के पास सफ रहने का अ धकार था, तो ऐसे म उ ह उन जगह को साफ-सुथरा रखने के लए कोई ो साहन नह मलता था। गांधी ने चेतावनी द क ‘अगर ये व ा जारी रही, तो कोई भी महामारी कभी भी फूट सकती है।’44 और ऐसा ही आ। माच म बाज़ार म बुबो नक लेग फैल गया। गांधी ने पी ड़त क सेवा के यास शु कए और लोग को इसके लए ो सा हत कया। एक प र य मकान म अ ायी अ ताल खोला गया जहां मरीज को मृदा नान के ारा इलाज कया गया। ब त क जान बचाई गई ले कन कम से कम चौबीस लोग क मौत हो गई।45 व ता और उ चत रखरखाव दे ने म वफल अब नगर नगम ने तय कया क बाज़ार को ही हटा दया जाए। सपा हय के एक ज े ने इलाके को खाली करवा दया और छह लॉक म आग लगा द जनम कम से कम 1600 मकान थे। वहां के बा शदे दल पर प र रख उसे चुपचाप दे खते रहे। अगले दन भारतीय को एक नए लोकेशन लप टट ले जाया गया जो शहर से दस मील र था। उस जगह का इ तेमाल पहले बोर यु बं दय को रखने के लए कया गया था—जहां पर सफ कनात थ और ना लय क कोई व ा नह थी। वह जगह रहने और ापार करने लायक नह थी। वहां पर कौन आता और कता? गोरे, अ ेत या ए शयाई कोई भी नह ? जन भारतीय को लप टट म फक दया गया था वे फर से धीरे-धीरे जोहांसबग आ गए और शहर के कनारे रहने और काम करने लगे।46 मई म हबीब मोटान नामके एक ापारी ने सु ीम कोट म सरकार के उस फैसले के खलाफ अपील क जसके मुता बक उसे एक सामा य लाइसस दे ने से मना कर दया गया था। उसने आं ल-बोर यु से पहले मु ापार कया था और उसने अब सवाल कया था क उसे एक खास ‘लोकेशन’ पर य बंद करके रखा जा रहा है? आ य क बात ये थी क यायाधीश ने बहा री का प रचय दे ते ए उसक बात मान ली। गांधी ने उस ापारी को जीत के लए बधाई द ले कन ‘उसे उस सफलता से यादा खुश न होने क चेतावनी भी द । शायद इसका मतलब एक सरे संघष क शु आत थी। अब पूरे दे श म उनका वरोध कया जाएगा और सरकार सु ीम कोट के फैसले को भावहीन करने के लए एक वधेयक ले आएगी।’ उ ह ने चीनी कारोबा रय क सम या क तरफ भी यान आक षत कया जो पूरे सूबे के छोटे -छोटे शहर म गोर ारा उ पी ड़त कए जा रहे थे जो अपने लए

चीनी खदान मक के नयम-कायदे चाहते थे। इस घटना ने उ ह सन ‘1896 म ई एक घटना क याद दला द ’ (जो भारतीय और खुद उनके खलाफ़ बट थी)।47 जैसा क गांधी ने कहा था क मोटान के फैसले से गोर के एक तबके म गु से क भावना फैल गई। गोरे ापा रय का एक श मंडल उप नवेश के से े टरी से मला और शकायत क क ‘ए शयाई लोग दे सी ापार पर क ज़ा करते जा रहे ह जो दे श क संपदा का एक बड़ा ह सा ह’। एक क रपंथी समूह द ई ट रड व जलस एसो शएशन ने सरकार से आ ह कया क वो ‘एक नया और ापक अ यादे श तैयार करे जो हर संभव तरीके से तगामी हो और जसम ये सु न त कया जाए क ए शयाइय के लए न त बाज़ार के अलावा कसी भी ए शयाई रहाइश या ापार को ांसवाल म कसी तरह क इजाज़त नह द जाएगी’।48 ई ट रड व जलांते का नेतृ व एं लकन पादरी सी. ई. ीनफ कर रहा था जसके बारे म गांधी के सा ता हक ने लखा था क ‘वह इस बात म यक न रखता था क अगर वग म एक भी टश भारतीय पाया गया तो वहां याय अनुप त हो जाएगा’।49 उस पादरी ने गोर के वचार को व तृत तरीके से सामने रखा। पीटसबग म यूरोपीय कसान क एक बैठक म एक व ा ने भारतीय क कुछ यूं ा या क : भारतीय एक बदबू दे नेवाले न ल के लोग ह और उस पर से उनका नया के खूबसूरत दे श म से एक म आना एक कु पता जैसा है। या हम उ ह यहां आने क इजाज़त दगे? (नह ) या हम इन मानव-परजी वय को ऐसे दे श पर क ज़ा करने क इजाज़त दगे जो गोर क वरासत है और जससे लए उ ह ने लड़ाइयां लड़ी ह और र बहाया है?(नह )। तो हम दे र होने से पहले उपयु कदम उठाने चा हए, नह तो वे यहां पर उस तरह पैर जमा लगे जैसा क उ ह ने पहले ही नटाल म कर लया है (ज़ोरदार ता लयां)।50 ीटो रया म ई एक अ य बैठक म ए. एच. ीन नाम के एक व ा ने द ण भारत म एक चाय-उ पादक के तौर पर बताए तीस साल के अनुभव के आधार पर अपने ोता को कसी भी तरह क ‘भावना मकता’ से र रहने के लए कहा। उसने कहा, ‘ ह लोग ब त धूत होते ह। अगर आपके साथ कोई भारतीय है और उसे आपने ‘बाज़ार’ म काम करने और रहने के लए बा य नह कया है तो वह ांसवाल म आपके काय े के हरेक ह से म घुसपैठ कर जाएगा। उसने एक भारतीय क कहानी सुनाई जसने इं लड म पढ़ाई करते समय एक अं ेज़ औरत से शाद कर ली थी और जसे शाद के बाद वह घर लेकर चला गया। उस औरत को अपना सर ढं कना पड़ता था और अलग से खाना पड़ता था। कौन कह सकता है क अगर यादा से यादा भारतीय को ांसवाल म आने क इजाज़त द गई तो पहले वे यहां क ज़मीन नह लगे, यहां क नौक रयां नह लगे और फर आ खरकार हमारी औरत नह ले लगे? या आपक बेट है महाशय?’ उस जोश-खरोश

वाले बुजग ने अपने उ े जत और डरे ए ोता बेट कसी भारतीय से ववाह कर ले?’51

से कहा, ‘ या आप चाहगे क आपक

● अब ांसवाल क सरकार ने हबीब मोटान के प म दए गए फैसले को पलटना चाहा। लॉड मलनर इस बात से च तत था क अगर फैसले को नह पलटा गया तो ‘कई हज़ार टश भारतीय इस फैसले के आलोक म अपने वशेषा धकार क मांग करने लगगे जससे वे इस फैसले के आने से पहले वं चत थे।’52 इधर गोर क उ भावना के म े नज़र गांधी ने एक समझौते का यास कया। उ ह ने सतंबर 1904 म लॉड मलनर को एक ताव भेजा और इसके शत क ा या क । हालां क रकॉड म वह ताव अब उपल नह है ले कन उसके साथ भेजी गई एक च मौजूद है। यह उस समय गांधी क ेरणा पर नया काश डालती है। उस प का मजाज़ और उसक भाषा अ य धक सामंज यकारी है। गांधी ने कहा क उनके ताव उप नवेशवा दय क हरेक उ चत आप य से कुछ इस तरह मेल खाते ह: (1) वे उन कुछ श त भारतीय के उप नवेश म आने दे ने को छोड़कर सारे लोग के अ वास को रोकने के प म है जो उस उप नवेश म पहले से ही बसे ए लोग क सहायता करने आना चाहते ह। (2) वे नए डीलर के लाइसस को पूण प से सरकार के या ानीय नकाय के नयं ण म लाना चाहते ह, सवाए उन खास मामल के जो सु ीम कोट ारा पुन वचार कए गए ह। (3) उनके ताव के तहत लोग के अ नवाय अलगाव क आव यकता नह होगी य क टो रया और जोहांसबग म, जहां सबसे यादा आबाद है, वहां पहले से ही ‘लोकेशंस’ त ह और सरी जगह पर वे ब कुल अनाव यक ह य क मौजूदा भारतीय आबाद वहां ब त कम है। अगर कोई नया लाइसस दया भी जाता है तो भ व य म भी उसम ब त कम क बढ़ो री होगी। गांधी ने अपने ताव के बारे म कहा क ‘वे भारतीय को न त संप रखने का अ धकार ज़ र दे ते ह ले कन अगर संभव आ तो उसका कुछ ह सा, मसाल के तौर पर, खेती क ज़मीन को खासतौर पर यूरोपीय म कयत म रखा जा सकता है। यह कहा गया है क क ब -शहर म भारतीय म कयत का कोई वरोध नह होना चा हए।’ उ ह ने अपने प को एक ाथना के साथ ख म कया: इस

के साथ मेरे यारह साल के जुड़ाव के दौरान मेरी दली इ ा रही है क म इस को यूरोपीय कोण से भी दे खूं और जहां तक संभ व है अपने दे शवा सय से आ ह क ं क होम डपाटमट से अपील करने

क मांग छोड़ द। इसी इ ा ने मुझे गवनर महोदय से अपील करने को े रत कया है। अगर मेरी उप आव यक ई तो म गवनर महोदय के बुलावे का इंत ज़ार क ं गा।



म यह साफ कर दे ना चाहता ं क ये प मने नजी तौर पर लखा है ले कन अगर गवनर महोदय मेरी सलाह से स होते ह तो मुझे लगता है क अगर ज़ री आ तो मुझे अपने दे शवा सय से इसे वीकृत कराने म कोई परेशानी नह होगी।53

गांधी के मूल ताव के बना भी इस लाजवाब और भुलाए गए प के आधार पर हम उस मूल प के मज़मून का अंदाज़ लगा सकते ह। वक ल गांधी ने कहा क भारतीय को संप का हक मलना चा हए और उ ह शहर मे गोरी आबाद के साथ-साथ रहने का अ धकार मलना चा हए, जहां वे पहले रहते ही थे। इससे उनक रोज़ी-रोट चलती रहेगी और उनक मान-मयादा बनी रहेगी। उ ह ने जस बात क मांग नह क वो थी टश भारतीय के प म सा ा य के कसी भी ह से म उ मु आवाजाही के उनके अ धकार को बरकरार रखने क । इसी लए उ ह ने सफ कुछे क श त भारतीय के आ वास क बात क । खेती क ज़मीन के म कयत संबंधी छू ट क जहां तक बात थी तो ये संभवतः इस लए आ क भारतीय को बोर समुदाय के लोग अं ेज़ से भी यादा नापसंद करते थे। ांसवाल के अंद नी ह स म ‘हेट वोक’ नाम क एक नई पाट ‘ए शयाइय के अबाध आगमन’ का वरोध कर रही थी। गांधी के ताव ने उनके वचार म मह वपूण नरमी का संकेत दया। सन 1894 और 1895 म उ ह ने मांग क थी क श त भारतीय को नटाल म लाइसस मलना चा हए। इस बार उ ह ने साफ तरीके से दे ख लया क द ण अ का के गोरे (इं लड के गोर से व श और अलग) मता धकार दे ने पर राज़ी नह हो रहे ह। इस लए उ ह ने कुछ धीमी मांग को सामने रखा— जसम उनके आवास, काय, या ा और कारोबार का अ धकार शा मल था। ये ठ क है क भारतीय वहां पर समान नाग रक नह हो सकते थे ले कन उनके साथ फर भी स मानजनक जा जैसा सलूक तो कया ही जा सकता था और द ण अ का म टश झंडे के तले शां तपूवक और स मानपूवक रहने क आज़ाद तो उ ह द ही जा सकती थी। गांधी के इन ताव क एक ेरणा न त तौर पर राजनी तक थी। उ ह ने इसे समझा था क स ा क और भारी असमानता के संदभ म (और सं या के भी) ांसवाल म भारतीय समुदाय के लोग गोरे पूवा ह से पार नह पा सकते। ले कन फर भी एक स दय टश शासन क मदद से उसे ह का या शांत कया जा सकता है। इसी लए उ ह ने उस समझौते को सामने रखा था— जसम आमतौर पर कोई नए आ वास क बात नह थी ले कन संप को ज़ त करने या जबरन कसी सरे ान पर भेजने क बात भी नह थी। गांधी क सरी ेरणा ब त संभव है क गत हो। जैसा क उ ह ने मलनर को याद दलाया क भले ही वह यारह बरस पहले द ण अ का आए थे, ले कन वह उनका वैसा

‘घर’ नह बन पाया था जैसा लंदन बन गया था। एक जगह पर गांधी पढ़ने गए थे तो सरी जगह पर एक कानूनी मुकदमे क पैरवी करने। वहां रह रहे भारतीय के त उनक तमाम तब ता के बावजूद द ण अ का (इं लड क तरह ही) उनके लए एक वदे शी ज़मीन थी। अ ू बर 1901 म वह डरबन से ह तान रवाना ए थे और वे हमेशा के लए रवाना ए थे। नवंबर 1902 को वह फर से डरबन आ गए, ले कन वह सोच रहे थे क पता नह कतना अ ायी यह दौरा होगा। और इसी लए उ ह ने क तूरबा और ब को बंबई म ही छोड़ दया। अब पछले सोलह साल से मोहनदास गांधी महादे श के बीच एक या ी बनकर रह गए थे। वह का ठयावाड़ म पैदा ए और पले-बढ़े थे और उ ह ने परंपरा को धता बताते ए लंदन जाकर पढ़ाई क थी। जब सतंबर 1888 म वे एसएस लाइड पर सवार ए तो उ ह लगा था क वह उनक पहली और आ खरी समु या ा है। अपनी पढ़ाई पूरी करके वह अपने पैतृक े का ठयावाड़ म क रयर और नाम कमाने लौट जाएंगे—जैसा उनक मां के आ या मक गु ने उनको सलाह द थी क लंदन से बै र टर क ड ी हा सल करने से द वानी मलने म उ ह आसानी होगी। हालां क उनके भाई ल मीदास ने उनक योजना चौपट कर द और ज़दगी यादा ज टल हो गई। राजकोट और बंबई म कई बार यास करके और नाकामयाब होकर गांधी अपने तीसरे यास म डरबन म एक कामयाब वक ल बन पाए। वहां पर तीन साल अकेले रहे, फर तीन साल अपने प रवार के साथ रहे और फर अपने ब को पढ़ाने और अपनी प नी का अकेलापन र करने के लए सन 1901 म गांधी ह तान लौट आए। साल भर बाद वह फर से द ण अ का म थे। इस बार समुदाय क इ ा थी क वह जोहांसबग म रह। यहां पर वह एक तरह से नवा सत क ज़दगी बता रहे थे— दन म वह अपने मुव कल का काम करते थे जब क शाम को वह गोरे पेशेवर के साथ समय काटते थे जो उनक ही तरह अपने प रवार से र थे। जोहांसबग म उनक ज़दगी दलच थी और कई बार संघषमय भी। ले कन ांसवाल म भारतीय हल हो जाने के बाद वह इस बात के त न त थे क वह फर से एक अंतमहादे शीय या ा करगे और अपने वतन को लौट आएंगे। क तूरबा ब त चाहती थ क उनके प त भारत लौट आएं। और वह भी खुद वापस जाना चाहते थे। शायद एक ह क सी महा वाकां ा अभी भी गांधी के मन म बची ई थी क तीसरी बार एक फर से बंबई हाईकोट म वकालत जमाने क को शश क जाए। वकालत से बाहर भी वक प खुले थे, गांधी राजनी त या समाजसेवा म जा सकते थे। एक महा वाकां ी रा भ के लए उसक अपनी मातृभू म वदे शी ज़मीन और आ वा सय के बीच क तुलना म यादा ग त व धय का वक प खोलकर बैठ थी। जो अनुभव और

व सनीयता उ ह ने द ण अ का म हा सल क थी, उसका यादा भाव के साथ अपने दे श म इ तेमाल कया जा सकता था। तो आ खरकार इस तरह से गांधी के वदे श लौटने के फैसले के पीछे पु ता कारण थे। सोलह साल तक लगातार कई महादे श के बीच वचरण करने के बाद अब वह अपनी मातृभू म म वकालत जमाना चाहते थे और सामा जक कायकता का काम करना चाहते थे। इसी लए उ ह ने मलनर को उस समझौते का ताव भेजा। अगर गांधी, उप नवेशवा दय क इ ा (भारतीय क पूण प से नकासी) और अपने उ दे शवा सय क आकां ा (मु आवाजाही और बसने क आज़ाद ) के बीच कोई समझौता करवाने म सफल हो जाते तो वह स मानपूवक द ण अ का छोड़कर ह तान आ सकते थे। गांधी क ट पणी और उनके प गवनर को भेज दए गए। ऐसा लगता है क मलनर ने मुलाकात के लए गांधी को नह बुलाया या वाकई उनके सुझाव को ब त गंभीरता से नह लया। गांधी को अब इस अं ेज़ के इराद म अ व ास होने लगा था। जैसा क उ ह ने गोखले को लखा: सारी अपे ा के वपरीत लॉड मलनर जो यु के समय टश भारतीय समेत सभी उ पी ड़त जन का रहनुमा बनता था, पूरी तरह से बदल गया है...और ांसवाल म भारतीय को कुछे क ऐसे अ धकार भी नह दे ना चाहता जो उ ह यु से पहले हा सल थे’।55

एक अं ेज़ जो आं ल बोर यु के समय म लॉड मलनर को जानने लगा था, उसने पाया क वह ‘खाली दमाग और संक ण’ मान सकता का था। उसने लखा, हर कोई कहता है क उसके पास दल नह है ले कन म कहता ं क उसके पास जो भी कुछ है वो नाममा का है।’56 अपने दे शवा सय के त तो कभी-कभी मलनर संवेदना भी दखाता था ले कन अ य के लए वह हमेशा कठोर रहता था। जैसा क सॉल डु बो ने लखा है क बोर सं कृ त के त मलनर के नकारा मक वचार के बावजूद, मलनर समझ गया था क ‘द ण अ का म समृ और वामीभ ांसवाल को कायम रखना टश े ता के लए सबसे ज़ री है’।57 गांधी के ताव को खा रज करके मलनर सफ यूरोपीय भावना क क कर रहा था— जसम बोर और टश दोन शा मल थे और जो भारतीय के खलाफ़ थे। ● मोहनदास गांधी शहर म ही पैदा ए थे और शहर म ही उनक परव रश और पढ़ाई- लखाई ई थी। पोरबंदर म उनका ज म आ, राजकोट म वे पले-बढ़े , लंदन म उनक पढ़ाई ई और बंबई, डरबन और जोहांसबग म उ ह ने वकालत क । इस तरह उ ह ने अपनी पूरी ज़दगी शहर म ही बताई थी चाह वे बड़े ह या छोटे । सन 1904 म उनक उ पतीस साल क थी और उ ह ने तब तक एक भी रात कसी गांव म नह बताई थी और शायद पूरा

दन भी नह । फर भी एक कठोर जीवन जीने क इ ा उनके मन म बरस से थी। इसक पहली अ भ लंदन म वे जटे रयन सोसायट क बैठक म ई थी जहां पर वह हेनरी सा ट से मले थे और और उनके दो त एडवड कारपटर को पढ़ा था। कारपटर क ज का एक व ान था जो यॉकशायर ह स म बस गया था जहां से वह औ ो गक करण के खलाफ़ अपने वचार करता रहता था। अपने खुद के शु आती लेखन म गांधी ने का ठयावाड़ के गड़े रय के सादा जीवन क काफ तारीफ क थी। बाद म उ ह ने टॉल टॉय को पढ़ा और ज़मीन को लेकर कए गए सी योग के बारे म जानकारी हा सल क । सन 1904 के उ राध म गांधी काम से डरबन गए जहां जोहांसबग के पाक टे शन तक हेनरी पोलक उ ह छोड़ने आए थे। जब े न रगने लगी तो उनके दो त ने उ ह जॉन र कन क कताब अंटू दस ला ट पढ़ने को द । यह उस समय क राजनी तक अथ व ा के काफ भावशाली व ान क एक तकपूण रचना थी। र कन ने रकाड , मल आ द क उस वृ का वरोध कया था जसम उ ह ने हरेक तरह के व नमय और मू य के लए पैसे को इकाई बना दे ने क बात कही थी। एक वैसा व ान जो हवा, काश, व ता या शां त, व ास और ेम को मू यवान नह मानता वह खुद महान धम क श ा और मानवता के गहरे हत के खलाफ़ है। जहां एक तरफ रकाड और उनके समान सोच रखने वाल ने काफ तक दे कर अथ व ा को नै तकता से अलग कया तो र कन क राय म मा लक और नौकर व उ ोगप त और मक के बीच के संबंध ेम और व ास से तय होने चा हए। एक नै तक अथशा उस व प का होगा जो अकूत संपदा को बढ़ावा दे ने और बड़ी सं या म अमीर य को पैदा करने क बजाए ‘ यादा से यादा सं या म स और यो य य का पोषण करेगा’।58 र कन क उस कताब को गांधी ने आ द से अंत पढ़ लया और उससे इतना भा वत ए क उस रात वे सो नह पाए। उसका भाव इतना गहन था क जैसे गांधी ने बाद म याद करते ए लखा, ‘मने उस कताब के आदश के हसाब से अपने जीवन को बदलने क ठान ली’। अंटू दस ला ट क मूल श ा, जैसा क उ ह ने समझा, ये था क कसान और मज़ र के काय उतने ही मह वपूण ह जतने वक ल और फै टरी मैनेजर के। ज़मीन पर अपने हाथ से म करना दमाग या मशीन से काम करने क तुलना म यादा त ा का काम है।59 जोहांसबग से डरबन तक क े न या ा के दौरान गांधी उस कताब को पढ़ते रहे और उसने उनके ामीण झान को रोमां टक ढं ग से मज़बूत कर दया। इसने उ ह इं डयन ओ प नयन के कायालय को डरबन के े ट से दे श के अं नी ह से म ले जाने को े रत कर दया। उ ह ने फ न स टे शन के पास एक भूखंड खरीदा जो शहर से कोई 14 मील क री पर नॉथ को ट लाईन पर था। 24 दसंबर 1904 के अंक म उस प का म उसके ान प रवतन क घोषणा क गई। छापाखाना और उसम काम करनेवाले मक ,

सबको उसी फाम म रहना था जहां ‘ मक एक बेहतर ाकृ तक और सामा य जीवन जी सकते थे और र कन और टॉल टॉय के वचार को क ठन ापा रक स ांत के साथ जी सकते थे’। जो लोग ेस म काम करते थे, चाहे वे भारतीय ह , अं ेज़ ह या दोन म से कोई नह हो, उ ह तमाह एक ठ क-ठाक मानदे य दे ने क बात क गई (3 पाउं ड तमाह) और उ ह ज़मीन का एक टु कड़ा दया गया ता क वे अपने लए अनाज उगा सक। उस योजना के अगुआ ने उस योजना को ‘एक साह सक योग बताया और बड़े नतीज क उ मीद क । हम कसी ऐसे अधा मक संगठन के बारे म नह जानते जो उपयु स ातो के आधार पर बं धत कया जाता हो या रहा हो।’60 उस नए योग म भत होनेवाले कुछ पहले कमचा रय म से अ बट वे ट भी था। गांधी ने उसे जोहांसबग क नौकरी छोड़ दने के लए राज़ी कया था और ेस क ज़ मेवारी स प द थी। जब वे ट फाम पर प ंचा तो उसने उसे एक खुशनुमा जगह के प म पाया जसम फल के पेड़ थे, खजूर के पेड़ थे और उस ज़मीन के बीच से एक नद बह रही थी। पहली बार वहां बीस एकड़ ज़मीन खरीद गई थी, उसके तुरंत बाद फर अ सी एकड़ ज़मीन खरीद गई। उस ज़मीन पर मक ने लकड़ी और लोहे क चादर से मकान बनाया। इस बीच ेस के पुज को अलग-अलग कर दया गया और उसे चार बड़ी गा ड़य म फ न स लाया गया। उन येक गा ड़य को 16 बैल ख च रहे थे। फर उस मशीन को जोड़ा गया। गांधी चाहते थे क मशीन को हाथ से चलाया जाए पर वे ट ने पे ोल इंजन खरीदने पर ज़ोर दया (वहां आसपास बजली नह थी)। अपने दो त क सहायता के लए उस अं ेज़ ने एक हाथ से चलनेवाली मशीन का डज़ाईन तैयार कया जो लकड़ी के ढांचे पर त था। उसे तेल ख म होने पर भी इ तेमाल कया जा सकता था।61 ज़मीन, आवास क साम ी और मक का मानदे य मुख प से दो य ारा वहन कया गया। गांधी ने अपनी बचत के पैसे से 3500 पाउं ड का अ ा-खासा योगदान दया। (साफतौर पर ये एक ‘अ वकालत’ का नतीजा था जैसा क उ ह ने अपने राजकोट के दो त को कहा था—यह वाकई ब त अ थी)। डरबन के ापारी पारसी तमजी ने धन और अ य तरीक से मदद क । पैसा दे ने के अलावा उसने काफ सं या म लोहे क बड़ी चादर द । सन 1905 के पहले स ताह से उस फाम से का शत होनेवाली प का के अंक अपने ाहक तक प ंचने लगे। गांधी ने गोखले को लखा क वह अब फ न स म एक कूल क ापना करना चाहते ह जो ‘द ण अ का के कसी भी कूल से बढ़-चढ़ कर होगा’। उ ह ने अपने गु से कहा वे एक ‘च र वान श क’ का अनुमोदन कर और इं डयन ओ प नयन के लए एक हौसला अफज़ाई का प भेज।62 ●

सन 1899 म जब द ण अ का म दो उप नवेशवा दय के बीच लड़ाई छड़ी तो गांधी उस समय सा ा य के वामीभ थे। वह उस समय सा ा य क नाग रकता म यक न रखते थे जो मानता था क मान-मनौवल और आ ाका रता से द ण अ का म भारतीय के खलाफ़ हो रहा भेदभाव ख म हो जाएगा। इसी लए उ ह ने बोर के खलाफ लड़ाई म अं ेज़ का साथ दया। इसी वजह से उ ह ने लंदन को बारंबार अपना आवेदन भेजना जारी रखा, इस उ मीद म क भले ही कभी-कभार उप नवेशवाद संक ण या अ याचारी हो जाएं ले कन सा ा य के उदार व रदश राजनेता उ ह उदार बनने पर मजबूर कर दगे। हां, गांधी को इस बात से ज़ र तस ली मली क भारत म काम करनेवाले टश अ धका रय ने द ण अ का म उनके लोगो का प लया। भारतीय स वल सेवा के एक मुख अ धकारी ने ांसवाल सरकार क इस बात के लए कड़ी आलोचना क क उसने एक ‘ ाचीन और व त स यता’ के लोग को ‘अस य अ क मज़ र ’ के समतु य रखा।63 एक सरे आईसीएस ने नटाल के एक श मंडल से कहा क ‘भारतीय क तुलना का फर से नह क जा सकती। वे एक ऊंचे वग से ता लुक रखते ह। भारतीय ापारी लगभग हमारे ही वग जैसे वक सत ह।’64 स यता के पदानु म के बारे म ऐसे वचार ब कुल पारंप रक थे। गांधी उस समय इन वचार से इ ेफाक रखते थे। वे भारतीय को लगभग यूरोपीय लोग के समतु य ही रखते थे, जस हसाब से द ण अ का के भेदभावकारी क़ानून अगर स य प से भेदभावकारी नह थे तो ब कुल भटके ए ज़ र थे। इस तरह से भारत के वॉयसराय लॉड कज़न ने लॉड मलनर क ांसवाल म भारतीय पर ‘तकलीफदे ह नयम-कायद ’ को यायो चत ठहराने के लए आलोचना क । कजन क राय म ‘द ण अ का जैसे एक छोटे से उप नवेश के ेत लोग के पूवा ह से सामने झुकने क तुलना म ए शया म हमारी 30 करोड़ जा क भावना के साथ सामंज य ा पत करना यादा मह वपूण था।’65 जब नवंबर 1902 म गांधी डरबन के लए रवाना ए थे, उस समय टश याय णाली म उनका व ास अ डग था। ले कन दो साल के बाद अब वह वैसा नह रह गया था। कभी उ ह ने बोर के खलाफ़ टश और भारतीय को एक करने क उ मीद क थी। ले कन अब लड़ाई के बाद वह टश, बोर के साथ मलकर भारतीय के खलाफ़ एकजुट हो रहे थे। द ण अ का कोई इं लड नह था जहां भूरे लोग को संसद म चुनकर भेजा जा सकता था या वह भारत भी नह था जहां वे अदालत म यायाधीश या सा ा य क सरकार के प रषद म सद य हो सकते थे। यहां पर तो न ल का बंधन हमेशा सा ा य क वामीभ और उसके एहसान पर भारी पड़ती थी। अब ांसवाल म भारतीय क त अ न त और सम या से भरी ई थी। जब सतंबर 1904 म लॉड मलनर ने गांधी के

समझौते के ताव को खा रज कर दया, गांधी को लगा क उ ह वहां रहना चा हए। इसी लए उ ह ने अपनी प नी और ब को जोहांसबग आने को कह दया। सन 1904 के आ खर म क तूरबा द ण अ का प ंच ग । उनका बड़ा बेटा ह रलाल जो अब 16 साल का था, भारत म ही रह गया था। वह बंबई मै कुलेशन म बैठने का इ ु क था जो उसके पता ने सन 1887 म दया था। हालां क उनके सरे बेटे अपनी मां के साथ आ गए। साथ ही दोन भतीजे गोकुलदास और छगनलाल भी द ण अ का आ गए।

8 ब लतावाद और अ तनै तकतावाद

गांधी ने अपने प रवार के लए अ बमारल ट म कराए पर एक मकान लया जो पूव जोहांसबग के ॉय वल ज़ले म त था। डरबन क तरह ही वहां वह उनका एकमा भारतीय घर था। वह दोमं जला मकान काफ खुला-खुला था जसम आठ कमरे थे, बालकनी थी और बगीचे थे।1 गांधी ने क तूरबा को पहले ही कह दया था क वे जोहांसबग म उसके साथ ब त समय नह बता पाएंगे और ऐसा ही आ भी। वह सवेरे उठते, आटा पीसने म अपनी प नी क मदद करते और रोज़ पांच मील चलकर र सक ट म अपने ऑ फस प ंचते थे। उनके साथ उनका दन का खाना होता था जसम रो टयां, पीनट बटर और मौसमी फल होते थे। उनका दन मुकदम को सुनने, सरकार को दए जानेवाले आवेदन को तैयार करने और वहां से र छप रहे इं डयन ओ प नयन के लए लेखन और नरी ण के काय म तीत होता था। वह शाम को घर आते थे, जहां भोजन के बाद वह अपने बेट को गुजराती ाकरण और रचना के बारे म पढ़ाते थे।2 हरमन कालेनबाख गांधी के घर म नय मत आनेवाल म से थे। ब े उ ह पसंद करते थे य क वे उनके लए चॉकलेट और खलौने लाया करते थे। वे उनक सु चपूण जीवनशैली क कहा नयां सुनकर भी भा वत होते थे, खासकर यह सुनकर क हरेक सुबह एक नाई ब तर पर ही उनक दाढ़ बनाने आता था।3 जहां एक तरफ ब े घर पर ही रहकर पढ़ाई कर रहे थे तो वय क हो चुका भतीजा फ न स म सामुदा यक काम करने भेज दया गया। उसका छोटा भाई मगनलाल पहले से ही वहां कंपो ज़टर का काम कर रहा था। उस सामुदा यक क म छगन और मगन गांधी क आंख और कान क तरह काम करते थे जसक उ ह ने ापना क थी और जसे व पो षत कया था, ले कन इस त म कभी-कभार ही जा पाते थे। स ताह म कम से कम एक बार चाचा अपने भतीज को प लखते जसम वह टाफ और वहां क व ीय त के बारे म पूछताछ करते थे। नौजवान को गुजराती टाइप कैसे सेट कया जाए, इसक सलाह द गई और नए ाहक बनाने के बारे म कहा गया।

अब इं डयन ओ प नयन आठ प से छ ीस प का हो गया। अब उसका टे ट छह तंभ (कॉलम) क बजाए तीन तंभ म छापा जाने लगा। आ खरी प ा व ापन के लए रखा गया। व ापन कुछ इस तरह के होते थे—‘सीधे बंबई के लए पं ह दन पर एक जमन ई ट अ कन ट मर’। कलक ा के एक पु तक व े ता ने भी उसम व ापन दया जसम हे प टु द टडी ऑफ इं लश और सेले ट ीचेज़ ऑफ द ेट ओरेटस शा मल थी। हालां क यादातर व ापन नटाल क कान और उन उ म के ही थे जो कपड़े , सगार, मठाई, चावल, घी और ज़मीन-जायदाद का कारोबार करते थे। इं डयन ओ प नयन के इस व तृत प म व वध वषय पर रपोट छपते थे। अ य ए शयाई दे श के उदय को अखबार म दज कया जाता था और उसक सराहना क जाती थी। स-जापान यु म पोट ऑथर के पतन के बाद उस प ने लखा क ‘ सफ अपनी चा र क ढ़ता के बल पर जापान ने नया के अ णी दे श म अपनी जगह बना ली है। उ ह ने एकता, आ म ब लदान, उ े य क ता, चा र क ढ़ता, इ ाती साहस और श ु के त उदारता का भी दशन कया है।’ हद म छपे एक लेख म चीन म रा ीयता के उदय पर लखा गया जसम जापान और प मी दे श के तज पर अ धकारी वभाग और म लटरी अकादमी खोलने क बात कही गई। उस प ने जनरल गोडन क उस पुरानी भ व यवाणी को याद कया जसम उसने कहा था क जब चीन जागेगा तो सारी नया उसे भय और शंसा क नगाह से दे खेगी।4 नटाल और ांसवाल म भारतीय सम या के बारे म भी लखा जाता था ले कन द ण अ का के सरे समुदाय क सम या के बारे म भी लखा जाता था। अ ैल 1905 क एक रपोट म एक ‘भीमकाय दे सी आवेदन’ के बारे म छापा गया जसपर 33,000 लोग ने ह ता र कए थे और उसम लंदन म सा ा य क सरकार से मांग क गई थी क जब ांसवाल को पूण वाय ता द जाए तो अ क लोग के हत का भी याल रखा जाए और ऐसा कोई भी वग य च र का वधेयक सदन म पेश न कया जाए जो सभी अ ेत न ल को ‘अपमा नत और उ पी ड़त’ करे। उस आवेदन म मांग क गई क फांसी क सज़ा को ख म कया जाए, अ कय को चाबुक से मारने क सज़ा बंद हो, ‘स मा नत दे सी लोग ’ को े न म ‘ऊंचे दज’ म या ा करने क इजाज़त द जाए और नगरपा लका चुनाव म उ ह मता धकार मले।5 गांधी के सा ता हक ने भारत के समाज और वहां क राजनी त पर भी रपोताज का काशन कया। जनवरी 1905 के शु आती एक अंक म बंबई कां ेस के अ य ीय भाषण का सार दया गया जो उदारवाद सा ा यवाद सर हेनरी कॉटन ने दया था। कॉटन ने कहा क उनके वाद के बावजूद बोर क तुलना म टश लोग, भारतीय के त कठोर रहे ह। उसने कहा, ‘उनक छोट उं गली भी ू गर क कमर से मोट है। जहां पर वह चाबुक से मारता था, वह वे ब ू से मारते ह।’6

गांधी के सा ता हक ने लंदन म एक उ गुजराती यामजीकृ ण वमा ारा ‘इं डया हाउस’ क ापना कए जाने पर कई रपोट का शत क । उसके उ ाटन म मु य अ त थ एक टश मा सवाद एच. एम. हडमैन थे। जैसा क इं डयन ओ प नयन ने रपोट कया, कृ णवमा ने कहा क, ‘उ ह अपने व र म दादाभाई नौरोजी को दे खकर अ य धक स ता ई, जो कुछ न त राजनी तक वचार से बंधे ए थे, उनम उस दोपहर को वहां अपनी उप त दशाने क मान सक उदारता और स नता थी।’ उसके बाद दए गए एक भाषण म कृ णवमा ने ट पणी क क ‘जहां एक तरफ मुसलमानी राज म उनक पीठ पर चोट पड़ते थे वह अं ेज़ी राज म उनके पेट पर चोट क जा रही है’।7 इं डयन ओ प नयन म मोहनदास गांधी के योगदान म मश र य का च ण भी शा मल था। जुलाई 1905 के पहले स ताह म उस अखबार ने सी लेखक मै सम गोक के बारे म लखा जसम उनके अ याय के खलाफ़ आवाज़ और जनसेवा क उनक भावना क तारीफ क गई। जुलाई के आ खरी स ताह म इसने इटली के एक करण के अ त मे ज़नी के बारे म छापा जो उस प के मुता बक ‘इतने खुली मान सकता का था क उसे कसी भी दे श का नाग रक माना जा सकता था’। अग त म अखबार ने अ ाहम लकन के बारे म एक ांजली छापी जसम उनक गरीब पृ भू म, गरीब के त उनक तब ता, उनके नः वाथ जीवन और दे शभ के बारे म व तार से चचा क गई। सतंबर के अंक म टॉल टॉय के बारे छापा गया जसका ज म एक अमीर प रवार म आ था और जसने वे ा से गरीबी का जीवन जया और बहा री से ज़ार ( स का शासक) और उसक नी तय क आलोचना क । उसके अगले अंक म पहली बार एक म हला के बारे म छापा गया। वो लोरस नाइ टगल थ जनके जीवन ने कुछ इस तरह क नै तक बात को ो सा हत कयाः ‘इसम कोई शक नह क जहां इस तरह क यां ज म लेती ह वो दे श समृ है। एक वशाल सा ा य पर इं लड के शासन क वजह सफ उसक सै य ताकत नह है, ब क इन पु ष और य के यो यतापूण काय ह।’8 इस वै क मान सकता के गुजराती ने उन भारतीय के बारे म भी लखा जसक वे शंसा करते थे। उ ोगप त जे. एन. टाटा क मृ यु क पहली वषगांठ पर गांधी ने राय क क ‘टाटा ने कभी अपने वाथ को नह दे खा...न ही उ ह ने कभी जा त या न ल को वरीयता द ...पारसी, मु लम और ह सब उनक नज़र म बराबर थे।’ बंगाली समाज सुधारक ई रचं व ासागर के बारे म उ ह न उनके नारी श ा और वधवा के लए कए गए सुधारा मक काय क तारीफ़ क । गांधी ने लखा क ‘ व ासागर के कै रयर ने ये द शत कया क कैसे बंगाल भारत के सरे ह स के लए उदाहरण का ोत बन गया है।’9 इन श द च के मा यम से गांधी अपने दे शवा सय क मुलाकात आदश से करवा रहे थे। उ लेखनीय प से उ ह ने अ क सुधारक जॉन ूब क तारीफ क और उ ह ने

अपने पाठक को सू चत कया क उ ह ने फ न स के नज़द क ही कह 300 एकड़ ज़मीन ली है और ‘उसम वे अपने भाईय (दे शवा सय ) को श ा दे रहे ह व व भ श प और वधा म श त कर रहे ह। ऐसा करके वे उ ह ज़दगी क चुनौ तय से लड़ने के का बल बना रहे ह’। जब कुछ ग तशील बागान-मा लक ूब को उस समय उप नवेश का दौरा कर रहे टश वै ा नक के एक समूह से मलवाने ले गया तो ूब ने उनसे कहा क ‘ जन अपमान से उनके दे शवा सय को गुज़रना पड़ रहा है, वे यायो चत नह ह। य क वे कड़ी मेहनत करते ह और उनके बना गोरे एक पल भी वहां नह टक सकते।’ डयूब क तारीफ, मान सकता म आए एक प रवतन क तरफ इशारा करती है य क अ कय या ‘का फर ’ को—जैसा क गांधी उस समय क बोलचाल के हसाब से उ ह कहा करते थे—वह भारतीय नेता दया के भाव से बराबरी का वहार करता था। उसके बाद उनके ख म आई मक त द ली का सबूत उस लेख म मलता है जसम जोहांसबग टाउन काउं सल ारा अ क साइ कल सवार को बा बांह पर एक बड़े प े पहनने को कहा गया था ता क गोरे उनसे बच सक और गांधी ने उसक आलोचना क थी। गांधी ने लखा, ‘ या एक दे सी को यह पूछने का अ धकार नह है क उसके पास कोई भावना है या नह ?’10

इं डयन ओ प नयन ने गांधी पर भी आलेख का शत कए। उसम उनको एक समाज सुधारक और जातीय नेता के प म तो च त कया ही गया साथ ही स य क तलाश करनेवाले एक अ या मवाद के प म उनका च ण कया गया। उस लेख म थयोसॉ फकल सोसाइट म उनके दए भाषण क ृंखला को छापा गया। उ ह एल. ड यू. रच ारा भाषण दे ने के लए आमं त कया गया जो अब तक सफ गांधी के म ही नह ब क उनके ऑ फस म काम करने वाले लक भी थे। वह ा यान धम पर था, जसने गांधी को ब त पहले से आक षत कर रखा था। एक ह प रवार म ज मे, एक जैन ारा आ या मक प से मागद शत और ईसाई, य द , मुसलमान और पार सय के संग इन वषय पर कई चचा-प रचचा ने गांधी को अपने धम को एक व तृत और तुलना मक संदभ म दे खने के लए ो सा हत कया था। इन सावज नक ा यान ने उनके धा मक श ण और गहराई को दशाया। गांधी ने ह धम से शु आत क और तक दया क यह तीन तंभ पर आधा रत हैः समा जक मामल म जा त का मह व, धा मक मामल म सव रवाद का मह व और नै तक मामल म आ म- याग का मह व। गांधी ने भारत म बौ धम के उ ान और पतन क बात कही। उ ह ने जैन धम का भी ज़ कया जसक ‘सबसे उ लेखनीय वशेषता हर जी वत ाणी के त उसका अटू ट स मान था’।

गांधी का सरा ा यान इ लाम पर था जसक मु य वशेषता इसक ‘समतामूलक भावना’ थी। इसके ‘समानता के स ांत ने आमजन को ापक तौर पर आक षत कया जो जा त था से पी ड़त थे। इस अंत न हत श म तलवार क ताकत भी जुड़ गई’। इस तरह से इसने भारत म ब त सारे धमप रव तत का दल जीत लया। हालां क ‘ ह धम क भावना को दे खते ए’ दोन धम के बीच ‘सामंज य के भी यास कए गए’। म यकालीन भारत म इन मेल- मलाप कराने वाल म कबीर और स ाट अकबर जैसे लोग शा मल थे। गांधी का तीसरा ा यान भारत म ईसाई धम के आगमन पर क त था। गांधी ने वीकार कया क यूरोपीय मशन रय ने जातीय आधार पर भेदभाव और म हला क हीन त जैसी ‘ ह धम क कुछ वलंत खा मय क तरफ इशारा कया था’। गांधी ने अपने आ खरी भाषण म यह कहा क ‘ ह धम पर बौ , इ लाम और ईसाईयत के प म तीन हमले ए’ ले कन फर भी ‘कुल मलाकर यह उससे बना कसी त के बाहर नकल आया। इसने इन तीन धम म जो कुछ ब ढ़या था उसे अंगीकार करने क को शश क ।’ गांधी के इन ा यान का गोरे वेदांतवा दय ( थयोसॉ फ ट) पर या असर पड़ा उसका कोई रकॉड नह है। ले कन जब उनके ये ा यान मु त अव ा म सामने आए, तो मुसलमान ने इसका कड़ा वरोध कया और कहा क गांधी ने ये कहकर इ लाम का अपमान कया है क इसम धमप रवतन कर आनेवाले लोग नचली जा तय से संबं धत थे। एक आलोचक ने दावा कया क गुजरात के एक मुख ापा रक मु लम समुदाय बोहरा के पूवज ा ण पुरो हत थे! कसी सरे ने कहा क ‘ये व क नचली जा त के ह धम-प रवतन करके मुसलमान बने थे, भारतीय इ तहास पर कसी उ या गुजराती पु तक ारा सम थत नह है’ और ‘यह ह क पना क एक उपज-मा है’। एक तीसरे ने गांधी पर आरोप लगाया क वह इ लाम के ‘बुरे काय ’ पर अ य धक ज़ोर दे रहे ह। उनके लेखन ने ‘मुसलमान क भावना को आहत कया है’; और ‘ऐसा लगता है क वे अ े नह ह’। गांधी क पहल पर आलोचक ने इं डयन ओ प नयन म अपने वचार रखे। उ ह ने जवाब म कहा क ‘अगर नचली जा त के ह ने इ लाम को अपना लया तो इसम कलंक क कोई बात नह है। ब क यह तो इसका बेहतरीन प ही दखाता है जस पर मुसलमान को गव होना चा हए।’ उ ह ने ज़ोर दे कर कहा क ‘मेरे लए गत तौर पर एक ा ण और एक भंगी म कोई फक नह है। और म इसे इ लाम क खा सयत मानता ं क जो लोग ह धम क सामा जक व ा क वजह से असंतु थे, वे इ लाम अपनाकर अपनी त को बेहतर करने के का बल बने।’

वह बहस, स ताह तक सावज नक और नजी तौर पर चलती रही। इं डयन ओ प नयन के संपादक के प म गांधी आ खर म ही अपनी बात रखते थे। उ ह ने चयन व नाम के एक प म एक लेख पढ़ा था जसम कहा गया क ‘सैकड़ अलग-अलग नाम और प म धम मानव के दय म एक बीज गराता है और जस तरह म त क उसे हण करने के यो य होता है स य का एक प उ ा टत होता है।’ गांधी ने इस पर ट पणी क क ‘हरेक धम क यह सहनशीलता क बढ़ती ई भावना भ व य के लए एक शुभ संकेत है। इस सावभौ मकता क भावना म, भारत ब त कुछ दे ने क त म है और हमारे बीच क एकता को एक सरे धम के त पूण- दय सहानुभ ू त और समझदारी से और भी मज़बूत कया जा सकता है। इस मह वपूण सवाल पर एक बड़ी सहनशीलता का मतलब होगा क हम दै नक काय म एक व तृत दयाशीलता का दशन कर पाएंगे और मौजूदा गलतफहमी को र कर पाएंगे। या यह एक त य नह है क मुसलमान और ह के बीच म सहनशीलता क यादा ज़ रत है? कभी-कभी तो ऐसा लगता है क यह पूरब और प म के बीच के सामंज य से भी यादा ज़ री है। भारतीय के बीच म हम भाईचारे क भावना को नह तोड़ना चा हए। अगर कोई घर बंटा आ होगा तो उसका गरना अव यंभ ावी है। इसी लए म कहता ं क भारत म हरेक वग के बीच पूण एकता और भाईचारे क भावना का वकास होना चा हए।11

भारत म भी राजनी तक बहस म ह -मु लम एकता का सवाल सबसे आगे था। अ ू बर 1905 म बंगाल े सडसी का वभाजन कर दया गया। बंगाल का पूव भाग मु लम ब ल था। उसे अलग करके अं ेज़ ने सोचा क मुसलमान को ह भाव वाली इं डयन नेशनल कां ेस से अलग कया जा सकता है। वभाजन का ज़बद त वरोध कया गया—खासकर कलक ा के म यवग म, ज ह लगा क उनके ांत को आधा कर दया गया है। बंगाल वभाजन का वरोध टश वरोध म बदल गया। एक वदे शी आंदोलन उठ खड़ा आ जसने वदे शी व तु के ब ह कार का आ ान कया। गांधी द ण अ का से इन घटना पर नज़र रखे ए थे। उ ह ने इसे समथन दे ने का फैसला कया। उ ह ने कहा क बंग-भंग के खलाफ़ जो आंदोलन उठ खड़ा आ है ‘उसम व भ समुदाय क एकता के बीज छु पे ए ह’। जहां तक आ थक ब ह कार का सवाल था तो गांधी क राय थीः ‘लोग के लए इससे बेहतर या हो सकता है क वे अपने बनाए व पहन, अपने ारा उ पा दत खाना खाएं और अपने जीवन के उपयोग म आनेवाली व तु का उ पादन कर?’ बंगाल म हो रही घटना क तुलना स म हो रहे लोकतां क आंदोलन से क गई। गांधी ने ट पणी क , ‘बंगाल म हो रहा वेदशी आंदोलन सी आंदोलन के समान है।’ उ ह ने आगे कहा, ‘अगर हमारे लोग एकजुट और धैयवान हो जाएं, अपने दे श को ेम करने लग, अपनी मातृभू म क बेहतरी के लए सोच और अपने वाथ को याग द तो हमारी जंज़ीर तो अभी टू ट जाएंगी।’12 ●

अपने काम और लेखन के बीच गांधी अपने प रवार के लए भी समय नकालते थे। जुलाई 1905 म उ ह ने बंबई म अपने एक म को लखा क वो ह रलाल को द ण अ का भेज दे । हालां क इं डयन ओ प नयन को शु करने म उनक बचत क रकम अ -खासी खच हो गई थी, ले कन क तूरबा और अ य ब को द ण अ क म रहने क वजह से एक बेटे का भारत म रहने का कोई मतलब नह रह गया था। गांधी ने लखा, ‘यहां मेरे ऊपर इतना यादा खच है क वहां उसका खच वहन करना मु कल है। न ही म ये दे ख रहा ं क ह रलाल का हत वहां सध रहा है।’13 ले कन ह रलाल भारत नह छोड़ना चाहते थे। अपने मां-बाप क इ ा के वपरीत वे राजकोट के वक ल ह रदास वोरा क बेट के ेम म पड़ गए थे।14 ह रलाल अब उनक काबू से बाहर थे, गांधी ने अपना सारा यान अपने सरे बेटे म णलाल पर क त कर दया। सतंबर म उस 13 साल के बालक को फ न स भेजा गया जहां उसे अपने चचेरे भाइय क दे खरेख म रहना था। गांधी ने छगनलाल से कहा था क म णलाल को अपने हाथ से काम करने द। उ ह ने कहा, ‘मु य बात है उस ज़मीन के बड़े टु कड़े को साफ करना और पौध म पानी दे ना। अगर वह पेड़-पौध क दे खभाल करता है तो वह खुद ही ब त कुछ सीख जाएगा।’15 कुल मलाकर दोन बेटे अ ायी तौर पर गांधी-गृह से बाहर थे, ले कन इसी बीच दो म उनके घर रहने आ गए। हेनरी पोलक ने अपने प रवार को मना लया था क वो उसे मली ाहम से ववाह करने क अनुम त दे दे । गांधी ने यहां अपनी भू मका नभाई। जब पोलक के पता ने दावा कया क लड़क अभी शारी रक प से शाद के लए पूरी तरह व नह है तो गांधी ने लखा क अगर मली वाकई कमज़ोर है तो ‘द ण अ का म यार भरे वातावरण, एक खूबसूरत जलवायु और साद -सरल ज़दगी के बदौलत वह शारी रक ताकत को हा सल कर लेगी जसक उसे ज़ रत है।’16 मली के लए गांधी ने कुछ सलाह और नदश दए। गांधी ने कहा क ‘लंदन म बचे उसके समय म उसे दादाभाई नौरोजी से मलना चा हए और उ ह स मान दे ना चा हए ज ह ांड ओ मैन, ऑफ इं डया कहा जाता था। वह भारतीय दे शभ के सबसे ऊंचे आदश को तुत करते ह।’ उसके बाद उसे ोमले म लेडी मा ट अ ताल जाना जाना चा हए जहां कभी गांधी के साथ रहनेवाले शाकाहारी डॉ. जो शया ओ फ मरीज़ का स त ‘फलाहार वाले भोजन के साथ इलाज करते ह’। उसे अ ताल म मरीज़ क दे खभाल क त के बारे म जानना चा हए ‘ य क यहां फ न स म हम ज द ही एक सेनेटो रयम खोलने जा रहे ह और वहां उसे जो भी अनुभव हा सल होगा वह मू यवान ही होगा।’ उ ह ने लंदन के नकट कह पर टॉल टॉय फाम के बारे म सुना था और गांधी ने कहा क मली को वहां जाना चा हए और जानने क को शश करनी चा हए क कस आधार पर वह बना है और काम कर रहा है। गांधी ने कहा, ‘मने तु ह काफ संकेत दे दए ह

क तु ह द ण अ का आने से पहले या- या अ ययन करना चा हए जो तु हारे लए उपयोगी होगा।’17 दसंबर 1905 के आ खरी स ताह म मली ाहम जोहांसबग प ंच गई। उसके अगले दन हेनरी और मली, गांधी के साथ र ज ार ऑफ यूरोपीय मै रजेज़ के द तर प ंच गए। उस ह वक ल ने उ मीद क थी क वह एक य द और ईसाई क शाद म गवाह बन सकता है ले कन र ज टार ने कहा क यह क़ानून ठ क नह है। उसने उ ह अगले दन आने को कहा। ले कन उसके अलगे दन र ववार था और उसके अगले दन यू ईयर डे था। वैसे भी मली और हेनरी ने काफ इंतज़ार कर लया था। अब गांधी चीफ म ज े ट के ऑ फस प ंच गए जसके अधीन र ज ार काम करता था। गांधी ने उसे अपनी बात से आ त कया क क़ानून म ऐसा कुछ भी नह है जसके मुता बक एक भूरा आदमी एक यूरोपीय जोड़े के ववाह का गवाह नह बन सकता। गांधी ने बाद म याद करते ए लखा इस पर चीफ र ज ार ‘हंस पड़ा और उसने गांधी को र ज ार के नाम एक नोट लखकर दया और उसके बाद ववाह व धवत नबं धत कर लया गया’।18 जब ववाह संप हो गया तो प त-प नी अ बमारल ट म गांधी के घर आ गए। मली ने लड़क को अं ेज़ी ाकरण और रचना पढ़ाना शु कया, साथ ही वह क तूरबा को रसोई म मदद भी करती थी। ज द ही दोन म हलाएं दो त बन ग । उनक दो ती म मली के गमजोशी से भरे वहार क वजह से क तूरबा का संकोची वभाव व अं ेज़ी का न जानना आड़े नह आया। गांधी और पोलक के लए दन क शु आत सवेरे ही हो जाती थी। छह बजकर तीस मनट पर लड़के और घर के पु ष आटा पीसने के लए जमा हो जाते थे। ना ते से पहले गांधी कुछ ह क उछल-कूद करते थे जो एक तरह का ायाम था और जसम गांधी कुशल थे। जब पु ष अपने काम पर चले जाते थे तो ब े पढ़ाई को बैठते थे जसम म हलाएं उनक दे खभाल करती थी। शाम को पूरा प रवार भोजन के लए जमा होता था जसम दन क घटना पर चचा क जाती थी। उसके बाद अगर घर म कोई मेहमान नह होता था तो धा मक ंथ को (खासकर गीता उनलोग को ब त य थी) ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा जाता था। गांधी प रवार के साथ रहते ए मली ने गौर कया क जहां तक वैवा हक संबंध क बात है तो प म और पूरब म मौ लक अंतर है। जहां एक तरफ पु ष को एक खास अंतराल पर आराम मलता था, वह उनक प नय को काम ही काम करना होता था। मली ने गांधी से कहा, ‘पूरब ने म हला को पु ष क जा बनाकर रख दया है। लगता है उसके पास अपनी कोई नजी ज़दगी नह है’। गांधी ने कहा क उसे गलत-फहमी ई हैः ‘पूरब ने उसे पूजा का दजा दया है।’ इसके सबूत म उ ह ने मली को सा व ी और स यवान क कथा सुनाई। जब स यवान क मृ यु हो गई तो सा व ी ने मृ यु के दे वता

यमराज से अपने प त को लौटाने क ाथना क । गांधी ने कहा, ‘उसे काफ क ठन लड़ाई लड़नी पड़ी। ले कन सव साहस, धैय, ेम और ान’ का दशन करने के बाद आ खरकार वह अपने प त को वापस पाने म सफल रही। इस पर मली ने जवाब दया क इस कहानी ने दरअसल उसी क बात को सा बत कया है। उसने कहा क ‘ऐसा लगता है क भारतीय दं तकथा और पुराण म य को पु ष क से वका माना गया है। यहां तक क मृ यु के दे वता तक से लड़ने का काम वो करती है’। पुराण और वा त वक जीवन म भी (ये दे खकर क गांधी कैसे अपनी प नी से वहार करते थे) मली ने पाया क भारतीय म हलाएं ‘हमेशा कसी खास पु ष को खुश करने का इंतज़ार करती रहती ह’।19 गांधी और पोलक के बीच भी तक- वतक होते रहते थे। उस अं ेज़ क राय म गांधी ब त ही यादा शांत वभाव थे। य क जब ेस म उनक आलोचना ई, उ ह उस मामले क उपे ा करने क बजाए उसका आ ामक जवाब दे ना चा हए था। पोलक जो क एक गहन समाजवाद था, उसने पाया क गांधी को आ थक स ांत म कोई दलच ी नह है और वे धा मक सम या म कुछ यादा ही डू बे ए ह। पोलक ने ये भी सोचा क अपने ब को गुजराती सखाने म यादा समय लगाने क बजाए गांधी को उ ह अं ेज़ी सखाने पर यादा जोर दे ना चा हए जो एक वै क भाषा है।20 एक बार जब पोलक और गांधी म गहन वाद- ववाद हो रहा था तो क तूरबा ने मली को एक कनारे बुलाया और पूछा क माजरा या है। उस अं ेज़ म हला ने भरसक क तूरबा को उन राजनी तक ज टलता को समझाने क को शश क जसने दोन को आवे शत कर दया था। मली ने बाद म याद कया क जब वह यह बात ‘क तूरबा को समझा रही थी तो उसके मन म एक संदेह पैदा आ क वह खुद भी उन बात से असहमत नह थी जन बात से पोलक, बापू जैसा क गांधी को घर म बोला जाता था, के साथ असहमत थे। कभी-कभी वह भी उनके साथ उलझ पड़ती थी और सरे (यानी पोलक), जसे वह जानती थी क जो गांधी का काफ याल रखते थे, उसके अपने गु से को स या पत करता तीत होता था।’21 पोलक अब अंशका लक प से इं डयन ओ प नयन के लए काम कर रहे थे। उसम उनक तता तब बढ़ गई जब जनवरी 1906 म प के संपादक एम. एच. नज़र क सोते व फ न स म मृ यु हो गई। जब नज़र क मौत ई तो उनक बगल म गीता रखी ई थी। 22 उसके अगले महीने प का हद और त मल भाग बंद कर दए गए। जहां छगनलाल, गुजराती प का भार दे खते थे तो पोलक अं ेज़ी दे खते थे। वे उनका संपादन करते, ूफ दे खते और खुद भी कई तंभ नय मत प से लखा करता। वह वदे शी आंदोलन का एक उ साही था जो आयरलड, पोलड और सरे उ पी ड़त रा म उसक अनुगूंज दे खा करता

था। हालां क पोलक ने गांधी के दे श क या ा नह क थी, फर भी भारतीय ेस क खबर को पढ़कर उ ह ने दे खा या सोचा क कैसे एक नया भारतीय सा ह य एक नई रा ीय आकां ा के साथ वक सत हो रहा है। उनक आंख के सामने एक नए भारत क एक रह यमय ले कन ईमानदार अवधारणा के साथ नेता क नई पौध सामने आती जा रही है। जो श द सबसे लोक य है वो है ‘भारत, भारतीय के लए’ और मातृभ ू म को उन लोग से शंसा मल रही है जनका दमाग कल तक लड़ते ए मत , खास-खास जा तय और मज़बूत ी से ए य ब हो रहे लोग क भावना से इ कार कर रहा था। हालां क आज एक रा ीय आशा क बात को सबसे यादा मह व दया जा रहा है। सभी े म रा ीय उ ोग पनप रहे ह और हरेक जगह दे सी उ पाद और वदे श न मत व तु क मांग है।23

यही उ साह हेनरी पोलक का भी था। इतने दल से भारतीय उ े य को अपना लेने के बाद पोलक अब एक ‘गैर-य द य द ’ के प म काम कर रहा था जो न सफ य द और गैर-य द क समानता के लए लड़ रहा था ब क हर तरह क ‘क रता, संक णता और धमाधता’ के खलाफ लड़ रहा था। हेन रक हाइन, काल मा स, रोज़ा ल ज़ेमबग और सगमंड ॉडय क तरह ही पोलक सफ अपनी न ल या जा त या मत क अभ करण के बारे म नह ब क ‘पूरी मानवता क एकता के लए सोच रहे थे’।24 उ ीसव सद के उ राध और बीसव सद के पूवाध म द ण अ का म य दय के लए एक रा ता उ मी से मी मा स ने खोल रखा था। हीरे और कोयले म नवेश क वजह से मा स अ य धक धनी हो चुका था और तेज़ी से शासकवग का ह सा बनना चाहता था। उसने साइं ट फक सोसाइ टय और ईसाई धम से संबं धत ग त व धत को संर ण दया था और उसने भ पु ष के लब म सद यता क को शश क थी। उसक ये तमाम को शश ‘वच वशाली एं लो-से सन सं कृ त म घुलने- मलने क या का एक ह सा थी’। द ण अ का म एक स मा नत अं ेज़ बनने क इ ा म उसने खुद को ए शयाई आ वा सय से कनारा कर लया। जब एक नए क़ानून ने य दय को भारतीय के समतु य रखने क बात कही, मा स ने चतुरता से और कामयाबी के साथ सरकार म अपने सा थय को आवेदन दे दया क ‘उसके लोग को कु लय के बराबर न रखा जाए’।25 यूरोपीय समुदाय म सै मी मा स के घुलने- मलने का जो तरीका था उसे कई तर पर द ण अ का म यादातर य दय ने अपनाया। ले कन उनम मह वपूण अपवाद भी थे, जसम अहम थे हेनरी पोलक। भारतीय के साथ पोलक क पहचान कुछ तो दाश नक तर पर थी, कुछ गत तर पर। गत तर पर यूं क वे मोहनदास गांधी का शंसक थे। फर भी उसक तुलना म गांधी के त लगाव और आदर कालेनबाख म थोड़ा सा यादा था। कालेनबाख एकाक जीवन जी रहे थे और हर संदभ म यूरोप म रह रहे अपने प रवार से र थे। कालेनबाख गांधी पर भरोसा और समथन के लए नभर था। सन् 1904 या 1905 का गांधी का कलेनबाख को लखा प उन दोन क नज़द क का सबूत है। कालेनबाख उस समय प र तय से वच लत थे और उ ह ने अपने भारतीय म को मदद के लए कहा था। गांधी ने लखा-

कसी भी क़ मत पर तु ह मन छोटा नह करना चा हए। धीरे-धीरे तुम उस भयानक व से बाहर आ जाओगे। चूं क तु हारा दमाग अभी वच लत है, ये सपने तु ह तु हारे गु त मन के बारे म चेत ावनी दे ने के लए आते ह जो तुम पर औचक हमला कर सकते ह जब तुम उसके लए तैयार नह रहोगे। तुम इन सपन को अपने बारे म हमेशा चतन करते ए अ बात म बदल सकते हो।

कालेनबाख के ः व पर यह ा या गांधी क अपनी थी, इसका ॉयड के द इंटर ेटेशन ऑफ ी स से कोई लेना दे ना नह था जो उस समय सफ जमन म ही उपल था। उसके बाद वह प मान सक से भौ तक नया म चला आया। गांधी ने आगे अपने उस आदश भोजन-वाद म को लखा, ‘कल मेरा खाना चार केला, तीन संतरा, एक नीबू, आधा पाउं ड टमाटर, खजूर, ढाई आउं स मूंगफली, बारह बादाम और एक पपीता था। दो बार द त आ। पछली रात 11 बजे सोने गया, चार बजे सुबह उठ गया। पांच बजे ब तर छोड़ दया। आंख म थोड़ी सम या हो रही है।’26 पी ढ़य से पोरबंदर के गांधी मांस-मछली से र थे। ले कन यह खास गांधी अब शाकाहार के चरम क तरफ अ सर था। उनके एक य लेखक और शोध के लए कसी जी वत ाणी को काटने-पीटने के स त वरोधी डॉ टर अ ा क सफोड ने दावा कया क फलाहार मनु य का ाकृ तक भोजन है जो उसक जीन संरचना के हसाब से अनुकूल भी है और उसने इसे वरासत म पाया है। इससे सर के त दयालुता भी बढ़ती है। लगता है क उसके भारतीय श य ने उसके स ांत को कुछ गंभीरता से ही ले लया था। ● सन 1905 म लंदन जैसे अं ेज़ी शहर या बंबई जैसे ह तानी शहर म भी एक गोरे और अ ेत का साथ-साथ रहना एक ब कुल असामा य बात थी। और जहां तक द ण अ का क बात थी तो वहां तो यह एक ां तकारी बात थी। वहां पर न ल के बीच मेलजोल के खलाफ़ जो पूवा ह था वह शायद नया के कसी भी ह से से यादा था। गांधी के लए कालेनबाख, पोलक, वे ट और अ य इस तरह के लोग के साथ दो ती एक बहा री का काम था, जब क उनके लए गांधी से दो ती करना अपनी परंपरा को चुनौती या ठगे पर रखने जैसा था। यह इकलौता घर कस तरह से ब न लीय था, यह छगनलाल क डायरी से साफ होता है। जनवरी 1906 म फ न स और इं डयन ओ प नयन क ग त व धय क जानकारी अपने चाचा को दे ने छगनलाल जोहांसबग प ंचे। उसके अलगे कुछ दन तक उसने ने जो कुछ दे खा उसक जानकारी वह कुछ यूं दे ते ह 4 जनवरी 1906: जोहांसबग टे शन प चा। रामा ामदास,, दे वा दे वदास,, भाई गांधी, और ीमती पोलक मुझे लेने के लए टे शन आए थे। उनके साथ 7 बजे घर प ंच ा। नहाने-धोने के बाद खाना खाया। प मी अंदाज़ के भोजन और तौर-तरीके दे खकर थोड़ा अचरज आ। मुझे आ य आ ले कन म ये तय नह कर पाया क

हमारा तरीका ठ क है या उनका...भोजन से पहले भाई गांधी, ने गीता के कुछ अथ बताया...।

ोक पढ़े और गुजराती म उसका

5 जनवरी 1906 : 5 बजे सुबह उठ गया और 6.30 तक तैयार हो गया...सभी लोग बना ना ते के काम पर चले गए...म भाई के साथ उनके ऑ फस गया जो वहां से करीब दो मील र था। रा ते म हमने इं डयन ओ प नयन के बारे म बात क । भाई ठ क 9.30 म अपना काम शु करते थे। उनके ऑ फस म एक लड़क को काम करते दे ख मुझे ता ुब आ। दोपहर म भाई और सरे लोग ने केला और मूंगफली का भोजन कया। तब ेस के अकाउंट उ ह सावधानी पूवक दखाए गए। साढ़े पांच बजे भाई के साथ घर लौटा। म फर से ता ुब म पड़ गया जब मने वहां अं ेज़ म को दे खा। वहां पोलक सबसे मल रहे थे। 6 जनवरी 1906 : पोलक क शाद के संदभ म कुछ लोग को भाई के घर पर रात के खाने के लए बुलाया गया था। उन अ त थय म अं ेज़, मुसलमान और कई ह थे। म सोचता ं क भोजन के समय उ ह ने मज़ाक क सीमा पार कर द । 11 जनवरी 1906 : मथ, पोलक और ीमती पोलक जो भाई के घर के ए ह, वे ब त व ं दता पूवक वहार कर रहे ह जो मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है।27

छगन ने जो कुछ दे खा उससे वे सोच म पड़ गए और मत हो गए-अपने चाचा के ऑ फस म ेत म हला स चव, भोजन के समय खुला हास-प रहास, अपने चाचा के घर ेम का शारी रक दशन (हेनरी और मली के बीच) और एक ही मेज़ पर ह , मुसलमान और यूरोपीय लोग को भोजन करते दे खना! उनक पारंप रक ब नया नगाह म वह घर परंपरा से डगमगा रहा था। जब क जोहांसबग के पारंप रक गोरे ईसाइय के लए वह घर ब कुल आधु नक था। जोहांसबग म रहने के दौरान गांधी ने पहले साल म ही सरे धम म अपनी गहरी दलच ी दखानी शु कर द । उ ह ने ब त सारे यूरोपीय पु ष (और कम से कम एक यूरोपीय म हला को) अपना म बनाया। इस बीच म त न ल के अ कय से उनका सा ा कार आ जसने उनके मान सक तज को और भी ापक बना दया। गांधी कभी-कभार केप टॉउन भी जाते थे, जहां एक छोटा सा ले कन स य भारतीय समुदाय रहता था और जन टश शासक से उनका वा ता था, उनका नवास भी वह था। इ ह या ा के दौरान उ ह म त न ल के एक राजनेता डॉ. अ ला अ रहमान के बारे म पता चला। अ ला एक केप मलय थे और गांधी क तरह ही इंगलड म उ ह ने पढ़ाई क थी (उ ह ने लासगो म मे डसीन क पढ़ाई क थी)। बाद म वह केप टॉउन आ गए और (गांधी क तरह ही) अपने पेशेवर काम को उ ह ने अपने सावज नक जीवन से जोड़ लया। डॉ. अ ला अ कन पो ल टकल ऑरगेनाइजेशन (एपीओ) के मु य ेरणा ोत थे जसने अ ेत के लए आवास का अ धकार और मता धकार क मांग क थी। सन 190506 म गांधी ने एपीओ क कुछ बैठक म ह सा लया था और कभी-कभार उसके प म लखा भी था। अ लरहमान के लए उनके मन म स मान था। ले कन आ खरकार उ ह ने

ये सोचा क उनका उ े य अलग-अलग और व श रहना चा हए। इं डयन ओ प नयन म लखे एक लाजवाब लेख म उ ह ने इसक वजह कुछ यूं बताई: अ ेत का यह संगठन अपने म भारतीय को शा मल नह करता ज ह ने खुद को भी इससे र कर रखा है। मुझे लगता है क भारतीय समुदाय ने ऐसा करके ठ क ही कया है। य क य तो जो तकलीफ उ ह ने और भारतीय समुदाय ने झेली है वो एक ही कार क ह ले कन उसका इलाज एक नह है। इस लए उ चत यही है क दोन अपने-अपने हसाब से अपनी लड़ाइयां लड़। य क जहां एक तरफ हम अपने प म सन 1857 क महारानी क घोषणा का उ लेख कर सकते ह, यहां के अ ेत वैसा नह कर सकते। हां, वे यह मज़बूत तक दे सकते ह क वे यहां के भू मपु ह। वे यह भी कह सकते ह क उनक जीवनशैली पूणतः यूरोपीय है। हम भारत मामल के से े टरी ऑफ टे ट के यहां अपनी तकलीफ के बाबत आवेदन दे सकते ह, जब क वे ऐसा नह कर सकते। वे अ धकांशतः ईसाई समुदाय से ता लुक रखते ह और अपनी सम या के लए पाद रय क मदद हा सल कर सकते ह। ऐसी कोई मदद हमारे लए उपल नह है।28

गांधी के ये वचार एक व श प रवतन क तरफ इशारा करते ह, अब वे साफतौर पर दे ख पा रहे थे क यूरोपीय समुदाय को छोड़कर द ण अ का म सभी न ल के लोग के साथ सां ा नक तौर पर भेदभाव हो रहा था। उ पी ड़त म सफ ह तानी ही नह थे। फर भी इन भेदभाव से मु पाने म हर समुदाय को अपना-अपना अलग रा ता अ तयार करना था। ● एक अं ेज़ जो गांधी के तुरंत बाद जोहांसबग गया था, उसने पाया क ‘वो शहर नया का सबसे यादा ज टल और शायद सबसे यादा स मो हत करनेवाला’ शहर था। हरेक महीने (और हरेक मनट) वह नए तरीक से न मत हो रहा था और हमेशा ग तशील था। वहां आनेवाले वासी कम से कम चार महादे श से आ रहे थे जो उस समृ म अपना ह सा मांगने आ रहे थे जो वहां क ज़मीन से नकले सोने से उपजी थी। उसने लखा क ‘यह आबाद का वै क व प है जो इस शहर को आकषक और ज टल बनाती है। यहां कोई एकरसता नह है, यहां कोई एकरसता नह है।’29 इसी संब ता या आपसी जुड़ाव क भावना का न होना, वहां के शासक न ल के लए चता क बात थी। टश वच व से बचने के लए बोर लोग द ण अ का के अंद नी ह स म पलायन कर गए थे। वहां उ ह ने दो वषम ले कन सामा य सामा जक व ा बना रखी थी-बोर और अ ेत। इसके बाद ओइटलडरस और ह तानी उस व ा को ज टल बनाते ए वहां आ गए। एक घनघोर यु के बाद ओइटलडस (अं ेज़) के साथ एक समझौता हो गया था। ले कन भारतीय लोग न तो यूरोपीय थे और न ही द ण अ क । वे एक ज टल त व थे जसने ेत और अ ेत सामा जक व ा म पेचीदगी पैदा कर द थी जसके नमाण क उ मीद गोर ने क थी।

इं लड और नीदरलड म—जहां से ये उप नवेशवाद आए थे—ये गोरे वहां क आबाद म वच वशाली थे। भारत और इंडोने शया म जहां अं ेज और डच ने शासन ा पत कया था, वहां वे ायी तौर पर रहना नह चाहते थे। इस मामले म द ण अ का अ त और खास था। यूरोप के लोग इसे अपना बनाना चाहते थे जस उ े य म सफ और सफ भारतीय ही उनके लए गंभीर बाधा बने ए थे। इस लए भारतीय के त उनके मन म अ य धक श ुता क भावना थी। सन 1905 म ांसवाल क या ा पर गए एक अं ेज़ ने ये अनुभव कया क ‘एक मज़ र, नौकर, फेरीवाले या ापारी के प म जहां कह भी हो, भारतीय अ ा काम कर रहे थे’। वे अपने काम म ‘गंभीर थे और शां त से’ काम कर रहे थे। सम या ये थी क एक ए शयाई जो एक गोरे से त धा करता था, उसपर गोर को ोध आता था। जो उ ह ज़मीन बेचता या कराए पर दे ता उसे हेय भावना से दे खा जाता और गोर के साथ त धा को असमान माना जाता’।30 सन् 1905-06 म ांसवाल एक सं मण के दौर से गुज़र रहा था। आं ल-बोर यु के बाद इसे ‘ ाउन कॉलोनी’ का दजा दे दया गया था। अब वहां एक ‘ ज़ मेवार सरकार’ दए जाने क तैयारी चल रही थी। एक नयी ‘ ेत द ण अ कावाद’ क भावना आकार ले रही थी जो डच और अं ेज़ उप नवेशवा दय के बीच सामंज य क राह खोज रही थी। हाल तक यु कर रहे इन दोन समूह ने अब अ ेत व अ य रंगीन लोग के खलाफ एक नया मोचा ा पत कर लया।31 ांसवाल के नए सं वधान म मता धकार उ ह को दया गया था जो यूरोपीय मूल के थे। हालां क शासक न ल के लए इतना ही काफ नह था—वे ऐसा क़ानून और नयम-कायदे वहां लागू करना चाहते थे जो धीरे-धीरे भारतीय क सं या म कमी करती जाती। नए गवनर लॉड सेलबन के प म उप नवेशवा दय को वहां एक बड़ा समथक भी मल गया। सेलबोन ने तेज़ी से अपने पूववत लॉड मलनर के एजडे को आगे बढ़ाने का काम शु कया। उप नवेश के लए से े टरी ऑफ टे ट को लखे एक गु त प म उसने अ ेत आ वा सय को वहां आने से रोकने के लए एक अ त योजना का ताव रखा। उसने कहा क भारतीय को यहां इस लए नह आने दे ना चा हए य क वे ह थयार चलाना नह जानते ह। उसने कहा, ‘जहां एक तरफ ेत न ल के लोग हमेशा लड़ाकू होते ह, भारत के लोग लड़ाकू जा त के नह ह’। आगे अगर डच और टश भ व य म फर से लड़ने लगे तो या होगा? ऐसे म संभावना है क ांसवाल ‘ फर से बोर के अधीन चला जाएगा जसक मु य वजह ये होगी क भारतीय आबाद के दबाव म अं ेज़, कॉटलड के लोग, आय रश इ या द लोग सरी जगह पर जा चुके ह गे’।32 सेलबोन ने मॉरीशस का उदाहरण दया जो कभी एक सुनसान टापू था और जसक खोज यूरोपीय लोग ने क थी। ले कन बाद म वहां ह ता नय क ब तायत हो गई और वे वहां क आबाद के 70 फ सद हो गए जब क गोरे महज़ 3 फ सद पर समट गए। उसने

आगाह कया क अगर ए शयाई लोग को ांसवाल से बाहर नह रखा गया तो वे लोग आनेवाले दन म ब मत हा सल कर लगे। गवनर ने लखा, ‘इस त म द ण अ का को हमेशा के लए यूरोप से आया तत सेना के अधीन रखना होगा— सफ बाहरी हमल से सुर ा के लए नह , ब क इसक दे सी आबाद म व ा कायम करने के लए भी।’ 33 गांधी इन प से नावा कफ थे और उ ह ने नए गवनर को भारतीय क सम या से अवगत कराने क उ मीद क । 29 नवंबर 1905 को गांधी के नेतृ व म एक त न धमंडल गवनर से मलने गया जसके सद य म चार गुजराती मुसलमान और एक त मल थे। उ ह ने उससे आ ह कया क वे क़ानून यो य आ वा सय को ांसवाल म आने और साथ ही ापा रय को भारत से का बल सहायक को लाने क भी इजाज़त द। उस श मंडल ने मांग क क ‘ ापा रय को आवास बनाने के लए नगर नगम के सामा य नयम के अधीन व ता और भवन नमाण मानक के आधार पर ज़मीन खरीदने क पूरी आज़ाद द जाए’। उ ह ने उसम गोर के लए एक आ तकारी शत ज़ र जोड़ी, ‘हम राजनी तक श नह चा हए, ले कन हम शां त और सौहादपूवक अ य टश नाग रक के साथ आ म-स मान के साथ रहना चाहते ह।’ उसके तीन महीने बाद गांधी के नेतृ व म एक सरा त न धमंडल उप नवेश मामल के उपस चव से मलने टो रया गया। उ ह ने उसे सोलह शकायत का पु लदा स पा जसम पर मट मलने म दे री, आवेदक पर गवाह तुत करने का दबाव, म हला को छू ट दे ने म मनाही (जब क वे ‘ कसी भी तरह से गोर को कोई त धा नह दे ती’), ब के ांसवाल म फर से आने म ई द कत और े न और ाम म लगातार जारी भेदभाव आ द थे।34 ले कन उन शकायत को खा रज कर दया गया। अब गांधी के ो साहन पर कुछ भारतीय ने उस परंपरा को पलटने क को शश क जसके तहत सावज नक जगह पर भारतीय और अ ेत लोग, यूरोपीय लोग के साथ या ा नह करते और कर सकते थे। जोहांसबग म उसी समय बजली के ाम शु कए गए थे। माच 1906 म ई. एसकोवा डया नाम के एक गुजराती ापारी ने गांधी के साथ काम करनेवाले एक अं ेज़ वक ल के साथ ाम म सफर कया। उसके बाद हेनरी पोलक ने टश इं डयन एसो सएशन के अ य अ ल गनी के साथ ऐसा ही कया। इन दोन मामल म भारतीय से कहा गया क वे ाम से उतर जाएं ले कन उ ह ने इसके खलाफ़ अदालत म अपील क और गांधी उनक तरफ से अदालत म पेश ए। जोहांसबग म आं ल-बोर शासन नया था और ाम तो और भी नया था। उसके इ तेमाल के लए कोई साफ क़ानून नह था। ले कन पुरानी परंपरा और पूवा ह क वजह से तय था क वे सफ गोर के इ तेमाल के लए है। उस वषय पर टॉउन काउं सल म बहस ई जसम सफ गोरे ही मबरान थे। उसम एक सद य ने कहा क अगर अ ेत को ाम म

सफर करने दया जाए तो इसके प रचालन को मुनाफे म बदला जा सकता है। ले कन सरे सद य ने इसका वरोध कया और कहा क अगर भारतीय उस पर चढ़े तो गोरे लोग उसका ब ह कार कर दगे जससे कंपनी को बंद होने पर मजबूर होना पड़े गा। कुल मलाकर ऐसा आ क सफ गोर और उनके पालतू जानवर के लए ही ाम म या ा करने का नयम बना दया गया।35 ● अपने काम के दौरान जस सरकारी अ धकारी के साथ गांधी का सबसे यादा वा ता पड़ता था उसका नाम था म टफोड चेमनी, जसे ोटे टर ऑफ ए शया ट स का पद हा सल था। चेमनी ने उससे पहले पूव भारत के चाय बागान म काम कया था और थोड़ा ब त ह तानी भाषा जानता था। उसके सामने गांधी ने उन आ ह और आवेदन का पहाड़ खड़ा कर दया जसम लोग अपने प रवार से मलने या ापा रक साझीदार से मलने ांसवाल आने क इजाज़त चाह रहे थे। वह उस वक ल (गांधी) क व ेषणा मक मता से बेहद भा वत था और साथ ही वह ‘उसके कानूनी द तावेज़ के अ ययन और कसी अ ध नयम क खा मय को पकड़ने क मता का भी कायल था’। हालां क उसक यह तारीफ भारतीय जीवनशैली के शंसा क हद तक नह प ंची: चेमनी ने शकायत क क म टर गांधी के सादा जीवन और एकांतवास के त मजबूत आ ह ने उनके शहर-वा सय को नीरस और यहां तक क अ चकर बना दया।’ कहने का मतलब ये था क गांधी के घर पर जो रा भोज होता था वह ऊपरी असम के चाय-बागान क पा टय क तरह नह होता था-उसम मासांहार, शराब या संगीत नह होता था। वो इस बात के म े नज़र था क गांधी खेलकूद, सामा य मनोरंजन और अ य समय बतानेवाली ग त व धय म ‘ दलच ी नह लेते थे’।36 चेमनी और गांधी का संबंध आदर और खीझ से भरा आ था। जब ोटे टर ऑफ ए शया ट स ने उन मांग को सीधे तौर पर खा रज़ कर दया तो गांधी ने लखा क वह फैसला ‘एक न मानने यो य आ य के प म सामने आया’। उ ह ने माना क उन आवेदन को खा रज़ कया जाना चेमनी क ‘अपनी ापना न होकर एक आ धका रक रवैए का तीक यादा था।’ अगली बार गांधी ने चेमनी के एक अधीन के खलाफ़ एक लंबा शकायत प लखा जो ‘एक नौजवान और कह क गु सैल कमचारी’ था और ‘आ ाप चाहनेवाल के त कठोरता से वहार करता था जो सर उठाकर उनसे पर मट हा सल करना चाहते थे। जहां तक चेमनी क बात थी तो वह गांधी के लगातार आवेदन दे ने से खीझ गया था। उसने अपने एक सहकम से शकायत क क ‘सबसे यादा जो एक एजट भा वत आ

है ख् पर मट के खा रज होने से , वो म टर गांधी खुद ह, जैसा क मुझे बताया गया है क जो अपने मुव कल को ये आ ासन दे ते ह क एक बार उ ह उनका शु क दे ने के बाद वे उ ह पर मट दलाकर रहगे।’ यह एक ब त ही घ टया ब क अपमानजनक आरोप था जो उसने गांधी पर लगाया था और वह लगभग सही था। सरकार को मले ‘ टश इं डयन एसो सएशन के चेयरमैन अ ल गनी’ के प पर ट पणी करते ए उसने कहा क ‘ म टर गनी एक अ श त ह और नाममा के अ य ह और उस एसो सएशन के से े टरी यानी म टर गांधी ही वह ह जसके साथ हमारा रोज़मरा का वा ता पड़ता है —भले ही उन प पर कसी और के द तखत य न ह ।’ 37 ● अ ैल 1906 म नटाल म एक जलू व ोह फूट पड़ा। दरअसल सरकार ने हरेक पु ष अ कय पर 1 पाउं ड का चुनाव कर लगा दया था जसका ल य राज व को बढ़ाना और वेतनभोगी नौकरी के लए बा य करना था। उस कर के खलाफ बड़े पैमाने पर नाराज़गी फैल गई। गांव से कई सरदार ने नटाल सरकार को संदेश भेजा क गांव के लोग कर अदा करने म असमथ ह। ले कन उन शकायत को खा रज़ कर दया गया। जब पु लस ज़बद ती उस कर को वसूलने के लए गई तो जलु ने उसका हसक तरोध कया। वह व ोह ( जसे अपने नेता के नाम पर बंबथा व ोह के नाम से जाना जाता है) ज द ही बल हो उठा और पूरे नटाल म फैल गया।38 अब नटाल के भारतीय के सामने सवाल ये था क वे व ोह के त कौन सा ख अ तयार कर? उस समय ांसवाल म भारतीय का भा य अधर म लटका आ था और गांधी जो क शासक के मन म अ ा भाव डालने के त फ मंद थे, उ ह ने इं डयन ओ प नयन के अपने पाठक से कहा क ‘म ये नह कह सकता क का फर का व ोह यायो चत है या नह । हम टश स ा क वजह से ही नटाल म ह। हमारा पूरा अ त व उसी पर टका आ है। इस लए हमारा ये कत है क हम जो भी मदद कर सक...कर...। अगर सरकार चाहती है तो हम एंबुलस कोर म मदद करनी चा हए।’ गांधी ने कहा, ‘घायल क सेवा करना उसी तरह मह वपूण है जैसा कसी सपाही का राइफल उठाना’।39 जून के पहले स ताह म 20 भारतीय को वयंसेवक के प म भत कया गया। उसम गांधी का नाम पहला था और ब त सारे त मल और उ र भारत के थे। गुजराती ापा रय ने समान और पैसे से मदद क । उ ह ने आटा और था लयां द और साथ ही पैसे भी दए जससे ओवरकोट, टो पयां और मोज़े खरीदे गए। उस 20 वयंसेवक म 13 पहले गर म टया मज़ र रह चुके थे। उनका काम सै नक श वर क साफ-सफाई, घायल क मरहम प और े चर पर उ ह लादकर लाना था। वह काम काफ क ठन था और कई बार

सुबह तीन बजे से ही शु 40

हो जाता था। कई बार वे लोग यु

ल के नज़द क भी होते थे।

मोच पर छह महीने तक काम करने के बाद एंबुलस कोर को भंग कर दया गया। जब गांधी डरबन प ंचे तो नटाल इं डयन कां ेस ने उनके वागत म एक भोज का आयोजन कया जसम गांधी ने सलाह द क सरकार को एक इं डयन कोर क ापना करनी चा हए। उ ह ने कहा क ‘अगर कसी वजह से उसम ापारी-गण शा मल नह होते ह तो सरे श त भारतीय, नौकर और लक ये काम आसानी से कर सकते ह।’ उ ह ने कहा क ‘लड़ाई के मैदान म गोर ने भारतीय के साथ ब ढ़या वहार कया था’ और अगर यह भाईचारे क भावना एक ायी भाव बन जाती है तो इसक ‘संभावना है क गोर के मन म भारतीय के त जो पूवा ह है, वह धीरे-धीरे ख म हो जाए।’41 उस व ोह को दबाने म रा य को करीब 10 लाख पाउं ड का खच आया था। उस लड़ाई म सरकार क तरफ से 31 जवान मारे गए थे जब क करीब 4000 अ कय ने अपनी जान गंवाई थी। उस लड़ाई म ‘भाल और ढाल के जवाब म अं ेज़ ने मशीनगन का इ तेमाल कया था’। हालां क इं डयन एंबुलस कॉकोर टश झंडे के त वामीभ था, ले कन उसने घायल क सेवा करने म ब कुल भेदभाव नह कया। जैसा क उस व ोह के एक शु आती इ तहासकार ने उ लेख कया, ‘उन घायल जलु क दे खभाल करने क गोर क त नक भी इ ा नह थी। अगर वहां इं डयन कोर नह होता तो शायद वे वह तड़प-तड़प कर मर जाते। वहां सैकड़ ऐसे भी अ ाक थे जनके साथ मारपीट क गई थी। भारतीय ने उनक दे खभाल क और उनके घाव तक धोए।’42 ● सन 1906 के आसपास मोहनदास करमचंद गांधी का जीवन व वधता से भरा आ था। इसके कम से कम छह अलग आयाम थे। पहला, उनका वकालत का पेशा था, यानी जोहांसबग और डरबन म अपने मुव कल से फ स लेकर उ ह कानूनी मदद दे ना। सरा, उनका राजनी तक काम था, यानी ांसवाल और नटाल म भारतीय के अ धकार क र ा के लए उनक को शश। हालां क इसम पैसा नह मलता था ले कन उसका पुर कार छोटा नह था। अपने समुदाय के अंदर उसने उ ह काफ त ा दान क । तीसरा, गांधी का एक चारवाद और ोपेगंडा फैलानेवाला प था जो एक सा ता हक प नकालता था और उसम खूब लखता था और अपने उ के हसाब से ऐसा लगता है क वे उस काम म, लेख लखने और उसके संपादन म खूब आनंद लेते थे। उनक चौथी तता जो सरे से संबं धत और तीसरे के ारा होती थी, वो थी भारतीय समुदाय के बीच वभाजन क खाई को कम करना या पाटना। चाहे वह द ण भारतीय और गुजरा तय के बीच हो या

फर ह और मुसलमान के बीच। उनक पांचवी ज़ मेवारी उनके प रवार के त थी — जसम सफ घर चलाने के लए पैसा कमाने क ही ज़ मेवारी नह थी ब क अपनी प नी के लए एक म और सखा क भी ज़ मेवारी थी जो अकेली एक वदे शी धरती पर रह रही थी जहां क भाषा वो बोल नह पाती थी। साथ ही उनक ज़ मेवारी अपने बेट के त भी थी जनक परव रश उनके पता क आवाजा हय क वजह से बा धत ई थी। और आ खर म गांधी क अपनी एक आ या मक जीवनशैली थी जसम वह अपने व क खोज म लगे रहते थे जैसा क उनक अंतर-धा मक प रचचा और एक उपयु भोजनशैली म आ था। वा य और अ या म म उनक च पहले से ही थी, उसम एक तीसरी च जुड़ गई थी—जो ज द ही उनका जुनून बनने वाली थी—और वो थी चय को कायम रखने क उनक इ ा। सन 1906 क ग मय (द ण अ क क ) के आ खर म गांधी जी ने चय का त ले लया। अब उसके बाद वे अपनी प नी के साथ कसी भी तरह का यौन संबंध नह बनाने वाले थे। उनक अपनी याद के मुता बक यह वचार उनके मन म ब त दन से चल रहा था। शायद इसक जड़ उन प रचचा म थ जो उ ह ने जैन गु रायचंदभाई के साथ क थ । जब गांधी ने लैड टोन और उनक प नी के दांप य ेम क तारीफ क —जैसा क उसके हाउस ऑफ कॉमंस क सद यता के दौरान भी उसक प नी ारा उसे चाय बनाकर पलाए जाने के दौरान आ था, इस पर उनके गु ने कहाइसम से कन दोन म से एक क आप यादा तारीफ करते ह? एक प नी के प म ीमती लैड टोन के ेम क या अपने उस संबंध से परे उनक सम पत सेवा क ? क पना क जए क वो उसक बहन होत या उसक सम पत नौकरानी होत और उसी तरह सेवा करत ...तो या आप उसी तरह से खुश होते? एक बार मेरे कोण पर वचार क जए।

रायचंद के पर वचार कर गांधी इस नतीजे पर प ंचे क उ ह अपनी प नी के साथ वशु तट संबंध बनाना चा हए। खासकर उ ह उनक ‘वासना’ क पू त का मा यम नह बनना है। अब उनसे जो संबंध होगा वह यौन संबंध से परे होगा। तो इस तरह से वह और क तूरबा अलग-अलग ब तर पर सोने लगे। उनका यह नणय इस वजह से भी आसान हो पाया क दोन ने तय कया क अब दोन को यादा ब े नह चा हए। जैन परंपरा म चय को एक उ ान हा सल है। यौन या म उ ेजना होती थी और वह आ मा के लए घातक थी। जै नय का यह भी मानना था क यौन या के दौरान ी शरीर म रहनेवाले ब त सारे सजीव त व न हो जाते ह। इस तरह से चय पूण अ हसा का एक ह सा था। इसके लए एक मक आचरण क बात कही जाती थी —इसे माननेवाल को कहा जाता था क दन म यौन या नह करना चा हए और धीरेधीरे उसे पूण संयम के लए तैयार कया जाता था। इ ु क चा रय को ब ढ़या सले ए

कपड़े , साबुन, सुगंध, गहना और आकषण के अ य तरीक को अपनाने से मना कया जाता था।43 उ के चौथे दशक क शु आत म रायचंदभाई ने खुद ही चय का त धारण कर लया था। ‘म हला पर एक कोण’ नामक प रचचा म उ ह ने इसके तक और कारण बताए थे। उ ह ने सामा य पु ष कोण को खा रज़ कर दया जसके मुता बक ‘भौ तक स ता के ोत के प म ी क क पना क गई थी’। उ ह ने कहा क ‘यौन या का आनंद महज णक होता है और थकावट और उ ेजना के हराव का कारण बनता है’। उस जैन गु ने ट पणी क क ‘वैवा हक आनंद के लए जस अंग का इ तेमाल कया जाता है, जब उसे भेदभाव क तीखी नगाह से दे खा जाता है तो वह घृणा के यो य भी तीत नह होता।’44 सन 1891 से लेकर—जब पहली बार गांधी क रायचंदभाई से मुलाकात ई थी—सन 1901 तक-जब रायचंदभाई क मृ यु ई, वह जैन व ान गांधी के लए एक नै तक पथदशक बना रहा। उनक मृ यु के बाद उनक याद और भी प व हो गई जैसा क कभीकभार उस श क के साथ होता है जो युवा अव ा म ही मृ यु को ा त हो जाता है। (जब आपका े य आपके पास से चला जाता है तो आप उसके आदश को और भी जीने क को शश करते ह)। ऐसा ही कुछ गांधी और रायचंदभाई के साथ था। नयावी महा वाकां ा के त उनक तट ता और शारी रक सुख या दखावट व -आभूषण के त उनक न ृहता ने गांधी को आनेवाले साल म यादा से यादा भा वत कया। जब रायचंद अठारह साल के थे तो उ ह ने एक छं द क रचना क थी और जसे गांधी उ त करना पसंद करते थे—उसम हम गांधी के सन 1906 म चय को धारण करने के नणय के बीज को दे ख सकते ह— म उस सव पद को कब जान पाऊंगा कब यह अंदर और बाहर का बंधन टू टेगा? कब म तेज़ी से बांधते इन बंधन को तोड़कर उस राह पर चल पडू ं गा जसे ा नय और महा मा ने चुना है? सभी वाथ से अपना दमाग र करके इस शरीर को सफ व- नयं ण म रखकर वह अपने कसी भी ग त उ े य क पू त नह चाहता इस शरीर म ऐसा कुछ नह दे खता जो अ ानता के अंधकार म राह दखा सके।45 गांधी के सामने अपने गु का उदाहरण था। और भी कई उदाहरण थे। ह और जैन परंपरा म याग को त ा हा सल थी, उसक तारीफ क जाती थी और यहां तक क

उसक पूजा भी क जाती थी। यौनाचार और मांसाहार के याग को एक उ तर शु , नै तक, अथपूण जीवन क तरफ बढ़ाया गया कदम माना जाता था।46 चय धारण करने के फैसले ने उ ह अपनी अंतरा मा क आवाज़ को सुनने पर मजबूर कया, उस आवाज़ पर ापक पुन वचार को मजबूर कया। जब बंबाथा व ोह शु आ तो उनको ज दबाजी म इं डयन एंबुलस कोर का गठन करने नटाल जाना पड़ा। उ ह ने तय कया क उनक गैर-मौजूदगी म क तूरबा और ब का फ न स म ही रहना बेहतर होगा जहां उनके दो त और संबंधी आसपास थे। वह व ा एक बड़े और अजनबी शहर क तुलना म बेहतर होगी। इसका मतलब था क उ ह जोहांसबग म एक खुला-खुला सा, बड़ा और सु व त मकान छोड़ना पड़ता। गांधी क नज़र म यह आव यक और अव यंभावी था। जैसा क उ ह ने बाद म याद कया, ‘इस बाद म मेरा ढ़ मत हो गया क ब को ज म दे ना और उनक परव रश सावज नक जीवन से तालमेल नह खाती...अगर म इस तरह से अपने समुदाय क सेवा म खुद को सम पत करना चाहता ं तो मुझे ब और धन क इ ा का प र याग करना पड़े गा और एक वान का जीवन जीना होगा।’47 अपने शा ीय प म या कह क ा णवाद व प म प रवार म कसी क परव रश के बाद जीवन क चौथी अव ा म सामा जक जीवन का प र याग कर दे ता है और जंगल जाकर जीवन के रह य के बारे म जानने क को शश करता है। ले कन गांधी के मामले म ऐसा आ क उ ह ने अपने प रवार से अपने आपको इस लए तट कर लया य क उ ह सामा जक और सावज नक जीवन म अ धक से अ धक भाग लेना था। कोई इस बात पर आ य कर सकता है क या वह पौरा णक यो ा भी म से भा वत थे ज ह ने स ा और सुख का याग करने के लए रा य का प र याग कर दया था और ववाह नह कया? भी म के चय को उनक नै तक पराका ा और धम के त उनक तब ता माना गया। ा ण ऋ षय क तरह वह योगी व प यो ा सामा जक जीवन से अलग नह आ, ब क उसने उसी म रहकर काय कया और अपने अनुया यय के बीच एक आदश और काशपुंज बनकर कायम रहा। ऐसा लगता है क गांधी का ल य भी वह था। सन 1906 म चय क शपथ लेते व गांधी टॉल टॉय के ेरक लेख ‘द फ ट टे प’ से भी ज़ र भा वत रहे ह गे जसका हाल ही म अं ेज़ी अनुवाद आ था। यहां पर उस सी महापु ष ने, जसक गांधी काफ शंसा करते थे लखा, ‘संयम के बना कोई भी अ ज़दगी नह सोची जा सकती। एक अ ज़दगी क हर उपल इसी से शु क जानी चा हए’। उसके बाद उ ह ने लखा: चय, वासना से मनु य क मु है...ले कन मनु य के भीतर ब त सारी वासनाएं छु पी ई ह और उनसे मु पाने के संघष म उसे सबसे पहले आधारभूत वासना से मु पानी चा हए.. जसके आधार पर सरी ज टल वासनाएं पैदा हो गई ह...ब त सारी ज टल उ ेजनाएं ह जैसे शरीर को सजाना, खेलकूद, मनोरंजन, चुगली,

उ सुकता और ब त सारे अ य। साथ ही ब त सारे आधारभूत वासनाएं ह जैसे भोजन, आलस, यौन ुधा आ द। इन वासना से लड़ाई म आ खरी से शु आत करना असंभ व है। हम इन ज टल वासना से लड़ने म पहले आधारभूत वासन के खलाफ़ लड़ाई शु करनी चा हए और वह भी न त म म। यह व ा उस व तु के सार और मानवीय ान क परंप रा ारा तय होती है।48

परंपरा या परव रश दोन से गांधी न तो ‘भु खड़’ थे- जसका ता पय टॉल टॉय के श द म मांसाहारी से था, न ही वे आलसी थे। एक आजीवन शाकाहारी और एक समय के पाबंद मेहनतकश पेशेवर के प म उ ह जस एक आधारभूत वासना से लड़ाई और मु लेनी थी वो थी—उनक ‘यौन ुधा’। और इस लए उ ह ने चय का त ले लया।

9 ांसवाल म उथल-पुथल

गांधी ने जैसे ही क तूरबा और ब को फ न स म व त कया, वे जोहांसबग आ गए। वहां उ ह ने एक छोटा सा मकान ले लया जहां वे मली और पोलक के साथ रहते थे। बेले ू ई ट म त यह मकान ॉय वल के मकान से आकार म आधा था: इसम आठ क बजाए सफ चार कमरे थे और येक इतने ही बड़े थे क उनम कसी तरह एक दो-जने का ब तर लग जाए।1 गांधी अपनी वकालत को कम कर रहे थे, अब उ ह अपने खच को सी मत करना था और यह अपे ाकृत छोटा सा घर उसक एक शु आत थी। मली पोलक ने बड़े सट क तरीके से इस नए घर का कुछ यूं च ण कया— वहां पर नल क कोई उ चत व ा नह थी और पुराने कराएदार ने सीढ़ के नीचे एक कामचलाऊ नानघर बना दया था। नानागार से बहा आ पानी द वार क बगल म एक गटरनुमा ग े क तरफ बहता रहता था जो अं धयारे ग लयारे के साथ था। इस तरह से द वार हमेशा नम रहती थी। इन वजह से उसम पतले-पतले ज क और कचुए पैदा हो गए जो घर म आ जाते थे।’2

मली उस जगह को यादा से यादा खुशनुमा बनाना चाहती थी ले कन उनके साथ रहनेवाला वो सादगी-पसंद ह तानी उसम आड़े आ गया। गांधी एक खाली फश और खाली द वार से संतु थे ले कन मली उसे खूबसूरत त वीर और कालीन से सजाना चाहती थी। जब मली ने कहा क एक कलाकृ त द वार क कु पता को ढं क दे गी तो गांधी ने उसे कहा क उसे द वार से बाहर झांककर सूया त क तारीफ करनी चा हए जो कसी भी इंसानी कलाकृ त से यादा खूबसूरत है। ले कन उसने ज़द क और हेनरी को अपने प म कर लया। फर गांधी मान गए और उ ह ने कहा क घर के खूबसूरत अंद नी भाग क तुलना कृ त के गौरव से नह क जा सकती। अगली बहस भोजन को लेकर थी। गांधी ने कहा क घर के भोजन म चीनी नह होनी चा हए, य क इसका नमाण गर म टया मज़ र के शोषण से आ है। उ ह ने क े याज़ और ध को इस आधार पर तबं धत करने क मांग क क उसके सेवन से वासना और उ ेजना बढ़ती है। मली को चीनी और याज़ छोड़ने से कोई द कत नह थी ले कन वह ध नह छोड़ना चाहती थी। उसने पूछा क अगर उस से वासना और उ ेजना म बढ़ो री होती है तो इसे ब के लए बेहतरीन भोजन य माना जाता है? गांधी ने इस पर

जवाब दया क ब के लए मां का ध अ ा होता है, ले कन वय क के लए कसी कार का ध ठ क नह है। इस पर मली ने तीखे वर म जवाब दया क ऐसा करने से लोग उ ह पेटू समझगे य क जोहांसबग म कोई भी घर ऐसा नह था जो भोजन को लेकर इतना च तत हो—खासकर इस बात को लेकर क या नह खाना चा हए। उसने गांधी से कहा, ‘ कसी का मू यांकन इस आधार पर कया जाना चा हए क उसके मुंह से या नकलता है, इस बात के आधार पर नह क उसके मुंह के अंदर या जाता है’! घर को व त करने के म म मली और पोलक मकान के साझीदार क दो पुरातन जातीय आदत से सीधे टकराए थे—जो आ खरकार इतने साल के बाद भी गांधी म बरकरार था। एक ब नया प रवार म ज मे गांधी ने अपनी जा त क परंपरा और आदत को उ वाद तरीके से वदा कर दया था। ब नया लोग धा मक मामल म कु यात प से ढ़वाद थे और मुसलमान के त एक खास नापसंदगी का भाव रखते थे। जब क गांधी मुसलमान और ईसाइय के साथ व ं द प से मलते-जुलते थे और यहां तक क उनके साथ घर म भी रहते थे। ब नय का धम पैसा बचाना और पैसा बनाना था ले कन गांधी ने एक शानदार वकालत के बदले समाज सेवा को अपना पेशा बना लया था और उनके मन म अपने या ब के लए पैसा जमा करने क कोई इ ा नह थी। ब नया लोग राजनी तक आंदोलन से र रहते थे—वे भारतीय रा ीय कां ेस से भी र थे (जहां ा णा और य क अ य धक सं या थी)। जब क गांधी राजनी तक प से काफ स य थे। कुल मलाकर वे अ धकांश मामल म उदार थे ले कन कम से कम दो आदत ऐसी थ या कह क उनक जातीय आदत थी जसे वे छोड़ नह पाए थे। उसम से एक थी —स दयवाद के त आकषण और खास भोजन आदत के त क रता।3 ले कन तमाम असहम तय के बावजूद मली ने अपने भारतीय म के त एक आदर क भावना बनाए रखी। खासकर वह इस बात से अचं भत थी क वो कतनी कड़ी मेहनत करते थे। वह र ववार समेत सभी दन अपने मुव कल से मलते थे। पोलक दं पती भारतीय के आद हो गए जो हमेशा अपने नेता और वक ल से मदद मांगने आते ही रहते थे। जैसा क मली ने याद कया, ‘बीच रात म म टर गांधी के साथ चार या यादा लोग को लौटते दे खना कोई असामा य बात नह थी और वे सभी इतने थके होते थे क बात करने क त म नह होते थे और उनके सोने के लए कालीन हटाकर ग लयारे म डाल द जाती ता क वे कुछ घंटे सो सक और सुबह अपने काम पर जा सक।’4 प मी दे श म जब गांधी के चय पर चचा होती है तो लोग म अ सर गु से क भावना पाई जाती है क गांधी ने ऐसा करते समय अपनी प नी क राय य नह ली। वे एकतरफा यौनसंबंध का प र याग कैसे कर सकते थे? उस त म या होता अगर वो उसे जारी रखना चाहत ? यह त या ब त ही आधु नक (और प मी है)। संभवतः ऐसा नह था क क तूरबा गांधी के चय के फैसले से वच लत थी। उ ह जो बात च तत कर

रही थी वो ये क गांधी के इन त का कह व तार न हो जाए और वे प रवार और ब से भी न र चले जाएं। वो गांधी से शारी रक प से र रहने से शायद असहज नह थी, ब क उनक चता मान सक और भावना मक री क थी। क तूरबा अपने प त और उनके सबसे बड़े बेटे ह रलाल के संबंध को लेकर खी थ । दोन म नह पटती थी। ह रलाल के ज म के कुछ ही दन के बाद गांधी लंदन चले गए थे। सन 1892-3 म जब वह बंबई म थे तो ब े राजकोट म थे। जब ब े उनसे मलने आए, तो उसके लगभग तुरंत बाद गांधी ने द ण अ का जाने का फैसला कर लया। सन 1896 म ही प रवार फर से एक त हो सका और उ ह ने साथ-साथ डरबन क या ा क । ले कन सन 1902 म वे फर से अलग हो गए। ह रलाल एक कमज़ोर छा था और जस भी कूल म वह पढ़ने गया उसम असफल ही रहा। इससे गांधी च तत थे, शायद इसक वजह यह थी क कभी वह खुद एक र छा रहे थे। उ ह ने क तूरबा से कहा था क वो सारे बेट को द ण अ का ले आएं। ले कन ह रलाल भारत म ही रह गया और ऊपरी तौर पर उसने इसक वजह ये बताई क उसे मै कुलेशन क परी ा दे नी है। ऐसा लगता है क तब तक पता और बड़े बेटे म र ता खराब होने लगा था। 28 दसंबर 1905 को गांधी ारा लखे एक प से कुछ ऐसा ही पता चलता है। उस प म गांधी ने ह रलाल को लखा क वो उ ह लगातार प न लखे जाने क वजह से उससे ‘असंतु ’ ह। उ ह ने आगे लखा क जब भी वह कसी सरे से खबर पाते ह ‘उसम तु हारे याकलाप के बारे म आलोचना होती है’। गांधी ने शकायत क क ‘अपने माता- पता के त तु हारे आचरण से उनके त तु हारा कोई ेम नह झलकता’।5 जब गांधी को ये पता चला क ह रलाल उनके दो त ह रदास वोरा क बेट चंचल6 से यार करता है तो बाप-बेटे बीच संबंध और खराब हो गया। गांधी क राय म दोन उस समय ववाह यो य नह थे ले कन राजकोट म रहनेवाले गांधी के भाई ल मीदास ने दोन क शाद करवा द । उनक शाद 2 मई 1906 को ई। जब ये बात गांधी को पता चली तो उ ह ने अपने भाई को ये कहते ए प लखा क ‘ये अ ा है क ह रलाल का ववाह हो गया, न भी होता तो भी अ ा होता। य क मने अपने बेटे के तौर पर उसके बारे म सोचना बंद कर दया है।’7 उस प क भाषा और उसक कठोरता इस बात से आं शक प से ही त व नत होती थी क ह रलाल कई अव ा का दोषी था, वह ठ क से पढ़ाई नह करता था, वह जोहांसबग नह आया, वह नय मत प से पता को प नह लखता था और सबसे बुरी बात ये क उसने ववाह के बारे म अपने पता क राय नह मानी। पता-पु के बीच के इस संबंध से क तूरबा ब त ही च तत थ । एक (भारतीय) मां के प म शायद वह ह रलाल क गल तय को माफ करने म यादा उदार थ । ले कन उ ह ने ये भी दे खा क गांधी का वहार भी ब त सरल-सहज नह था— क वे कभी तो ह रलाल के त काफ उपे ा का

भाव रखते तो कभी उस पर हावी होने का यास करते। दोन के बीच सुलह कराने के लए उ ह ने ह रलाल से द ण अ का आने को कहा। जब इस पर ह रलाल राज़ी हो गया तो गांधी ने ोटे टर ऑफ ए शया ट स म टफोड चेमनी को एक लंबा प लखा जो प त, प नी और उनके पहले बेटे के बीच के तीन-तरफा तनाव को दशाता है। वह प 13 अग त 1906 का है— डयर म टर चेमनी, मुझे फर से एक नजी मसले पर आपसे आ ह करना पड़ रहा है। मेरा बड़ा बेटा ह रलाल भारत से रवाना आ है। उसने म बासा से फ न स एक प भेजा है जसके बारे म मेरे भतीजे ने मुझे सूच ना द है...हालां क मेरा लड़का आज के दन म कुछ यादा उ का यानी अठारह साल का है, ले कन उसका पर मट कै टन फाउल ने जारी कया था जब सन 1904 म ीमती गांधी यहां आई थ । ीमती गांधी से प मलने के बाद मने पर मट के लए आवेदन कया था, ले कन ीमती गांधी मेरे बड़े बेटे और भतीजे के बना ही आ ग । उस समय मेरा भतीजा छगनलाल तो आ गया ले कन ह रलाल नह आ पाया य क वह